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11 जून 2015

30-35 लाख टन सोयाबीन बचने की उम्मीद

खरीफ 2015 सत्र में बुआई से पहले तक 30-35 लाख टन सोयाबीन शेष रहने की उम्मीद है। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के चेयरमैन दवीश जैन कहते हैं, 'पूरे सत्र में सोयाबीन आपूर्ति कमजोर रही है। आगे अच्छी कीमतें मिलने की उम्मीद के बीच किसानों ने अपने उत्पाद बचाए रखे। हमें लगता है कि इस साल 30-35 लाख टन सोयाबीन शेष रह सकता है।'

जैन ने कहा कि बुआई की बाद करीब 10-15 लाख टन सोयाबीन शेष रह सकता है। बाजार के जानकारों का कहना है कि बुआई के बाद अगर किसानों ने अपने भंडार खाली करने चाहे तो बाजार में पिछले साल का सोयाबीन उपलब्ध हो सकता है। सोयाबीन की बुआई मध्य जून से शुरू होती है। इसे अधिक पानी की जरूरत होती है इसलिए मॉनसून आने के बाद ही इसकी बुआई शुरू होती है। प्रदेश में मॉनसून आम तौर पर 14-15 जून के बाद पहुंचता है। मौसम विभाग के अनुसार चक्रवाती तूफान 'अशोबा' के कारण मॉनसून आने में कुछ दिनों की देरी हो सकती है। (BS Hindi)

निर्यात में कमी से उधड़े धागे

चीन को किए जाने वाले सूती धागे का निर्यात घटने और कमजोर मांग की वजह से इनकी कीमतें घटने से पिछले वित्त वर्ष के दौरान भारतीय कताई मिलों के प्रदर्शन पर बहुत बुरा असर पड़ा है। पूरे भारत की कताई मिलों के मुनाफे पर इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है। कच्चे माल की कीमतों में आई गिरावट के बावजूद मिलें वित्त वर्ष 2015 में बेहतर मुनाफा कमाने में नाकाम रहीं क्योंकि उन पर पहले का बकाया काफी अधिक है और उन्हें जरूरत से ज्यादा आपूर्ति की स्थिति का सामना भी करना पड़ रहा है। बिज़नेस स्टैंडर्ड रिसर्च ब्यूरो द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक 46 सूचीबद्घ कताई कंपनियों की कमाई वित्त वर्ष 2015 में स्थिर रही। वित्त वर्ष 2014 में इन कंपनियों की कमाई 32,813 करोड़ रुपये थी जो वित्त वर्ष 2015 में घटकर 32,483 करोड़ रुपये रह गई। दूसरी तरफ उनका मुनाफा 1,041 करोड़ रुपये से घटकर महज 76 करोड़ रुपये रह गया। मार्च तिमाही में इन कंपनियों को तगड़ा झटका लगा और ज्यादातर कंपनियां घाटे में रहीं।

भारत के कपड़ा क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक ओसवाल समूह के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक भी इस बात की पुष्टिï करते हुए कहते हैं कि चीन से कम होती मांग, भारत सरकार द्वारा बाजार केंद्रित योजनाओं को वापस लिए जाने और उधार लेने की उच्च लागत की वजह से पिछले एक साल के दौरान कताई क्षेत्र के प्रदर्शन पर बहुत  बुरा असर पड़ा है। दो साल पहले सूती धागे की मांग में चीन की ओर से बढ़ोतरी और अब अचानक आई गिरावट ने धागा निर्यातकों को अन्य विकल्पों की ओर गौर करने का मौका ही नहीं दिया और इस वजह से देसी बाजार में जरूरत से अधिक आपूर्ति की स्थिति उत्पन्न हो गई और कीमतें 10-12 फीसदी तक गिर गईं। मुनाफे में गिरावट आने की यह एक प्रमुख वजह है। उन्होंने कहा कि चूंकि वियतनाम अपनी कताई क्षमता का विस्तार कर रहा है और खबरें यह भी हैं कि चीन वियतनाम में कताई क्षेत्र में निवेश कर रहा है। इससे भारतीय कपास निर्यातकों के लिए एक और मुसीबत खड़ी हो सकती है।

सूत्रों का कहना है कि छोटी मिलों ने भी अपनी क्षमता में करीब 20 फीसदी की कटौती कर दी है। अब कताई उद्योग का जोर पूरी तरह देसी उद्योग की मांग पर है। अप्रैल, 2014 के दौरान चीन सरकार ने स्थानीय उत्पादकों की मदद करने के लिए कच्चे कपास को इकटï्ठा करने के तीन साल के कार्यक्रम को बंद कर दिया और इसके बजाय सरकार सीधे किसानों को सब्सिडी देने की पेशकश कर रही है। कपास के स्टॉक को निपटाने की चीनी सरकार की नीतियों के परिणामस्वरूप चीनी कताई मिलों को स्थानीय बाजार से ही सस्ती दरों पर कपास मिलने लगा है और इसकी वजह से आयात पर उनकी निर्भरता कम हो गई है। इसकी वजह से वित्त वर्ष 2015 में चीन को किए जाने वाले कपास और सूती धागे का निर्यात तेजी से कम हुआ। चीन अभी भारत से कपास का आयात करने वाले देशों की सूची में सबसे आगे है। भारत से होने वाले सूती धागे के निर्यात में चीन की हिस्सेदारी करीब 46 फीसदी है। इसमें काफी गिरावट देखने को मिलेगी जिससे भारतीय कताई मिलों की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ा है। कनफेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (सीआईटीआई) के महासचिव डी के नायर ने कहा कि बांग्लादेश, वियतनाम और मिस्र जैसे वैकल्पिक बाजार निर्यातकों को कुछ राहत दे सकते हैं लेकिन उनका आधार बहुत ही छोटा है।

चीन बहुत बड़ा बाजार है। छोटे देशों को अधिक निर्यात करने से नुकसान को कुछ हद तक कम करने में मदद मिल सकती है लेकिन मिल मालिकों की चिंता अभी भी बरकरार है। देश के प्रमुख मिल मालिकों का मानना है कि भारतीय कपास निगम के पास कपास की 85 लाख गांठें उपलब्ध हैं जो कुल सालाना फसल का करीब 20 फीसदी हिस्सा है। कारोबारियों का कहना है कि निगम को कीमतें कम करने के लिए स्टॉक की बिकवाली शुरू करनी चाहिए। इस स्तर पर कपास की कीमतों में सुधार होने से किसानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन इससे कताई क्षेत्र को बचाने में मदद मिल सकती है। नायर ने बताया कि भारत के कताई क्षेत्र और कपड़ा क्षेत्र के बीच बढ़ते अंतर की वजह से देसी बाजार में जरूरत से ज्यादा आपूर्ति हो जाएगी जिससे भारतीय मिलों की निर्भरता निर्यात मांग पर बढ़ गई है। कॉटन टेक्सटाइल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन आर के डालमिया ने कहा, 'कपास की फसल अच्छी होने और कपास निगम के पास भरपूर स्टॉक होने के बावजूद मिलमालिक कपास के लिए भारी रकम चुका रहे हैं। कमजोर मांग की वजह से मार्जिन कम होता है और सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही है।'

त्यागराज मिल्स, मदुरै के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक टी कन्नन का मानना है कि फिलहाल हालात भले ही मुश्किल नजर आ रहे हों लेकिन इसके आखिर में बहुत ही उजाला है। यूरोप और अमेरिका से मांग में तेजी आने की वजह से इस साल कपड़ा क्षेत्र के अच्छा करने की उम्मीद है। इससे देसी क्षेत्र में कपास धागे की मांग में तेजी आ सकती है।  केयर रेटिंग्स में कॉरपोरेट रेटिंग्स के प्रबंधक कुणाल मोदी ने कहा, 'आने वाले महीनों में मांग की स्थिति में बदलाव हो सकता है क्योंकि यूएई जैसे ठिकाने मंदी के दौर को कपड़ा क्षेत्र के लिए एक अवसर के तौर पर परिवर्तित कर सकते हैं, इसके अलावा यूरोपीय संघ और अमेरिका में बढ़ती मांग भी निर्यात को बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है। आने वाले 3-6 महीने भारतीय कताई क्षेत्र के लिए काफी मुश्किल होंगे।' उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2014 कई कपास कताई मिलों के लिए बेहतरीन साल रहा, इसकी वजह निर्यात और उपभोग में तेजी रही। (BS Hindi)

चीनी उद्योग सस्ते कर्ज के ऐलान से नहीं खुश

चीनी उद्योग के प्रमुख संगठन इस्मा ने आज कहा कि सरकार का 6,000 करोड़ रुपये का ब्याज मुक्त ऋण देने का निर्णय सार्थक नहीं होगा क्योंकि इससे अधिशेष भंडार की समस्या तथा चीनी की कम कीमत के मुद्दे का समाधान नहीं होगा। इस्मा के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने कहा, 'सरकार ने चीनी उद्योग के लिए एक साल की छूट के साथ 6,000 करोड़ रुपये के ऋण की घोषणा की है। यह सार्थक नहीं होगा। इससे अधिशेष भंडार की समस्या तथा चीनी की कम कीमत के मुद्दे का समाधान नहीं होगा।' उन्होंने कहा कि गन्ना किसानों का मौजूदा 21,000 करोड़ रुपये बकाया है जिसमें 6,000 करोड़ रुपये की कमी अएगी लेकिन इस बाद भी बड़ी राशि बकाया रह जाएगी।

 वर्मा ने कहा कि इसकी जगह केंद्र को सार्वजनिक क्षेत्र की एजेंसियों को 25 से 30 लाख टन चीनी खरीदने के लिए सरकारी एजेंसियों को रिण देना चाहिए। उन्होंने कहा, 'सरकार ने केवल एक साल के लिए ब्याज मुक्त ऋण देने की निर्णय किया है जबकि इससे पहले फरवरी 2014 में घोषित योजना में पांच साल की छूट थी।' वर्मा का मानना है कि उद्योग के लिए एक साल में 6,000 करोड़ रुपये लौटाने के लिए इतनी कमाई करना असंभव है। महाराष्ट्र की चीनी मिलें भी केंद्र के फैसले से नहीं हुईं खुश महाराष्टï्र का सहकारी चीनी उद्योग भी चीनी मिलों को 6,000 करोड़ रुपये ब्याजमुक्त ऋण मुहैया कराने के केंद्र सरकार के फैसले से बहुत खुश नहीं है। इसके बजाय उद्योग ने केंद्र से प्रति टन 850 रुपये की वित्तीय मदद, 50 लाख टन का बफर स्टॉक बनाने और कच्ची चीनी प्रोत्साहन (हाल में 4,000 रुपये प्रति टन की राशि घोषित की गई) को 2019-20 तक विस्तारित करने की मांग की है।

कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांगे्रस पार्टी से संबंध रखने वाले सहकारी चीनी उद्योग के नेताओं ने तर्क दिया कि 6,000 करोड़ रुपये ब्याजमुक्त ऋण देने से गन्ना किसानों को भुगतान, ब्याज का पुनर्भुगतान करने का मसला नहीं सुलझेगा। महाराष्टï्र की सहकारी और निजी चीनी मिलों को गन्ना किसानों का 3,400 करोड़ रुपये का भुगतान करना है। इसमें से सहकारी मिलों पर कुल 1,900 करोड़ रुपये बकाया है। उनका कहना है कि उनकी खराब वित्तीय स्थिति की सबसे प्रमुख वजह उत्पादन की लागत और चीनी की गिरती कीमतों के बीच बढ़ता अंतर है। चीनी की मौजूदा कीमतें 2,100-2,300 रुपये प्रति क्विंटल है जबकि उत्पादन लागत 3,200-3,400 रुपये प्रति क्विंटल के बीच हैं। वर्ष 2014-15 के पेराई सीजन में सभी 178 चीनी मिलों ने हिस्सा लिया और 105 लाख टन से भी अधिक चीनी का उत्पादन किया।  

महाराष्ट्र में सहकारी चीनी मिलों के संघ के प्रबंध निदेशक संजीव बाबर ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'केंद्र सरकार के इस फैसले से वित्तीय संकट से जूझ रही सहकारी चीनी मिलों को जरूरी राहत नहीं मिलेगी। इन मिलों का नुकसान से उबर पाना मुश्किल होगा। सरकार को 850 रुपये प्रति टन की वित्तीय मदद मुहैया कराने की जरूरत है और ऋण पुनर्गठन के लिए कदम उठाने की जरूरत है।' उन्होंने बताया कि ज्यादातर सहकारी चीनी मिलों को डर है कि बैंक उन्हें ऋण नहीं देंगे। इस बीच सहकारी चीनी मिलों को बेसब्री से 2,000 करोड़ रुपये के ब्याजमुक्त ऋण का इंतजार है जिसकी घोषणा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मॉनसून सत्र के दौरान की थी। राज्य सरकार पहले ही यह संकेत दे चुकी है कि चीनी उद्योग को आगे सरकार से किसी तरह की सब्सिडी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। (BS Hindi)

चावल जमा नहीं करने वाली मिलों पर होगी कार्रवाई

छत्तीसगढ़ सरकार ने कस्टम मिलिंग का चावल जमा नहीं करने वाली चावल-मिलों पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। आधिकारिक सूत्रों ने आज यहां बताया कि राज्य के खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री पुन्नूलाल मोहले ने अनुबंध के अनुसार कस्टम मिलिंग का चावल जमा नहीं करने वाली मिलों पर नियमों के तहत कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

मोहले ने अधिकारियों को ऐसी मिलों की सूची तैयार करने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। राज्य सहकारी विपणन संघ के प्रबंध संचालक एस भारती दासन ने बताया कि खरीफ विपणन वर्ष 2014-15 में राज्य में समर्थन मूल्य पर किसानों से 63 लाख टन धान की खरीद की गई है। इसमें से 52 लाख टन धान का उठाव हो चुका है। दासन ने बताया कि राज्य में पंजीकृत मिलों की संख्या 1,544 है। चावल मिलों के पास दी गई कुल धान की मात्रा 52 लाख 8 हजार टन है। जिलों में कुल जमा चावल की मात्रा 32 लाख 42 हजार 581 टन है। (BS Hindi)

मेंथा तेल की नई आवक षुरु, पैदावार कम होने का अनुमान


आर एस राणा
नई दिल्ली। प्रमुख उत्पादक मंडियों में मेंथा तेल की नई आवक षुरु हो गई है। चालू फसल सीजन में मेंथा तेल का उत्पादन पिछले साल की तुलना में करीब 14,000-15,000 हजार टन कम होने का अनुमान है। ऐसे में आगामी दिनों में मेंथा तेल की कीमतों में तेजी आने की संभावना है। गुरुवार को उत्पादक मंडियों में मेंथा तेल के भाव 1,070 से 1,075 रुपये प्रति किलो रहे।
मेंथा कारोबारी अनुराग रस्तोगी ने बताया कि चालू सीजन में मेंथा तेल का उत्पादन घटकर 35,000 से 37,000 टन ही होने का अनुमान है जबकि पिछले साल पैदावार 50,000 टन से ज्यादा की हुई थी। उन्होंने बताया कि पिछले साल मेंथा तेल के भाव नीचे रहे थे जिसकी वजह से किसानों ने इस बार बुवाई कम की, साथ ही प्रतिकूल मौसम का असर भी फसल पर देखा गया। उन्होंने बताया कि उत्पादक मंडियों में 25 से 50 ड्रम (एक ड्रम-180 किलो) नए मेंथा तेल की आवक षुरु हो गई है तथा चालू महीने के आखिर तक आवक बढ़ जायेगी। हालांकि पैदावार कम होने का अनुमान है ऐसे में मौजूदा कीमतों में अभी ज्यादा गिरावट की संभावना नहीें हैं।
मेंथा निर्यातक जुगल किषोर ने बताया कि मेंथा उत्पादों में इस समय निर्यातकों की मांग कमजोर है। आयातक नई फसल को देखते हुए नए सौदों से परहेज कर रहे हैं तथा फसल के सही आकंलन के बाद जुलाई-अगस्त में निर्यात मांग निकलने की संभावना है। हालांकि कुछ बड़ी कंपनियां विदेषों में स्थिेंटिक मेंथा तेल का उपयोग कर रही है जिसका असर मेंथा तेल की निर्यात मांग पर पड़ सकता है।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार वित वर्ष 2014-15 के पहले 9 महीनों में देष से मेंथा तेल का निर्यात बढ़कर 21,700 टन का हो चुका है जोकि पिछले वित वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 11 फीसदी ज्यादा है। वित वर्ष 2013-14 में अप्रैल से दिसंबर के दौरान 19,546 टन मेंथा उत्पादों का निर्यात हुआ था। मसाला बोर्ड ने निर्यात का लक्ष्य 21,000 टन का रखा था।
मेंथा व्यापारी सुरेष जैन ने बताया कि उत्पादक मंडियों में 400 से 450 ड्रम मेंथा तेल की दैनिक आवक हो रही है, इसमें 25 से 50 ड्रम नया मेंथा तेल है। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में पैदावार कम हुई है तथा जुलाई-अगस्त में निर्यात मांग बढ़ सकती है, जिससे जुलाई-अगस्त में भाव तेज रह सकती है। गुरुवार को संभल मंडी में मेंथा तेल के भाव 1,070 रुपये और चंदौसी में 1,075 रुपये प्रति क्विंटल रहे।.....आर एस राणा

केंद्र सरकार की सख्ती से दलहन की कीमतों में नरमी


आर एस राणा
नई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा दलहन की बढ़ती कीमतों पर अंकुष लगाने के उपायों का असर कीमतों पर देखा गया। उत्पादक मंडियों में दलहन की कीमतों में गुरुवार को 100 से 200 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट दर्ज की गई।
दलहन कारोबारी एस उपाध्याय ने बताया कि केंद्र सरकार ने दलहन की कीमतों पर अंकुष लगाने के लिए राज्य सरकारों को पत्र लिखकर जरुरी कदम उठाने की मांग की है, साथ ही आयात बढ़ाने की संभावना भी तलाषी जा रही है। इसका असर गुरुवार को उत्पादक मंडियों में दलहन की कीमतों पर देखा गया। दिल्ली में चना के भाव घटकर 4,600 रुपये, मूंग के भाव 7,000 से 7,100 रुपये, मोठ के भाव 6,800 से 7,000 रुपये, उड़द के भाव 8,250 रुपये और मसूर के भाव 6,700 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।
दलहन आयातक फर्म के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि म्यांमार से आयातित दालों के भाव में हल्की नरमी दर्ज की गई। लेमन अरहर के भाव मुंबई में 1,160 डॉलर प्रति टन रहे तथा इसमें 10 डॉलर की गिरावट आई। मूंग पेड़ी सेवा के भाव 1,220 डॉलर, अन्ना मूंग के भाव 1,200 डॉलर प्रति टन रहे। उड़द एफएक्यू के भाव 1,190 डॉलर प्रति टन रहे तथा इसमें 20 डॉलर की गिरावट दर्ज की गई। उड़द एसक्यू के भाव 1,230 डॉलर प्रति टन रहे। उन्होंने बताया कि मौजूदा कीमतों में थोड़ी और गिरावट तो आ सकती है लेकिन भारी गिरावट की संभावना नहीं है।
उपभोक्ता मामले मंत्रालय की माने तो महीने भर में दालों की फूटकर कीमतों में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है। मंत्रालय के अनुसार दिल्ली में महीने भर में जहां मूंग की कीमतों में 4 रुपये प्रति किलो की गिरावट आकर भाव 103 रुपये प्रति किलो रह गए, वहीं मसूर दाल के भाव 94 रुपये प्रति किलो पर स्थिर बने हुए है। चना दाल की कीमतों में इस दौरान 2 रुपये की तेजी आकर गुरुवार को भाव 70 रुपये प्रति किलो हो गए। अरहर दाल के भाव महीने भर में 108 रुपये से बढ़कर 115 रुपये और उड़द दाल के 110 रुपये से बढ़कर 114 रुपये प्रति किलो हो गए।
कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में देष में दालों की पैदावार घटकर 173.8 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसकी रिकार्ड पैदावार 192.5 लाख टन की हुई थी। पैदावार में आई कमी के कारण ही वित वर्ष 2014-15 में देष में रिकार्ड 45 लाख टन दालों का आयात हो चुका है।....आर एस राणा

10 जून 2015

फिर बढ़ गए रबर के दाम

मॉनसून में देरी और तापमान में हो रही तेज बढ़ोतरी ने केरल में प्राकृतिक रबर की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित किया है। उत्पादन में बाधा आ रही है। पूरी दुनिया में हालात कुछ ऐसे ही हैं और पिछले कुछ हफ्तों के दौरान आपूर्ति में कमी आई है। स्थानीय बाजार में मानक ग्रेड आरएसएस-4 की कीमतें एक बार फिर तीन महीनों के बाद 130 रुपये प्रति किलोग्राम पर लौट आई हैं। अप्रैल के आखिरी हफ्ते तक कीमतें 119 रुपये के स्तर तक गिर गई थीं। वैश्विक कीमतों में भी पिछले महीने के मुकाबले तेजी का रुख देखने को मिला क्योंकि बैंकॉक के बाजार में कीमतें 119 रुपये प्रति किग्रा रहीं। बाजार में पिछले हफ्ते कीमत 121 रुपये प्रति किग्रा रहीं। पिछले महीने के मुकाबले वैश्विक बाजार की हालत बेहतर है।

जानकारों का कहना है कि पहाड़ी इलाकों में मॉनसून की कमी और गर्मी के कारण रबर की भारी कमी हो सकती है। इस तरह की जलवायु परिस्थिति पांच साल के अंतर के बाद उत्पन्न हुई है। उन्होंने कहा कि आने वाले महीनों में कहीं न कहीं बाजार में तेजी देखने को मिलेगी। इस बीच टोक्यो कमोडिटी एक्सचेंज में रबर वायदा में आज गिरावट का रुख देखने को मिला। टोकॉम की दरें 14 फीसदी बढ़कर 16 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हंै जबकि जापानी मुद्रा गिरकर 12 साल के निम्रतम स्तर पर है। दुनिया में रबर के सबसे बड़े उत्पादक और निर्यातक थाईलैंड से आपूर्ति पिछले कुछ हफ्तों से साल के सबसे निचले स्तर पर है क्योंकि इस सीजन में उत्पादन कम रहा। थाईलैंड में फरवरी से मई के बीच सर्दी रहती है जब रबर के पेड़ पत्तियां गिरा देते हैं और किसान उत्पादन बंद कर देते हैं। थाईलैंड के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक पिछले चार महीनों के दौरान देश से होने वाला निर्यात 26 फीसदी की गिरावट के साथ 11.7 करोड़ टन रहा।

अधिक तापमान से प्रभावित उत्पादन

भारतीय रबर शोध संस्थान (आरआरआईआई) द्वारा कराए गए अध्ययन में पाया गया कि केरल में सबसे अधिक रबर का उत्पादन करने वाले क्षेत्र कोट्टïायम में पिछले कुछ सालों के दौरान तापमान बढऩे की घटनाएं सामने आती हैं। वर्ष 1970 से 2010 के बीच दैनिक अधिकतम और न्यूनतम तापमानों के आंकड़ों का विश्लेषण आरआरआईआई के क्लाईमेट चेंज ऐंड इकोसिस्टम स्टडीज डिवीजन ने किया जिससे पता चला कि गर्मी का रुझान बढ़ रहा है और इसका असर इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन पर भी पड़ सकता है। रबर के पेड़ों पर लेटेक्स का उत्पादन वातावरण के तापमान से संबंधित है।

एक तय सीमा से अधिक तापमान बढऩे पर फसल की उत्पादकता घटने लगती है। शुरुआत में किए गए अध्ययनों से साफ पता चलता है कि तापमान में इजाफों से भारत में पारंपरिक तौर पर रबर पैदा करने वाले क्षेत्रों में रबर उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसलिए बदलते जलवायु का असर इस क्षेत्र में रबर की बुआई पर गंभीर रूप से पड़ सकता है। आरआरआईआई ने सावधान करते हुए कहा कि चूंकि इस क्षेत्र का सामाजिक-आर्थिक स्थायित्व बड़े पैमाने पर रबर की बुआई पर निर्भर है इसलिए इस क्षेत्र में रबर की बुआई के वक्त उचित कदम उठाने की जरूरत है। BS Hindi