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16 जनवरी 2014

खाद्य प्रसंस्करण

खाद्य प्रसंस्करण भारत के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग क्षेत्र में प्रसंस्कृत खाद्य के उत्पादन और निर्यात की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। खाद्य बाजार लगभग 10.1 लाख करोड़ रुपये का है, जिसमें खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का हिस्सा 53% अर्थात 5.3 लाख करोड़ रुपये का है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से 130 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और 350 लाख लोगों को परोक्ष रूप से रोजगार मिलता है। वित्तीय वर्ष 2004-05 के दौरान विनिर्माण क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का योगदान लगभग 14% रहा। भारत का खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मुख्यतः असंगठित है और असंगठित क्षेत्र में इसका हिस्सा 42%, लघु उद्योग क्षेत्र में 33% और संगठित क्षेत्र में 25% है। उद्योग की संरचना भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के उत्पाद निर्मित जाते हैं। भारत में फल एवं सब्जियाँ, दुग्ध एवं दुग्ध-निर्मित उत्पाद, मीट एवं मुर्गी पालन, मत्स्य उत्पाद, अनाज प्रसंस्करण, बीयर एवं एल्कोहोलिक पेय पदार्थ, उपभोक्ता खाद्य वस्तुएँ ; अर्थात् कन्फेक्शनरी, चॉकलेट और कोको उत्पाद, सोया-निर्मित उत्पाद, मिनरल वाटर, उच्च प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थ, सॉफ्ट ड्रिंक, खाने और पकाने के लिए तैयार उत्पाद, नमकीन स्नैक्स, चिप्स, पास्ता उत्पाद, बेकरी उत्पाद और बिस्कुट आदि जैसी मुख्य श्रेणियों में खाद्य प्रसंस्करण कार्य होता है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में उपलब्ध संभावनाएँ भारत में खाद्य प्रसंस्करण कम्पनियों के लिए प्रचुर संभावनाएँ हैं। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के विभिन्न उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसका कारण भारत के लोगों की प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि होना है, जिसके फलस्वरूप वे उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों पर खर्च करने की स्थिति में हैं। उत्पादन की मात्रा की दृष्टि से कुछेक खाद्य उत्पादों में भारत विश्व का सबसे बड़ा देश है। निम्नलिखित तालिका भारत के खाद्य प्रसंस्करण के उन क्षेत्रों को दर्शाती है, जिनमें उत्पादन की पर्याप्त संभावनाएँ हैं- खाद्य प्रसंस्करण श्रेणी प्रतिवर्ष प्रसंस्कृत खाद्य की मात्रा ( मिलियन टन में) उत्पादन की दृष्टि से विश्व में स्थान दुग्ध एवं दुग्ध निर्मित उत्पाद 88 पहला फल एवं सब्जियाँ 150 दूसरा चावल 132 दूसरा गन्ना 289 दूसरा मत्स्य उत्पाद 6.3 तीसरा गेहूँ, मूंगफली, कॉफी, मसाले, गन्ना, अंडे और ऑयल सीडस - विश्व के शीर्षस्थ 5 उत्पादकों में इससे पता चलता है कि भारत में प्रसंस्करण के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। प्रसंस्कृत खाद्य की मात्रा का विश्लेषण उत्पादन मात्रा के प्रतिशत से करने पर संभावनाएँ और भी उभर कर आती हैं। भारत में फल और सब्जियाँ के लगभग 2%, दूध के 37%, मीट और मुर्गी पालन के 1% तथा मत्स्य उत्पाद के 12% हिस्से का प्रसंस्करण किया जाता है। इसकी तुलना हम जब विकसित देशों में प्रसंस्कृत किए जा रहे उत्पादन की 80% मात्रा से करते हैं, तो हमें भारत में खाद्य प्रसंस्करण व्यवसाय की अपार संभावनाओं की मौजूदगी का आभास होता है। भारतीय अर्थ-व्यवस्था के उदारीकरण के बाद तक भी इन अवसरों को पूरी तरह से अनुभव नहीं किया गया था। सरकार ने हाल ही में इस क्षेत्र में संयुक्त उद्यमों, विदेशी सहयोग और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की अनुमति प्रदान की है। इस उद्योग के विकास के लिए सरकार ने अनेक योजनाएँ भी कार्यान्वित की हैं। वि-लाइसैंसीकरण, खाद्य पार्कों की स्थापना, पैकेजिंग केद्रों की स्थापना और एकीकृत प्रशीतल शृंखला की सुविधाएँ आदि सरकार द्वारा किए गए प्रयासों में कुछ उल्लेखनीय प्रयास हैं। इस उद्योग में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए 100% तक निवेश करने की अनुमति भी प्रदान कर दी गई है। वित्तीय वर्ष 2008-09 में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 4700 करोड़ रुपये था। भारत में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का भविष्य उत्पादन की अधिकता और प्रसंस्करण की कमी की समस्या से समूचा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग प्रभावित है और इससे पता चलता है कि इस क्षेत्र में अभी भी विकास की अपार संभावनाएँ विद्यमान है, जिनको तलाश करने की आवश्यकता है। मूलभूत संरचना और अनुसंधान एवं विकास में कम निवेश की बड़ी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई है। किन्तु, सरकार द्वारा कार्यान्वित निवेश की विभिन्न योजनाओं के फलस्वरूप यह अनुमान लगाया जा रहा है कि निवेश के बढ़ने से इस उद्योग में वृद्धि होगी। वर्ष 2015 तक लगभग 1.1 लाख करोड़ रुपये के निवेश के अवसर सृजित किए जाने हैं। वर्तमान में घरेलू प्रसंस्कृत-खाद्य बाजार 5.3 लाख करोड़ रुपये का है। इस क्षेत्र में भारी वृद्धि और निवेश की पर्याप्त संभावनाओं के मद्देनज़र यह अनुमानित है कि वर्ष 2015 तक इसका बाज़ार 310 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ जाएगा। विश्व के प्रमुख खाद्य उत्पादकों में भारत की गणना भी होती है, किन्तु विश्व के खाद्य प्रसंस्करण व्यापार में इसकी हिस्सेदारी मात्र 1.7% (वर्ष 2008 जिसका मूल्य 34400 करोड़ रुपये था) की है। वर्ष 2015 तक यह हिस्सेदारी 3% ( 91800 करोड़ रुपये) तक बढ़ सकती है। इसकी प्राप्ति प्रसंस्करण की मात्रा में वृद्धि करके (कुल उत्पादन की प्रतिशतता के रूप में ) और तत्पश्चात निर्यात को बढ़ाकर की जाएगी। खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के विजन दस्तावेज़ से प्रसंस्कृ त खाद्य हेतु निर्धारित लक्ष्यों के अनुमानित मूल्य की जानकारी निम्नलिखित तालिका से मिलती हैः प्रसंस्कृत खाद्य के लिए निर्धारित लक्ष्य ( कुल उत्पादन के प्रतिशत के रूप में) खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र 2004 2010 (अनुमानित) 2015 (अनुमानित) फल एवं सब्जियाँ 1 4 8 दूग्ध उत्पाद 15 20 30 मत्स्य उत्पाद 11 15 20 मीट 21 28 35 मुर्गीपालन 6 10 15 आंकड़ों का स्रोत : मैककिंसे एंड कम्पनी रिपोर्ट, भारतीय खाद्य मंच की भारतीय खाद्य रिपोर्ट 2008, खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय-विजन रिपोर्ट, राष्ट्रीय विनिर्माता प्रतिस्पर्द्धात्मकता परिषद (एनएमसीसी)।

15 जनवरी 2014

Gold, silver tumble on stockists selling, global cues

New Delhi, Jan 15. Gold prices today fell by Rs 365 to Rs 30,035 per ten gram in the national capital on increased selling by stockists, triggered by a weak global trend. Silver prices also lost Rs 420 to Rs 44,700 per kg on reduced offtake by jewellers and industrial units. In Mumbai, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity traded at Rs 29,915 and Rs 29,765 per ten gram, while silver enquired at Rs 45,450 per kg. Traders said stockists selling in tandem with a weak global trend amid speculation that the US Federal Reserve will continue reducing asset purchases mainly pulled down both gold and silver prices. Gold in Singapore, which normally sets price trend on the domestic front, fell by 0.5 per cent to USD 1,239 an ounce, and silver by 0.3 per cent to USD 20.19 an ounce. Weak trend at futures market too influenced the precious metal prices, they said. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity plunged by Rs 365 each to Rs 30,035 and Rs 29,835 per ten gram, respectively. Sovereign followed suit and declined by Rs 100 to Rs 25,000 per piece of eight gram. In a similar fashion, silver ready dropped by Rs 420 to Rs 44,700 per kg and weekly-based delivery by Rs 450 to Rs 44,670 per kg. Silver coins, however, held steady at Rs 85,000 for buying and Rs 86,000 for selling of 100 pieces.

श्री शरद पवार ने प्रमुख कृषि कार्यक्रमों की सफलता में वैज्ञानिकों के योगदान की सराहना की

कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री श्री शरद पवार ने प्रमुख कृषि कार्यक्रमों की सफलता में वैज्ञानिकों के योगदान की सराहना की है। वे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) समाज की 85वीं आम सभा की बैठक में वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों ने अधिक उपज वाली और रोग प्रतिरोधक किस्में ईजाद की हैं, जिनके उपयोग से किसानों को अधिक पैदावार करने में मदद मिल रही है और उनकी उपज की गुणवत्ता में भी इजाफा हुआ है। श्री पवार ने कहा कि पिछले 10 वर्षों के दौरान देश का अनाज उत्पादन बढ़ा है, जो 2004-05 में 198 मिलियन टन से बढ़कर 2011-12 में 259 मिलियन टन हो गया है। इस तरह प्रतिवर्ष औसतन लगभग 60 लाख टन की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कृषि मंत्री ने कहा कि पूसा बासमती-1121 चावल की ऐसी अकेली किस्म है, जिसके निर्यात से पिछले वर्ष 18 हजार करोड़ रुपये की आय हुई। इसके अलावा भारत बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है और पूसा पंजाब बासमती-1509 किस्म के चावल के निर्यात में देश को भारी सफलता मिली है। परिषद ने प्रमुख अनाजों से संबंधित बीजों के उत्पादन में बहुत सफलता प्राप्त की है और 11,835 टन से अधिक बीजों का उत्पादन किया है। पटना स्थित पूर्वी क्षेत्र से संबंधित आईसीएआर शोध परिसर ने देश में पहली बार मखाने की ‘स्वर्ण वैदेही’ किस्म को विकसित और जारी किया। पशु अनुसंधान में भी प्रमुख उपलब्धियां अर्जित की गईं। इस संबंध में मंत्री महोदय ने संकर सुअर और दोहरे उद्देश्य वाली मुर्गी की किस्म ‘श्रीनिधि’ का विकास किया है। इसी प्रकार वैज्ञानिकों ने दुनिया के पहले मिथुन बछड़े को भ्रूण स्थानान्तरण के जरिए और टेस्ट ट्यूब के माध्यम से भैंस के क्लोन से तैयार ‘नोरग्याल’ याक बछड़े को विकसित किया। उल्लेखनीय है कि पिछड़े क्षेत्रों में कृषि शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए बुंदेलखंड क्षेत्र में एक केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के गठन के संबंध में आईसीएआर ने एक विधेयक पेश किया है। मंत्री महोदय ने बताया कि आईसीएआर ने बेहतरीन प्रबंधन प्रणाली लागू की है, जिसके लिए उसे आईएस/आईएसओ 9001:2008 प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ है। इस प्रकार वह भारत सरकार के उन विभागों में शामिल हो गया है जिन्हें सबसे पहले यह प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ है। आम सभा की बैठक को कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्रियों श्री तारिक अनवर और डॉ. चरणदास महंत तथा आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एस. अय्यप्पन ने भी संबोधित किया। (PIB.NIC.in)

सरकार को इस साल रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन की उम्मीद

कृषि मंत्री शरद पवार ने आज कहा कि इस साल देश का खाद्यान्न उत्पादन, 25.92 करोड़ टन के पिछले रिकॉर्ड स्तर को पार कर जाने की संभावना है। आईसीएआर की 85वीं वार्षिक आम सभा को संबोधित करते हुए पवार ने कहा, 'मुझे विश्वास है कि फरवरी में जब हमें दूसरा अग्रिम अनुमान मिलेगा, हम सर्वकालिक रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन की ओर बढ़ रहे होंगे।' उन्होंने कहा कि गेहूं जैसी रबी की फसलों की बुवाई के संबंध में आंकड़े बहुत उत्साहवर्धक हैं। देश ने 2011-12 फसल वर्ष (जुलाई-जून) में 25.92 करोड़ टन का रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन दर्ज किया था। हालांकि, देश के कुछ भागों में सूखा पडऩे से 2012-13 में उत्पादन मामूली गिरावट के साथ 25.53 करोड़ टन रह गया था। इस साल, अच्छे मानसून से खरीफ (गर्मी) और रबी (जाड़े) फसलों की बुवाई में सुधार आया है जिससे रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन की संभावना बढ़ गई है।

Govt expects all-time high foodgrain production this year

New Delhi, Jan 15. Agriculture Minister Sharad Pawar today said the country's foodgrain production this year is likely to surpass the previous record of 259.29 million tonnes achieved in the 2011-12 crop year. "I am confident that when we get second advance estimate in February, we will be approaching towards all-time record foodgrain production," Pawar said addressing the 85th annual general meeting of ICAR. He said the data regarding sowing of rabi (winter) crops like wheat is very encouraging. The country had a record foodgrain production of 259.29 million tonnes in 2011-12 crop year (July-June). However, the output fell marginally to 255.36 million tonnes in the next year due to drought in some parts. This year, good monsoon has improved sowing of both kharif (summer) and rabi (winter) crops, thereby boosting prospects of record foodgrains production. Pawar said timely arrival and uniform spread of monsoon during the kharif season of 2013 augured well for the agriculture sector. "Against the backdrop of serious criticism of stagnated growth in Indian economy, the agriculture sector has achieved near-target growth in the second quarter of this fiscal in spite of several challenges," he said. The growth rate in the agriculture and allied sector has improved to 4.6 per cent during the July-September period of the 2013-14 fiscal from 2.4 per cent in the first quarter. Expressing concern over continuous dependence on import of pulses and edible oils, the Agriculture Minister called for more research efforts to boost the productivity and production of these commodities. The country is expected to harvest a record 19 million tonnes of pulses this year, but still short of estimated demand, he added. India imports around 3.5 million tonnes of pulses and over 10 million tonnes of vegetable oils annually to meet domestic shortages. Emphasising that the real test of agriculture lies in ensuring well-being of farmers, Pawar said, "There is an urgent need to enter into partnership with farmers for successful transmission of research conducted by Indian Council of Agricultural Research (ICAR) into fields." He asked ICAR to draw its research focus on increasing feed and fodder supply in the country besides introducing farm machineries to address the growing labour shortages. Highlighting the achievements of government research body ICAR, Pawar said, "The efforts of scientists in developing high yielding, input efficient, disease tolerant varieties along with their widespread adoption by farmers are visible in increasing farm productivity, quality and quantity." Apart from foodgrain, fruits, vegetables, milk and fish production has risen over the years, boosting the country's total farm exports by 11 per cent to Rs 2,01,000 crore in 2012-13 from Rs 1,78,800 crore in 2012-13, he added. ICAR released 104 new improved varieties and hybrids of different field and horticultural crops with potential for higher yields in 2013. The premium institute also produced 11,835 tonnes of breeder seeds of major food crops. Since the climate variability is a major concern now, the ICAR is focusing both on strategic research and on-farm adaptation to climate variability, Pawar added.

14 जनवरी 2014

गेहूं उत्पादन पिछले रिकॉर्ड से भी ज्यादा रहने की उम्मीद

पिछले साल की 948 लाख टन रिकॉर्ड पैदावार से ज्यादा उपज संभव: अनवर बुवाई क्षेत्रफल में हुई बढ़ोतरी के साथ ही मौसम भी अनुकूल होने से केंद्र सरकार को चालू रबी में गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार होने का अनुमान है। फसल वर्ष 2011-12 में देश में गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार 948.8 लाख टन की हुई थी। चालू रबी में गेहूं की बुवाई बढ़कर 311.86 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है। एसोचैम द्वारा सोमवार को दिल्ली में आयोजित छठी एग्री-बिजनेस समिट के मौके पर कृषि राज्य मंत्री तारिक अनवर ने पत्रकारों से कहा कि गेहूं के बुवाई क्षेत्रफल में बढ़ोतरी हुई है जबकि मौसम भी अभी तक अनुकूल बना हुआ है। ऐसे में गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार होने का अनुमान है। कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2011-12 में देश में गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार 948.8 लाख टन की हुई थी जबकि बीते वर्ष 2012-13 में गेहूं की पैदावार 924.6 लाख टन की हुई थी। उन्होंने बताया कि हरियाणा में एकाध जगह सफेद रतुआ बीमारी लगने की खबरें जरूर मिली हैं लेकिन सरकार ने किसानों को इससे बचाव के लिए कीटनाशक उपलब्ध कराने के साथ ही जागरूक कर दिया है। कृषि वैज्ञानिक ने इसकी रोकथाम के लिए जरूरी कदम उठाए हैं, साथ ही राज्य सरकार को भी सचेत रहने को कहा गया है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में गेहूं की बुवाई बढ़कर 311.86 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि 291.27 लाख हैक्टेयर में हुई थी। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में गेहूं के बुवाई क्षेत्रफल में पिछले साल की तुलना में बढ़ोतरी हुई है। उत्तर प्रदेश में गेहूं की बुवाई बढ़कर 99.40 लाख हैक्टेयर में, मध्य प्रदेश में 57.88 लाख हैक्टेयर में, राजस्थान में 30.41 लाख हैक्टेयर में और गुजरात में 14.74 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई है। हालांकि पंजाब और हरियाणा में गेहूं की बुवाई पिछले साल की तुलना में कम हुई है। उन्होंने कहा कि परिवहन, रखरखाव और भंडारण की सुविधा के अभाव में देश में हर साल करीब 4,400 करोड़ रुपये का खाद्यान्न बर्बाद हो जाता है। इसके बचाव से जहां उपभोक्ताओं को सही दाम पर खाद्यान्न मिल सकेंगे, वहीं किसानों को भी अपनी फसलों के उचित दाम मिलेंगे, इसमें कोल्ड चेन और कोल्ड स्टोर की महत्वपूर्ण भूमिका है। दूध के भंडारण और परिवहन में अमूल को रोल मॉडल के रूप में अपनाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि खरीद और वितरण के अभाव में उपभोक्ताओं को प्याज खरीदने के लिए ज्यादा दाम चुकाने पड़ जाते हैं। देश में प्याज का उत्पादन 170-180 लाख टन होने के बावजूद जहां किसानों को 10 रुपये किलो प्याज बेचना पड़ता है वहीं उपभोक्ताओं को प्याज खरीदने के लिए 80 से 100 रुपये प्रति किलो तक चुकाने पड़ते हैं। (Business Bhaskar....R S Rana)

क्यों फीकी पड़ी कमोडिटी मार्केट की चमक!

पिछले पूरे एक साल लगातार सुर्खियों में रहने के बावजूद पूरा कमोडिटी बाजार बेहद ठंडा रहा है। सिर्फ रिटर्न के लिहाज से नहीं, बल्कि बाजार में कारोबार भी काफी घट गया है। एफएमसी के ताजा आंकड़ों पर गौर करें, तो दिसंबर के अंतिम पखवाड़े में एक्सचेंजों का कारोबार घटकर आधा रह गया है। गौर करने वाली बात ये है कि पिछले एक साल लगातार कमोडिटी मार्केट के कारोबार में गिरावट दर्ज हुई। कमोडिटी एक्सचेंजों का कारोबार लगातार गिरता रहा है। चालू चित्त वर्ष में वायदा कारोबार में करीब 36 फीसदी की भारी गिरावट आई है। घटते कारोबार को संभालने के लिए एफएमसी अब अपने ही फैसलों को उलटने लगा है। सीएनबीसी आवाज़ ने सबसे पहले आयोग के सामने एक्सचेंजों पर गिरते कारोबार का मुद्दा उठाया था। एफएमसी ने गिरते कारोबार को बढ़ाने के लिए एल्गो और स्प्रेड के नियमों में भारी बदलाव किया है। खास तौर से छोटे निवेशकों को ध्यान में रखकर शुरू किए गए मिनी और माइक्रो वायदा में भी एल्गो की सहूलियत दे दी गई। एल्गो ऑर्डर की लिमिट बढ़ा दी गई और स्प्रेड ट्रेड की मार्जिन में भारी कटौती भी कर दी गई। गौर करने वाली बात ये है कि एल्गो ट्रेड से रिटेल इन्वेस्टर का कोई लेना-देना नहीं है, शायद इसी वजह से जानकारों की नजर में ये कदम काफी नहीं है। दरअसल चालू वित्त वर्ष में कमोडिटी एक्सचेंजों का वॉल्यूम 36 फीसदी तक गिर गया है। अप्रैल से दिसंबर तक सोने और चांदी के कारोबार में सबसे ज्यादा करीब 40 फीसदी की गिरावट आई है। पिछले एक साल में सबसे ज्यादा रिटर्न देने वाले क्रूड और नैचुरल गैस के कारोबार में भी करीब 30 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज हुई है। बगैर सीटीटी वाले एग्री कमोडिटी का कारोबार भी इस दौरान करीब 33 फीसदी गिर गया है। दूसरी ओर कमोडिटी बाजार में सुधार के लिए फाइनेंशियल सेक्टर लेजिस्लेटिव रिफॉर्म कमीशन ने एफएमसी को कुछ सुझाव दिए हैं। जिसे लागू करने से पहले एफएमसी ने लोगों की राय मांगी है। देखना होगा इन सुझावों को लागू करने के बाद कमोडिटी बाजार की तस्वीर कैसी होती है। ट्रेड स्विफ्ट कमोडिटीज के डायरेक्टर संदीप जैन का कहना है कि कमोडिटी बाजार के कारोबारी नियमों में एफएमसी के बदलाव का स्वागत है। हालांकि सीटीटी और एनएसईएल जैसे मामलों ने कमोडिटी बाजार पर दबाव बनाने का काम जरूर किया है। डब्बा ट्रेडिंग और वेयरहाउस की कमी भी कमोडिटी बाजार का कारोबार गिराने में जिम्मेदार हैं। वहीं निर्मल बंग कमोडिटीज के कुणाल शाह का भी मानना है कि सीटीटी और एनएसईएल मामले ने कमोडिटी बाजार को गहरी चोट पहुंचाई है। हिंदू बिजनेस लाइन के कमोडिटी एडिटर जी चंद्रशेखर का कहना है कि पिछले 10 सालों में वैश्विक बाजारों की तेजी से घरेलू बाजारों को फायदा मिला है। लिहाजा तेजी के दौर में निवेशक कमोडिटी बाजार के साथ थे। हालांकि पिछले 2 सालों से जैसे ही कमोडिटी की कीमतों में नरमी दिखी है उससे निवेशक भी बाजार से दूर रहे हैं। ऐसे में निवेशकों के दूर होने से कमोडिटी मार्केट के कारोबार में गिरावट आना स्वाभाविक है। (Hindi>Moneycantorl.com)