फाइनेंशियल टेक्नोलॉजीस (एफटीआईएल) द्वारा प्रोन्नत नेशनल स्पॉट एक्सचेंज (एनएसईएल) में वर्तमान वित्तीय वर्ष के पहले चार महीनों में ई-गोल्ड में उल्लेखनीय कारोबार रिकॉर्ड हुआ। एनएसईएल देश का नंबर-1 राष्ट्रव्यापी इलेक्ट्रॉनिक कमोडिटी स्पॉट एक्सचेंज है। वित्तीय साल 2011 के प्रथम चार महीनों में ई-गोल्ड का औसत मासिक कारोबार बढ़कर 3082.60 करोड़ रुपए हो गया जो गत साल समान अवधि के 436.89 करोड़ रुपए से 605 प्रतिशत अधिक है। वैसे साल 2011 के पहले 8 महीनों में एक्सचेंज पर ई-गोल्ड का कारोबार गत जनवरी महीने के 2377 करोड़ रुपए से 60 प्रतिशत उछलकर अबतक 3823.67 करोड़ रुपए हो चुका है। एक्सचेंज पर 16 अगस्त के दिन ई-गोल्ड में अब तक का सर्वाधिक दैनिक कारोबार 359.67 करोड़ रुपए किया गया और इसमें 1,29,967 ग्राम की रिकॉर्ड डिलीवरी दर्ज की गई। एनएसईएल ने गत साल मार्च 2010 में ई-सिरीज के अंतर्गत खुदरा निवेशकों की भारी मांग पर ई-गोल्ड लांच किया। इस सिरीज में बाद में अप्रैल में ई-सिल्वर, नवंबर में ई-कॉपर और जनवरी में ई-जिंक लांच किया गया।ई-गोल्ड अबतक का सफल उत्पाद रहा है। इस उत्पाद भारतीय खुदरा निवेशकों के निवेश की मांग को पूरा किया है। उन्हें सोने और चांदी जैसे बहुमूल्य धातुओं में छोटी बचत करने का मौका उपलब्ध कराया है। सोने चांदी के वर्तमान तेजी के दौरान ई-गोल्ड निवेशकों का पसंदीदा उत्पाद बन गया है। निवेश में सुरक्षा और उच्च प्रतिलाभ के मद्देनजर खुदरा निवेशक इस उत्पाद को भारी तरजीह दे रहे हैं। लांच के समय से अबतक ई-गोल्ड ने निवेशकों को सोने के दूसरे साधनों से अधिक 57.58 प्रतिशत का प्रतिलाभ दिलाया है।साल 2010 के दौरान जब शेयरों में निफ्टी एक मापक था, ने केवल 11 प्रतिशत का लाभ दिया और कुछ मशहूर गोल्ड ईटीफ ने निवेशकों को केवल 23 प्रतिशत का रिटर्न दिया जबकि ई-गोल्ड ने इनकी तुलना में निवेशकों को सर्वाधिक 26 प्रतिशत का रिटर्न दिलाया।एनएसईएल के प्रबंध निदेशक एवं सीईओ अंजनि सिन्हा ने कहा कि एनएसईएल का ई-गोल्ड आज निवेशकों के लिए निवेश का बेहतर विकल्प सिद्ध हो रहा है, खासकर छोटे निवेशकों और एचएनआई के लिए। ई-गोल्ड अपने निवेशकों को पारदर्शक भाव, व्यवस्थित ट्रेडिंग और जीरो होल्डिंग कॉस्ट की सुïिवधा देता है। आज ई-गोल्ड में निवेशकों में काफी पसंद किया जा रहा है और निवेशक बिना किसी चिंता के इसमें पैसे डाल रहे हैं। इसकी विशुद्धता और फिजिकल सेक्युरिटीज पर उन्हें पूरा भरोसा हो गया है। ई-गोल्ड में निवेश आज अत्यंत आसान और सुविधाजनक है। यह कारोबारियों को सराफा बाजार में बिना किसी फिजिकल गोल्ड के प्रवेश का मौका प्रदान करता है।फिलहाल, ई-गोल्ड का एनएसईएल के साल 2011 के कुल टर्नओवर में 17 प्रतिशत का योगदान है। इस कारोबार के साथ ई-सिरीज के उत्पादों में कारोबार एनएसईएल पर मार्च 2010 के 2301.24 करोड़ रुपए से उछलकर अगस्त 2011 में १२१९३.५६ करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।
31 अगस्त 2011
दूसरे विकल्पों के मुकाबले ई-गोल्ड का प्रदर्शन बेहतर
मुंबई February 16, 2011
लेनदेन, ब्रोकरेज व डिलिवरी की कम लागत के चलते साल 2010 में सोने में निवेश के अन्य विकल्पों के मुकाबले नैशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (एनएसईएल) में ई-गोल्ड का प्रदर्शन शानदार रहा। हाजिर बाजार में सोने ने थोड़ा बेहतर रिटर्न दिया, लेकिन सोना रखने से जुड़े खतरों को देखते हुए कई निवेशकों ने ई-गोल्ड में निवेश को प्राथमिकता दी।पिछले साल मार्च महीने में पेश ई-गोल्ड ने अब तक 23.64 फीसदी का रिटर्न दिया है। एमसीएक्स गोल्ड फ्यूचर्स समेत सोने में निवेश के अन्य विकल्पों में रिटर्न इसके मुकाबले कम रहा है। रिलायंस गोल्ड ईटीएफ में 17.82 फीसदी का रिटर्न मिला है। ई-गोल्ड वैसे छोटे निवेशकों के लिए बाजार में पेश किया गया था, जो बड़ी मात्रा में सोना नहीं खरीद सकते। इसमें निवेश में काफी बढ़ोतरी हुई है और एक्सचेंज में रोजाना औसतन टर्नओवर 50 से 100 करोड़ रुपये का रहा है। 19 जनवरी को इसने हालांकि 129.55 करोड़ रुपये का सर्वाधिक टर्नओवर हासिल करने में कामयाबी हासिल की थी।एनएसईएल के प्रबंध निदेशक व सीईओ अंजनी सिन्हा कहते हैं - ई-गोल्ड की खरीद-बिक्री में आसानी, सुरक्षा, शून्य होल्डिंग लागत, डीमैट स्टेटमेंट, हाजिर सोने में आसानी से परिवर्तन आदि कुछ ऐसी चीजें हैं जो निवेशकों को आकर्षित करती हैं। एनएसईएल ने ऐसी ही सुविधा ई-सीरीज के दूसरे उत्पादों मसलन चांदी, तांबा व जस्ते में भी उपलब्ध कराया है। साल 2011 के दौरान यह और उत्पाद पेश करने की योजना बना रहा है।विश्लेषक छोटे निवेशकों को सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान के सिद्धांत अपनाने की सलाह देते हैं और सोने या चांदी को धीरे-धीरे जमा करने को कहते हैं। उन्हें इसकी बिक्री कीमत बढऩे पर ही करने की सलाह दी जाती है। पिछले कुछ सालों में सोने ने निवेशकों को करीब 40 फीसदी का रिटर्न दिया है और अगर लंबी अवधि तक इसमें निवेश जारी रखा जाए तो भविष्य में भी ऐसा ही रिटर्न मिलने की उम्मीद है। निवेशक हमेशा ही जिंसों में फायदा कमाते हैं, ऐसे में खुदरा निवेशकों को निवेश करना चाहिए न कि बाजार के कयासोंं पर ध्यान देना चाहिए। ई-सीरीज के उत्पादों का मकसद रोजाना, साप्ताहिक या मासिक आधार पर छोटी-छोटी रकम का निवेश करने को प्रोत्साहन देने का है, ताकि निवेशक लंबी अवधि में सबसे अच्छा रिटर्न हासिल कर सकें।हाजिर बाजार के प्रतिभागियों, सोने-चांदी के कारोबारी, आभूषण के कारोबारी आदि के लिए एनएसईएल ऑप्शन उपलब्ध कराता है, जहां एक किलोग्राम या 100 ग्राम के आयातित सिल्लियों की डिलिवरी की पेशकश की जाती है। एनएसईएल ने ऐसे अनुबंध विभिन्न स्थानों पर पेश किया है। विश्लेषकों का कहना है कि छोटे व खुदरा निवेशकों को छोटी अवधि में बेचना नहीं चाहिए बल्कि बने रहना चाहिए। उन्हें हमेशा लंबी अवधि के बारे में सोचना चाहिए। ऐसा करने वाले निवेशक अपनी रकम नहीं गंवाते। ई-गोल्ड व ई-सिल्वर को डीमैट से आभूषण में बदलने के लिए एनएसईएल देश भर के करीब 100 से ज्यादा आभूषण निर्माताओं के साथ बातचीत कर रहा है। इस साल मार्च तक इसके शुरू होने की संभावना है।
सोने में निवेश का नया तरीका : ई-गोल्ड
नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (एनएसईएल) ने हाल ही एक उत्पाद लांच किया है - ई-गोल्ड। यह आज के नए जमाने में निवेश का नया जरिया बन गया है जो गोल्ड के निवेशकों में बड़ी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। ई-गोल्ड में सोने की दोनों खास विशेषताओं - भौतिक व इलेक्ट्रॉनिक का मिश्रण होता है। यह कैसे काम करता है?चूंकि ई-गोल्ड सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक रूप में खरीदा जा सकता है लिहाजा इसमें निवेश करने के लिए आपके पास डीमैट खाता होना जरूरी है। ध्यान रहे इसमें आपका रेगुलर शेयर डीमैट खाता किसी काम का नहीं होगा। आपको एनएसईएल की सूची में शामिल डिपॉजिटरी पार्टीसिपैंन्ट्स (डीपी) में से किसी एक के पास डीमैट खाता खुलवाना होगा। डीपी की सूची एनएसईएल की वेबसाइट से ली जा सकती है। डीपी एकाउंट के बाद आपको एनएसईएल के किसी सदस्य के पास क्लाइंट एकाउंट भी खुलवाना होगा। आपकी सुविधा के लिए एनएसईएल के पास सूचीबद्ध 300 से भी ज्यादा कारोबारी सदस्य हैं जो देश भर में फैले हुए हैं। ये कारोबारी सदस्य आपको देश के तकरीबन सभी छोटे-बड़े शहरों में मिल जाएंगे। यानी अगर आप रायपुर, इंदौर, जयपुर, जोधपुर या भोपाल में रहते हैं तो भी आप ई-गोल्ड में निवेश करने के लिए बड़ी आसानी से एनएसईएल के कारोबारी सदस्यों की सेवाएं प्राप्त कर सकते हैं। इन कारोबारी सदस्यों की सूची भी एनएसईएल की वेबसाइट से ली जा सकती है।ई-गोल्ड में ट्रेडिंग सोमवार से शुक्रवार के बीच सुबह 10 बजे से रात 11.30 बजे के बीच की जा सकती है। जिस ब्रोकर सदस्य के पास आपने अपना क्लाइंट एकाउंट खोला है आप उसे फोन करके बता सकते हैं कि आप क्या और कितना खरीदना चाहते हैं। इसके साथ ही ब्रोकर सदस्य द्वारा मुहैया कराए जाने वाले उपरोक्त कारोबारी समय के दौरान आप ऑनलाइन भी ई-गोल्ड की खरीदारी कर सकते हैं।कितना आता है खर्चजिस तरह शेयरों की खरीद या बिक्री में आपको ब्रोकरेज देना होता है ठीक उसी प्रकार प्रति यूनिट ई-गोल्ड की खरीदारी या बिक्री में ब्रोकर ब्रोकरेज चार्ज कर सकते हैं। अमूमन यह चार्ज 0.25 फीसदी से 0.50 फीसदी के बीच होता है। इसके अलावा ब्रोकर प्रति एक लाख रुपये के लिए 20 रुपये की दर से ट्रांजैक्शन चार्ज भी वसूलते हैं। ट्रांजैक्शन चार्ज एक्सचेंज का प्रभार होता है। डीपी को इलेक्ट्रॉनिक रूप में यूनिटों की बिक्री के प्रत्येक लेनदेन के लिए भी आपको प्रभार देना होता है, हालांकि यह नाममात्र का ही होता है।डीमैट एकाउंट को मेनटेन करने के लिए भी आपसे तकरीबन 300 रुपये का सालाना लिए जाएंगे। इसके पहले एक्सचेंज सेफ डिपॉजिट वॉल्ट में सोने को सुरक्षित रखने का खर्च वसूलते थे, पर अब यह नहीं होता। आपको दिन के दौरान ई-गोल्ड की यूनिटों में कारोबार करने की अनुमति होती है पर कारोबार का समय खत्म होने तक सभी यूनिटों की स्थिति डिलीवरी या पेमेंट मे होनी ही चाहिए। डिलीवरी व पेमेंट मैकेनिज्म शेयर बाजार सरीखा ही होता है। शार्ट डिलीवरी के मामले में यहां भी शेयर बाजार जैसी ऑक्शन व्यवस्था है।सोने में कन्वर्जन सभी ई-गोल्ड यूनिटों के पीछे समान मात्रा का सोना रहता है। आप एक्सचेंज से यह निवेदन कर सकते हैं कि आपको आपके डीमैट खाते में पड़ी ई-गोल्ड यूनिटों की समान मात्रा का सोना दे दिया जाए। इसके लिए आपको निवेदन के साथ इलेक्ट्रॅनिक यूनिटें सरेंडर करनी होंगी। आप मुंबई, दिल्ली या अहमदाबाद में स्थित एनएसईएल के किसी भी डिलीवरी केंद्र से सोने की डिलीवरी ले सकते हैं। यूनिटें 8, 10, 100 ग्राम या एक किलोग्राम के सिक्कों/बार्स या दोनों के कॉम्बीनेशन में कन्वर्ज कराई जा सकती हैं। एक्सचेंज 8 व 10 ग्राम के सिक्कों में प्रत्येक कन्वर्जन के लिए 200 रुपये वसूलता है। 100 ग्राम के सिक्के के लिए प्रभार 100 रुपये है, लेकिन अगर आप एक किग्रा का बार लेते हैं तो इसके लिए एक्सचेंज की कोई फीस नहीं है।
जेवरात में निवेश का खरा फॉर्मूला
सोने की कीमतों में रिकॉर्ड तेजी के बावजूद बीते हफ्ते अक्षय तृतीया के शुभ मौके पर उपभोक्ताओं और निवेशकों ने जमकर खरीदारी की। इस मौके पर कई ज्वैलर्स ने ग्राहकों को लुभाने के लिए तरह-तरह के डिस्काउंट दिए। वैसे बिना किसी डिस्काउंट या उत्सव के भी भारतीय ग्राहक आमतौर पर सोने के प्रति काफी उदार होते हैं। लेकिन यह सोना जितना खरा होता है, सोने की खरीद उतनी सीधी नहीं है। निवेशकों या ग्राहकों के लिए इस पेचीदे फैसले से पहले कुछ जरूरी बातों की जानकारी आवश्यक है ताकि आप बढ़िया समान के बदले सही भुगतान कर सकें। सोने की हॉलमार्किंग संगठित बाजार में गोल्ड ज्वैलर्स सोने की गुणवत्ता को परखने के लिए हॉलमार्किंग की शर्तों का पालन करते हैं। भारत में ज्वैलर्स को ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंर्डड्स से बीआईएस हॉलमार्क सर्टिफिकेशन मिलती है। देशभर के बड़े और छोटे शहरों में बीआईएस हॉलमार्किंग सेंटर हैं। हॉलमार्क में बीआईएस और ज्वैलर्स के इनिशियल्स के साथ सोने के कैरेट की जानकारी और हॉलमार्किंग की तारीख रहती है। इतना ही नहीं, आभूषण के पिछले भाग में, अगूंठी के बीच में या चूड़ी के भीतरी हिस्से में सोने से जुड़ी जानकारी रहती है। भारत में अब भी हॉलमार्किंग की प्रक्रिया अनिवार्य नहीं है, इसलिए सोने के आभूषण बगैर कोई क्वालिटी मार्क के बेचे जाते हैं। रीटेल ज्वैलरी चेन रीवा के मैनेजिंग डायरेक्टर संजीव अग्रवाल के मुताबिक, 'इस मामले में ग्राहकों को दुकानदारों की बात मानने के बजाय हॉलमार्क पर ज्यादा जोर देना चाहिए।' उन्होंने बताया, 'बगैर हॉलमार्क के आभूषण बेचने वाले कई दुकानदार ग्राहकों को बताते हैं कि हॉलमार्किंग पर बहुत ज्यादा खर्च आता है और इससे गहने और महंगे हो जाते हैं।' संजीव अग्रवाल ने बताया, 'यह सही नहीं है। हॉलमार्किंग में बहुत मामूली शुल्क लगता है, लेकिन सबसे अहम बात यह है कि बीआईएस मार्क से सोने की गुणवत्ता पक्की हो जाती है।' अगर कोई दुकानदार हॉलमार्क के गहने देने से इनकार करता है तो दूसरे स्टोर जाकर बीआईएस मार्क के गहने खरीदने चाहिए। उद्योग के जानकारों का अनुमान है कि बाजार में हॉलमार्क्ड सोने के आभूषणों की हिस्सेदारी 15-20 फीसदी है। क्यों महत्वपूर्ण है हॉलमार्किंग? कुछ ज्वैलर्स 19 कैरेट के गोल्ड ज्वैलरी को 22 कैरेट का बताकर बेच सकते हैं। इस लिहाज से आपको कम गुणवत्ता वाले गहनों पर ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे। यह बात आपको तब पता चलेगी, जब आप इसके बदले नए गहने लेने दूसरे स्टोर जाएंगे। रीवा ज्वैलर्स के संजय अग्रवाल ने बताया, 'बीआईएस के आंकड़ों से पता चला है कि आज भी देश के छोटे शहरों और दूरदराज इलाकों में ज्वैलर्स 19 कैरेट के गोल्ड को 22 कैरेट बताकर उसकी बिक्री करते हैं। इस तरह की जालसाजी को ग्राहक तभी पकड़ पाएंगे जब वह हॉलमार्क्ड होगा या फिर उसे कैरेट मीटर का सहारा लेना होगा।' इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ज्वैलरी के डायरेक्टर वेदांत जटिया ने बताया, 'सोना काफी कीमती होता है और इन दिनों तो काफी महंगा हो चला है। सभी ज्वैलर्स आभूषण खुद से नहीं बनाते हैं। अपनी जरूरत के हिसाब से वे सूरत या कोयम्बटूर जैसे प्रमुख शहरों से आभूषणों की आउटसोर्सिंग करते हैं।' उन्होंने बताया, 'एक छोटा गहना भी कई लोगों के हाथों से होकर ग्राहक के पास आता है, इसलिए ग्राहकों को हॉलमार्क सर्टिफिकेट वाले गहनों की मांग करनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि वह बढ़िया चीज का सही भुगतान कर रहा है।' बिल के लिए जोर डालें असली बिल की पर्ची नहीं लेकर आप भले ही सौ या हजार रुपए बचा लें, लेकिन ऐसा करके आप अनजाने में घटिया क्वॉलिटी के सोने महंगे दाम पर खरीद लेते हैं। इसलिए आपको दुकानदार से बिल जरूर लेनी चाहिए, जिसमें खरीद की तारीख से लेकर कैरेट, सोने का वजन और मेकिंग चार्जेज का ब्योरा लिखा रहता है। अगर बिल के ब्योरे के मुताबिक, खरीदा गया आभूषण सही नहीं होता है तो आप इस सुबूत के दम पर ज्वैलर के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं। जटिया ने बताया, 'अक्सर ज्वैलर ग्राहकों को समझाते रहते हैं कि बिल नहीं लेने पर आपको आभूषण 1 फीसदी सस्ते मिलेंगे। आमतौर पर ग्राहकों को उसी स्टोर से आभूषण खरीदने चाहिए, जो कर भुगतान के साथ वैट नंबर रखते हों।' पुराने के बदले नए पुराने गहनों को बेचकर नए गहने सभी लोग खरीदते हैं। फैशन बदलने, पुराने आभूषणों से मोहभंग और नए कलेक्शन को लेकर प्राय: लोग ऐसा करते हैं। लेकिन यह जानना जरूरी है कि एक्सचेंज के समय पुराने सोने की पूरी कीमत नहीं मिलती है। हॉलमार्किंग भारत में बहुत नया कॉन्सेप्ट है। 5-6 साल पहले खरीदे गए गहनों में बीआईएस मार्क नहीं होता है, इसलिए जब आप एक्सचेंज के लिए किसी ज्वैलर्स के पास जाएंगे तो वह उसकी गुणवत्ता और वजन की जांच करता है। शहरी इलाकों के ज्वैलर सोने की गुणवत्ता जांचने के लिए कैरेट मीटर का इस्तेमाल करते हैं। यह एक ऐसा टूल है जो आभूषण में सोने का वजन मापता है। छोटे शहरों के ज्वैलर स्टोर के सहारे आभूषण की गुणवत्ता और उसमें सोने का वजन अंश मापते हैं। इस प्रक्रिया के बाद वे आपको सोने का बायबैक वैल्यू बता देंगे। आप बायबैक कीमत से सहमत हैं तो ज्वैलर उसी कीमत के नए जेवर आपको दे देगा। 24 कैरेट का सोना दुलर्भ संगठित बाजार में ज्वैलरी स्टोर आमतौर पर 22 कैरेट के सोने की बिक्री करते हैं। जटिया ने बताया, '24 कैरेट का सोना बहुत नरम होता है।' 24 कैरेट में 99.9 फीसदी गोल्ड होता है, जिसका इस्तेमाल कलाकृतियों में होता है। 22 कैरेट में 91.6 फीसदी सोने की मात्रा होती है। जटिया ने बताया, 'ऐसे बहुत कम ज्वैलर हैं जो 24 कैरेट सोने की बिक्री करते हैं, क्योंकि नरम होने के कारण 24 कैरेट गोल्ड का इस्तेमाल हीरे जड़ित आभूषणों में नहीं होता है। थोड़ा सा भी मोड़ने पर उसके टूटने की आशंका रहती है।' सोना खरीदने से पहले उस दिन बाजार में सोने का भाव पता करना चाहिए। इसके अलावा मेकिंग चार्जेज, वजन और कैरेट की जानकारी के साथ स्टोर की बॉयबैक पॉलिसी भी पता होनी चाहिए। यह तब और अच्छा माना जाएगा सोने से जुड़ी सारी जानकारी ज्वैलर आपको एक पेपर पर दे। (ET Hindi)
30 अगस्त 2011
सोने के गहनों की मासिक किस्त न पड़ जाए महंगी
मुंबई
आप अपनी बेटी का जन्मदिन धूमधाम से मनाना चाहते हैं या फिर अपने खास दोस्त की शादी में शरीक होना चाहते हैं?
आप जरूर सोच रहे होंगे कि इस खास मौके पर आपको कैसा उपहार देना चाहिए। ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस तरह के मौके पर उपहार देना अब आसान हो गया है। आपको जानकर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि टाटा समूह की तनिष्क और पी एन गाडगिल ज्वैलर्स मासिक बचत योजना चला रहे हैं। यह बैंकों की जमा योजनाओं की तरह ही है।
इस योजना के तहत आप अलग-अलग अवधि के लिए कम पूंजी की बचत कर सकते हैं। अवधि खत्म होने के बाद निवेशक उस रकम से सोने के गहने खरीद सकता है क्योंकि नकद पैसे वापस करने की अनुमति इस योजना में नहीं है।
कई लोकल ज्वैलर्स इस तरह की योजनाएं चला रहे हैं। इन योजनाओं में शुरूआत में न्यूनतम 500 रुपये प्रति माह निवेश किया जा सकता है। तनिष्क यह स्कीम 12 महीने और 18 महीने के लिए चलाती है।
क्या है प्रक्रिया
जो योजना 12 महीने की है, इसके लिए निवेशक को 11 महीने तक किस्त देनी होती है और तनिष्क अंतिम किस्त देती है। इसी तरह 18 महीने की योजना में निवेशकों को 17 महीने की किस्त देनी होती है जबकि ज्वेलर अंतिम किस्त देता है। यह अलग-अलग ज्वेलर के लिए अलग हो सकता है।
पुणे में पीएन गाडगिल ज्वेलर्स के स्टोर मैनेजर राजेश सोनी का कहना है, 'एक साल की योजना के लिए ग्राहकों को 12 महीने तक किस्त का भुगतान करना होता है और एक महीने की मुफ्त किस्त हम अपने ग्राहकों को देते हैं जो बोनस होता है।'
पीएन गाडगिल स्टोर अपने ग्राहकों को, एक साल, 2 साल और 3 साल की योजनाओं का विकल्प मुहैया कराते हैं। एक साल की स्कीम पर वे एक महीने की किस्त बोनस के तौर पर देते हैं, 2 साल की स्कीम पर 3 महीने की किस्त और 3 साल की स्कीम पर 7 महीने की किस्त देते हैं। इस अवधि के अंत में निवेशक उसी ज्वैलर्स की दुकान से सोने या चांदी के गहने खरीद सकता है।
तनिष्क की शॉप में 22 कैरेट का शुद्ध सोना और 18 कैरेट का जड़ा हुआ हीरा और प्लेटिनम ज्वैलरी खरीदी जा सकती है। हालांकि अगर आप सोने या चांदी के सिक्के चाहते हैं तो इसमें इसका ऑफर नहीं है। आपके पास यह विकल्प भी होगा कि आप अपनी बचत क्षमता के मुताबिक मासिक किस्त को बढ़ा या घटा सकें।
लेकिन अगर आपने अपनी किस्त का भुगतान नहीं किया तो परिपक्वता की तारीख बढ़ जाएगी। यानी आप तय तिथि से भुगतान में जितने दिनों की देरी करेंगे उतनी ही देरी योजना के परिपक्व होने में लगेगी। अगर आपको नकद पैसे की जरूरत है और आप इस स्कीम को जल्दी खत्म करते हैं तो आपको ज्वैलर्स द्वारा दिया जाने वाला बोनस नहीं मिलेगा।
निवेश से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि जो लोग स्कीम की पूरी अवधि में निवेश करते रहते हैं उनके पास अच्छी रकम इकट्ठा हो जाती है। इस तरह की योजनाएं अपने पोर्टफोलियो में विविधता लाने के लिए बेहतर हैं और इसमें थोड़ी बचत भी हो जाती है। लेकिन वे मूल निवेश के तौर पर इसकी सिफारिश नहीं करते।
जोखिम की संभावना
ट्रेंडी इंवेस्टमेंट के मुख्य कार्याधिकारी डी सुंदराजन का कहना है, 'खुदरा निवेशकों के लिए इस तरह की योजनाओं में कई तरह के जोखिम हैं। ज्वैलरी के कारोबार का नियमन नहीं होता, इसी वजह से इसमें पैसे के सुरक्षित होने की कोई गारंटी नहीं होती। इसी तरह लोकल ज्वैलर डिफॉल्ट साबित भी हो सकता है।'
दूसरी खास बात यह है कि सोने की कीमतों में स्थिरता नहीं है। इंवेस्टोलाइन डॉट इन के अभिनव अंग्रीश का कहना है, 'आपको क्या मालूम है कि जब आपके निवेश की अवधि पूरी हो जाएगी जब सोने का कारोबार किस दर पर हो रहा होगा? अगर सोने का कारोबार 16,000 पर हो रहा है और ऐसे वक्त में अवधि जब खत्म हो रही हो तो यह और भी ज्यादा ऊंची दर पर जा सकता है।'
ज्यादा कीमत होने से आप कम कीमत की खरीदारी ही कर पाएंगे क्योंकि इन स्कीमों में नकदी नहीं मिल पाती है। ऐसे में आपको महसूस हो सकता है कि आपके पैसे फंस गए हैं। फोरफ्रंट कैपिटल की राधिका गुप्ता का कहना है, 'आप अपने पैसे एक इलिक्विड विकल्प में डाल रहे हैं और 1 साल की अवधि कम नहीं होती है।'
छोटी मासिक बचत योजनाओं के लिए भ्भी म्युचुअल फंडों का सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (सिप) भी एक बेहतर विकल्प है। वैल्यू रिसर्च के आंकड़े के मुताबिक पिछले एक साल में एक म्युचुअल फंड रेटिंग एजेंसी, इक्विटी डाइवर्सिफाइड फंड ने औसतन 82 फीसदी का रिटर्न दिया है। वहीं एचडीएफसी टॉप 200 ने भी एक साल में लगभग 85 फीसदी का रिटर्न दिया है।
डीएसपीबीआर इक्विटी ने लगभग 83 फीसदी का रिटर्न दिया है। इस तरह साल में 2000 रुपये के मासिक निवेश से 43,680 रुपये बनाया जा सकता है। सुंदराजन का कहना है, 'अगर कोई अपने पोर्टफोलियो में सोना शामिल करना चाहता है तो उसे मासिक आधार पर गोल्ड एक्सचेंज-ट्रेडेड फं ड (ईटीएफ) खरीदना चाहिए। इसके अलावा आप एक ग्राम सोना भी खरीद सकते हैं।'
बाद में इन यूनिटों को सोने में तब्दील किया जा सकता है। ये योजनाएं उनके लिए बेहतर हैं जिन्हें किसी जल्द आने वाले किसी खास मौके पर कुछ उपहार देना हो और वे बड़ी रकम नहीं जुटा सकते। गुप्ता का कहना है, 'लेकिन तब भी इन योजनाओं में कम निवेश करने का विकल्प ही बेहतर होगा।'
...निवेश में बरते सावधानी
बैंकों की तर्ज पर ज्वैलर्स चला रहे हैं मासिक बचत योजनाइस स्कीम की परिपक्वता की अवधि 1,2 और 3 सालों की हैज्वैलर्स आखिरी महीने का किस्त देते हैं निवेश राशि से गहने खरीदने की है बाध्यता
27 अगस्त 2011
10 फीसदी बढ़ सकती हैं टायरों की कीमतें
नई दिल्ली।। ऑटो सेक्टर में सुस्ती और लागत में बढ़ोतरी टायर उद्योग को काफी परेशान कर रही है। पिछले वित्त वर्ष में उद्योग की बढ़ोतरी दर करीब 35 फीसदी जो पहली तिमाही में घटकर 12 से 14 फीसदी तक रह गई है। यही कारण है कि सितंबर-अक्टूबर तक अगर ऑटो सेल्स में तेजी न आई तो कीमतों में 10 से 12 फीसदी की बढ़ोतरी से इनकार नहीं किया जा सकता। टायर मैन्युफैक्चरिंग की कुल लागत में कच्चे माल की का 70 फीसदी हिस्सेदारी होती है। पिछले वित्त वर्ष से तुलना करें तो एक साल में टायर बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पीबीआर, नायलॉन शीट, सिंथेटिक रबर जैसे कच्चे माल की कीमतों में काफी इजाफा हुआ है। इससे लागत में 10 फीसदी की अतिरिक्त बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। मोदी टायर्स का अधिग्रहण करने वाली कंपनी कॉन्टिनेंटल ऑटो के बोर्ड मेंबर आलोक मोदी ने बताया, 'टायर मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों से जुड़ी इकाइयों को काफी चुनौतीपूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। इस स्थिति में दामों में 10 से 12 फीसदी की बढ़ोतरी करने की आवश्यकता है।' हालांकि दामों में कब तक बढ़ोतरी की जा सकती है इस बात पर मोदी ने कहा कि अगले दो से तीन महीने तक दामों में किसी भी तरह की बढ़ोतरी की कोई आशंका नहीं है। टायर कंपनियों के मुताबिक अगर त्योहारों के मौसम यानी सितंबर और अक्टूबर के दौरान अगर ऑटो सेल्स में तेजी नहीं आती है तो दामों में बढ़ोतरी की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। जेके टायर्स के डायरेक्टर (मार्केटिंग) ए एस मेहता के मुताबिक, 'लागत बढ़ने से ज्यादातर टायर कंपनियों की पहली तिमाही के नतीजे अच्छे नहीं रहे हैं। प्रॉफिट मार्जिन में करीब 5 फीसदी की गिरावट दर्ज की जा रही है।' मेहता ने कहा कि उद्योग में काफी कड़ी प्रतिस्पर्धा है। यही वजह है कि दाम में इजाफा करने में कोई कंपनी जल्दबाजी नहीं करना चाहती। नवरात्रि और दिवाली जैसे त्योहार ऑटो सेल्स के लिए काफी अच्छे माने जाते हैं। इस दौरान बिक्री में तेजी नहीं आती तो दाम बढ़ाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचेगा। उद्योग का सालाना टर्नओवर 35,000 करोड़ रुपए है। ऑटोमोटिव टायर्स मैन्युफैक्चरर्स असोसिएशन के डायरेक्टर जनरल राजीव बुद्धिराजा ने कहा, 'कच्चे माल की कीमतों में इजाफा टायर उद्योग के लिए परेशानी की बड़ी वजह है। रही सही कसर ब्याज दरों में वृद्धि ने पूरी कर दी है। इससे कंपनियों को बढ़ी हुई लागत का प्रबंधन करने में काफी दिक्कत आ रही है।' सिएट के प्रवक्ता के मुताबिक, 'कंपनी को कीमतें बढ़ाने की सख्त जरूरत महसूस हो रही है। हालांकि त्योहारों के बाद ही इस बारे में कोई फैसला किया जाएगा।' (ET Hindi)
सीसीआई एक करोड़ गांठ कपास की खरीद करेगी
आर.एस. राणा नई दिल्ली
मकसद - नए सीजन में बाजार मूल्य एमएसपी से भी नीचे गिरने से रोकने की कवायदनिर्यात का हालकेंद्र सरकार ने कपास निर्यात पर लगे मात्रात्मक प्रतिबंध को एक अगस्त से चालू सीजन के बचे हुए दो महीनो के लिए हटाया हुआ है। सूत्रों के अनुसार सितंबर महीने में निर्यात स्थिति की समीक्षा की जाएगी।पैदावार कैसी रहेगीकपास का उत्पादन 242.3 लाख गांठ से बढ़कर 334.3 लाख गांठ होने का अनुमान है। चालू खरीफ में बुवाई 106 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 114.80 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है। मौसम भी अनुकूल है।कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) ने नए कपास सीजन (अक्टूबर से सितंबर) के दौरान एक करोड़ गांठ (एक गांठ-170 किलो) कपास खरीदने की योजना बनाई है। बुवाई क्षेत्रफल बढऩे और अनुकूल मौसम से पैदावार में बढ़ोतरी होने का अनुमान है जिससे सीसीआई के साथ ही अन्य एजेंसियों की खरीद भी बढऩे का अनुमान है। अगस्त के पहले सप्ताह में सीसीआई के पास कपास का करीब चार लाख गांठ का पुराना स्टॉक भी बचा हुआ है। जिसकी बिकवाली निविदा के माध्यम से की जा रही है।
सीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू सीजन में देश में कपास का बुवाई रकबा बढ़ा है जबकि अभी तक मौसम भी फसल के अनुकूल बना हुआ है। इसीलिए कपास का बंपर उत्पादन होने का अनुमान है।
मिलों को बीते सीजन कपास खरीद में भारी घाटा उठाना पड़ा है जिससे नए सीजन में मिलों की मांग सुस्त रहने का अनुमान है। ऐसे में हाजिर बाजार में कपास की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे ना जा पाए इसीलिए सीसीआई ने एक करोड़ गांठ कपास खरीदने की योजना बनाई है।
केंद्र सरकार ने कपास निर्यात पर लगे मात्रात्मक प्रतिबंध को एक अगस्त से चालू सीजन के बचे हुए दो महीनो के लिए हटाया हुआ है। सूत्रों के अनुसार सितंबर महीने में निर्यात स्थिति की समीक्षा की जाएगी।
घरेलू मंडियों में अगस्त के पहले सप्ताह में करीब 60 लाख गांठ कपास का स्टॉक बचा हुआ है जबकि चार लाख गंाठ का स्टॉक सीसीआई के पास है। आने वाली फसल की पैदावार में भी बढ़ोतरी होने का अनुमान है। ऐसे में अगर निर्यात पर फिर से मात्रात्मक प्रतिबंध लगा दिया तो हाजिर बाजार में दाम घटकर एमएसपी से भी नीचे जाने की आशंका है।
केंद्र सरकार ने नए विपणन सीजन 2011-12 के लिए कपास के एमएसपी में 300 रुपये की बढ़ोतरी कर मध्यम दर्जे की लंबाई वाली कपास का एमएसपी 2,800 रुपये और लंबे दर्जे की लंबाई वाली कपास का एमएसपी 3,300 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। बुधवार को अहमदाबाद में शंकर-6 किस्म की कपास का भाव 38,800 से 39,000 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी-356 किलो) रहा। उधर न्यूयार्क बोर्ड ऑफ ट्रेड में अक्टूबर महीने के वायदा अनुबंध में कपास का भाव 107.31 सेंट प्रति पाउंड रहा।
कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2010-11 में कपास का उत्पादन 242.3 लाख गांठ से बढ़कर 334.3 लाख गांठ होने का अनुमान है। जबकि चालू खरीफ में कपास की बुवाई बढ़कर 114.80 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 106.62 लाख हैक्टेयर में हुई थी। सीसीआई के अलावा कपास की न्यूतनम समर्थन मूल्य पर खरीद भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी संघ (नेफेड) और महाराष्ट्र राज्य को-ऑपरेटिव कॉटन ग्रोवर मार्किट फेडरेशन करती है। (Business Bhaskar....R S Rana)
मकसद - नए सीजन में बाजार मूल्य एमएसपी से भी नीचे गिरने से रोकने की कवायदनिर्यात का हालकेंद्र सरकार ने कपास निर्यात पर लगे मात्रात्मक प्रतिबंध को एक अगस्त से चालू सीजन के बचे हुए दो महीनो के लिए हटाया हुआ है। सूत्रों के अनुसार सितंबर महीने में निर्यात स्थिति की समीक्षा की जाएगी।पैदावार कैसी रहेगीकपास का उत्पादन 242.3 लाख गांठ से बढ़कर 334.3 लाख गांठ होने का अनुमान है। चालू खरीफ में बुवाई 106 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 114.80 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है। मौसम भी अनुकूल है।कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) ने नए कपास सीजन (अक्टूबर से सितंबर) के दौरान एक करोड़ गांठ (एक गांठ-170 किलो) कपास खरीदने की योजना बनाई है। बुवाई क्षेत्रफल बढऩे और अनुकूल मौसम से पैदावार में बढ़ोतरी होने का अनुमान है जिससे सीसीआई के साथ ही अन्य एजेंसियों की खरीद भी बढऩे का अनुमान है। अगस्त के पहले सप्ताह में सीसीआई के पास कपास का करीब चार लाख गांठ का पुराना स्टॉक भी बचा हुआ है। जिसकी बिकवाली निविदा के माध्यम से की जा रही है।
सीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू सीजन में देश में कपास का बुवाई रकबा बढ़ा है जबकि अभी तक मौसम भी फसल के अनुकूल बना हुआ है। इसीलिए कपास का बंपर उत्पादन होने का अनुमान है।
मिलों को बीते सीजन कपास खरीद में भारी घाटा उठाना पड़ा है जिससे नए सीजन में मिलों की मांग सुस्त रहने का अनुमान है। ऐसे में हाजिर बाजार में कपास की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे ना जा पाए इसीलिए सीसीआई ने एक करोड़ गांठ कपास खरीदने की योजना बनाई है।
केंद्र सरकार ने कपास निर्यात पर लगे मात्रात्मक प्रतिबंध को एक अगस्त से चालू सीजन के बचे हुए दो महीनो के लिए हटाया हुआ है। सूत्रों के अनुसार सितंबर महीने में निर्यात स्थिति की समीक्षा की जाएगी।
घरेलू मंडियों में अगस्त के पहले सप्ताह में करीब 60 लाख गांठ कपास का स्टॉक बचा हुआ है जबकि चार लाख गंाठ का स्टॉक सीसीआई के पास है। आने वाली फसल की पैदावार में भी बढ़ोतरी होने का अनुमान है। ऐसे में अगर निर्यात पर फिर से मात्रात्मक प्रतिबंध लगा दिया तो हाजिर बाजार में दाम घटकर एमएसपी से भी नीचे जाने की आशंका है।
केंद्र सरकार ने नए विपणन सीजन 2011-12 के लिए कपास के एमएसपी में 300 रुपये की बढ़ोतरी कर मध्यम दर्जे की लंबाई वाली कपास का एमएसपी 2,800 रुपये और लंबे दर्जे की लंबाई वाली कपास का एमएसपी 3,300 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। बुधवार को अहमदाबाद में शंकर-6 किस्म की कपास का भाव 38,800 से 39,000 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी-356 किलो) रहा। उधर न्यूयार्क बोर्ड ऑफ ट्रेड में अक्टूबर महीने के वायदा अनुबंध में कपास का भाव 107.31 सेंट प्रति पाउंड रहा।
कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2010-11 में कपास का उत्पादन 242.3 लाख गांठ से बढ़कर 334.3 लाख गांठ होने का अनुमान है। जबकि चालू खरीफ में कपास की बुवाई बढ़कर 114.80 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 106.62 लाख हैक्टेयर में हुई थी। सीसीआई के अलावा कपास की न्यूतनम समर्थन मूल्य पर खरीद भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी संघ (नेफेड) और महाराष्ट्र राज्य को-ऑपरेटिव कॉटन ग्रोवर मार्किट फेडरेशन करती है। (Business Bhaskar....R S Rana)
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