आर.एस. राणा नई दिल्ली
सरकार 21 नवंबर को चीनी निर्यात पर फैसला ले सकती है। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने बिजनेस भास्कर को बताया कि खाद्य मामलों पर प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह (ईजीओएम) की 21 नवंबर को बैठक होगी जिसमें चीनी के निर्यात पर फैसला लिया जायेगा। उन्होंने चीनी निर्यात की मात्रा पर कहा कि इस बारे में फैसला ईजीओएम को करना है।
चालू पेराई सीजन में देश में चीनी का उत्पादन बढऩे का अनुमान है, इसीलिए उद्योग चाहता है कि ओपन जरनल लाइसेंस (ओजीएल) के तहत 30 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी जाये। जबकि खाद्य मंत्रालय छोटी-छोटी मात्रा में निर्यात की अनुमति देने के पक्ष में है। सूत्रों के अनुसार 21 नवंबर को होने वाली ईजीओएम की बैठक में पांच लाख टन चीनी के निर्यात को अनुमति दी जा सकती है।
इसके अलावा इस बैठक में 19,000 टन चीनी के निर्यात की अनुमति मित्र देशों को (डिप्लोमेटिक आधार) पर दिए जाने की संभावना है। खाद्य मंत्रालय के अनुसार चालू पेराई सीजन के दौरान देश में 247.7 लाख टन चीनी का उत्पादन होने का अनुमान है।आलोचना:- वर्ष 2007 में महंगे दामों पर चीनी आयात के बाद अगले ही साल 2008 में उन्होंने चीनी निर्यात का फैसला करने पर पवार की कड़ी आलोचना देश में हुई थी। पिछले साल विपक्षी दलों ने खाद्यान्नों की ऊंची कीमतों के लिए पवार की नीतियों को ही जिम्मेदार ठहराया था।भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्यान्न उपभोक्ताओं में से एक है। ऐसे में खाद्यान्न निर्यात का मामला काफी संवेदनशील होता है। लेकिन जब खाद्यान्न निर्यात की बारी आती है तो तुरुप का पत्ता कृषि मंत्री शरद पवार के हाथ में होता है। चार दशक से भारतीय राजनीति में जमे और मौजूदा यूपीए सरकार में अपनी निर्णायक भूमिका के कारण उनकी बात टालना किसी के लिए भी संभव नहीं होता है।
माना जा रहा है कि इस सप्ताह वे देश से 5 लाख टन चीनी निर्यात के लिए दबाव बढ़ा सकते हैं। विपक्ष और अपनी सरकार में ही उनके कुछ साथियों को शायद ऐसे में असहज स्थिति का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि महंगाई को काबू में करने और 120 करोड़ आबादी वाले घरेलू बाजार में चीनी की सप्लाई को पर्याप्त रखने की चुनौती देश के सामने है। कुछ जानकारों ने तो इस तरह की आशंका भी जताई है कि यदि चीनी निर्यात की जाती है तो इसका चीनी की कीमतों पर भारी असर पड़ सकता है और देश में चीनी कीमतें 50 रुपये प्रति किलो तक भी उछल सकती हैं।
70 वर्षीय पवार पहले ही इस साल कई निर्यात सौदों के लिए दबाव डाल चुके हैं, जिनकी देश में आलोचना भी होती रही है। पवार इससे बढ़ती कीमतों का फायदा किसानों को दिलाने का प्रयास करते हैं ताकि अपनी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मतदाताओं को प्रभावित किया जा सके। 2007 में महंगे दामों पर चीनी का आयात करने के बाद अगले ही साल 2008 में उन्होंने चीनी निर्यात का फैसला किया जिसकी कड़ी आलोचना देश में हुई। पिछले साल विपक्षी दलों ने खाद्यान्नों की ऊंची कीमतों के लिए पवार की नीतियों को ही जिम्मेदार ठहराया।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चीनी उपभोक्ता और ब्राजील के बाद दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक है। ऐसे में भारत से चीनी का आयात या निर्यात दोनों ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों को बड़े पैमाने पर प्रभावित करता है। हालांकि यह इसके उत्पादन पर निर्भर करता है। भारतीय किसान संगठनों के संघ के महासचिव पी. शेंगाल रेड्डी पवार के प्रभाव को लेकर कहते हैं, 'प्रधानमंत्री उनकी (पवार की) बात सुनते हैं और कैबिनेट पीएम की। कृषि और खाद्यान्न संबंधी मामलों में वह एक अथॉरिटी हैं। उनके प्रस्ताव भले ही प्रधानमंत्री हों या कैबिनेट एक दिन से ज्यादा दिन नहीं टलते।'
जनवरी 2011 तक पवार के पास खाद्यान्न मंत्रालय भी था और उनको किसानों और उपभोक्ताओं के जरूरतों के बीच संतुलन बैठाने के लिए जूझना पड़ता था। अब केवी थॉमस को खाद्यान्न मंत्रालय दिया जा चुका है और निर्यात पर बने मंत्रियों के पैनल में पवार के प्रस्तावों का थॉमस विरोध करते नजर आते हैं। यह पैनल जब भी मिलता है कृषि निर्यात की इजाजत देता है। यह दर्शाता है कि पवार अपने मतदाताओं को फायदा पहुंचाने के लिए सबकुछ करते हैं और यही कारण है कि चार दशक के राजनीतिक जीवन में उन्होंने कभी चुनाव नहीं हारा। (Business Bhaskar....R S Rana)
17 नवंबर 2011
काली मिर्च का वैश्विक उत्पादन बढ़ेगा
कोच्चि November 16, 2011
काली मिर्च के वैश्विक उत्पादन के ताजा अनुमान से संकेत मिलता है कि साल 2012 के सीजन में इसमें 4 फीसदी की बढ़ोतरी होगी। अग्रणी निर्यात घरानों के अनुमानों के मुताबिक, अगले साल कुल 2,70,000 लाख टन काली मिर्च का उत्पादन होगा। वैश्विक आपूर्ति के नियंत्रण की कुंजी वियतनाम के पास होगी, जहां कुल 1,40,000 टन काली मिर्च का उत्पादन होगा। साल 2011 में वियतनाम में कुल 1,30,000 टन काली मिर्च का उत्पादन हुआ था। काली मिर्च के प्रमुख उत्पादक देशों में कैरीओवर स्टॉक को शामिल करते हुए साल 2012 में कुल वैश्विक आपूर्ति करीब 3,20,000 टन की होगी। यह साल 2011 के 3,30,000 टन के मुकाबले 10,000 टन कम होगा।वियतनाम में काली मिर्च के उत्पादन पर प्रमुख निर्यात घरानो का अनुमान अलग-अलग है और यह 1,30,000 टन से 1,50,000 टन तक है। पर इतना तय है कि नए सीजन में वियतनाम में उत्पादन बढ़ेगा क्योंकि वहां काली मिर्च के रकबे में तेजी से इजाफा हुआ है। पिछले 2-3 सीजन में काली मिर्च की कीमतों में हुई बढ़ोतरी के चलते वियतनाम में इसका रकबा बढ़ा है। ऐसे में इस देश में उत्पादन बढऩे से आपूर्ति की स्थिति साल 2012 में भी ठीक रहेगी। यह भी ज्ञात हुआ है कि वहां अधिकारी किसानों को इसका रकबा बढ़ाने की सलाह नहीं दे रहे हैं ताकि इसकी कीमतें उच्च स्तर पर बनी रहे।वियतनाम में उत्पादकों के एक वर्ग का कहना है कि देश में अगले सीजन के दौरान उत्पादन या तो स्थिर रहेगा या फिर इसमें कमी आएगी। उन्होंने इसकी वजह काली मिर्च के बीमारी की चपेट में आने और कुछ इलाकों में रसायनिक उर्वरकों के ज्यादा इस्तेमाल के चलते फसलों को हुए नुकसान को बताया।भारत में हालांकि उत्पादन अनुमान में कमी की बात कही गई है और यहां साल 2012 में 42,000 टन काली मिर्च का उत्पादन होगा जबकि साल 2011 में 48,000 टन काली मिर्च का उत्पादन हुआ था। भारत में दिलचस्प पहलू यह है कि किसान व उत्तर भारतीय डीलर अपने पास बचे स्टॉक बेच रहे हैं। साल 2011 में ज्यादातर मांग की पूर्ति साल 2005 से भंडारित काली मिर्च के जरिए हुई, जब कीमतें 55-60 रुपये प्रति किलोग्राम थी। ब्राजील व मलयेशिया में काली मिर्च का उत्पादन स्थिर रहने का अनुमान है और यहां क्रमश: 30,000 व 50,000 टन काली मिर्च का उत्पादन होगा। वहीं इंडोनेशिया में उत्पादन बढ़कर 15,000 टन पर पहुंच जाएगा जबकि साल 2011 में 10,000 टन काली मिर्च का उत्पादन हुआ था और इस वजह से वैश्विक आपूर्ति इस साल बुरी तरह प्रभावित हुई थी। (BS Hindi)
काली मिर्च के वैश्विक उत्पादन के ताजा अनुमान से संकेत मिलता है कि साल 2012 के सीजन में इसमें 4 फीसदी की बढ़ोतरी होगी। अग्रणी निर्यात घरानों के अनुमानों के मुताबिक, अगले साल कुल 2,70,000 लाख टन काली मिर्च का उत्पादन होगा। वैश्विक आपूर्ति के नियंत्रण की कुंजी वियतनाम के पास होगी, जहां कुल 1,40,000 टन काली मिर्च का उत्पादन होगा। साल 2011 में वियतनाम में कुल 1,30,000 टन काली मिर्च का उत्पादन हुआ था। काली मिर्च के प्रमुख उत्पादक देशों में कैरीओवर स्टॉक को शामिल करते हुए साल 2012 में कुल वैश्विक आपूर्ति करीब 3,20,000 टन की होगी। यह साल 2011 के 3,30,000 टन के मुकाबले 10,000 टन कम होगा।वियतनाम में काली मिर्च के उत्पादन पर प्रमुख निर्यात घरानो का अनुमान अलग-अलग है और यह 1,30,000 टन से 1,50,000 टन तक है। पर इतना तय है कि नए सीजन में वियतनाम में उत्पादन बढ़ेगा क्योंकि वहां काली मिर्च के रकबे में तेजी से इजाफा हुआ है। पिछले 2-3 सीजन में काली मिर्च की कीमतों में हुई बढ़ोतरी के चलते वियतनाम में इसका रकबा बढ़ा है। ऐसे में इस देश में उत्पादन बढऩे से आपूर्ति की स्थिति साल 2012 में भी ठीक रहेगी। यह भी ज्ञात हुआ है कि वहां अधिकारी किसानों को इसका रकबा बढ़ाने की सलाह नहीं दे रहे हैं ताकि इसकी कीमतें उच्च स्तर पर बनी रहे।वियतनाम में उत्पादकों के एक वर्ग का कहना है कि देश में अगले सीजन के दौरान उत्पादन या तो स्थिर रहेगा या फिर इसमें कमी आएगी। उन्होंने इसकी वजह काली मिर्च के बीमारी की चपेट में आने और कुछ इलाकों में रसायनिक उर्वरकों के ज्यादा इस्तेमाल के चलते फसलों को हुए नुकसान को बताया।भारत में हालांकि उत्पादन अनुमान में कमी की बात कही गई है और यहां साल 2012 में 42,000 टन काली मिर्च का उत्पादन होगा जबकि साल 2011 में 48,000 टन काली मिर्च का उत्पादन हुआ था। भारत में दिलचस्प पहलू यह है कि किसान व उत्तर भारतीय डीलर अपने पास बचे स्टॉक बेच रहे हैं। साल 2011 में ज्यादातर मांग की पूर्ति साल 2005 से भंडारित काली मिर्च के जरिए हुई, जब कीमतें 55-60 रुपये प्रति किलोग्राम थी। ब्राजील व मलयेशिया में काली मिर्च का उत्पादन स्थिर रहने का अनुमान है और यहां क्रमश: 30,000 व 50,000 टन काली मिर्च का उत्पादन होगा। वहीं इंडोनेशिया में उत्पादन बढ़कर 15,000 टन पर पहुंच जाएगा जबकि साल 2011 में 10,000 टन काली मिर्च का उत्पादन हुआ था और इस वजह से वैश्विक आपूर्ति इस साल बुरी तरह प्रभावित हुई थी। (BS Hindi)
प्रणब ने खाद्य सुरक्षा बिल में बदलाव को मंज़ूरी दी
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में हुई मंत्रियों के समूह की बैठक में प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल में प्रमुख बदलावों को मंज़ूरी दे दी गई है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ इस संशोधित मसौदे को जल्द ही कैबिनेट के सामने मंज़ूरी के लिए पेश किया जाएगा.
खाद्य मंत्री केवी थॉमस ने पत्रकारों को बताया कि बुधवार शाम को वित्त मंत्री ने खाद्य बिल के मसौदे को हरी झंडी दिखा दी है और उसे जल्द कैबिनेट के सामने रखा जाएगा.
उनका कहना था कि जो भी प्रमुख बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं, उस संबंध में एक कैबिनेट नोट मंत्रालयों की प्रतिक्रिया के लिए गुरुवार को भेजा जाएगा. (BBC Hindi)
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ इस संशोधित मसौदे को जल्द ही कैबिनेट के सामने मंज़ूरी के लिए पेश किया जाएगा.
खाद्य मंत्री केवी थॉमस ने पत्रकारों को बताया कि बुधवार शाम को वित्त मंत्री ने खाद्य बिल के मसौदे को हरी झंडी दिखा दी है और उसे जल्द कैबिनेट के सामने रखा जाएगा.
उनका कहना था कि जो भी प्रमुख बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं, उस संबंध में एक कैबिनेट नोट मंत्रालयों की प्रतिक्रिया के लिए गुरुवार को भेजा जाएगा. (BBC Hindi)
खाद्य सुरक्षा बिल के संशोधित मसौदे को मंजूरी
नई दिल्ली: वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक के संशोधित मसौदे को मंजूरी दे दी है। अब इस विधेयक को जल्द मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाएगा। वित्त मंत्री खाद्य पर मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह के प्रमुख हैं।
खाद्य मंत्री के वी थॉमस ने गुरुवार को एककार्यक्रम के मौके पर संवाददाताओं से कहा, ‘कल शाम वित्त मंत्री ने खाद्य विधेयक के मसौदे को अंतिम मंजूरी दे दी। जल्द इसे मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाएगा।’
थॉमस ने बताया कि विधेयक में प्रस्तावित महत्वपूर्ण बदलाव को मंजूरी मिल गई है और आज ही अंतर मंत्रालयी चर्चा के लिए कैबिनेट नोट जारी किया जाएगा।
इससे पहले जुलाई में खाद्य पर मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक के मसौदे को मंजूरी दी थी। इसके तहत देश की 75 प्रतिशत ग्रामीण तथा 50 फीसद शहरी आबादी को सब्सिडी वाला खाद्यान्न पाने का कानूनी अधिकार मिल जाएगा।
खाद्य मंत्री ने कहा कि संबंधित अंशधारकों तथा राज्य सरकारों से विचार विमर्श के बाद खाद्य मंत्रालय ने विधेयक के मसौदे में कई महत्वपूर्ण बदलावों का प्रस्ताव किया था, जिसे वित्त मंत्री ने मंजूर कर लिया है।
जो दो प्रमुख बदलाव किए गए हैं उनमें सामान्य परिवारों को तीन किलोग्राम खाद्यान्न की आपूर्ति तथा इसका दायरा बढ़ाकर इसमें स्तनपान कराने वाली महिलाओं, गरीब और उम्रदराज लोगों के अलावा बच्चों को पोषक आहार शामिल किया जाएगा। उन्होंने बताया कि स्तनपान कराने वाली महिलाओं को छह माह के लिए एक हजार रुपये की राशि दी जानी है। अब यह 52 जिलों के बजाय देशभर में दी जाएगी।
साधारण परिवारों को सब्सिडी वाले अनाज के बारे में थॉमस ने कहा कि वित्त मंत्री ने इसमें न्यूनतम शब्द जोड़ा है। ऐसे में उत्पादन बढ़ने पर सरकार आवंटन बढ़ा सकती है।
विधेयक के मौजूदा रूप में खाद्य मंत्रालय का प्रस्ताव है कि सरकार साधारण परिवारों को प्रति व्यक्ति प्रति माह तीन किलोग्राम चावल देगी, जो समर्थन मूल्य से 50 फीसद से अधिक नहीं होगा।
अन्य बदलावों में वित्त मंत्री ने उस शर्त को हटा दिया है जिसमें प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून का लाभ सिर्फ उन राज्यों के साधारण परिवारों को मिलेगा, जहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली का आधुनिकीकरण हो चुका है।थॉमस ने कहा कि मौजूदा मसौदा साधारण परिवारों को सिर्फ उन राज्यों में लाभ देता है जहां पीडीएस व्यवस्था आधुनिक है। अब यह लाभ सभी राज्यों में दिया जाएगा।
खाद्य मंत्री ने कहा कि इन बदलावों के बारे में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी से विचार विमर्श हो चुका है।
प्रस्तावित विधेयक से सरकार पर सब्सिडी का सालाना बोझ 1,00,000 करोड़ रुपये का पड़ेगा। वर्तमान में सरकार का खाद्य सब्सिडी बिल सालाना 70,000 करोड़ रुपये का है। (Z News)
खाद्य मंत्री के वी थॉमस ने गुरुवार को एककार्यक्रम के मौके पर संवाददाताओं से कहा, ‘कल शाम वित्त मंत्री ने खाद्य विधेयक के मसौदे को अंतिम मंजूरी दे दी। जल्द इसे मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाएगा।’
थॉमस ने बताया कि विधेयक में प्रस्तावित महत्वपूर्ण बदलाव को मंजूरी मिल गई है और आज ही अंतर मंत्रालयी चर्चा के लिए कैबिनेट नोट जारी किया जाएगा।
इससे पहले जुलाई में खाद्य पर मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक के मसौदे को मंजूरी दी थी। इसके तहत देश की 75 प्रतिशत ग्रामीण तथा 50 फीसद शहरी आबादी को सब्सिडी वाला खाद्यान्न पाने का कानूनी अधिकार मिल जाएगा।
खाद्य मंत्री ने कहा कि संबंधित अंशधारकों तथा राज्य सरकारों से विचार विमर्श के बाद खाद्य मंत्रालय ने विधेयक के मसौदे में कई महत्वपूर्ण बदलावों का प्रस्ताव किया था, जिसे वित्त मंत्री ने मंजूर कर लिया है।
जो दो प्रमुख बदलाव किए गए हैं उनमें सामान्य परिवारों को तीन किलोग्राम खाद्यान्न की आपूर्ति तथा इसका दायरा बढ़ाकर इसमें स्तनपान कराने वाली महिलाओं, गरीब और उम्रदराज लोगों के अलावा बच्चों को पोषक आहार शामिल किया जाएगा। उन्होंने बताया कि स्तनपान कराने वाली महिलाओं को छह माह के लिए एक हजार रुपये की राशि दी जानी है। अब यह 52 जिलों के बजाय देशभर में दी जाएगी।
साधारण परिवारों को सब्सिडी वाले अनाज के बारे में थॉमस ने कहा कि वित्त मंत्री ने इसमें न्यूनतम शब्द जोड़ा है। ऐसे में उत्पादन बढ़ने पर सरकार आवंटन बढ़ा सकती है।
विधेयक के मौजूदा रूप में खाद्य मंत्रालय का प्रस्ताव है कि सरकार साधारण परिवारों को प्रति व्यक्ति प्रति माह तीन किलोग्राम चावल देगी, जो समर्थन मूल्य से 50 फीसद से अधिक नहीं होगा।
अन्य बदलावों में वित्त मंत्री ने उस शर्त को हटा दिया है जिसमें प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून का लाभ सिर्फ उन राज्यों के साधारण परिवारों को मिलेगा, जहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली का आधुनिकीकरण हो चुका है।थॉमस ने कहा कि मौजूदा मसौदा साधारण परिवारों को सिर्फ उन राज्यों में लाभ देता है जहां पीडीएस व्यवस्था आधुनिक है। अब यह लाभ सभी राज्यों में दिया जाएगा।
खाद्य मंत्री ने कहा कि इन बदलावों के बारे में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी से विचार विमर्श हो चुका है।
प्रस्तावित विधेयक से सरकार पर सब्सिडी का सालाना बोझ 1,00,000 करोड़ रुपये का पड़ेगा। वर्तमान में सरकार का खाद्य सब्सिडी बिल सालाना 70,000 करोड़ रुपये का है। (Z News)
16 नवंबर 2011
गन्ने के एफआरपी का फॉर्मूला बदला जाए : राजू शेट्टी
महाराष्ट्र में गन्नाराज्य ने एफआरपी से ज्यादा तय किया पहली किस्त का गन्ना मूल्यस्वाभिमानी शेतकारी संघ ने एफआरपी में खामियां बताईंकिसानों का मानना है कि केंद्र सरकार द्वारा तय किए जाने वाले गन्ने के उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) को तय करने के फार्मूले में बदलाव होना चाहिए। स्वाभिमानी शेतकारी संघ के अध्यक्ष और लोकसभा सांसद राजू शेट्टी ने कहा है कि वर्तमान में तय होने वाले एफआरपी के फार्मूले में कई खामियां है, जिसकी वजह से लागत के मुकाबले गन्ना का उपयुक्त दाम तय नहीं हो पाता है और गन्ना किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
राजू शेट्टी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि गन्ने का एफआरपी तय करने के फार्मूले में बदलाव करने की जरूरत है। वर्तमान में तय किए जाने वाले फार्मूले में गन्ने की उत्पादन लागत, कटाई, परिवहन लागत और अन्य खर्चे काफी कम जोड़े जाते हैं जबकि इनकी लागत काफी ज्यादा है। इस वजह से गन्ने का एफआरपी लागत के मुकाबले कम तय किया जाता है जिससे गन्ना किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
चालू पेराई सीजन के लिए केंद्र सरकार ने 9.5 फीसदी चीनी की रिकवरी पर गन्ने का एफआरपी 1,450 रुपये प्रति टन घोषित किया है जो पूरी तरह अव्यवहारिक है। उन्होंने कहा कि सरकार को एफआरपी तय करने के फार्मूले में बदलाव के साथ ही लेवी चीनी की अनिवार्यता को भी समाप्त करना चाहिए। चालू सीजन में चीनी का उत्पादन बढऩे का अनुमान है इसीलिए ज्यादा से ज्यादा मात्रा में चीनी निर्यात की अनुमति देनी चाहिए।
राजू शेट्टी ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के किसानों को गन्ने की पहली किस्त के भुगतान के लिए 1,800 से 2,050 रुपये प्रति टन मू्ल्य तय किया है। राज्य सरकार द्वारा पुणे में गन्ने का मूल्य 1,850 रुपये प्रति टन, कोल्हापुर-सांगली और सतारा के लिए 2,050 रुपये प्रति टन किया है जबकि मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्र के लिए गन्ने का समर्थन मूल्य 1,800 रुपये प्रति टन तय किया गया है।
गौरतलब है कि गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाने को लेकर सांसद राजू शेट्टी केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के संसदीय क्षेत्र बारामती में पांच दिनों से अनशन पर बैठे थे। किसानों की मांग थी कि उन्हें 2,350 रुपये प्रति टन के हिसाब से गन्ने का भाव मिले। इसके लिए गन्ना किसान स्वाभिमानी शेतकारी संघ के अध्यक्ष और सांसद राजू शेट्टी के नेतृत्व में पिछले महीने भर से राज्य के गन्ना किसान आंदोलन कर रहे थे।
राज्य के गन्ना किसानों ने 19 सितंबर को आंदोलन शुरू किया था तथा 31 अक्टूबर को राज्य के जय सिंहपुर में एक रैली की थी जिसमें करीब 60,000 से 70,000 किसानों ने भाग लिया था। इस आंदोलन के बाद ही राज्य सरकार ने अपने स्तर पर गन्ने का मूल्य एफआरपी से ज्यादा तय किया है। (Business bhaskar.....R S Rana)
राजू शेट्टी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि गन्ने का एफआरपी तय करने के फार्मूले में बदलाव करने की जरूरत है। वर्तमान में तय किए जाने वाले फार्मूले में गन्ने की उत्पादन लागत, कटाई, परिवहन लागत और अन्य खर्चे काफी कम जोड़े जाते हैं जबकि इनकी लागत काफी ज्यादा है। इस वजह से गन्ने का एफआरपी लागत के मुकाबले कम तय किया जाता है जिससे गन्ना किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
चालू पेराई सीजन के लिए केंद्र सरकार ने 9.5 फीसदी चीनी की रिकवरी पर गन्ने का एफआरपी 1,450 रुपये प्रति टन घोषित किया है जो पूरी तरह अव्यवहारिक है। उन्होंने कहा कि सरकार को एफआरपी तय करने के फार्मूले में बदलाव के साथ ही लेवी चीनी की अनिवार्यता को भी समाप्त करना चाहिए। चालू सीजन में चीनी का उत्पादन बढऩे का अनुमान है इसीलिए ज्यादा से ज्यादा मात्रा में चीनी निर्यात की अनुमति देनी चाहिए।
राजू शेट्टी ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के किसानों को गन्ने की पहली किस्त के भुगतान के लिए 1,800 से 2,050 रुपये प्रति टन मू्ल्य तय किया है। राज्य सरकार द्वारा पुणे में गन्ने का मूल्य 1,850 रुपये प्रति टन, कोल्हापुर-सांगली और सतारा के लिए 2,050 रुपये प्रति टन किया है जबकि मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्र के लिए गन्ने का समर्थन मूल्य 1,800 रुपये प्रति टन तय किया गया है।
गौरतलब है कि गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाने को लेकर सांसद राजू शेट्टी केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के संसदीय क्षेत्र बारामती में पांच दिनों से अनशन पर बैठे थे। किसानों की मांग थी कि उन्हें 2,350 रुपये प्रति टन के हिसाब से गन्ने का भाव मिले। इसके लिए गन्ना किसान स्वाभिमानी शेतकारी संघ के अध्यक्ष और सांसद राजू शेट्टी के नेतृत्व में पिछले महीने भर से राज्य के गन्ना किसान आंदोलन कर रहे थे।
राज्य के गन्ना किसानों ने 19 सितंबर को आंदोलन शुरू किया था तथा 31 अक्टूबर को राज्य के जय सिंहपुर में एक रैली की थी जिसमें करीब 60,000 से 70,000 किसानों ने भाग लिया था। इस आंदोलन के बाद ही राज्य सरकार ने अपने स्तर पर गन्ने का मूल्य एफआरपी से ज्यादा तय किया है। (Business bhaskar.....R S Rana)
यूपी की चीनी मिलें गन्ना के एसएपी के खिलाफ कोर्ट जाएंगी
सरकारी कदम - सरकार ने 235-250 रुपये का परामर्श मूल्य तय कियाचीनी कंपनियों का तर्कचीनी के दाम उत्तर प्रदेश में (एक्स-फैक्ट्री) 2,900 रुपये प्रति क्विंटल हैं। जबकि सरकार द्वारा तय एसएपी के आधार पर इसका दाम 3,400 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए। ऐसे में मिलों को भारी नुकसान होगा। इसलिए राज्य की मिलें घोषित एसएपी पर भुगतान नहीं कर सकती हैं।
चीनी कंपनियों ने चालू पेराई सीजन 2011-12 (अक्टूबर से सितंबर) के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा तय किए गए राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) देने में असमर्थता जताई है। चालू पेराई सीजन के लिए राज्य सरकार ने गन्ने के एसएपी में 40 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 235-250 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। राज्य की चीनी मिले इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की तैयारी कर रही हैं।
इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के डायरेक्टर जरनल अबिनाश वर्मा ने मंगलवार को दिल्ली में संवाददाताओं को बताया कि चीनी के दाम उत्तर प्रदेश में (एक्स-फैक्ट्री) 2,900 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। जबकि चालू पेराई सीजन के लिए राज्य सरकार द्वारा तय किए गए एसएपी के आधार पर इसका दाम 3,400 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए।
ऐसे में चीनी मिलों को मौजूदा कीमतों पर भारी नुकसान होगा। यही कारण है कि राज्य की मिलें चीनी की मौजूदा कीमतों पर एसएपी का भुगतान नहीं कर सकती हैं। उत्तर प्रदेश में चालू पेराई सीजन के लिए राज्य सरकार ने जल्दी पकने वाली किस्म के गन्ने का एसएपी 250 रुपये और सामान्य किस्म के गन्ने का एसएपी 240 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। रिजेक्ट वैरायटी के गन्ने का एसएपी 235 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है।
इस अवसर पर यूपी शुगर मिल्स एसोसिएशन (यूपीएसएमए) के सचिव श्याम लाल गुप्ता ने कहा कि चीनी की मौजूदा एक्स-फैक्टरी कीमत पर एसएपी का भुगतान संभव नहीं है तथा इसके खिलाफ राज्य की मिलें इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जाएंगी। चीनी के दाम खुले बाजार में नहीं बढ़ेंगे तो फिर मिलें किसानों को भुगतान नहीं कर पाएंगी। जिसका असर अगले वर्षों में गन्ने के उत्पादन पर पड़ेगा।
अबिनाश वर्मा ने कहा कि इस समय उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों को तीन-चार रुपये प्रति किलो का घाटा उठाना पड़ रहा है। ऐसे में चालू पेराई सीजन में राज्य की मिलों को 3,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ सकता है। पिछले साल भी राज्य की मिलों को भारी नुकसान हुआ है। चालू पेराई सीजन में उत्तर प्रदेश में 66 लाख टन चीनी का उत्पादन होने का अनुमान है।
वर्मा ने कहा कि चालू पेराई सीजन में देश में चीनी का उत्पादन बढ़कर 260 लाख टन होने का अनुमान है। पिछले साल के बकाया स्टॉक को देखते हुए सरकार को जल्द ही 30-40 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दे देनी चाहिए। साथ ही सरकार को मिलों को हर महीने बेचे जाने वाले कोटा सिस्टम को भी समाप्त कर देना चाहिए। सरकार को लेवी चीनी की अनिवार्यता को भी समाप्त करना चाहिए। (Business Bhaskar.....R S Rana)
चीनी कंपनियों ने चालू पेराई सीजन 2011-12 (अक्टूबर से सितंबर) के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा तय किए गए राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) देने में असमर्थता जताई है। चालू पेराई सीजन के लिए राज्य सरकार ने गन्ने के एसएपी में 40 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 235-250 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। राज्य की चीनी मिले इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की तैयारी कर रही हैं।
इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के डायरेक्टर जरनल अबिनाश वर्मा ने मंगलवार को दिल्ली में संवाददाताओं को बताया कि चीनी के दाम उत्तर प्रदेश में (एक्स-फैक्ट्री) 2,900 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। जबकि चालू पेराई सीजन के लिए राज्य सरकार द्वारा तय किए गए एसएपी के आधार पर इसका दाम 3,400 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए।
ऐसे में चीनी मिलों को मौजूदा कीमतों पर भारी नुकसान होगा। यही कारण है कि राज्य की मिलें चीनी की मौजूदा कीमतों पर एसएपी का भुगतान नहीं कर सकती हैं। उत्तर प्रदेश में चालू पेराई सीजन के लिए राज्य सरकार ने जल्दी पकने वाली किस्म के गन्ने का एसएपी 250 रुपये और सामान्य किस्म के गन्ने का एसएपी 240 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। रिजेक्ट वैरायटी के गन्ने का एसएपी 235 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है।
इस अवसर पर यूपी शुगर मिल्स एसोसिएशन (यूपीएसएमए) के सचिव श्याम लाल गुप्ता ने कहा कि चीनी की मौजूदा एक्स-फैक्टरी कीमत पर एसएपी का भुगतान संभव नहीं है तथा इसके खिलाफ राज्य की मिलें इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जाएंगी। चीनी के दाम खुले बाजार में नहीं बढ़ेंगे तो फिर मिलें किसानों को भुगतान नहीं कर पाएंगी। जिसका असर अगले वर्षों में गन्ने के उत्पादन पर पड़ेगा।
अबिनाश वर्मा ने कहा कि इस समय उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों को तीन-चार रुपये प्रति किलो का घाटा उठाना पड़ रहा है। ऐसे में चालू पेराई सीजन में राज्य की मिलों को 3,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ सकता है। पिछले साल भी राज्य की मिलों को भारी नुकसान हुआ है। चालू पेराई सीजन में उत्तर प्रदेश में 66 लाख टन चीनी का उत्पादन होने का अनुमान है।
वर्मा ने कहा कि चालू पेराई सीजन में देश में चीनी का उत्पादन बढ़कर 260 लाख टन होने का अनुमान है। पिछले साल के बकाया स्टॉक को देखते हुए सरकार को जल्द ही 30-40 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दे देनी चाहिए। साथ ही सरकार को मिलों को हर महीने बेचे जाने वाले कोटा सिस्टम को भी समाप्त कर देना चाहिए। सरकार को लेवी चीनी की अनिवार्यता को भी समाप्त करना चाहिए। (Business Bhaskar.....R S Rana)
15 नवंबर 2011
ऑयल पाम के सहारे आयात बिल बचाने की रणनीति
खाद्य महंगाई दर और आयात पर बढ़ती निर्भरता ने सरकार को दीर्घकालिक रणनीति बनाने के लिए मजबूर कर दिया है। इसी के तहत खाद्य तेलों के बढ़ते आयात को रोकने के लिए केंद्र सरकार देश में ऑयल पाम का उत्पादन बढ़ाने की रणनीति तैयार कर रही है। अगर मौजूदा स्थिति कायम रहती है तो अगले एक दशक में देश का खाद्य तेल आयात बिल तीन लाख करोड़ रुपये हो जाएगा, जो इस समय 29,000 करोड़ रुपये है। इस पर अंकुश लगाने के लिए अगले पांच साल में किसानों को 10,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी देकर ऑयल पाम क्षेत्रफल को बढ़ाकर दस लाख हेक्टेयर करने की रणनीति बनाई जा रही है। ऑयल पॉम के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का भी प्रावधान किया जाएगा। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के चेयरमैन (सीएसईपी) डॉ. अशोक गुलाटी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि सरकार ने ऑयल पाम उत्पादन को बढ़ावा देने और इसके एमएसपी पर रिपोर्ट देने के लिए कहा है। हम तीन सप्ताह में रिपोर्ट तैयार करेंगे। गुलाटी ने बताया कि देश में खाद्य तेलों की जिस तरह से मांग बढ़ रही है उसे देखते हुए 10 साल में हमें इनके आयात पर तीन लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे। वर्ष 1990-91 में देश का खाद्य तेल आयात बिल मात्र 322 करोड़ रुपये था जो 2010-11 में 29 हजार करोड़ रुपये को पार कर गया। जिस तरह से लोगों की आय और खान-पान की आदतें बदल रही हैं उसके चलते खाद्य तेलों की मांग खाद्यान्न के मुकाबले तीन गुना गति से बढ़ रही है। इस स्थिति में हमें तुरंत कारगर कदम उठाने की जरूरत है। डॉ. गुलाटी ने बताया कि ऑयल पाम का उत्पादन बढ़ाकर ही खाद्य तेलों की बढ़ती मांग से निपटा जा सकता है। ऑयल पाम से हमें प्रति हेक्टेयर करीब चार टन क्रूड पाम ऑयल उपलब्ध होता है। दूसरी तिलहन फसलों से 600-700 किलो प्रति हेक्टेयर खाद्य तेल ही उपलब्ध होता है। ऑयल पाम के प्लांटेशन से करीब 20 साल तक यह उत्पादन मिलता है। लेकिन प्लांटेशन तैयार होने तक पहले चार साल उत्पादन नहीं मिल पाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए ऑयल पाम के कल्टीवेशन की रणनीति पर काम किया जा रहा है। गुलाटी ने बताया कि किसानों को ऑयल पाम की फसल के लिए वित्तीय प्रोत्साहन देना होगा। पहले चार साल में यह प्रोत्साहन ऑपर्चुनिटी कॉस्ट के तहत देना होगा ताकि किसान दूसरी फसल ना उगाकर इसी का कल्टीवेशन करें। किसानों को बेहतर सीडलिंग और ड्रिप इरीगेशन जैसी सुविधाओं के लिए कैपिटल सब्सिडी भी देनी होगी। चौथे साल के बाद उनको एमएसपी की सुविधा उपलब्ध करानी होगी। साथ ही फ्रेश पाम फ्रूट के गुच्छों की क्रशिंग के लिए उद्योग और किसानों के बीच तालमेल स्थापित करना होगा। इसे गन्ना किसान और चीनी उद्योग की तर्ज पर विकसित किया जा सकता है क्योंकि कटाई के कुछ घंटों के बाद ही इसकी क्रशिंग जरूरी है। डॉ गुलाटी के मुताबिक इसके लिए सालाना 2500 से 3000 करोड़ रुपये सब्सिडी देनी होगी। इसके लिए 12वीं पंचवर्षीय योजना में करीब 10 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान करना होगा। उन्होंने कहा कि बढ़ते खाद्य तेल आयात बिल को देखते हुए यह लागत बहुत बड़ी नहीं है। उनके मुताबिक सरकार 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल को ऑयल पाम के तहत लाने के लक्ष्य के साथ चलेगी। अगर इसमें से हम सात-आठ लाख हेक्टेयर के स्तर को हासिल कर सके तो भी बड़ी उपलब्धि होगी। इस समय देश में करीब 1.7 लाख हेक्टेयर में ऑयल पाम की खेती हो रही है। सबसे अधिक संभावना आंध्र प्रदेश और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में है। जहां तक एमएसपी का सवाल है तो उसके लिए इंपोर्ट प्राइस पैरिटी को आधार बनाया जाएगा। एक सीमा भी तय की जाएगी जिससे नीचे आयात मूल्य आने पर सीमा शुल्क लगाया जा सकेगा ताकि घरेलू किसानों को सस्ते आयात से संरक्षण मिल सके। पाम ऑयल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भारी उतार चढ़ाव की प्रवृत्ति के चलते ऐसा करना जरूरी है। (Business Bhaskar)
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