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02 अगस्त 2025

जुलाई अंत तक चीनी के उत्पादन में 18 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई - एनएफसीएसएफ

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2024 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-24 से सितंबर-25) के पहले 10 महीनों पहली अक्टूबर से जुलाई अंत तक चीनी के उत्पादन में 18.38 फीसदी की गिरावट आकर कुल उत्पादन 258.2 लाख टन का ही हुआ है।


राष्ट्रीय सहकारी चीनी कारखाना महासंघ लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) का अनुमान है कि चालू पेराई सीजन में कुल चीनी उत्पादन 261.1 लाख टन होने का अनुमान है, जो कि 2023-24 सीजन के उत्पादन 319 लाख टन से कम है।

एनएफसीएसएफ के अनुसार कर्नाटक और तमिलनाडु में जून से सितंबर तक विशेष पेराई कार्य चल रहा है, जिस कारण चीनी के कुल उत्पादन में कुछ अतिरिक्त टन की वृद्धि होने की उम्मीद है।

एनएफसीएसएफ के अनुसार देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में जुलाई तक उत्पादन घटकर 92.7 लाख टन का रह गया, जो कि पिछले साल के 103.6 लाख टन से कम है। दूसरे सबसे बड़े उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में भी उत्पादन में भारी गिरावट देखी गई, जहां उत्पादन पिछले पेराई सीजन के 110 लाख टन से घटकर 80.90 लाख का ही हुआ है। इसी तरह से कर्नाटक में चीनी का उत्पादन पिछले साल के 51.6 लाख टन से घटकर 40.6 लाख टन का रह गया।

चीनी के उत्पादन में आई गिरावट का प्रमुख कारण गन्ने की कम उपलब्धता, प्रतिकूल मौसम, इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के बढ़ते उपयोग और कीट एवं रोगों के प्रकोप के कारण फसल हो हुआ नुकसान है। एनएफसीएसएफ को उम्मीद है कि अनुकूल मानसून, महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ने की खेती में वृद्धि और सरकार द्वारा उचित एवं लाभकारी मूल्य में समय पर की गई वृद्धि के कारण आगामी पेराई सीजन 2025-26 में देश में चीनी का उत्पादन बढ़कर 350 लाख टन तक पहुंच जाएगा।

एनएफसीएसएफ ने सरकार से नीतिगत उपायों की मांग की है, जिनमें एथेनॉल खरीद मूल्यों में संशोधन, चीनी के लिए न्यूनतम बिक्री मूल्य में बढ़ोतरी के साथ ही स्वास्थ्य जागरूकता के कारण प्रति व्यक्ति खपत में आई गिरावट को देखते हुए अतिरिक्त भंडार के प्रबंधन हेतु चीनी निर्यात की अनुमति शामिल है। 

29 जुलाई 2025

खाद्वय मंत्रालय ने अगस्त के लिए 22.5 लाख टन चीनी का कोटा जारी किया

नई दिल्ली। केंद्रीय खाद्वय एवं उपभोक्ता मामले मंत्रालय ने अगस्त 2025 के लिए 22.5 लाख टन चीनी का मासिक कोटा जारी किया है, जो कि अगस्त 2024 के दौरान जारी किए गए कोटे की तुलना में कम है।


केंद्रीय खाद्य मंत्रालय द्वारा 28 जुलाई को जारी की गई घोषणा के अनुसार अगस्त 2025 के लिए 22.5 लाख टन का कोटा जारी किया है। अगस्त 2024 में, सरकार ने घरेलू बिक्री के लिए 22 लाख टन का मासिक चीनी कोटा आवंटित किया था। जुलाई 2025 के लिए भी चीनी का कोटा 22 लाख टन का आवंटित किया गया था।

जानकारों के अनुसार, मांग बनी रहने के कारण जुलाई में चीनी की कीमतों में 100 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि देखी गई। रक्षा बंधन, कृष्ण जन्माष्टमी आदि त्योहारों के कारण अगस्त का कोटा अपेक्षित मांग से कम है, इसलिए, बाजार में चीनी की कीमतों में 100 से 150 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि होने की संभावना है। पिछले साल अगस्त में चीनी की खपत 25.20 लाख टन की हुई थी।

खरीफ फसलों की बुआई 929 लाख हेक्टेयर के पार, पिछले साल की तुलना में 4 फीसदी बढ़ी

नई दिल्ली। चालू खरीफ सीजन में फसलों की बुआई की 3.98 फीसदी बढ़कर 829.44 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 797.69 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान जहां कपास की बुआई में 2.25 फीसदी की कमी आई है, वहीं धान, दलहन एवं मोटे अनाजों की बुआई बढ़ी है। तिलहनी फसलों की बुआई भी पीछे चल रही है।


कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में 25 जुलाई तक देशभर के राज्यों में धान की रोपाई बढ़कर 245.13 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी रोपाई केवल 216.16 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

दलहनी फसलों की बुआई चालू खरीफ सीजन में बढ़कर 93.05 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 89.94 लाख हेक्टेयर में तुलना में बढ़ी है। इस दौरान अरहर की बुआई 34.90 लाख हेक्टेयर में, मूंग की बुआई 30.60 लाख हेक्टेयर में और उड़द की 16.59 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले खरीफ सीजन में इस समय तक इनकी बुआई क्रमश: 37.99 लाख हेक्टेयर में, 26.36 लाख हेक्टेयर और 17.79 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

मोठ की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 8.14 लाख हेक्टेयर में तथा अन्य दलहन की 2.67 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई क्रमश: 5.06 और 2.60 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

चालू खरीफ सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई थोड़ी घटकर 166.89 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय 170.73 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। तिलहनी फसलों में मूंगफली की बुआई 41.17 लाख हेक्टेयर में, सोयाबीन की 116.71 लाख हेक्टेयर में तथा सनफ्लावर की 56,000 हेक्टेयर में हुई है। पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई क्रमश: 40.77 लाख हेक्टेयर में, 121.38 लाख हेक्टेयर में तथा 59,000 हेक्टेयर में ही हुई थी।

शीशम सीड की बुआई चालू खरीफ में 7.44 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 7.14 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। कैस्टर सीड की बुआई 94 हजार हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 57 हजार हेक्टेयर में ही बुआई हो पाई थी।

मोटे अनाजों की बुआई बढ़कर चालू खरीफ सीजन में 160.72 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 154.97 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई थी। मोटे अनाजों में मक्का की 85.58 लाख हेक्टेयर में तथा बाजरा की 58.02 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई क्रमश: 78.92 और 57.99 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। ज्वार की बुआई 12.45 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 12.34 लाख हेक्टेयर की तुलना में बढ़ी है।

चालू खरीफ में गन्ने की बुआई 55.16 लाख हेक्टेयर में और कपास की 103.15 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले खरीफ सीजन की समान अवधि में इनकी बुआई क्रमश: 54.88 लाख हेक्टेयर और 105.52 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

देश का सब्जी बीज बाजार वर्ष 2030 तक 970 मिलियन डॉलर पर पहुंचने का अनुमान

नई दिल्ली। नवाचार, अनुसंधान एवं विकास पर ध्यान केंद्रित करने के साथ ही नीतिगत सुधारों के बल पर देश को 2030 तक 970 मिलियन डॉलर के सब्जी बीज केंद्र में बदला जा सकता है।


वर्ष 2024 में 8.45 बिलियन डॉलर के मूल्य वाला वैश्विक सब्जी बीज बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है और विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इसका अगला प्रमुख केंद्र बनने की अच्छी स्थिति में है, बशर्ते सही नीतियां बनाई जाएं और प्रभावी ढंग से उन्हें लागू किया जाएं।

सरकार द्वारा सब्जियों और फलों के लिए अपने व्यापक कार्यक्रम के माध्यम से बागवानी क्षेत्र पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। एक राष्ट्रीय सम्मेलन में विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर देकर कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) को मजबूत करने और जैव प्रौद्योगिकी के उपयोग के साथ-साथ नीतिगत समर्थन प्रदान करने से भारतीय सब्जी बीज बाजार 2023-24 के 740 मिलियन डॉलर से बढ़कर 2030 तक 970 मिलियन डॉलर का हो सकता है, जो कि 4.6 फीसदी की वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ रहा है।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के कृषि आयुक्त डॉ. पी के सिंह ने कहा कि बागवानी, विशेष रूप से सब्जी उत्पादन में भारत की वृद्धि, समृद्ध जर्मप्लाज्म, विविध उत्पादन परिस्थितियों, अनुसंधान एवं विकास नवाचारों और निजी एवं सार्वजनिक संस्थानों द्वारा किए गए रणनीतिक निवेश से जुड़ी है। उन्होंने आगे कहा कि बीज क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास, संकर बीजों को अपनाने और विज्ञान-आधारित बीज उद्योग की ओर रुझानों के कारण बागवानी हाशिये से मुख्यधारा में आ गई है। फिर भी हमारी वैश्विक क्षमता का अभी भी काफी हद तक दोहन नहीं हुआ है।

भारतीय बीज उद्योग महासंघ (एफएसआईआई) द्वारा शुक्रवार को राजधानी में आयोजित 'भारत को वैश्विक बीज केंद्र बनाने में सब्जी बीज क्षेत्र की भूमिका' नामक राष्ट्रीय सम्मेलन में वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, कृषि वैज्ञानिकों, बीज उद्योग के नेताओं और नीति निर्माताओं ने नियामक बाधाओं और देश की निर्यात क्षमता को उजागर करने के तरीकों पर विचार-विमर्श किया।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव (बीज) अजीत कुमार साहू ने कहा कि भारत का बीज क्षेत्र एक निर्णायक मोड़ पर है। समृद्ध कृषि-जलवायु विविधता, प्रतिस्पर्धी उत्पादन प्रणालियों, एक गतिशील निजी क्षेत्र और मजबूत सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों के साथ, हमारे पास वैश्विक बीज उत्पादन केंद्र बनने के लिए सभी आवश्यक तत्व मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि मंत्रालय लाइसेंसिंग को सुव्यवस्थित कर रहा है, साथ ही विज्ञान-आधारित नियामक सुधार लागू कर रहा है, एसएटीएचआई प्लेटफॉर्म के माध्यम से डिजिटल ट्रेसेबिलिटी को सक्षम बना रहा है, और प्रसंस्करण संयंत्रों, भंडारण और परीक्षण प्रयोगशालाओं सहित आधुनिक बीज अवसंरचना में निवेश कर रहा है। ये कदम यह सुनिश्चित करेंगे कि किसानों को पूर्ण क्यूआर-कोड-आधारित ट्रेसेबिलिटी वाले प्रमाणित, उच्च-गुणवत्ता वाले बीज समय पर प्राप्त हों, जिससे फसल के नुकसान को कम करने, उत्पादकता में सुधार करने और उन्हें नकली इनपुट से बचाने में मदद मिलेगी।

जहा सरकारी अधिकारियों ने भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को उत्प्रेरित करने के लिए बनाए जा रहे सक्षम नीतिगत पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रकाश डाला, वहीं कृषि वैज्ञानिकों ने उत्पादकता बढ़ाने, जैव प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक-निजी सहयोग की परिवर्तनकारी भूमिका पर ज़ोर दिया।

भारत वर्तमान में सालाना लगभग 12 करोड़ डॉलर मूल्य के सब्जियों के बीजों का निर्यात करता है। भारत से मुख्यतः दक्षिण पूर्व एशिया और मध्य पूर्व को इनका निर्यात होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर लंबे समय से चली आ रही नीतिगत बाधाओं को दूर कर दिया जाए, तो यह आसानी से दोगुना या तिगुना हो सकता है, जिनमें से प्रमुख है 2016 से लंबित 100 से ज़्यादा कीट जोखिम विश्लेषण (पीआरए) का लंबित होना, जिससे अनुमानित 5.5 करोड़ डॉलर का व्यापार ठप पड़ हुआ है।

एफएसआईआई के उपाध्यक्ष, कृषि मामले एवं नीति निदेशक - आईबीएसएल और बायर क्रॉपसाइंस लिमिटेड में ट्रेट्स लाइसेंसिंग के प्रमुख श्री राजवीर राठी ने कहा कि हम एकीकृत विनियामक दृष्टिकोण और घरेलू बीज पंजीकरण के लिए "एक राष्ट्र, एक लाइसेंस" मॉडल तथा एकल-खिड़की निर्यात मंजूरी प्रणाली की शुरुआत का आह्वान करते हैं। डिजिटल अनुमोदन और लंबी अवधि की लाइसेंस वैधता के साथ, ये भारत में बीजों के व्यापार को आसान बनाने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

गन्ने का बुआई क्षेत्रफल पिछले दस साल में करीब 18 फीसदी बढ़ा - प्रह्लाद जोशी

नई दिल्ली। देश में गन्ने के बुआई क्षेत्रफल में पिछले दस साल में करीब 18 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि इस दौरान गन्ने का उत्पादन जहां 40 फीसदी बढ़ा है, वहीं उत्पादकता में भी 19 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।


भारतीय चीनी प्रौद्योगिकी संघ (एसटीएआई) के 83वें शताब्दी वार्षिक सम्मेलन के अनुसार केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने देश के चीनी उद्योग में आए महत्वपूर्ण परिवर्तन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सरकार ने भारत के किसानों को अन्नदाता को ऊर्जादाता बना दिया।

उन्होंने कहा कि पिछले दस वर्षों में देश में चीनी का उत्पादन 58 फीसदी बढ़ा है। सरकार ने गन्ने के उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) 2013-14 के 210 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 2025-26 के चीनी सत्र के लिए 355 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया। पेराई सीजन 2023-24 का गन्ना किसानों को लगभग 99.9 फीसदी बकाया राशि का भुगतान किया जा चुका है। इसी तरह से पेराई सीजन 2024-25 का भी किसानों को 90 फीसदी से अधिक बकाया राशि का भुगतान किया जा चुका है। चीनी की खुदरा कीमत लगभग स्थिर बनी हुई है जिस कारण हमारी सरकार किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के हितों का ध्यान रख रही है।

जोशी ने कहा कि एक स्थायी चीनी उद्योग के लिए हमारी सरकार ने कई पहल की हैं, जिनमें राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति 2018 भी शामिल है, जिसे 2022 में संशोधित किया गया है, ताकि इथेनॉल उत्पादन के लिए विभिन्न फीडस्टॉक जैसे गेहूं के अवशेष, कृषि अपशिष्ट और औद्योगिक अपशिष्ट को अनुमति दी जा सके। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार ने इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के रस, गन्ने के सिरप, बी-हैवी और सी-हैवी गुड़ के उपयोग की भी अनुमति दी है।

खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने इथेनॉल उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के लिए चीनी मिलों के लिए एक ब्याज अनुदान योजना शुरू की हुई है। इसके अतिरिक्त, मौजूदा गन्ना आधारित इथेनॉल संयंत्रों को बहु फीडस्टॉक आधारित संयंत्रों में परिवर्तित करने हेतु सहकारी चीनी मिलों (सीएमएस) के लिए एक वित्तीय सहायता योजना बनाई गई है ताकि इथेनॉल उत्पादन क्षमता को और बढ़ाया जा सके। इन पहलों ने अतिरिक्त चीनी भंडार को कम करने और जैव ईंधन अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद की है। इन सभी विकासों ने देश के चीनी क्षेत्र को एक सुस्त कमोडिटी बाजार से एक जीवंत ऊर्जा क्षेत्र में बदल दिया है।

उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है, जो कि वैश्विक उत्पादन का लगभग 20 फीसदी है, और दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है, जहाँ वैश्विक चीनी खपत का लगभग 15 फीसदी हिस्सा है। वैज्ञानिकों और अनुसंधान संस्थानों के निरंतर प्रयासों से यह क्षेत्र प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 5.5 करोड़ से ज्यादा किसानों और 5 लाख से अधिक श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है। पिछले एक दशक में, गन्ने की नई किस्में विकसित की गई है, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादकता में बढ़ोतरी हुई है और गन्ने का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है।

भारत के इथेनॉल क्षेत्र में भी परिवर्तन हुआ है, जिसमें मिश्रण दर 2013 के दौरान लगभग 1.5 फीसदी से बढ़कर 2025 तक लगभग 20 फीसदी हो गई है, जिसे महत्वपूर्ण क्षमता विस्तार, फीडस्टॉक विविधीकरण और इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के तहत प्रगतिशील नीतिगत उपायों का समर्थन प्राप्त है।

उन्होंने उद्योग से सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए शून्य द्रव उत्सर्जन, जल दक्षता और हरित ऊर्जा को प्राथमिकता देने का आग्रह किया। अनुसंधान एवं विकास तथा डिजिटल तकनीकों के साथ, गन्ना मिलें बहु-उत्पादक, ऊर्जा-कुशल जैव-शोधन संयंत्रों के रूप में विकसित होंगी। हम सब मिलकर 2047 तक विकसित भारत के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक लचीला, विविध और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारतीय चीनी क्षेत्र का निर्माण करेंगे।

25 जुलाई 2025

राजस्थान में खरीफ की बुआई 87 फीसदी पूरी, दलहन एवं तिलहन के साथ कपास की बढ़ी

नई दिल्ली। चालू खरीफ सीजन राजस्थान में फसलों की बुवाई 87 फीसदी क्षेत्रफल में पूरी हो चुकी है। दलहन एवं तिलहन के साथ ही मोटे अनाज तथा कपास की बुआई में बढ़ोतरी हुई है।


राज्य के कृषि निदेशालय के अनुसार 23 जुलाई तक राज्य में खरीफ फसलों की बुआई 144.39 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में केवल 133.80 लाख हेक्टेयर में ही बुआई थी। चालू खरीफ सीजन में राज्य में 165.39 लाख हेक्टेयर में फसलों की बुआई का लक्ष्य तय किया है।

चालू खरीफ सीजन में मोटे अनाजों की बुआई बढ़कर 60.18 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई केवल 56.19 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। मोटे अनाजों में बाजरा की 41.37 लाख हेक्टेयर में तथा मक्का की 9.48 लाख हेक्टेयर में हुई है। इसके अलावा धान की रोपाई 2.90 लाख हेक्टेयर और ज्वार की बुआई 6.39 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। पिछले साल की समान अवधि में बाजरा और मक्का की बुआई क्रमश: 38.43 लाख हेक्टेयर में तथा 9.36 लाख हेक्टेयर में हुई थी।

दलहनी फसलों की बुआई चालू खरीफ सीजन में बढ़कर 34.09 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 29.27 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। खरीफ दलहन में मूंग की बुआई 22.19 लाख हेक्टेयर में और मोठ की 8.26 लाख हेक्टेयर तथा उड़द की 2.91 लाख हेक्टेयर तथा छौला की 57 हजार हेक्टेयर में हो चुकी है ।

चालू खरीफ सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई राज्य में बढ़कर 20.83 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 20.67 लाख हेक्टेयर में ही बुआई हो पाई थी। तिलहनी फसलों में मूंगफली की बुआई 9.23 लाख हेक्टेयर में, सोयाबीन की 9.91 लाख हेक्टेयर में तथा शीशम की 1.75 लाख हेक्टेयर में और कैस्टर सीड की 22 हजार हेक्टेयर में हुई है।

चालू खरीफ में कपास की बुआई राज्य में 6.26 लाख हेक्टेयर में तथा ग्वार सीड की बुआई 19.98 लाख हेक्टेयर में और गन्ने की बुआई 3 हजार हेक्टेयर में हो चुकी है। पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई क्रमश: 5.02 लाख हेक्टेयर में, 19.55 लाख हेक्टेयर और गन्ने की 5 हजार हेक्टेयर में हुई थी।

महाराष्ट्र में कपास के साथ ही मूंगफली एवं सोयाबीन तथा अरहर की बुआई पिछड़ी

नई दिल्ली। महाराष्ट्र में चालू खरीफ सीजन में कपास के साथ ही मूंगफली एवं सोयाबीन तथा अरहर की बुआई बीते साल की तुलना में पीछे चल रही है।


राज्य के कृषि निदेशालय के अनुसार 21 जुलाई तक राज्य में खरीफ फसलों की बुआई 1.20 फीसदी कम होकर 12,739,258 हेक्टेयर में हुई ही है, जबकि पिछले साल की समान अवधि के दौरान राज्य में 12,894,445 हेक्टेयर में बुआई हो चुकी थी।

चालू खरीफ सीजन में तिलहन की प्रमुख फसल मूंगफली की बुआई 108,233 हेक्टेयर में ही हुई है , जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई 134,893 हेक्टेयर में हो चुकी थी। इस दौरान राज्य में सोयाबीन की बुआई 4,673,040 हेक्टेयर में ही हुई है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 4,805,997 हेक्टेयर की तुलना में कम है। तिलहन की कुल बुआई राज्य में घटकर 3,744,463 हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 3,960,219 हेक्टेयर में बुआई हो चुकी थी। अन्य तिलहनी फसलों में शीशम की बुआई 2,990 हेक्टेयर में हुई है।

चालू खरीफ में कपास की बुआई राज्य में घटकर 3,744,463 हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई 3,984,127 हेक्टेयर में हो चुकी थी।

दलहनी फसलों की बुआई चालू खरीफ सीजन में घटकर 1,733,737 हेक्टेयर में ही हुई है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 1,787,658 हेक्टेयर की तुलना में कम है। खरीफ दलहन में अरहर की बुआई 1,144,029 हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई 1,160,035 हेक्टेयर में हो चुकी थी। मूंग की बुआई 201,690 हेक्टेयर में तथा उड़द की 342,504 हेक्टेयर में तथा अन्य दलहन की 45,514 हेक्टेयर में हो चुकी है।

चालू खरीफ सीजन में मोटे अनाजों की बुआई बढ़कर 2,470,645 हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई केवल 2,162,441 हेक्टेयर में ही हुई थी। मोटे अनाजों में बाजरा की 300,013 हेक्टेयर में तथा मक्का की 1,335,744 हेक्टेयर में हुई है। इसके अलावा धान की रोपाई 719,143 हेक्टेयर और खरीफ ज्वार की बुआई 76,552 हेक्टेयर में हो चुकी है।