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21 मार्च 2026

महाराष्ट्र में 85 फीसदी चीनी मिलों में पेराई बंद, केवल 28 मिलें ही चल रही हैं

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) के दौरान 18 मार्च महाराष्ट्र की 85 फीसदी से अधिक मिलों ने गन्ने की कमी के कारण पेराई कार्य बंद कर दिया है तथा अब केवल 28 मिलों में ही पेराई चल रही है।


महाराष्ट्र के चीनी आयुक्त की रिपोर्ट के अनुसार बेमौसम बारिश से गन्ने की खेती पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिससे चालू सीजन में गन्ने का उत्पादन और मिलों को आपूर्ति प्रभावित हुई है। 18 मार्च तक राज्य की मिलों ने केवल 837.31 लाख टन गन्ने की पेराई की, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 1,029.98 लाख टन थी। इसी तरह से चालू पेराई सीजन में चीनी की रिकवरी दर भी घटकर 9.45 फीसदी की बैठी है, जो पिछले साल के 10.16 फीसदी से कम है।

चालू सीजन में कुल 202 चीनी मिलों में से 85 फीसदी से अधिक चीनी मिलों ने गन्ने की कमी के कारण पेराई कार्य बंद कर दिया है। इस समय केवल 28 मिलों में ही पेराई जारी है। राज्य की लगभग 172 चीनी मिलों ने गन्ने की पेराई पूरी कर ली है। इनमें सोलापुर की 45, कोल्हापुर की 40, पुणे की 24, नांदेड़ की 24, छत्रपति संभाजीनगर की 18, अहिल्यानगर की 20 और अमरावती क्षेत्र की 1 मिल शामिल है। पिछले सीजन में की समान अवधि में केवल 103 चीनी मिलों ने पेराई समाप्त की थी।

इस सीजन में गन्ने की कमी के कारण समय से पहले पेराई बंद होने और आने वाले खरीफ मौसम में सूखे जैसी स्थिति की आशंका के चलते महाराष्ट्र के चीनी उद्योग की समस्याएं और बढ़ सकती हैं। जानकारों के अनुसार यदि एल नीनो के कारण महाराष्ट्र में सूखा पड़ता है, तो फिर सरकार को गन्ने की खेती को हतोत्साहित करने का निर्णय लेना पड़ सकता है, क्योंकि यह अत्यधिक पानी की खपत वाली फसल है। इसके बजाय कृषि अनुसंधान विश्वविद्यालयों की मदद से किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। सूखे की स्थिति में कम पानी वाली फसलें जैसे मोटे अनाज (मिलेट्स) और दालों पर जोर दिया जाएगा।

पशु आहार वालों की कमजोर मांग से बिनौला एवं कपास खली में गिरावट, कॉटन वॉश तेज

नई दिल्ली। पशु आहार वालों की मांग कमजोर होने से घरेलू बाजार में गुरुवार को बिनौला के साथ ही कपास खली की कीमतों में गिरावट आई, जबकि इस दौरान कॉटन वॉश के भाव तेज हुए। सीसीआई ने चालू सप्ताह में बिनौला की बिक्री कीमतों में कटौती थी, जिसके कारण हाजिर बाजार में इसकी कीमतों पर दबाव देखा गया।


सीसीआई ने बुधवार को ई नीलामी के माध्यम से 5,19,800 क्विंटल बिनौले की बिक्री की पेशकश की थी तथा इस दौरान 2,95,600 क्विंटल बिनौले की बिक्री हुई। निगम ने इसके बिक्री भाव 50 से 100 रुपये प्रति क्विंटल तक कम किए थे। निगम ने मंगलवार को भी बिनौले की बिक्री कीमतों में 10 से 80 रुपये प्रति क्विंटल तक की कटौती थी।

व्यापारियों के अनुसार सीसीआई ने चालू सप्ताह में लगातार दो दिन बिनौले की कीमतों में कटौती की है जिससे हाजिर बाजार में भी इसकी कीमतों पर दबाव देखा गया। घरेलू बाजार में बिनौले का बंपर स्टॉक सीसीआई के पास है, इसलिए इसकी कीमतों में तेजी, मंदी काफी हद तक निगम के बिक्री भाव पर ही निर्भर करेगी।

तेल मिलों की खरीद कमजोर होने के कारण उत्तर भारत के राज्यों में गुरुवार को बिनौले की कीमतों में मंदा आया। हरियाणा में बिनौले के भाव 50 रुपये घटकर 3,950 से 4,250 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। इस दौरान राजस्थान में बिनौला के भाव 50 रुपये घटकर 4,050 से 4,250 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए। बिनौला के दाम में पंजाब में 50 रुपये नरम होकर 3,950 से 4,150 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

पशु आहार वालों की मांग कमजोर होने से कपास खली की कीमतों में दूसरे दिन नरमी आई। सेलू में रेगुलर क्वालिटी की कपास खली की कीमत कमजोर होकर 3,750 रुपये प्रति क्विंटल रह गई। इस दौरान भोकर में रेगुलर कपास खली की कीमत घटकर 3,720 रुपये प्रति क्विंटल बोली गई। शाहपुर में रेगुलर कपास खली के भाव कमजोर होकर 3,780 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। इस दौरान सूर्यापेट में रेगुलर क्वालिटी की कपास खली के दाम घटकर 3,580 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए।

विश्व बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी का रुख रहा, इस दौरान घरेलू बाजार में कॉटन वॉश की कीमत तेज हुई। राजकोट में कॉटन वॉश के भाव तेज होकर 1,390 रुपये प्रति 10 किलो हो गए। इस दौरान अकोला में कॉटन वॉश की कीमत बढ़कर 1,385 रुपये प्रति दस किलो हो गई। गुजरात डिलीवरी कॉटन वॉश के दाम तेज होकर 1,405 से 1,410 रुपये प्रति 10 किलो हो गए।

सीसीआई ने तीसरे कार्यदिवस में कॉटन के बिक्री भाव तेज किए, बिनौले के बिक्री दाम घटाए

नई दिल्ली। कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) ने बुधवार को लगातार तीसरे कार्यदिवस में कॉटन की बिक्री कीमतों में 200 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी 356 किलो की बढ़ोतरी की। अत: स्पिनिंग मिलों की मांग बनी रहने के कारण बुधवार को शाम के सत्र में गुजरात के साथ ही उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन की कीमतों में तेजी आई। इस दौरान निगम ने बिनौले की बिक्री कीमतों में कटौती की।


सीसीआई ने बुधवार को ई नीलामी के माध्यम से 5,19,800 क्विंटल बिनौले की बिक्री की पेशकश की। निगम ने इसके बिक्री भाव 50 से 100 रुपये प्रति क्विंटल तक कम किए। सीसीआई ने लगातार दूसरे दिन बिनौले की कीमतों में कटौती की है।

सीसीआई ने मंगलवार को भी कॉटन की बिक्री कीमतों में 500 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी 356 किलो की बढ़ोतरी की थी, जबकि इससे पहले सोमवार भी इसके बिक्री भाव 700 रुपये प्रति कैंडी तक बढ़ाये थे।

गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव बुधवार को 500 रुपये तेज होकर 55,500 से 56,000 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो हो गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 5,500 से 5,700 रुपये प्रति मन बोले गए। हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव तेज होकर 5,300 से 5,500 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 5,380 से 5,710 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 51,500 से 52,500 रुपये कैंडी बोले गए।

घरेलू वायदा कारोबार में कॉटन की कीमतों में तेजी का रुख रहा। एमसीएक्स पर मार्च 26 के वायदा अनुबंध में कॉटन के भाव 540 रुपये तेज होकर 26,700 रुपये प्रति कैंडी हो गए। हालांकि इस दौरान आईसीई के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग में कॉटन की कीमतों में नरमी का रुख रहा।

उधर विश्व बाजार में भी हाल ही में कॉटन के दाम तेज हुए हैं। अधिकांश स्पिनिंग मिलों के पास कॉटन का बकाया स्टॉक कम है। हालांकि सीसीआई घरेलू बाजार में लगातार कॉटन बेच रही है तथा निगम के पास कॉटन का भारी, भरकम स्टॉक है लेकिन सीसीआई द्वारा बिक्री दाम तेज करने से हाजिर बाजार में इसके दाम तेज हो रहे हैं।

चालू सीजन में उत्पादन अनुमान तो ज्यादा है ही, साथ ही आयात भी बढ़ेगा, हालांकि मौजूदा भाव में जिनर्स की बिकवाली कम आ रही है। ऐसे में घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतों में तेजी, मंदी सीसीआई के बिक्री दाम पर भी निर्भर करेगी।

घरेलू बाजार में कॉटन की कुल उपलब्धता ज्यादा है, जबकि यार्न में स्थानीय मांग पहले की तुलना में बढ़ी है।

फरवरी के दौरान डीओसी का निर्यात 22 फीसदी घटा - एसईए

नई दिल्ली। फरवरी में डीओसी के निर्यात में 22 फीसदी की गिरावट आकर कुल निर्यात 257,961 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले साल फरवरी में इनका निर्यात 330,319 टन का ही हुआ था।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2025-26 के पहले 11 महीने अप्रैल से फरवरी के दौरान डीओसी के निर्यात में 11 फीसदी की कमी आकर कुल निर्यात 3,493,823 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इनका निर्यात 3,933,349 टन का हुआ था।

अमेरिका एवं इजराइल के साथ ईरान के बीच बढ़ते झगड़े ने होर्मुज स्ट्रेट और रेड सी के आसपास अस्थिरता की वजह से, खासकर मिडिल ईस्ट और यूरोप को भारत से डीओसी के निर्यात में काफी रुकावट डाली है। लॉजिस्टिक्स और शिपिंग में रुकावटों की वजह से मिडिल ईस्ट को जाने वाले भारत के डीओसी निर्यात का लगभग 20 फीसदी और यूरोप को जाने वाले 15 फीसदी पर खतरा मंडरा रहा है।

शिपिंग में रुकावट - शिपिंग कंपनियां लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य से बच रही हैं, जिससे रास्ता बदलना पड़ रहा है, जिससे आने-जाने का समय और लागत बढ़ रही है, क्योंकि मिडिल ईस्ट और यूरोप को डीओसी का निर्यात जारी रहने में खतरा है।

एक्सपोर्ट रुका - कुछ रिपोर्ट्स बताती हैं कि मिडिल ईस्ट में कई कृषि उत्पादों का निर्यात पहले से ही रुका हुआ है।

लॉजिस्टिक्स की लागत में हुई बढ़ोतरी - लड़ाई लंबी होने की वजह से क्रूड तेल की कीमतों में तेजी आई है (100 डॉलर प्रति बैरल के पार) और जहाजों के लिए इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ गए हैं, जिससे शिपमेंट महंगा और कम फायदेमंद हो गया है।

दूसरे रास्ते — केप ऑफ गुड होप के आस-पास से रास्ता बदलने से शिपिंग की यात्रा में 10-15 दिन और लग जाते हैं, जिससे देरी होती है साथ ही लागत का खर्च ज्यादा होता है। उद्योग को खास तौर पर इस बात की चिंता है कि लगातार लड़ाई शिपमेंट में रुकावट डालती रहेगी, जिससे भारत डीओसी समेत अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात पर असर पड़ेगा।

इस साल चीन से मांग बढ़ने और यूरोपियन सप्लायर के मुकाबले कॉम्पिटिटिव प्राइसिंग की वजह से भारतीय डीओसी का निर्यात बढ़ा है। भारतीय डीओसी में ज्यादा प्रोटीन होने की वजह से यह जानवरों के चारे के लिए बहुत अच्छा है। चीन की मांग में बढ़ोतरी देखी गई है, और अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच आयात 7.7 लाख टन से ज्यादा का हो गया। भारतीय डीओसी की कीमत अभी लगभग 225 डॉलर प्रति टन (एफओबी/एफएएस कांडला) है, जो एचबीजी एक्स-मिल 297 डॉलर प्रति टन से सस्ता है। नई फसल आने से पहले कम क्रशिंग की वजह से 2026 की शुरुआत में भारत से कुछ समय के लिए निर्यात में कमी आ सकती है।

मार्च 2025 में, चीन ने चीनी इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर कनाडा के टैरिफ के बदले में कनाडाई डीओसी और तेल पर 100 फीसदी टैरिफ लगा दिया। अत: आयात शुल्क में बढ़ोतरी से कनाडा से आयात महंगा हो गया, जिससे चीन को दूसरे सप्लायर की ओर देखना पड़ा और सप्लाई के अंतर को कम करने के लिए भारत से आयात बढ़ाना पड़ा। हालांकि, 1 मार्च 2026 से चीन ने ट्रेड को कम करने की कोशिशों के तहत 31 दिसंबर, 2026 तक कनाडाई कैनोला (रेपसीड) मील पर 100 फीसदी टैरिफ को रोक दिया है। इससे भारतीय डीओसी के निर्यात को चीन की मार्केट में बने रहने के लिए कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ेगा।

भारतीय बंदरगाह पर फरवरी में सोया डीओसी का भाव तेज होकर 489 डॉलर प्रति टन हो गया, जबकि जनवरी में इसका दाम 435 डॉलर प्रति टन था। इस दौरान सरसों डीओसी का मूल्य फरवरी में भारतीय बंदरगाह पर घटकर 239 डॉलर प्रति टन रह गया, जबकि जनवरी में इसका भाव 248 डॉलर प्रति टन था। इस दौरान कैस्टर डीओसी का दाम जनवरी के 84 डॉलर प्रति टन से कमजोर होकर फरवरी में 82 डॉलर प्रति टन रह गया।

मध्य मार्च तक चीनी का उत्पादन बढ़कर 261 लाख टन के पार, पेराई सत्र अंतिम चरण में

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) के दौरान 15 मार्च तक देशभर में चीनी का उत्पादन 10 फीसदी बढ़कर 261.75 लाख टन का हो चुका है। पिछले साल की समान अवधि में इसका उत्पादन 237.15 लाख टन का हुआ था।


नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) के अनुसार गन्ने की अधिक उपलब्धता और बेहतर दक्षता के कारण चालू पेराई सीजन में चीनी का कुल उत्पादन और इसकी रिकवरी दर में भी सुधार हुआ है। हालांकि कई प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में पेराई का कार्य अब समाप्ति की ओर है।

एनएफसीएसएफ के अनुसार पेराई सीजन 2025-26 के दौरान कुल 540 चीनी मिलें संचालित हुईं, जबकि 2024-25 में यह संख्या 533 थी। हालांकि मध्य मार्च तक केवल 173 चीनी मिलें ही चल रही हैं, जो कि पिछले साल इसी समय चल रही 200 चीनी मिलों की तुलना में काफी कम है।

प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में मध्य मार्च तक चीनी उत्पादन बढ़कर 98.50 लाख टन का हो गया है, जबकि पेराई सीजन 2024-25 की समान अवधि में इसका उत्पादन केवल 78.60 लाख टन का ही हुआ था। राज्य में औसत रिकवरी की दर 9.50 फीसदी की दर्ज की गई है, जो कि पिछले सीजन के 9.45 फीसदी से थोड़ी अधिक है।

उत्तर प्रदेश में चालू पेराई सीजन में चीनी के उत्पादन में मामूली वृद्धि हुई है और यह 81.50 लाख टन तक पहुंच गया है, जबकि पिछले सीजन की समान अवधि में इसका उत्पादन 80.95 लाख टन का हुआ था। बेहतर रिकवरी के कारण चीनी के कुल उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है। राज्य में औसत चीनी की रिकवरी 10.15 फीसदी की आई है, जो पिछले साल के 9.60 फीसदी से अधिक है।

कर्नाटक में चालू पेराई सीजन में मध्य मार्च तक चीनी का उत्पादन बढ़कर 45.80 लाख टन का हो गया है, जबकि 2024-25 पेराई सीजन की समान अवधि में इसका उत्पादन 39.10 लाख टन का ही हुआ था। यहां औसत रिकवरी की दर 8.65 फीसदी की दर्ज की गई है, जो कि पिछले साल के 8.50 फीसदी से अधिक है।

एनएफसीएसएफ की रिपोर्ट के अनुसार गन्ने का पेराई सत्र अब धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, खासकर पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में। हालांकि उत्तरी राज्यों में अभी भी पेराई कुछ समय तक जारी रहने की संभावना है।

14 मार्च 2026

चालू सीजन में कॉटन का उत्पादन बढ़कर 320.50 लाख गांठ होने का अनुमान - सीएआई

नई दिल्ली। उद्योग ने एक बार फिर कॉटन के उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी की है। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू फसल सीजन 2025-26 में देश में कॉटन का उत्पादन 3.50 लाख गांठ बढ़कर 320.50 लाख गांठ होने का अनुमान है, जबकि इससे पहले 317 लाख का अनुमान जारी किया था।


मालूम हो कि उद्योग ने दिसंबर 2025 में 309.50 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान जारी किया था, जोकि आरंभिक अनुमान से 4.50 लाख गांठ ज्यादा था। इसके बाद उद्योग ने इसे बढ़ाकर 317 लाख गांठ का कर दिया था।

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया, सीएआई के अनुसार पंजाब के पहले के अनुमान में 50 हजार गांठ, उत्तर और लोअर राजस्थान में भी क्रमश: 50-50 हजार गांठ की कमी आने का अनुमान है। प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में पहले के अनुमान से 4 लाख गांठ ज्यादा एवं आंध्र प्रदेश में एक लाख गांठ ज्यादा होने का अनुमान है।

सीएआई के अनुसार उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन का कुल उत्पादन 29 लाख गांठ होने का अनुमान है। इसमें पंजाब की हिस्सेदारी 1.50 लाख गांठ, हरियाणा की 7 लाख गांठ के अलावा अपर राजस्थान में 12 लाख गांठ के अलावा लोअर राजस्थान में 8.50 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है।

मध्य भारत के राज्यों में कॉटन का उत्पादन 191 लाख गांठ होने का अनुमान है। इसमें गुजरात की हिस्सेदारी 75 लाख गांठ तथा महाराष्ट्र की 98 लाख गांठ के अलावा मध्य प्रदेश की 18 लाख गांठ है।

दक्षिण भारत के राज्यों में चालू फसल सीजन में 95 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है। इसमें तेलंगाना की हिस्सेदारी 45 लाख गांठ, आंध्र प्रदेश 18 लाख गांठ के अलावा कर्नाटक 27 लाख गांठ तथा तमिलनाडु में 5 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है।

अन्य राज्यों में ओडिशा में चालू सीजन में 3.50 लाख गांठ तथा अन्य राज्यों में 2 लाख गांठ के उत्पादन का अनुमान है।

चालू फसल सीजन में 47 लाख गांठ कॉटन के आयात का अनुमान है, जोकि पिछले साल के 41 लाख गांठ से 6 लाख गांठ ज्यादा है। चालू फसल सीजन के पहले पांच महीनों में फरवरी अंत तक 36 लाख गांठ आयातित कॉटन भारतीय बंदरगाह पर पहुंच चुकी है।

चालू फसल सीजन 2025-26 के दौरान देश से 15 लाख गांठ कॉटन के निर्यात का अनुमान है, जबकि चालू फसल सीजन के पहले पांच महीनों में फरवरी अंत देश से 7 लाख गांठ कॉटन का निर्यात हो चुका है।

एसएआई के अनुसार चालू फसल सीजन के आरंभ में 60.59 लाख गांठ का बकाया स्टॉक बचा हुआ था जबकि 320.50 लाख गांठ का उत्पादन होने की उम्मीद है। इस दौरान 47 लाख गांठ आयातित कॉटन आयेगी। अत: घरेलू बाजार में कॉटन की कुल उपलब्धता 428.09 लाख गांठ की बैठेगी।

चालू फसल सीजन में कॉटन की कुल खपत 315 लाख गांठ की होने का अनुमान है, इसके अलावा 15 लाख गांठ का निर्यात हो जायेगा। अत: क्लोजिंग स्टॉक 98.09 लाख गांठ का बैठेगा। सीसीआई, महाराष्ट्र फेडरेशन, एमएनसी एवं जिनर्स के साथ ही व्यापारियों एवं निर्यातकों के पास 144.30 लाख गांठ कॉटन का स्टॉक है। इसके अलावा मिलों के पास करीब 75 लाख गांठ का स्टॉक है।

पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू फसल सीजन 2025-26 में फरवरी अंत तक उत्पादक राज्यों की मंडियों में 260.96 लाख गांठ, एक गांठ 170 किलो की आवक हो चुकी है।

चालू तेल वर्ष के पहले चार महीनों में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 6 फीसदी बढ़ा - एसईए

नई दिल्ली। चालू तेल वर्ष 2025-26 के पहले चार महीनों नवंबर-25 एवं फरवरी-26 के दौरान देश में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 6 फीसदी बढ़कर 5,324,275 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले तेल वर्ष की समान अवधि में इनका आयात 5,023,900 टन का हुआ था। फरवरी 2026 में खाद्य तेलों का आयात पिछले महीने (जनवरी, 2026) के 13.12 लाख टन की तुलना में थोड़ा कम होकर 12.92 लाख टन का रह गया।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार फरवरी 2026 में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 35 फीसदी बढ़कर 1,316,545 टन का हुआ है, जबकि पिछले साल फरवरी में इनका आयात 977,477 टन का हुआ था। इस दौरान खाद्य तेलों का आयात 1,292,043 टन का एवं अखाद्य तेलों का आयात 24,502 टन का हुआ है।

एसईए के अनुसार मिडिल ईस्ट और ब्लैक सी पर चल रहे तनावों ने भारत के खाद्य तेल के बाजार में काफी उतार-चढ़ाव और सप्लाई की चिंताएँ पैदा कर दी हैं। रूस और पूर्वी यूरोप से सूरजमुखी तेल के शिपमेंट में रुकावट और पाम तेल के माल ढुलाई के खर्च में बढ़ोतरी ने सूरजमुखी तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की है, जिससे व्यापारियों और उपभोक्ताओं को सप्लाई चेन के जोखिमों से निपटने के लिए स्थिति पर नजर रखनी पड़ रही है।

क्रूड तेल की कीमतों में आई तेजी से पाम तेल की बायोडीजल में दिलचस्पी बढ़ी: मिडिल ईस्ट में युद्ध की वजह से क्रूड तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से बायोफ्यूल प्रोड्यूसर पाम तेल बेस्ड बायोडीजल में दिलचस्पी ले रहे हैं, जिससे आने वाले समय में पाम तेल की डिमांड और कीमतें बढ़ सकती हैं, खासकर साउथ-ईस्ट एशिया में।

सूरजमुखी तेल की सप्लाई के रिस्क: वैसे तो भारत पहले से सूरजमुखी तेल के लिए रूस और यूक्रेन पर निर्भर रहा है, लेकिन मौजूदा लड़ाई, खासकर लाल सागर और स्वेज नहर में संभावित रुकावटों से शिपमेंट में देरी होने, लॉजिस्टिक लागत बढ़ने और उपलब्धता पर असर पड़ने का खतरा है।

कीमतों में उतार-चढ़ाव: खाद्य तेलों की कीमतों में हाल ही में उतार-चढ़ाव देखा गया है। कुछ तेलों जैसे सूरजमुखी तेल की कीमतों में घरेलू बाजार में बढ़ोतरी देखी गई है। रूस-यूक्रेन युद्ध के असर को कम करने के लिए सप्लाई चेन में रुकावट की चिंताओं के कारण, भारत सोया और सूरजमुखी तेल के लिए अर्जेंटीना, ब्राजील, पैराग्वे और उरुग्वे के साथ लंबे समय के कॉन्ट्रैक्ट की संभावना तलाश रहा है।

निर्यात पर असर: इस लड़ाई से भारत के डीओसी के निर्यात को भी खतरा है, क्योंकि साउथ-ईस्ट एशिया और मिडिल ईस्ट में शिपमेंट पर असर डालने वाली संभावित लॉजिस्टिक दिक्कतों से डीओसी के कुल एक्सपोर्ट में लगभग 20 फीसदी का हिस्सा आता है।

नेपाल से भारत में इंपोर्ट:
नवंबर-दिसंबर, 2025 के दौरान, नेपाल ने लगभग 101,000 टन रिफाइंड तेल भारत को निर्यात किया, जिसमें 89,753 टन रिफाइंड सोया तेल, 6,427 टन रिफाइंड सूरजमुखी तेल और 4,288 टन आरबीडी पामोलिन शामिल थे। जनवरी 2026 में, नेपाल ने लगभग 60,000 टन रिफाइंड तेल का निर्यात  किया, जिसमें मुख्य रूप से रिफाइंड सोया तेल और थोड़ी मात्रा में सूरजमुखी तेल तथा आरबीडी पामोलिन शामिल थे।

एसईए के अनुसार नवंबर 25 से फरवरी 26 के दौरान 803,297 टन के मुकाबले केवल 118,417 टन रिफाइंड पाम तेल का आयात हुआ और नवंबर 24 से फरवरी 25 के दौरान 4,081,880 टन के मुकाबले 5,099,951 टन क्रूड तेल का आयात हुआ। क्रूड पाम तेल के आयात में बढ़ोतरी की वजह से रिफाइंड तेल का रेश्यो 16 फीसदी से घटकर 2 फीसदी रह गया, जबकि क्रूड तेल का रेश्यो एक साल पहले के 84 फीसदी से बढ़कर 98 फीसदी का हो गया।

एसईए के अनुसार केंद्र सरकार की पॉलिसी के लिए धन्यवाद, जिसमें 31 मई, 2025 से क्रूड और रिफाइंड तेल के बीच ड्यूटी का अंतर 8.25 फीसदी से बढ़ाकर 19.25 फीसदी कर दिया गया है। इससे घरेलू रिफाइनिंग इंडस्ट्री की वैल्यू एडिशन, रोजगार और बेहतर कैपेसिटी इस्तेमाल में मदद मिली है, जो एडिबल ऑयल में आत्मनिर्भरता पर प्रधानमंत्री के विजन की तरफ एक कदम है।

चालू पेराई सीजन में चीनी का उत्पादन घटकर 283 लाख टन होने का अनुमान - एआईएसटीए

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) में चीनी का उत्पादन 4.39 फीसदी घटकर 283 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पहले आरंभिक अनुमान में इसका उत्पादन 296 लाख टन होने की उम्मीद थी।


अखिल भारतीय चीनी व्यापार संघ, एआईएसटीए के अनुसार आरंभिक अनुमान में 296 लाख टन चीनी के उत्पादन का अनुमान लगाया था, लेकिन जिस तरह से हाल ही में देश के कई प्रमुख उत्पादक राज्यों में चीनी मिलों में पेराई बंद हुई है तथा गुड़ में गन्ने की खपत उम्मीद से ज्यादा हुई है, खासकर के उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में। अत: दूसरे आरंभिक अनुमान में इसको घटाकर 283 लाख टन कर दिया है।

एआईएसटीए के अनुसार चालू सीजन में चीनी का कुल उत्पादन 315 लाख टन होने की उम्मीद है, जबकि इसमें से 32 लाख टन की खपत एथेनॉल में हो जायेगी। इसलिए कुल उत्पादन 283 लाख टन का होगा।

विश्व बाजार में चीनी के दाम पांच साल के न्यूनतम स्तर पर है इसलिए निर्यात में पड़ते नहीं लग रहे। केंद्र सरकार ने 20 लाख टन चीनी के निर्यात की जो अनुमति दी हुई है, उसमें से केवल पांच लाख टन के निर्यात के सौदे ही हुए हैं, जबकि शिपमेंट केवल 2.50 लाख टन की ही हुई है।

प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में चीनी का उत्पादन 99.7 लाख टन तथा उत्तर प्रदेश में 91 लाख टन एवं कर्नाटक में 48 लाख टन और तमिलनाडु में 7.80 लाख टन के अलावा गुजरात में 7.50 लाख टन तथा अन्य राज्यों में इसका उत्पादन 29 लाख टन होने का अनुमान है।

बुधवार को विश्व बाजार शुगर की कीमतों में तेजी आई। आईसीई रॉ शुगर कॉन्ट्रैक्ट 0.09 सेंट तेज होकर 14.46 सेंट प्रति lb हो गया। इस दौरान व्हाइट शुगर वायदा 2.70 बढ़कर 421.10 डॉलर प्रति टन हो गया।

दिल्ली में बुधवार को एम ग्रेड चीनी की थोक दाम 4,350 रुपये और मुंबई में 4,100 रुपये तथा कानपुर में 4,370 रुपये तथा कोलकाता में 4,340 रुपये प्रति क्विंटल रहे। इस दौरान दिल्ली में चीनी के खुदरा भाव 46 रुपये तथा कानपुर में 45 रुपये और मुंबई में 45 रुपये तथा कोलकाता में 46 रुपये प्रति किलो बोले गए।

चालू समर सीजन में फसलों की बुआई 5.06 फीसदी पिछड़ी - कृषि मंत्रालय

नई दिल्ली। चालू समर सीजन 2026 में फसलों की कुल बुआई पिछले साल की तुलना में 5.06 फीसदी पिछे चल रही है। इस दौरान दलहन एवं तिलहन की बुआई बढ़ी है, जबकि धान की रोपाई के साथ मोटे अनाजों की बुवाई पिछले साल की तुलना में पिछड़ रही है।


कृषि मंत्रालय के अनुसार 9 मार्च 2026 तक देशभर में समर सीजन की फसलों की बुआई घटकर 31.69 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 33.38 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

समर की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू सीजन में घटकर केवल 25.30 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 26.89 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। समर सीजन में धान की रोपाई सामान्यत 31.49 लाख हेक्टेयर में होती है तथा फसल सीजन 2025 में इसकी रोपाई 33.28 लाख हेक्टेयर में हुई थी।

समर सीजन में दालों की बुआई बढ़कर 1.59 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 1.57 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। समर में दलहन की प्रमुख फसल मूंग की बुआई 95 हजार हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि के 98 हजार हेक्टेयर में हो चुकी थी। इस दौरान उड़द की बुआई चालू समर में 45 हजार हेक्टेयर में ही हुई है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 46 हजार हेक्टेयर की तुलना में कम है।

मोटे अनाजों की बुवाई चालू समर सीजन में घटकर 2.51 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई 2.73 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। इस दौरान समर मक्का की बुआई 1.72 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 1.88 लाख हेक्टेयर की तुलना में कम है। इस दौरान ज्वार की बुआई 15 हजार हेक्टेयर, ज्वार की 46 हजार हेक्टेयर तथा रागी की 17 हजार हेक्टेयर में ही हुई है।

चालू समर सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई बढ़कर 2.29 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 2.18 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। मूंगफली की बुआई चालू समर सीजन में बढ़कर 1.58 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल के 1.50 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। इस दौरान सनफ्लावर की 19 हजार हेक्टेयर में और शीशम सीड की बुआई 49 हजार हेक्टेयर हो चुकी है। 

महाराष्ट्र में 133 चीनी मिलों में गन्ने की पेराई बंद, उत्पादन 97.50 लाख टन के पार

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) में 8 मार्च तक महाराष्ट्र में चीनी का उत्पादन 97.52 लाख टन का हो चुका है तथा राज्य की 133 चीनी मिलों ने पेराई बंद कर दी है।


महाराष्ट्र में 2025–26 पेराई सीजन की गन्ना पेराई का काम अंतिम चरण में पहुंच गया है। राज्य की कुल 210 चीनी मिलों में से 133 मिलों ने अपना उत्पादन बंद कर दिया है। राज्य के शुगर कमिश्नर के अनुसार 8 मार्च तक राज्य में 1031.03 लाख टन गन्ने की पेराई हो चुकी है और 97.52 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। राज्य की औसत चीनी रिकवरी 9.46 फीसदी की बैठ रही है। पिछले साल की समान अवधि में राज्य में 835.32 लाख टन गन्ने की पेराई की थी और औसत चीनी की रिकवरी दर 9.41 फीसदी की थी। पिछले सीजन की इसी अवधि तक 143 चीनी मिलें बंद हो चुकी थी।

कोल्हापुर डिवीजन की सभी चीनी मिलों ने पेराई बंद कर दी है तथा इस डिवीजन की मिलों ने 209.96 लाख टन गन्ने की पेराई की है और 23.10 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। कोल्हापुर डिवीजन में रिकवरी की दर 11.01 फीसदी की है। इसी तरह से पुणे डिवीजन में अब तक 223.38 लाख टन गन्ने की पेराई कर 21.95 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। पुणे डिवीजन की रिकवरी दर 9.83 फीसदी की है।

सोलापुर डिवीजन की 49 में से 35 मिलों पेराई बंद कर दी है। इस डिवीजन की मिलों में 218.64 लाख टन गन्ने की पेराई हो चुकी है और 18.76 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। अहमदनगर (अहिल्यानगर) डिवीजन में चीनी मिलों ने 125 लाख टन गन्ने की पेराई की है और 11.33 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। अहमदनगर डिवीजन में चीनी की रिकवरी दर 9.07 फीसदी है। यहां की 28 में से 23 चीनी मिलें बंद हो चुकी है।

छत्रपति संभाजीनगर डिवीजन में चीनी मिलों ने अब तक 107.06 लाख टन गन्ने की पेराई कर 9.59 लाख क्विंटल चीनी का उत्पादन किया है। चीनी की रिकवरी की दर 8.02 फीसदी है। यहां की 25 में से 7 मिलें पेराई बंद कर चुकी है।

नांदेड़ डिवीजन में चीनी मिलों ने 123.27 लाख टन गन्ने की पेराई कर 11.57 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। इस डिवीजन में चीनी की रिकवरी दर 9.39 फीसदी है। अमरावती डिवीजन में चीनी मिलों ने अब तक 11.9 लाख टन गन्ने की पेराई की है तथा 1.18 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। चीनी में रिकवरी की दर इस डिवीजन में 9.31 फीसदी है। नागपुर डिवीजन में 1.92 लाख टन पेराई हुई है।

रबी विपणन सीजन 2026-27 के दौरान केंद्र सरकार 303 लाख टन गेहूं खरीदेगी

नई दिल्ली। सरकार ने रबी विपणन सीजन 2026-27 (अप्रैल-मार्च) के दौरान 303 लाख टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य तय किया है। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अनुसार सरकार ने 779,000 टन मोटे अनाज, जिसमें बाजरा भी शामिल है, खरीदने का भी लक्ष्य तय किया है।


पिछले रबी विपणन सीजन 2025-26 में केंद्र सरकार ने गेहूं खरीदने का लक्ष्य 312.7 लाख टन का तय किया था, जिसे बाद में बढ़ाकर 332.7 लाख टन कर दिया गया था। इसके मुकाबले, सरकार ने किसानों से 300.35 लाख टन गेहूं की खरीद की थी।

केंद्र सरकार ने रबी विपणन सीजन 2026-27 के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2,585 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। हालांकि मध्य प्रदेश सरकार ने गेहूं उत्पादक किसानों को राहत देते हुए एमएसपी पर 40 रुपये प्रति क्विंटल बोनस देने का फैसला किया है अत: राज्य के किसानों से गेहूं की खरीद मध्य प्रदेश में 2,625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की जाएगी।

उधर राजस्थान सरकार ने भी रबी विपणन सीजन 2026-27 के लिए राज्य के गेहूं किसानों को 150 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस देने की घोषणा की हुई है। अत: राजस्थान के किसानों से गेहूं की खरीद 2,735 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की जायेगी।

प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों पंजाब एवं हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में गेहूं की समर्थन मूल्य पर खरीद पहली अप्रैल से शुरू होगी, जबकि राजस्थान एवं मध्य प्रदेश से खरीद चालू महीने में शुरू हो जायेगी।

फसल वर्ष 2024-25 (जुलाई-जून) में देश में गेहूं का उत्पादन 117.9 मिलियन टन का हुआ टन था। चालू रबी में गेहूं की बुआई बढ़ी है तथा उत्पादक राज्यों में मौसम भी फसल के अनुकूल बना हुआ है ऐसे में उत्पादन पिछले साल की तुलना में बढ़ने की उम्मीद है। गेहूं खरीदने का समय आमतौर पर अप्रैल से जून के आखिर तक होता है।

कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी सीजन गेहूं की बुआई बढ़कर 334.17 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई केवल 328.04 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

गेहूं के खरीद का लक्ष्य अलग-अलग राज्यों के फूड सेक्रेटरी और भारतीय खाद्य निगम, एफसीआई के अधिकारियों की एक बैठक में तय किया गया। इस बैठक में अनाज की खरीद, पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन और स्टोरेज पर असर डालने वाले कई फैक्टर का भी रिव्यू किया गया।

सरकार ने 10 फीसदी तक टूटे हुए दानों वाले बेहतर चावल की सप्लाई के लिए पांच राज्यों में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है। राज्यों से इसे लागू करने पर फीडबैक देने के लिए कहा गया है।

मध्य प्रदेश सरकार गेहूं किसानों को 40 रुपये का बोनस देगी, पंजीकरण का समय बढ़ाया

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश सरकार ने गेहूं उत्पादक किसानों को बड़ी राहत देते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर बोनस देने का फैसला किया है। सरकार ने गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,585 रुपये प्रति क्विंटल के साथ 40 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस देने की घोषणा की है। इसके बाद अब राज्य के किसानों से गेहूं की खरीदी 2,625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की जाएगी


राज्य के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि सरकार किसान कल्याण के लिए समर्पित है और उसी भाव के साथ काम कर रही है। शुक्रवार को मुख्यमंत्री ने भारतीय किसान संघ के प्रतिनिधियों के साथ मीटिंग की थी। इस मीटिंग के बाद किसानों को राहत देते हुए कई फैसले लिए गए।

उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने 2026 को 'किसान कल्याण वर्ष' घोषित किया है और अन्नदाताओं के हित में लगातार कदम उठाए जा रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने बताया कि गेहूं की सरकारी खरीद के लिए किसानों के पंजीयन की आखिरी तारीख को बढ़ाकर 10 मार्च कर दी गई है जो पहले सात मार्च तय की गई थी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने अपने संकल्प पत्र में 2028 तक गेहूं का खरीद भाव 2,700 रुपये प्रति क्विंटल करने की बात कही थी, जिसे राज्य सरकार किसानों के हित में धीरे, धीरे इस भाव को पार करेगी।

मालूम हो कि इससे पहले राजस्थान सरकार ने रबी विपणन सीजन 2026-27 के लिए राज्य के गेहूं किसानों 150 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस देने की घोषणा की हुई है। अत: राजस्थान के किसानों से गेहूं की खरीद 2,735 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की जायेगी।

व्यापारियों के अनुसार गुजरात के बाद मध्य प्रदेश की मंडियों में गेहूं के बाद घटकर 2,250 से 2,350 रुपये प्रति क्विंटल रह गए हैं तथा चालू महीने में मध्य प्रदेश के साथ ही राजस्थान की मंडियों में गेहूं की आवक बढ़ेगी। इससे कीमतों पर और दबाव बनने की उम्मीद है। पंजाब एवं हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश की मंडियों में नए गेहूं की आवक अप्रैल में बढ़ेगी। जानकारों के अनुसार चालू सीजन में गेहूं की बुआई बढ़ी है तथा अभी तक मौसम भी फसल के लगभग अनुकूल रहा है इसलिए उत्पादन अनुमान बढ़ने की उम्मीद है।

केंद्र सरकार ने देश में गेहूं के बंपर स्टॉक को हल्का करने और इनकी कीमतों में स्थिरता को ध्यान में रखते हुए 25 लाख टन गेहूं के साथ-साथ 5 लाख टन गेहूं उत्पादों के निर्यात को मंजूरी दी थी। हालांकि भारतीय गेहूं विश्व कीमतों से करीब 45 से 50 डॉलर महंगा होने के कारण निर्यात में पड़ते नहीं लग रहे।

कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी सीजन गेहूं की बुआई बढ़कर 334.17 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई केवल 328.04 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। 

मिडिल ईस्ट संकट जारी रहा तो बासमती चावल एवं क्रूड से जुड़े सेक्टर पर असर बढ़ेगा - क्रिसिल

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में चल रही जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताएं और बढ़ती हैं या फिर लंबे समय तक बनी रही, तो इसका कई भारतीय सेक्टर पर बुरा असर पड़ सकता है, जिसमें बासमती चावल, फर्टिलाइजर, डायमंड पॉलिशिंग, ट्रैवल ऑपरेटर और एयरलाइंस शामिल हैं, क्योंकि उनका इस क्षेत्र से सीधा संपर्क है।


क्रिसिल रेटिंग की रिपोर्ट के मुताबिक, सिरेमिक और फर्टिलाइजर जैसे सेक्टर, जो इम्पोर्टेड लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं, उन्हें भी जल्द ही उत्पादन में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है और उन पर कड़ी नजर रखने की जरूरत होगी। मिडिल ईस्ट की अनिश्चितताएं, डायरेक्ट ट्रेड, एनएनजी पर निर्भर और क्रूड से जुड़े सेक्टर लंबे समय तक रुकावट का खामियाजा भुगत सकते है। अगर एनर्जी की कीमत ऊंची रहती हैं तो डाउनस्ट्रीम ऑयल रिफाइनर, टायर, पेंट, स्पेशलिटी केमिकल, फ्लेक्सिबल पैकेजिंग और सिंथेटिक टेक्सटाइल जैसे क्रूड से जुड़े सेक्टर भी प्रभावित हो सकते हैं।

भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल और एलएनजी की आधी सप्लाई आयात से पूरी करता है, जिसमें लगभग 40-50 फीसदी कच्चा तेल और 50-60 फीसदी एलएनजी शिपमेंट होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ज़्यादातर शिपिंग जहाजों ने 1 मार्च, 2026 से इस रास्ते पर चलना बंद कर दिया है, क्योंकि रास्ते में खतरा बढ़ गया है। इस रास्ते में कोई भी लंबे समय तक रुकावट ग्लोबल क्रूड तेल और एलएनजी की उपलब्धता पर असर डाल सकती है और कीमतें बढ़ सकती है।

ब्रेंट क्रूड की कीमत जनवरी-फरवरी 2026 के दौरान औसतन 66-67 यूएसडी से बढ़कर पहले ही लगभग 82-84 यूएसडी प्रति बैरल (बीबीएल) हो गई है। इसी तरह, एशियाई स्पॉट एलएनजी की कीमत लगभग यूएसडी 10/एमएमबीटीयू से बढ़कर यूएसडी 24-25/एमएमबीटीयू हो गई है। एनर्जी की कीमतों में और बढ़ोतरी से देश का करंट अकाउंट डेफिसिट और फ्यूल इन्फ्लेशन बढ़ सकता है। इंडस्ट्रीज़ में एनर्जी की अहम भूमिका को देखते हुए, यह भारतीय कंपनियों के प्रॉफिट पर भी असर डाल सकता है। भारत अपनी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) का लगभग दो-तिहाई हिस्सा भी आयात करता है, जिसमें ज्यादातर की सप्लाई वेस्ट एशिया से होती है। हालाँकि, क्योंकि एलपीजी का ज्यादा इस्तेमाल घरेलू इस्तेमाल के लिए होता है और सिर्फ लगभग 10 फीसदी का इस्तेमाल इंडस्ट्रियल फ्यूल के तौर पर होता है, इसलिए इंडिया इंक पर इसका असर कम होने का अनुमान है।

जिन सेक्टर्स पर ज्यादा असर पड़ रहा है, उनमें बासमती चावल की निर्यात शिपमेंट में देरी हो सकती है, क्योंकि पिछले वित्त वर्ष में भारत के लगभग 6 मिलियन टन बासमती निर्यात वॉल्यूम का लगभग 70-72 फीसदी वेस्ट एशियाई देशों को भेजा गया था। फर्टिलाइजर सेक्टर को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि भारत अपनी फर्टिलाइजर की जरूरत का लगभग 30 फीसदी आयात करता है, जिसमें वेस्ट एशिया इन आयात का लगभग 40 फीसदी सप्लाई करता है।

एविएशन सेक्टर को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि इंडियन एयरलाइंस द्वारा ऑपरेट की जाने वाली कुल फ्लाइट्स में से लगभग 10 फीसदी वेस्ट एशिया जाती हैं या वहाँ से होकर दूसरे देशों को जाती हैं। एयरस्पेस पर रोक और एयरपोर्ट बंद होने, खासकर दुबई में, फ्यूल की लागत बढ़ सकती है और ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर पड़ सकता है। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि ज्यादातर भारतीय कंपनियों पर जल्द असर सीमित रह सकता है, क्योंकि उनकी बैलेंस शीट मजबूत हैं, जो मौजूदा अनिश्चितताओं से कुछ बचाव कर सकती हैं।

कैस्टर सीड का उत्पादन बढ़कर 17.60 लाख टन होने का अनुमान - एसईए

नई दिल्ली। फसल सीजन 2025-26 के दौरान देश में कैस्टर सीड का उत्पादन 11 फीसदी बढ़कर 17.60 लाख टन होने का अनुमान है। फसल सीजन 2024-25 के इसका उत्पादन 15.90 लाख टन का हुआ है।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए ने 27 और 28 फरवरी 2026 को गांधीनगर में हुए ग्लोबल कैस्टर कॉन्फ्रेंस 2026 में 2025-26 सीजन के लिए अपने कैस्टर क्रॉप सर्वे के नतीजे जारी किए हैं। इसमें देश का कुल कैस्टर सीड का उत्पादन 17.60 लाख टन होने का अनुमान जारी किया, जो कि पिछले साल की तुलना में 11 फीसदी ज्यादा है। सर्वे के अनुसार कैस्टर सीड के प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौसम फसल के अनुकूल रहा जिससे इसकी प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में बढ़ोतरी हुई। यह अनुमान फरवरी 2026 के पहले सप्ताह तक किए गए दो राउंड के फील्ड सर्वे पर आधारित हैं।

एसईए के अनुसार कैस्टर सीड के उत्पादन में बढ़ोतरी के मुख्य कारणों में समय पर बुआई तथा उत्पादक क्षेत्रों में अच्छी मानसूनी बारिश के साथ ही किसानों द्वारा ज्यादा पैदावार वाली किस्मों को बड़े पैमाने पर अपनाने से हुई है। सभी राज्यों में फसल की सेहत काफी हद तक ठीक-ठाक रही। हालांकि एकाध जगहों पर प्रतिकूल मौसम का असर फसल पर पड़ा है, लेकिन इससे कुल उत्पादन पर कोई खास असर नहीं पड़ा।

गुजरात जोकि कैस्टर उत्पादन में सबसे ज्यादा योगदान देने वाला राज्य है, इसका उत्पादन 13.65 लाख टन होने का अनुमान है, जो कि पिछले साल की तुलना में 9 फीसदी ज्यादा है। हालांकि राज्य में इसकी बुआई थोड़ी कम होकर 6.34 लाख हेक्टेयर में हुई, लेकिन अच्छे फसल मैनेजमेंट और अच्छे मौसम की वजह से उत्पादकता में बढ़ोतरी हुई।

राजस्थान में कैस्टर सीड की बुआई 10 फीसदी बढ़कर 1.88 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि उत्पादन 18 फीसदी बढ़कर 3.22 लाख टन का होने का अनुमान। राज्य में समय पर बुआई, अच्छी मानसून बारिश और बाड़मेर, जालोर और जोधपुर जैसे खास जिलों में बेहतर फसल मैनेजमेंट से पैदावार में बढ़ोतरी हुई।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का कैस्टर सीड का कुल उत्पादन 0.58 लाख टन होने का अनुमान है, जो पिछले साल के 0.54 लाख टन से ज्यादा है। अन्य राज्यों में चालू फसल सीजन में कैस्टर सीड का उत्पादन 15 हजार होने का अनुमान है, जोकि पिछले साल की तुलना में बढ़ा है।

जनवरी में कैस्टर तेल का निर्यात 18 फीसदी फीसदी से ज्यादा घटा - एसईए

नई दिल्ली। जनवरी में देश से कैस्टर तेल का निर्यात 18.30 फीसदी घटकर 43,238 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले साल जनवरी में इसका निर्यात 52,926 टन का हुआ था।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के अनुसार मूल्य के हिसाब से जनवरी में कैस्टर तेल का निर्यात 605.65 करोड़ रुपये का ही हुआ है, जो कि पिछले साल जनवरी के 714.19 करोड़ रुपये की तुलना में कम है।

एसईए के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2025-26 के पहले 10 महीनों अप्रैल से जनवरी के दौरान कैस्टर तेल का निर्यात 542,063 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के दौरान इसका निर्यात 563,399 टन का हुआ था।

एसईए के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2025-26 के पहले 10 महीनों अप्रैल से जनवरी के दौरान मूल्य के हिसाब से कैस्टर तेल का निर्यात 7,306.40 करोड़ रुपये का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात मूल्य के हिसाब से 7,026.52 करोड़ रुपये का ही हुआ था।

गुजरात में शनिवार को कैस्टर सीड के भाव 5 रुपये कमजोर होकर 1,250 से 1,275 रुपये प्रति 20 किलो रह गए, जबकि दैनिक आवक 75 हजार बोरियों, एक बोरी 75 किलो की हुई। राजकोट में कैस्टर सीड के दाम 10 रुपये कमजोर होकर 1,220 से 1,255 रुपये प्रति 20 किलो रह गए, जबकि गोंडल में इसके दाम 10 रुपये घटकर 1,220 से 1,256 रुपये प्रति 20 किलो बोले गए।

व्यापारियों के अनुसार हाल ही में कैस्टर सीड की कीमतों में मंदा आया है, क्योंकि उत्पादक मंडियों में इसकी दैनिक आवकों में बढ़ोतरी हुई है। मार्च महीने में भी कैस्टर सीड की दैनिक आवक बराबर बनी रहने का अनुमान है

कृषि मंत्रालय के आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2025-26 के दौरान कैस्टर सीड का उत्पादन 16.96 लाख टन का ही होने का अनुमान है, जबकि इसके पिछले फसल सीजन के दौरान 17.86 लाख टन का उत्पादन हुआ था।

28 फ़रवरी 2026

सीसीआई ने चालू सप्ताह में लगातार दूसरी बार कॉटन के बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी की

नई दिल्ली। कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) ने चालू सप्ताह में शुक्रवार को कॉटन की बिक्री कीमतों में 200 से 800 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी 356 किलो की बढ़ोतरी की। इससे पहले भी निगम ने बुधवार को बिक्री भाव में बढ़ोतरी की थी।


सूत्रों के अनुसार शुक्रवार को सीसीआई ने कॉटन की बिक्री कीमतों में 200 से 800 रुपये प्रति कैंडी की बढ़ोतरी की। इस दौरान निगम ने 1,00,500 गांठ कॉटन की बिक्री की, जिसमें मिलों ने 45,500 गांठ कॉटन की खरीद की, इसके अलावा व्यापारियों ने इस दौरान 55,000 गांठ खरीदी।

सीसीआई चालू सप्ताह में बुधवार को भी कॉटन की बिक्री कीमतों में 200 से 900 रुपये प्रति कैंडी की बढ़ोतरी की थी, तथा इस दौरान 2,78,000 गांठ की बिक्री की थी।

स्पिनिंग मिलों की मांग बढ़ने के कारण शुक्रवार को शाम के सत्र में गुजरात में कॉटन के दाम तेज हुए, जबकि इस दौरान उत्तर भारत के राज्यों में इसके दाम लगभग स्थिर हो गए।

गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव शुक्रवार को 100 रुपये तेज होकर 54,300 से 54,500 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो हो गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव 5,300 से 5,470 रुपये प्रति मन बोले गए। हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव 5,140 से 5,300 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 5,140 से 5,480 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 50,200 से 51,200 रुपये कैंडी बोले गए।
देशभर की मंडियों में कपास की आवक 112,350 गांठ, एक गांठ-170 किलो की हुई।

आईसीई के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग में कॉटन की कीमतों में शुक्रवार को तेजी का रुख रहा।

व्यापारियों के अनुसार सीसीआई द्वारा बिक्री दाम बढ़ा देने से स्पिनिंग मिलों की खरीद से गुजरात में कॉटन की कीमतों में सुधार आया, जबकि उत्तर भारत के राज्यों में इसके दाम लगभग स्थिर हो गए। सीसीआई चालू सप्ताह में कॉटन की बिक्री कीमतों में दो बार बढ़ोतरी कर चुकी है, जबकि इससे पहले चालू महीने में ही दो बाद इसके बिक्री भाव कम किए थे। ऐसे में स्पिनिंग मिल जरुरत के हिसाब से ही खरीद रही है। अत: हाजिर बाजार में भी इसकी कीमतों में सीमित तेजी, मंदी बनी रहने का अनुमान है। चालू सीजन में उत्पादन अनुमान तो ज्यादा है ही, साथ ही आयात भी बढ़ेगा। मौजूदा भाव में प्राइवेट जिनिंग मिलों की बिकवाली कम आ रही है, क्योंकि उनके पास कुल स्टॉक कम है। घरेलू बाजार में कॉटन का सबसे ज्यादा स्टॉक सीसीआई के पास है, इसलिए हाजिर बाजार में कॉटन की कीमतों में तेजी, मंदी सीसीआई की बिक्री दाम पर ही ज्यादा निर्भर करेगी।

सीसीआई ने तेलंगाना में कपास की एमएसपी पर खरीद हेतु पंजीकरण की तिथि बढ़ाई


नई दिल्ली। कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) ने तेलंगाना के कपास किसानों को राहत देने के लिए पंजीकरण की तिथि को बढ़ा दिया है। सीसीआई ने किसानों से आग्रह किया है, जिन किसानों के पास कपास का स्टॉक बचा हुआ है, वह 27 फरवरी 2026 तक कपास किसान एप पर जाकर पंजीकरण कर सकते है ताकि उनकी कपास की खरीद समर्थन मूल्य पर की जा सके। पंजीकरण के बाद किसान सीसीआई के नजदीकी खरीद केंद्र पर कपास समर्थन मूल्य पर बेच सकते हैं।

सीसीआई के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर ललित कुमार गुप्ता ने क्वालिटी स्टैंडर्ड, सेफ्टी और सिक्योरिटी उपायों, और पूरे सर्विस डिलीवरी सिस्टम का रिव्यू करने के लिए तेलंगाना के अलग-अलग गोदामों का दौरा किया। यह दौरा एमएसपी के तहत खरीदे गए कपास के स्टॉक को सुरक्षित रखने में ट्रांसपेरेंसी, एफिशिएंसी, और बेस्ट इन क्लास स्टोरेज प्रैक्टिस बनाए रखने के लिए है।

सीसीआई ने गुरुवार को ई नीलामी के माध्यम से 4,18,000 क्विंटल बिनौले की बिक्री की पेशकश की, जिसमें से केवल 53,000 क्विंटल बिनौले की बिक्री हुई।


स्पिनिंग मिलों की मांग सीमित होने के कारण गुरुवार को शाम के सत्र में गुजरात के साथ ही उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन के दाम लगभग स्थिर हो गए।

गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव गुरुवार को 54,200 से 54,400 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो पर स्थिर हो गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव 5,300 से 5,490 रुपये प्रति मन बोले गए। हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव 5,140 से 5,300 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 5,140 से 5,470 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 50,200 से 51,200 रुपये कैंडी बोले गए।

देशभर की मंडियों में कपास की आवक 77,850 गांठ, एक गांठ-170 किलो की हुई।

महाराष्ट्र में 60 चीनी मिलों में पेराई बंद, उत्पादन 25 फीसदी बढ़कर 92 लाख टन के पार

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) में 23 फरवरी तक महाराष्ट्र में चीनी का उत्पादन 24.73 फीसदी बढ़कर 92.29 लाख टन का हो चुका है। पिछले पेराई सीजन की समान अवधि में राज्य में 73.99 लाख टन चीनी का ही उत्पादन हुआ था। राज्य की 60 चीनी मिलों ने पेराई बंद कर दी है।


शुगर कमिश्नर के अनुसार 23 फरवरी तक राज्य में 980.85 लाख टन गन्ने की पेराई हो चुकी है और 92.29 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। राज्य की औसत चीनी रिकवरी 9.41 फीसदी की बैठ रही है। पिछले साल की समान अवधि में राज्य में 793.56 लाख टन गन्ने की पेराई की थी और 73.99 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। औसत चीनी की रिकवरी दर 9.32 फीसदी की थी।

कोल्हापुर डिवीजन ने 206.19 लाख टन गन्ने की पेराई की है और 22.59 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। कोल्हापुर डिवीजन में रिकवरी की दर 10.96 फीसदी की है। इसी तरह से पुणे डिवीजन में अब तक 209.11 लाख टन गन्ने की पेराई कर 20.37 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। पुणे डिवीजन की रिकवरी दर 9.75 फीसदी की है।

सोलापुर डिवीजन में 211.34 लाख टन गन्ने की पेराई हो चुकी है और 18.04 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। चीनी की रिकवरी दर 8.54 फीसदी की है। अहमदनगर (अहिल्यानगर) डिवीजन में चीनी मिलों ने 122.42 लाख टन गन्ने की पेराई की है और 10.03 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। अहमदनगर डिवीजन में चीनी की रिकवरी दर 9.01 फीसदी है।

छत्रपति संभाजीनगर डिवीजन में चीनी मिलों ने अब तक 103.3 लाख टन गन्ने की पेराई कर 8.38 लाख क्विंटल चीनी का उत्पादन किया है। चीनी की रिकवरी की दर 8.11 फीसदी है।

नांदेड़ डिवीजन में चीनी मिलों ने 115.3 लाख टन गन्ने की पेराई कर 10.73 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। इस डिवीजन में चीनी की रिकवरी दर 9.31 फीसदी है। अमरावती डिवीजन में चीनी मिलों ने अब तक 11.39 लाख टन गन्ने की पेराई की है तथा 1.05 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। चीनी में रिकवरी की दर इस डिवीजन में 9.27 फीसदी है। नागपुर डिवीजन में 1.8 लाख टन पेराई हुई है।

चालू समर सीजन में फसलों की कुल बुआई 4.51 फीसदी बढ़ी - कृषि मंत्रालय

नई दिल्ली। चालू समर सीजन 2026 में फसलों की कुल बुआई पिछले साल की तुलना में 4.51 फीसदी आगे चल रही है। इस दौरान दलहन एवं मोटे अनाजों की बुआई बढ़ी है, जबकि धान की रोपाई पिछले साल के लगभग बराबर ही हुई है।


कृषि मंत्रालय के अनुसार 20 फरवरी 2026 तक देशभर में समर सीजन की फसलों की बुआई बढ़कर 21.30 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 20.38 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई थी।

समर की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू सीजन में 17.78 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जोकि पिछले साल के लगभग बराबर ही है। समर सीजन में धान की रोपाई सामान्यत 31.49 लाख हेक्टेयर में होती है तथा फसल सीजन 2025 में इसकी रोपाई 33.28 लाख हेक्टेयर में हुई थी।

समर सीजन में दालों की बुआई बढ़कर 0.91 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 0.76 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। समर में दलहन की प्रमुख फसल मूंग की बुआई 59 हजार हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 56 हजार हेक्टेयर से ज्यादा है।

मोटे अनाजों की बुवाई चालू समर सीजन में बढ़कर 1.38 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 1.08 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। इस दौरान समर मक्का की बुआई 1.06 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 0.89 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है।

चालू समर सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई 1.24 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 0.77 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। मूंगफली की बुआई चालू समर सीजन में बढ़कर 1.04 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल के 0.60 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। इस दौरान सनफ्लावर और शीशम सीड की बुआई क्रमश 7 हजार एवं 12 हजार हेक्टेयर हो चुकी है। 

समर्थन मूल्य पर जिंसों की खरीद को पारदर्शी और मजबूत बनाने पर सरकार का जोर - केंद्रीय कृषि मंत्री

नई दिल्ली। जिंसों की न्यूनतम समर्थन मूल्य, (एमएसपी) पर खरीद को और मजबूत बनाने के साथ ही खरीद पारदर्शिता होनी चाहिए। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि किसानों को परेशानी से बचाने के लिए खरीद केंद्रों को अच्छी तरह से तैयार और मैनेज किया जाना चाहिए।


शुक्रवार को नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (नेफेड) की रिव्यू मीटिंग में उन्होंने कहा कि प्राइस सपोर्ट स्कीम (पीएसएस) और प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड (पीएसएफ) के तहत खरीद ऑपरेशन की मजबूत करने पर सरकार का जोर है।

केंद्रीय कृषि मंत्री ने चल रही खरीद की स्थिति का रिव्यू किया साथ ही ऑपरेशनल चुनौतियों का आकलन किया और खरीद सिस्टम को और ज्यादा कुशल और किसान केंद्रित बनाने के तरीके खोजने पर जोर दिया, ताकि किसानों को बिना देरी के उनकी उपज का सही दाम मिल सके।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसानों को परेशानी से बचाने के लिए खरीद केंद्रों में जरूरी सामान और अच्छा मैनेजमेंट होना चाहिए। उन्होंने खरीद केंद्र पर आसान और बिना किसी परेशानी के काम करने की जरूरत पर जोर दिया, जिसमें समय पर पेमेंट, सही इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रोक्योरमेंट शेड्यूल पर ईमानदारी से काम करने की बात कही। उन्होंने कहा कि सरकारी खरीद सिस्टम में किसानों का भरोसा पक्का करना सबसे जरूरी है। अरहर, उड़द और मसूर जैसी खास दालों का उत्पादन और खरीद बढ़ाने पर खास जोर दिया गया। न्यूट्रिशनल सिक्योरिटी और आयात पर बाध्यता कम करने के लिए इन फसलों की अहमियत को देखते हुए, इनका उत्पादन और खरीद बढ़ाने की जरूरत है। घरेलू उत्पादन बढ़ाने और एमएसपवी पर खरीद की गारंटी देने के मकसद से छह साल के ‘दलहनों में आत्मनिर्भरता मिशन’ पर भी जोर दिया।

प्रस्तावित मिशन के तहत, खेती के तरीकों को बेहतर बनाने, अच्छी क्वालिटी के बीजों की उपलब्धता बढ़ाने, किसानों को टेक्निकल सपोर्ट देने और मार्केटिंग और खरीद सिस्टम को मजबूत करने जैसे उपायों पर अधिकारियों संग चर्चा की। इस मिशन का मकसद भारत को दालों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना, आयात पर निर्भरता कम करना, घरेलू कीमतों को स्थिर करना और किसानों की इनकम में लगातार बढ़ोतरी सुनिश्चित करना है।

केंद्रीय मंत्री ने किसानों को सीधे सरकारी खरीद सिस्टम से जोड़कर बिचौलियों पर निर्भरता से मुक्त करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने अधिकारियों को खरीद के कामों को सुचारू और एक जैसा लागू करने के लिए राज्य सरकारों के साथ तालमेल मजबूत करने का निर्देश दिया। एमएसपी पर खरीदी गई उपज की सुरक्षित और कुशल हैंडलिंग सुनिश्चित करने के लिए खरीद और स्टोरेज के इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने पर भी जोर दिया गया।

उन्होंने कहा कि बाजार की स्थिरता के लिए प्रभावी खरीद और पर्याप्त स्टोरेज जरूरी है। कीमतों में उतार-चढ़ाव को कम करने और किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के हितों की रक्षा करने में मदद करना जरुरी हैं। उन्होंने निर्देश दिया कि खरीद की योजना प्रोएक्टिव होनी चाहिए और फसल की आवक के समय खरीद सुनिश्चित करने के लिए उत्पादन अनुमान के साथ नीति बनानी चाहिए।

21 फ़रवरी 2026

महाराष्ट्र में एफआरपी भुगतान के देरी पर मिलों को 15 फीसदी ब्याज देना होगा - चीनी आयुक्त

पुणे, महाराष्ट्र। राज्य में चीनी का पेराई सीजन अपने आखिरी दौर में पहुंच गया है और शुगर कमिश्नरेट ने किसानों को उनके गन्ने के बकाया भुगतान के लिए शुगर फैक्ट्रियों पर कार्रवाई शुरू कर दी है। शुगर कमिश्नर डॉ. संजय कोलते ने पिछले हफ्ते हुई सुनवाई के दौरान मिलों को चेतावनी दी थी कि, शुगर फैक्ट्रियों द्वारा एफआरपी भुगतान में अगर देरी होती है तो उन्हें किसानों को 15 फीसदी ब्याज देना होगा। हालांकि, कुछ फैक्ट्रियों ने कहा कि एग्रीमेंट के मुताबिक किसानों को एफआरपी का भुगतान किया जा रही है।


राज्य की जिन मिलों ने किसानों को एफआरपी का 60 फीसदी से कम पेमेंट किया है, उन 45 शुगर फैक्ट्रियों की सुनवाई 17 और 18 फरवरी को शुगर कमिश्नरेट कार्यालय में हुई। डॉ. कोलते ने कहा कि जैसे ही कमिश्नरेट ने फैक्ट्रियों को बकाया एफआरपी मुद्दे पर अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी किया, कुछ फैक्ट्रियों ने बकाया रकम का भुगतान कर दिया है। उन्होंने कहा कि किसानों को उनके गन्ने का भुगतान समय पर मिलें, इसके लिए हमारी कोशिशें जारी हैं।

शुगर कमिश्नरेट की तरफ से 18 फरवरी को जारी रिपोर्ट के मुताबिक राज्य की 157 चीनी मिलों ने 15 फरवरी के आखिर तक गन्ना किसानों को 4,315 करोड़ रुपये का एफआरपी का भुगतान कर दिया है। शुगर कमिश्नरेट की तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक, पेराई कर रही 206 चीनी मिलों में से 157 चीनी मिलों ने 15 फरवरी के आखिर तक पूरा एफआरपी का भुगतान नहीं किया है तथा इस दौरान केवल 49 मिलों ने ही 100 फीसदी एफआरपी का भुगतान किया है। 31 जनवरी तक राज्य की चीनी मिलों ने 870.11 लाख टन गन्ने की पेराई की है।

इस गन्ने के लिए (कटिंग और ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट मिलाकर) कुल एफआरपी 33,697 करोड़ रुपये होता है। इसमें से 29,382 करोड़ रुपये (कटिंग और ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट मिलाकर) का भुगतान किसानों को किया जा चुका हैं तथा 49 फैक्ट्रियों ने 100 फीसदी एफआरपी का भुगतान कर दिया है। 58 फैक्ट्रियों ने 80 से 99.99 फीसदी एफआरपी का भुगतान किसानों को किया है। 58 फैक्ट्रियों ने 60 से 79.99 फीसदी एफआरपी किसानों के अकाउंट में ट्रांसफर किया है। 41 फैक्ट्रियों ने 60 परसेंट से कम एफआरपी अभी तक किसानों को दिया है। अत: राज्य की गन्ना मिलों पर 4,315 करोड़ रुपये का एफआरपी अभी बकाया है।