देश में कमरतोड़ महंगाई से कराह रहे गरीब परिवारों के जख्मों पर मरहम लगाने में सरकार अब कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। सरकार के नए इरादों से कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। सरकार अब देश के गरीब परिवारों को तीन रुपये प्रति किलो की दर से 25 किलो के बजाय 35 किलो गेहूं अथवा चावल हर महीने देने पर गंभीरता से विचार कर रही है। खाद्य पदार्थो पर मंत्रियों के उच्चाधिकार प्राप्त समूह (ईजीओएम) की बैठक सोमवार को होनी है जिसमें इस प्रस्ताव पर भी विचार किए जाने की प्रबल संभावना है। वैसे, बताया जाता है कि एक गैर सरकारी संगठन राइट टू फूड कैंपेन द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे गए विशेष पत्र ने ही सरकार को अपने इरादों में बदलाव के लिए विवश किया है। इस पत्र में हर गरीब परिवार को 25 किलो अनाज देने के प्रस्ताव को एक सिर से खारिज किया गया है।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाले ईजीओएम की बैठक इससे पहले गत 18 मार्च को हुई थी जिसमें खाद्य सुरक्षा विधेयक को हरी झंडी दिखाई गई थी। इस विधेयक में गरीब परिवारों को हर महीने 25 किलो सस्ता अनाज हासिल करने का अधिकार दिया गया था। हालांकि, ईजीओएम अब यूपीए सरकार के इस महत्वाकांक्षी एजेंडे में संशोधन करने पर विचार कर रहा है। इस तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं कि यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी खुद इस स्कीम में बदलाव लाने पर जोर दे रही हैं ताकि इसके जरिए गरीबी रखा से नीचे जीवनयापन कर रहे करोड़ों परिवारों (बीपीएल फैमिली) को और ज्यादा लाभान्वित किया जा सके। यही नहीं, इस स्कीम के दायर में अब महिलाओं और बच्चों के साथ-साथ समाज के उन अन्य तबकों को भी लाने पर विचार किया जा रहा है जो सरकारी बीपीएल सूची में स्थान पाने से वंचित रह गए हैं। हालांकि, इन अटकलों के बावजूद राइट टू फूड कैंपेन द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए गए पत्र की अनदेखी नहीं की जा सकती।
इस पत्र में खाद्य सुरक्षा के नाम पर हर गरीब परिवार को 25 किलो अनाज देने के अधिकार को अपर्याप्त बताते हुए कहा गया है कि इससे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी उल्लंघन होता है। पत्र में इस ओर ध्यान दिलाया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने हर परिवार को 35 किलो अनाज पाने का अधिकार पहले ही दे दिया है। यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने गरीबों को कई और अधिकार दिए हैं। अंत्योदय अन्न योजना के तहत अत्यंत गरीब तबकों को सस्ता राशन देना और आईसीडीएस के तहत देश के नौनिहालों को बतौर पूरक पोषक खाद्य-पेय पदार्थ मुहैया कराना प्रमुख हैं। इस पत्र में कहा गया है कि प्रस्तावित विधेयक को केवल सरकारी बीपीएल सूची में शामिल लोगों तक ही सीमित कर दिया गया है, जबकि सच्चाई यही है कि देश में बड़ी तादाद में महिलाओं और बच्चों को अपने भोजन में पर्याप्त पोषक तत्व नहीं मिल रहे हैं।
सरकार की ताजा कवायद में पत्र के इस बिंदु यानी प्वाइंट का भी असर नजर आता है क्योंकि वह अब इस स्कीम के दायर में महिलाओं और बच्चों के साथ-साथ अन्य गरीबों को भी शामिल करने पर विचार कर रही है। सूत्रों ने बताया कि ईजीओएम की बैठक में शिकायत निपटार की उस व्यवस्था में कुछ बदलाव किए जाने की भी संभावना है जिसका जिक्र इस विधेयक के मसौदे में किया गया है। गौरतलब है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक के तहत कोई भी महिला अथवा पुरुष निर्धारित अनाज न मिलने की स्थिति में अपनी शिकायत बाकायदा दर्ज करा सकता है क्योंकि प्रस्तावित कानून के अंतर्गत खाद्यान्न मिलने की गारंटी दी जा रही है।
ईजीओएम को अपनी बैठक में बीपीएल परिवारों की वास्तविक संख्या को लेकर मतभेदों पर भी विचार करना है। मालूम हो कि योजना आयोग के एक अनुमान के मुताबिक देश में फिलहाल 6.5 करोड़ बीपीएल परिवार हैं। वहीं, दूसरी ओर प्रधानमंत्री द्वारा गठित तेंदुलकर समिति ने देश में बीपीएल परिवारों की संख्या इससे कहीं अधिक बताई है।
एपीएल परिवारों को अभी राहतनई दिल्ली ह्व गरीबी रखा से ऊपर जीवनयापन कर रहे परिवारों (एपीएल फैमिली) के लिए कुछ राहत भरी खबर है। सरकार द्वारा खाद्य मंत्रालय के प्रस्ताव पर फैसला फिलहाल टाल देने से ही यह राहत उन्हें मिली है। खाद्य मंत्रालय ने 11.52 करोड़ एपीएल परिवारों को राशन की दुकानों के जरिए बेचे जाने वाले गेहूं और चावल की कीमतें बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था। मंत्रालय ने कहा था कि इन परिवारों को बेचे जाने वाले गेहूं और चावल की कीमत बढ़ाकर क्रमश: 11 रुपये एवं 15.37 रुपये प्रति किलो कर दी जाए। जहां तक मौजूदा कीमतों का सवाल है, एपीएल परिवारों को गेहूं 6.10 रुपये प्रति किलो और चावल 8.30 रुपये प्रति किलो की दर से मिलता है। (प्रेट्र)
मौजूदा स्थिति ईजीओएम ने पिछली बैठक में खाद्य सुरक्षा विधेयक को दी थी मंजूरीइसमें गरीब परिवारों को हर माह 25 किलो अनाज पाने का था अधिकारलेकिन राइट टू फूड कैंपेन ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में जताई आपत्तिस्कीम के दायर में अब महिलाओं और बच्चों को भी लाने पर विचार (बिज़नस भास्कर)
05 अप्रैल 2010
03 अप्रैल 2010
होता रहेगा कच्ची चीनी का शुल्क मुक्त आयात
सरकार ने कच्ची चीनी के एकमुश्त आयात पर सीमा शुल्क छूट की अवधि को एक साल के लिए और बढ़ा दिया है। अब इस अवधि को 1 अप्रैल 2011 तक बढ़ा दिया गया है।
31 मार्च को जारी की गई सीमा शुल्क अधिसूचना के मुताबिक एकमुश्त खरीदार वह व्यक्ति, संगठन या औद्योगिक इकाई हो सकती है जो एक महीने में 10 क्विंटल से ज्यादा कच्ची चीनी का कारोबार में संलग्न हो। कच्ची चीनी के आयात को साधारण सीमा शुल्क और विशेष अतिरिक्त शुल्क दोनों से मुक्त रखा गया है। (बीएस हिंदी)
31 मार्च को जारी की गई सीमा शुल्क अधिसूचना के मुताबिक एकमुश्त खरीदार वह व्यक्ति, संगठन या औद्योगिक इकाई हो सकती है जो एक महीने में 10 क्विंटल से ज्यादा कच्ची चीनी का कारोबार में संलग्न हो। कच्ची चीनी के आयात को साधारण सीमा शुल्क और विशेष अतिरिक्त शुल्क दोनों से मुक्त रखा गया है। (बीएस हिंदी)
चीन में लौह अयस्क का स्टॉक 3फीसदी घटा
चीन के प्रमुख बंदरगाहों पर लौह अयस्क का स्टॉक शुक्रवार को 3।3 फीसदी गिरकर 682.6 लाख टन रह गया। स्टील इंडस्ट्री की कंसल्टेंट फर्म मायस्टील के अनुसार बीते सप्ताह चीन में ऑस्ट्रेलिया से लौह अयस्क का आयात कम रहा।शुक्रवार को समाप्त सप्ताह के दौरान ऑस्ट्रेलिया से 212.7 लाख टन लौह अयस्क का आयात किया गया। ऑस्ट्रेलिया से आयात 7.3 लाख टन कम रहा। चीन में लौह अयस्क के कुल आयात में ऑस्ट्रेलिया का योगदान करीब 31.2 फीसदी रही। ब्राजील से आयात 4.6 लाख टन घटकर 177.3 लाख टन रह गया। इस तरह ब्राजील से 26 फीसदी आयात किया गया। भारत से भी आयात 4.6 लाख टन घटकर 169.7 लाख टन रह गया। चीन में भारत से आयात 24.9 फीसदी रहा। यह तथ्य सामने आया है कि चायना आयरन एंड स्टील एसोसिएशन देश के लौह अयस्क नियंत्रण पाने के लिए दुबारा प्रयास कर सकता है। एसोसिएशन पिछले वर्ष में 10 लाख टन से कम लौह अयस्क आयात करने वाली कंपनियों के लाइसेंस रद्द कर सकती है। एसोसिएशन और कई सरकारी विभागों को जांच में पता चला था कि बंदरगाहों पर पड़े लौह अयस्क की क्वालिटी ठीक नहीं है। इसके बाद ये कदम उठाए जाने की चर्चाएं हो रही है। हालांकि कारोबारियों को इन उपायों के प्रभावी होने पर संदेह है। उनका कहना है कि नए नियम से सिर्फ मामूली आयातकों पर नियंत्रण हो सकेगा। देश में लौह अयस्क की जोरदार मांग के चलते सरकार को क्वालिटी नजरंदाज करनी पड़ती है। शंघाई की एक स्टील एंड आयरन ओर ट्रेडिंग कंपनी के प्रतिनिधि ने कहा कि उनका पास लाइसेंस नहीं है लेकिन वे आयात कर रहे हैं। सरकारी अधिकारी समय-समय पर कड़ाई की बात तो करते हैं लेकिन वास्तव में कोई कार्रवाई करने की उनकी कोई मंशा नहीं है। (बिज़नस भास्कर)
देश का कॉफी निर्यात 2.6फीसदी बढ़ा
भारत से कॉफी निर्यात बीते वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान 2.65 फीसदी बढ़कर 2.06 लाख टन हो गया। कॉफी बोर्ड के अनुसार विदेश में मांग बढ़ने और देश में सप्लाई बेहतर रहने के कारण निर्यात में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि मूल्य के लिहाज से कॉफी का निर्यात थोड़ा कम रहा। वर्ष 2009-10 में 2194 करोड़ रुपये मूल्य की काफी निर्यात हुई जबकि उससे पिछले वर्ष में कॉफी निर्यात से 2,260 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा अर्जित हुई थी। भारत एशियाई का तीसरा सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक देश है। कॉफी बोर्ड के एक अधिकारी के मुताबिक कुल निर्यात में बढ़ोतरी की मुख्य वजह अरबिका कॉफी की अच्छी मांग और प्रोसेस्ड कॉफी के पुनर्नियात में बढ़त रही है। बीते वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही जनवरी से मार्च के दौरान निर्यात तेजी से बढ़ा। पिछले साल भारत का कॉफी निर्यात घटकर 2.01 लाख टन रह गया था। भारतीय कॉफी मांग में कमी मुख्य रूप से इटली, रूस, जर्मनी, बेल्जियम और अरब देशों में दर्ज की गई। बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक बीते वित्त वर्ष में 34,558 टन अरबिका और 100,619 टन रोबस्ता कॉफी का निर्यात किया गया। इसके अलावा 24,629 टन इंस्टेंट कॉफी और 46,734 टन प्रोसेस्ड कॉफी निर्यात हुई। कॉफी एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रमेश राजा के मुताबिक आखिरी तिमाही में सप्लाई सुधरने से निर्यात में बढ़त हुई। अरबिका कॉफी की नई फसल आने के कारण बाजार में सुलभता बेहतर होगई थी। आखिरी तिमाही के जबर्दस्त निर्यात से पहली तीन तिमाहियों में आई गिरावट की भरपाई हो गई। (बिज़नस भास्कर)
कमोडिटी- इस सप्ताह (नेशनल कोलेटरल मैनेजमेंट सर्विसेज लि.)
काली मिर्च ग्लोबल मार्केट..अंतरराष्ट्रीय काली मिर्च संगठन ने अनुमान लगाया है कि इस साल काली मिर्च का वैश्विक उत्पादन 3.20 लाख टन से 3.50 लाख टन के बीच रहने की उम्मीद है, जो पिछले साल के 2.85 लाख टन उत्पादजन से ज्यादा होगा।..मलेशियाई काली मिर्च बोर्ड ने 2020 तक घरेलू उपभोग को बढ़ाकर एक लाख टन तक करने का लक्ष्य रखा है। मलेशिया में घरेलू बाजार की खपत पिछले साल 30 फीसदी बढ़कर 6000 टन हो गई। खपत में वृद्धि मुख्य रूप से फूड मैन्यूफेक्चरिंग इंडस्ट्री की ओर से हुई। भावी दिशा..वियतनाम में काली मिर्च की नई फसल आने लगी है लेकिन वहां के उत्पादक मौजूदा मूल्य स्तर पर बिकवाली के इच्छुक नहीं हैं।काली मिर्च घरेलू बाजार..जनवरी और फरवरी में वियतनाम से लगभग 13600 टन काली मिर्च का निर्यात किया गया, जिसमें से 903 टन काली मिर्च का आयात भारत में हुआ। कारोबारियों और उत्पादकों का कहना है कि आने वाले समय में देश में आयातित काली मिर्च की सप्लाई बढ़ सकती है। यह काली मिर्च घरेलू बाजार में वायांदन काली मिर्च के रूप में मिल सकती हैं क्योंकि यह आकार के मामले में एक जैसी है।..रुपये के मजबूत होने के कारण भारत में वियतनाम और श्रीलंका से आयात बढ़ सकता है। इन देशों के निर्यातक 2,750-2,800 डॉलर प्रति टन के भाव पर सौदे करने को तैयार हैं। कोच्चि के हाजिर बाजार में काली मिर्च का भाव 12681 से 12959 रुपये प्रति क्विंटल रहा।भावी दिशा..घरेलू बाजार में क ाली मिर्च की आवक बराबर बनी हुई है।..घरेलू बाजार में वियतनाम से काली मिर्च का आयात जारी रह सकता है।मूल्य संभावनाअगले पखवाड़े में वायदा कारोबार में काली मिर्च के भाव सुधर सकते हैं। वायदा में काली मिर्च का भाव 13804 से 16679 रुपये के बीच रहने की उम्मीद है। (बिज़नस भास्कर)
यूपी में गेहूं के भाव एमएसपी से नीचे
देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में इस साल गेहूं की आवक जल्दी शुरू हो गई है जबकि सरकारी खरीद ठीक तरीके शुरू नहीं हो पाई है। गेहूं की खरीद वैसे तो एक अप्रैल से शुरू हो चुकी है, लेकिन अभी ज्यादातर खरीद केंद्रों पर व्यवस्था दुरुस्त न होने के कारण खरीद सुचारु नहीं हो पाई है। इसके कारण कीमतों में आई गिरावट से किसानों की परशानी बढ़ गई है। जिन जिलों में नए गेहूं की आवक शुरू हुई है, वहां दाम 1100 रुपये प्रति क्विंटल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे चले गए हैं। मथुरा, कोसी, बरली, पीलीभीत मंडियों में भाव घटकर 1040-1070 रुपये प्रति क्विंटल रह गए हैं।भारतीय मजदूर संगठन के संयोजक वी। एम. सिंह ने कहा कि अभी तो राज्य की कुछेक मंडियों में ही नया गेहूं आया है। गेहूं के दाम एमएसपी से नीचे चले गए है। ऐसे में आगामी दिनों में जब सभी मंडियों में आवक का दबाव बनेगा तो भावों में और भी गिरावट आ सकती है। राज्य में इस सीजन में 280-290 लाख टन गेहूं का उत्पादन होने का अनुमान है। लेकिन सरकारी खरीद सुचारुरूप से शुरू न होने के कारण सरकारी खरीद सीमित ही है। गत वर्ष राज्य से मात्र 38.82 लाख टन गेहूं की खरीद हो पाई थी। सिंह ने बताया कि बीज, डीजल और खाद के दाम बढ़ने से किसानों की लागत तो बढ़ गई है लेकिन केंद्र ने गेहूं के एमएसपी में मात्र 20 रुपये प्रति क्विंटल की ही बढ़ोतरी की। राज्य सरकार को गेहूं किसानों को 100 रुपये प्रति `िंटल का बोनस देना चाहिए तथा सरकारी खरीद ज्यादा मात्रा में करनी चाहिए। जिससे किसानों को अपनी फसल एमएसपी से नीचे दाम पर न बेचनी पड़े। राज्य में गेहूं की सरकारी खरीद पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा की तर्ज पर होनी चाहिए। हालांकि एफसीआई ने पहली अप्रैल से राज्य में गेहूं की सरकारी खरीद शुरू करने का ऐलान किया था। लेकिन राज्य की आधी से ज्यादा मंडियों में अभी खरीद के लिए व्यवस्थाएं नहीं हो पाई हैं। उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार ने प्राइवेट पार्टियों को एमएसपी पर गेहूं खरीदने की इजाजत दे दी है। हालांकि प्राइवेट खरीदारों को राज्य सरकार को शपथपत्र देना होगा कि खरीदे गए गेहूं का उपयोग वे खुद करेंगे। अन्य किसी को इस गेहूं की बिक्री नहीं की जा सकती हैं। मालूम हो कि 2007 में राज्य सरकार ने प्राइवेट खरीददारों पर राज्य से गेहूं की खरीद करने पर रोक लगा दी थी। (बिज़नस भास्कर.....आर अस राणा)
चीनी के साथ शीरे का भी उत्पादन बढ़ने का अनुमान
चालू सीजन में चीनी का उत्पादन बढ़ने के साथ शीरे का भी उत्पादन ज्यादा रहने का अनुमान है। शीर का उत्पादन बढ़ने के कारण मूल्य पर भी इसका दबाव महसूस किया जा रहा है। उधर शराब निर्माताओं की मांग कमजोर होने से पिछले एक सप्ताह में शीर की कीमतों में 25 से 40 रुपये की गिरावट आकर भाव 250 से 275 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र कीमिलों में अभी गन्ने की पेराई जारी है लेकिन चालू महीने के आखिर तक पेराई बंद हो जाएगी। तब तक तो शीर की कीमतों पर दबाव बना रहेगा लेकिन मई के बाद कीमतों में तेजी आने के आसार हैं।इंडियन शुगर मिल एसोसिएशन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू सीजन में देश में शीर का उत्पादन पिछले साल के 66 लाख टन से बढ़कर 75 लाख टन होने का अनुमान है। गत वर्ष देश में चीनी का उत्पादन मात्र 147 लाख टन रहा था जबकि चालू पेराई सीजन में उत्पादन बढ़कर 168.45 लाख टन होने का अनुमान है। हालांकि उद्योग सूत्रों का मानना है कि चीनी का उत्पादन 175-180 लाख टन तक पहुंच सकता है। महाराष्ट्र जो चीनी उत्पादन में देश का अग्रणी राज्य है, में शीर का उत्पादन 27 लाख टन, उत्तर प्रदेश में 21.6 लाख टन, कर्नाटक में 9.45 लाख टन, तमिलनाडु में 5.62 लाख टन और आंध्र प्रदेश में 2.31 लाख टन होने का अनुमान है। ऑल इंडिया डिस्टीलरीज एसोसिएशन के महानिदेशक वी. एन. रैना ने बताया कि अभी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की मिलों में गन्ने की पेराई चल रही है और शराब निर्माताओं के पास शीर का स्टॉक भरपूर है इसलिए मांग पहले की तुलना में कम हो गई है। चालू महीने के आखिर तक मिलों में पेराई बंद हो जाएगी, उसके बाद शीर की मौजूदा कीमतों में तेजी बननी शुरू हो जाएगी। उत्तर प्रदेश में गत सप्ताह शीर के दाम 300 रुपये प्रति क्विंटल थे जो गुरुवार को घटकर 275 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। महाराष्ट्र में भी इसके दाम घटकर 260 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। उन्होंने बताया कि पिछले साल पाकिस्तान से शीर का आयात हुआ था लेकिन इस साल पाकिस्तान से शीरा आयात करने पर भारत ने रोक लगा रखी है। परिवहन लागत ज्यादा आने के कारण ब्राजील से आयात संभव नहीं है। उधर पश्चिम बंगाल के दो-तीन शराब निर्माता बांग्लादेश से शीर का सीमित मात्रा में जरूर आयात करते हैं। शीर के कुल उत्पादन की 45 से 50 फीसदी खपत शराब उद्योग में होती है तथा करीब 25 फीसदी खपत केमिकल उद्योग में होती है। इसके अलावा करीब 15-20 फीसदी खपत एथनॉल में होती है। पशुआहार में इसकी खपत मात्र चार से पांच फीसदी ही होती है। मवाना शुगर लिमिटेड के बिजनेस हैड (एथनॉल) राजेश ढींगरा ने बताया कि जैसे ही चीनी मिलों में गन्ने की पेराई बंद होगी शीर के दाम बढ़ने शुरू हो जाएंगे। हालांकि आगामी वर्ष में देश में गन्ने की पैदावार ज्यादा होने का अनुमान है। इसीलिए आगामी दिनों में शीर के दाम 300-350 रुपये प्रति क्विंटल के दायर में रहने का अनुमान है। (बिज़नस भास्कर....आर अस राणा)
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