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28 जून 2025

खाद्य तेलों के आयात शुल्क में कटौती से किसानों को नुकसान की आशंका - सोपा

नई दिल्ली। सोपा ने केंद्र सरकार द्वारा 30 मई 2025 को क्रूड खाद्वय तेलों के आयात पर सीमा शुल्क में 11 फीसदी की कटौती करने के निर्णय पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है। उद्योग का मानना है कि इस फैसले से तिलहन प्रसंस्करणकर्ताओं के साथ ही तिलहन किसानों को नुकसान होगा।


सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के अनुसार आयात शुल्क में कमी से घरेलू तेल प्रसंस्करण उद्योग और किसानों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

सोपा के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में, सरकार बढ़ती मुद्रास्फीति से उपभोक्ताओं को राहत देने करने के लिए आयात शुल्क में कटौती करती है। विडंबना यह है कि यह शुल्क कटौती ऐसे समय में की गई है जब देश की मौजूदा मुद्रास्फीति दर अप्रैल 2025 में 3.16 फीसदी थी, जो कि जुलाई 2019 के बाद सबसे कम है। हालांकि हम इस निर्णय के बारे में सरकार की मंशा की सराहना करते हैं, जो कि वैश्विक व्यापार गतिशीलता में बदलाव, विशेष रूप से भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच चल रहे व्यापार सौदे के संबंध में हो सकता है। हालांकि इस नीतिगत बदलाव ने घरेलू तिलहन उत्पादन, प्रसंस्करण इकाइयों और लाखों किसानों की आजीविका पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव के बारे में गंभीर चिंता पैदा कर दी हैं।

सोपा के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा एमएसपी में वृद्धि की घोषणा के एक दिन बाद शुल्क में कटौती का निर्णय विरोधाभासी प्रतीत होता है और यह निर्णय तिलहन उत्पादन, तिलहन की खेती करने वाले किसान और प्रसंस्करण उद्योग को नुकसान पहुंचेगा। क्रूड खाद्य तेलों पर सीमा शुल्क में 11 फीसदी की कटौती से भारतीय बाजार में सस्ते आयातित तेलों की बाढ़ आ जाएगी, जिससे घरेलू खाद्य तेल की कीमतों में गिरावट आएगी।

खाद्य तेलों की कीमतों में गिरावट का सीधा मतलब स्थानीय किसानों को कम दाम मिलेगा, जिससे धान और मक्का जैसी वैकल्पिक फसलों की तुलना में तिलहन की खेती कम आकर्षक हो जाएगी, जो प्रति हेक्टेयर अधिक सकल लाभ प्रदान करती हैं।

विशेषज्ञों और किसान का मानना है कि इस निर्णय से चालू खरीफ सीजन में तिलहन की खेती के रकबे में कमी आएगी, क्योंकि किसान अधिक फायदे वाली फसलों की ओर रुख कर सकते हैं।

घरेलू तिलहन प्रोसेसर, विशेष रूप से छोटे और मध्यम आकार की पेराई इकाइयाँ, जोकि पहले से ही खली की कमजोर मांग और अधिक लागत के कारण नकारात्मक मार्जिन का सामना कर रही हैं। शुल्क में कमी से प्रोसेसर के मार्जिन में और कमी आएगी, क्योंकि उन्हें कम कीमत वाले आयातित तेलों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी होगी, जिससे संभावित रूप से अधिक इकाइयों को ब्रेक-ईवन क्षमता से कम पर काम करने या पूरी तरह से बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

रिफाइनिंग के लिए क्रूड तेल के आयात में वृद्धि के कारण बड़ी, बंदरगाह-आधारित रिफाइनरियों को अल्पावधि में लाभ होगा, लेकिन छोटे और क्षेत्रीय प्रसंस्करणकर्ताओं को इससे नुकसान होगा।

सोपा के अनुसार यह बदलाव भारत के खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए
भी झटका माना जा रहा है, क्योंकि इससे घरेलू तिलहन उत्पादन हतोत्साहित होगा, जो प्रसंस्करण बुनियादी ढांचे और आत्मनिर्भरता में निवेश के लिए प्रतिकूल है। किसान संगठन और सोपा जैसे उद्योग निकाय चिंतित हैं कि इस कदम से लाखों लोगों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी और खाद्य तेलों के आयात पर देश की निर्भरता बढ़ जाएगी।

13 जून 2025

दाल मिलों की मांग घटने से उड़द एवं चना मंदा, अरहर में मिलाजुला रुख

नई दिल्ली। दाल मिलों की खरीद कमजोर होने के कारण घरेलू बाजार में गुरुवार को  उड़द एवं चना के भाव में गिरावट दर्ज की गई जबकि इस दौरान अरहर की कीमतों में मिलाजुला रुख रहा। मसूर के दाम तेज हुए, जबकि मूंग की कीमत दिल्ली में तेज हुई।


जानकारों का मानना है कि दालों का आयात इसी तरह से बेरोकटोक जारी रहा तो देश कभी भी दालों के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बन पायेगा। वास्तव में आत्मनिर्भर की बात तो भूल ही जाइए, इसी तरह से आयात जारी रहा तो किसान को दलहन की बुआई से भी हतोत्साहित करेगा। केंद्र सरकार चाहे कितना भी न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी बढ़ा ले।

बर्मा से आयातित उड़द एफएक्यू एवं एसक्यू के भाव में चेन्नई में लगातार तीसरे दिन कमजोर हो गए। उड़द एफएक्यू के भाव जून एवं जुलाई शिपमेंट के 15 डॉलर कमजोर होकर 750 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ रह गए, जबकि इस दौरान एसक्यू उड़द के भाव जून एवं जुलाई शिपमेंट के 15 डॉलर घटकर 825 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ बोले गए। लेमन अरहर के भाव चेन्नई में जून तथा जुलाई शिपमेंट के 40 डॉलर तेज होकर 750 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ हो गए।

चेन्नई में आयातित उड़द की कीमत डॉलर में तीसरे दिन कमजोर हो गई, हालांकि इस दौरान म्यांमार में इनके दाम स्थिर बने रहे। घरेलू बाजार में दाल मिलों की मांग कमजोर होने से इसके भाव में गिरावट दर्ज की गई। जानकारों के अनुसार दाल मिलें उड़द की खरीद जरूरत के हिसाब से कर रही है क्योंकि हाल ही में उड़द के आयात पड़ते सस्ते हुए हैं। म्यांमार के निर्यातकों की बिकवाली बराबर बनी हुई है। जबलपुर लाइन से देसी उड़द की आवक पहले की तुलना में बढ़ी है। हालांकि खपत का सीजन होने के कारण उड़द दाल में मांग भी बनी रहने की उम्मीद है साथ ही दक्षिण भारत की दाल मिलों की खरीद भी उड़द में अभी बनी रहेगी। जानकारों के अनुसार जबलपुर और गुजरात की गर्मियों की फसल पहले की तुलना में बढ़ी है। ऐसे में उड़द की कीमतों में तेजी मानकर व्यापार नहीं करना चाहिए।

चेन्नई में लेमन अरहर के दाम तेज हुए हैं, लेकिन म्यांमार में इसके दाम स्थिर ही बने रहे। घरेलू बाजार में दाल मिलों की सीमित मांग से अरहर की कीमतों में मिलाजुला रुख रहा। आयात पड़ते महंगे होने के कारण आयातकों की बिकवाली कम हुई है, इसलिए इसके भाव में हल्का सुधार बन सकता है। हालांकि दाल मिलें जरुरत के हिसाब से ही अरहर की खरीद कर रही है। आम का सीजन होने के कारण अरहर दाल खपत चालू महीने में कमजोर बनी रहने की उम्मीद है। हालांकि उत्पादक राज्यों कर्नाटक के साथ ही महाराष्ट्र में देसी अरहर की आवकों में काफी कमी आई है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में अरहर का उत्पादन अनुमान ज्यादा था, साथ ही बर्मा से लेमन अरहर का आयात बराबर बना रहने की उम्मीद है। केंद्र सरकार लगातार अरहर की कीमतों की समीक्षा कर रही है।

दाल मिलों की खरीद कमजोर होने से चना के भाव घट गए। जानकारों के अनुसार चना की कीमतों में सीमित तेजी, मंदी बनी हुई है, हालांकि व्यापारी इसके भाव में ज्यादा मंदे में नहीं है। वैसे भी उत्पादक राज्यों की मंडियों में चना की आवक पहले की तुलना में कम हुई है। हालांकि स्टॉकिस्टों की पास चना का स्टॉक ज्यादा है, लेकिन केंद्रीय पूल में कम है। मानसूनी सीजन शुरू होने के कारण बेसन की खपत अगले से बढ़ेगी, इसलिए दाल मिलों की खरीद चना में बनी रहने की उम्मीद है। चालू रबी सीजन में व्यापारी चना का उत्पादन अनुमान कम मान रहे हैं। इसलिए आगे इसकी कीमतों में आगे सुधार बनने की उम्मीद है।

देसी मसूर के दाम दिल्ली में दूसरे दिन स्थिर बने रहे, साथ ही इस दौरान आयातित मसूर की कीमत भी स्थिर हो गई। जानकारों के अनुसार नीचे दाम पर स्टॉकिस्ट बिकवाली नहीं करना चाहते, हालांकि दाल मिलें भी जरुरत के हिसाब से ही खरीद कर रही हैं। इसलिए इसके भाव में सीमित तेजी, मंदी बनी रहने का अनुमान है। जानकारों के अनुसार प्रमुख उत्पादक राज्यों मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की मंडियों में मसूर की आवक पहले की तुलना में कम हुई है तथा चालू सीजन में मसूर का घरेलू उत्पादन अनुमान कम है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में मसूर का उत्पादन 18.17 लाख टन होने का अनुमान है।

मूंग की कीमतों मे दिल्ल में तेजी का रुख रहा, जबकि अन्य मंडियों में इसके दाम स्थिर हो गए। व्यापारियों के अनुसार दाल मिलें मूंग की खरीद जरुरत के हिसाब से ही कर रही है क्योंकि समर सीजन में मूंग की आवक पहले की तुलना में बढ़ी है, तथा नई फसल का उत्पादन अनुमान ज्यादा है। मध्य प्रदेश की मंडियों से मूंग की समर्थन मूल्य पर खरीद शुरू नहीं होने से कीमतों पर दबाव है। अत: मूंग में तेजी मानकर व्यापार नहीं करना चाहिए। हालांकि उत्पादक राज्यों की मंडियों में खरीफ मूंग की आवक पहले की तुलना में कम हुई है, लेकिन माना जा रहा है कि उत्पादक राज्यों में बकाया स्टॉक ज्यादा है। साथ ही सरकार भी केंद्रीय पूल से लगातार मूंग की बिकवाली कर रही है।

उत्तर प्रदेश में 34,720 टन मूंग की न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी पर खरीद को मंजूरी दे दी है।

चेन्नई में उड़द एफएक्यू के दाम 6,600 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए, जबकि एसक्यू के भाव 25 रुपये घटकर 7,325 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

दिल्ली में उड़द एफएक्यू के दाम कमजोर होकर 6,850 रुपये प्रति क्विंटल रह गए, जबकि एसक्यू के भाव 125 रुपये घटकर 7,650 से 7,700 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

मुंबई में उड़द एफएक्यू के भाव 6,700 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

कोलकाता में उड़द एफएक्यू के भाव 6,750 से 6,800 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

गुंटूर में उड़द पॉलिश के भाव 7,050 से 7,100 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए, जबकि विजयवाड़ा में उड़द पॉलिश के दाम 50 रुपये घटकर 7,200 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

चेन्नई में लेमन अरहर के भाव शाम के सत्र में 25 रुपये तेज होकर 6,125 रुपये प्रति क्विंटल  हो गए।

दिल्ली में लेमन अरहर के भाव शाम के सत्र में 100 रुपये कमजोर होकर 6,550 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

मुंबई में लेमन अरहर के भाव शाम के सत्र में 25 रुपये बढ़कर 6,125 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।

देसी अरहर के दाम कटनी, अकोला तथा कानपुर में कमजोर हुई जबकि अन्य अधिकांश उत्पादक मंडियों में लगभग स्थिर बने रहे।

मुंबई में अफ्रीकी देशों से आयातित अरहर के भाव स्थिर हो गए। सूडान से आयातित अरहर के भाव 6,200 से 6,250 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। इस दौरान गजरी अरहर के भाव 5750 से 5800 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए। मतवारा की अरहर के भाव 5,700 से 5,800 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। सफेद अरहर के दाम 6,000 से 6,050 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

दिल्ली में देसी मसूर के दाम 6,625 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

मुंद्रा बंदरगाह पर मसूर के भाव 5,900 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। कांडला बंदरगाह पर मसूर के भाव 5,900 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। हजिरा बंदरगाह पर मसूर के भाव 6,000 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए। कनाडा की मसूर के दाम कंटेनर में 6,150 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। पटना में देसी मसूर के भाव 6,500 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

दिल्ली में राजस्थान के बेस्ट चना के दाम 25 रुपये कमजोर होकर 5,725 से 5,750 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। इस दौरान मध्य प्रदेश के चना का व्यापार 25 रुपये घटकर 5,675 से 5,700 रुपये प्रति क्विंटल की दर से हुआ।

इंदौर में बोल्ड मूंग के भाव 6,400 से 6,500 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। जयपुर में मूंग के बिल्टी भाव 6,200 से 6,700 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। जलगांव में चमकी मूंग के दाम 6,500 से 7,000 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। दिल्ली में मूंग के दाम 50 रुपये तेज होकर 6,675 से 6,700 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।

मई में खाद्वय एवं अखाद्य तेलों का आयात 22 फीसदी घटा - एसईए

नई दिल्ली। चालू तेल वर्ष 2024-25 के मई 2025 में खाद्वय एवं अखाद्य तेलों का आयात 22 फीसदी घटकर 1,187,068 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले साल मई में इनका आयात 1,529,804 टन का हुआ था। इस दौरान खाद्वय तेलों का आयात 1,175,028 टन का एवं अखाद्य तेलों का आयात 12,040 टन का हुआ है। सोया तेल के आयात में लगातार वृद्धि हुई है, जबकि आरबीडी पामोलीन के आयात में कमी दर्ज की गई।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार चालू तेल वर्ष के पहले सात महीनों नवंबर-24 से मई-25 के दौरान देश में खाद्वय एवं अखाद्य तेलों का आयात 9 फीसदी कम होकर 7,884,768 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले तेल वर्ष की समान अवधि में इनका आयात 8,678,447 टन का हुआ था। हालांकि खाद्य तेलों के आयात के आंकड़ों में नेपाल से आयात हुई मात्रा शामिल नहीं है।

केंद्र सरकार ने 30 मई 2025 को क्रूड खाद्य तेलों जैसे पाम, सोया और सूरजमुखी के आयात शुल्क को 20 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी कर दिया था, जिस कारण कुल आयात शुल्क 27.5 फीसदी से घटकर 16.5 फीसदी रह गया। यह कदम उद्योग, उपभोक्ता और आत्मनिर्भर भारत के व्यापक दृष्टिकोण के मोर्चे पर एक जीत है। क्रूड और रिफाइंड तेलों के बीच 19.25 फीसदी का बढ़ा हुआ शुल्क घरेलू रिफाइनिंग को फिर से मजबूत करेगा, साथ ही सस्ते आयात पर निर्भरता कम करेगा।

सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया केंद्र सरकार के इस निर्णय की सराहना करता है। यह रिफाइंड पाम तेल के आयात में कमरेगा और मांग को वापस क्रूड पाम तेल की ओर ले जाएगा, जिससे घरेलू रिफाइनिंग क्षेत्र को फिर से सहारा मिलेगा। इस कदम से खाद्य तेल के आयात की कुल मात्रा पर कोई असर नहीं पड़ेगा और इससे खाद्य तेल की कीमतों पर कोई दबाव पड़ने की संभावना नहीं है। इसके विपरीत, क्रूड तेल पर शुल्क में कटौती से घरेलू कीमतों में कमी आएगी, जिसका लाभ उपभोक्ताओं को मिलेगा।

चालू तेल वर्ष 2024-25 की पहले सात महीनों नवंबर 24 से मई 25 के दौरान 1,236,581 टन की तुलना में 819,171 टन रिफाइंड तेल (आरबीडी पामोलीन) का आयात किया गया। नवंबर 23 से मई 24 के दौरान 7,331,103 टन की तुलना में 6,858,092 टन क्रूड तेल का आयात किया गया। आरबीडी पामोलीन और सीपीओ के कम आयात के कारण रिफाइंड तेल का अनुपात 14 फीसदी से घटकर 11 फीसदी रह गया, जबकि सोया तेल के आयात में वृद्धि के कारण क्रूड पाम तेल का अनुपात 86 फीसदी से बढ़कर 89 फीसदी हो गया।

एसईए के अनुसार नवंबर 2024 से मई 2025 के दौरान पाम तेल का आयात नवंबर 2023 से मई 2024 के 4,977,233 टन की तुलना में कम होकर 3,329,890 टन का रह गया, जबकि सॉफ्ट तेलों का आयात पिछले साल की समान अवधि के 3,590,452 टन से बढ़कर 4,347,373 टन का हो गया। अत: पाम तेल की हिस्सेदारी 58 फीसदी से घटकर 43 फीसदी की रह गई, जबकि सॉफ्ट तेल की हिस्सेदारी 42 फीसदी से बढ़कर 57 फीसदी की हो गई।

विश्व बाजार में कॉटन के दाम कमजोर होने से घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव

नई दिल्ली। विश्व बाजार में कॉटन की कीमतों में गिरावट आने से घरेलू बाजार में भी इसकी कीमतों पर दबाव बना हुआ है। स्पिनिंग मिलों की मांग कमजोर बनी रहने के कारण बुधवार को गुजरात के साथ ही उत्तर भारत में कॉटन की कीमतों में नरमी आई।


गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव बुधवार को 50 रुपये कमजोर होकर 53,700 से 54,000 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो रह गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव नरम होकर 5,700 से 5,710 रुपये प्रति मन बोले गए।हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव कमजोर होकर 5,510 से 5,570 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 5,690 से 5,760 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के 54,700 से 54,800 रुपये कैंड़ी बोले गए। देशभर की मंडियों में कपास की आवक 16,500 गांठ, एक गांठ-170 किलो की हुई।

आईसीई कॉटन वायदा के भाव में मंगलवार को गिरावट का रुख रहा था। जुलाई-25 वायदा अनुबंध में इसके दाम 0.57 सेंट कमजोर होकर भाव 65.42 सेंट रह गए थे। दिसंबर-25 वायदा अनुबंध में इसके दाम 0.64 सेंट कमजोर होकर 67.71 सेंट रह गए। मार्च-26 वायदा अनुबंध में इसके दाम 0.66 सेंट कमजोर होकर भाव 69.06 सेंट रह गए।

स्पिनिंग मिलों की मांग कमजोर के कारण गुजरात के साथ ही उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन की कीमतों में नरमी आई है। व्यापारी कॉटन के भाव में बड़ी तेजी के पक्ष में नहीं है। विश्व बाजार में पिछले सप्ताह कॉटन की कीमतों में मंदा आया था, जिस कारण स्पिनिंग मिल जरुरत के हिसाब से ही कॉटन की खरीद कर रही है। व्यापारियों के अनुसार चालू सीजन में कपास के उत्पादन में कमी आई थी, लेकिन एक तो घरेलू बाजार से कॉटन के निर्यात में कमी आई है, वहीं दूसरी तरफ चालू सीजन में अभी तक आयात ज्यादा मात्रा में हुआ है। घरेलू बाजार में सीसीआई के पास कॉटन का बंपर स्टॉक मौजूद है। इसलिए घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतों में तेजी, मंदी काफी हद तक सीसीआई के बिक्री भाव पर भी निर्भर करेगी।

गेहूं की सरकारी खरीद 300 लाख टन पर पहुंची, कीमतों में हल्का सुधार

नई दिल्ली। चालू रबी विपणन सीजन 2025-26 में 9 जून 2025 तक देशभर में गेहूं की न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी पर खरीद 300 लाख टन की हो चुकी है। जबकि पिछले साल कुल खरीद 266 लाख टन की ही हुई थी। अधिकांश राज्यों में गेहूं की खरीद बंद हो चुकी है, ऐसे में तय लक्ष्य 322.7 लाख टन से कम रहने की आशंका है।


चालू रबी विपणन सीजन 2025-26 में पंजाब से 119.19 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है जबकि इस दौरान हरियाणा से 72.06 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है। मध्य प्रदेश से चालू रबी में 77.53 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है।

अन्य राज्यों में राजस्थान से 20.60 लाख टन तथा उत्तर प्रदेश से चालू रबी में 10.26 लाख टन तथा बिहार से 18,197 टन गेहूं की सरकारी खरीद ही हुई है। गुजरात से चालू रबी में 3,780 टन तथा एवं हिमाचल प्रदेश से 2,991 टन के अलावा उत्तराखंड से 343 टन गेहूं खरीदा गया है।

दिल्ली में मंगलवार को गेहूं के दाम 5 रुपये तेज होकर भाव 2,730 से 2,735 रुपये प्रति क्विंटल हो गए, तथा इसकी दैनिक आवक 10,000 बोरियों की हुई।

सूत्रों के अनुसार खुले बाजार बिक्री योजना, ओएमएसएस के तहत गेहूं की बिक्री केंद्र सरकार 2,475 से 2,525 रुपये प्रति क्विंटल की दर से कर सकती है, तथा इसकी बिक्री जुलाई या फिर अगस्त में शुरू होने की उम्मीद है उसके बाद ही भाव में मंदे के आसार है।

केंद्र सरकार ने स्टॉकिस्टों, व्यापारियों एवं मिलर्स को हर सप्ताह गेहूं के स्टॉक की जानकारी देना अनिवार्य किया हुआ है, इसके बावजूद भी चालू सीजन में स्टॉकिस्टों ने गेहूं की खरीद बड़ी मात्रा में की है।

चालू रबी विपणन सीजन 2025-26 में केंद्र सरकार ने गेहूं की खरीद का लक्ष्य बढ़ाकर 322.7 लाख टन कर दिया था, जबकि पहले 310 लाख टन की खरीद का लक्ष्य तय किया था। चालू रबी सीजन में पंजाब से 124 लाख टन तथा हरियाणा से 75 लाख टन, मध्य प्रदेश से 60 लाख टन के लक्ष्य को बढ़ाकर 70 लाख टन कर दिया है। उत्तर प्रदेश से 30 लाख टन गेहूं के अलावा राजस्थान से 20 लाख टन और गुजरात से एक लाख टन की खरीद का लक्ष्य तय किया था। बिहार से 2 लाख टन तथा उत्तराखंड से 50 हजार टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य तय किया था।

रबी विपणन सीजन 2024-25 में केंद्र सरकार ने 320 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य किया था, लेकिन खरीद हुई थी केवल 266 लाख टन की ही।

रबी विपणन सीजन 2024-25 के दौरान पंजाब एवं हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश के किसानों से 2,425 रुपये प्रति क्विंटल, एमएसपी की दर से गेहूं की खरीद की गई, जबकि मध्य प्रदेश के साथ ही राजस्थान में राज्य सरकार गेहूं की खरीद पर किसानों को बोनस दिया है।

कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2024-25 में देश में रिकॉर्ड 1175.07 लाख टन गेहूं के उत्पादन का अनुमान है। गेहूं की बुआई रबी सीजन में बढ़कर 326 लाख हेक्टेयर में हुई थी, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 315.6 लाख हेक्टेयर से ज्यादा थी।

07 जून 2025

मिलों की सीमित मांग से कॉटन की कीमतों में मिलाजुला रुख, सीसीआई ने बेची 700 गांठ

नई दिल्ली। स्पिनिंग मिलों की मांग सीमित होने के कारण शुक्रवार को कॉटन की कीमतों में मिलाजुला रुख रहा। सीसीआई ने 700 गांठ, एक गांठ -170 किलो कॉटन की बिक्री की।


गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव शुक्रवार को 50 रुपये तेज होकर 53,800 से 54,100 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो हो गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव नरम होकर 5,700 से 5,710 रुपये प्रति मन बोले गए।हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के 5,530 से 5,580 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम नरम होकर 5,680 से 5,740 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के 54,600 से 54,700 रुपये कैंड़ी बोले गए। देशभर की मंडियों में कपास की आवक 14,200 गांठ, एक गांठ-170 किलो की हुई।

घरेलू वायदा कारोबार में कॉटन की कीमतों में गिरावट का रुख रहा। एनसीडीईएक्स पर अप्रैल 26 महीने के वायदा अनुबंध में कपास के दाम 11 रुपये कमजोर होकर भाव 1,590 रुपये प्रति 20 किलो रह गए। एमसीएक्स पर मई 25 महीने के वायदा अनुबंध में कपास के दाम 500 रुपये कमजोर होकर भाव 53,100 रुपये प्रति कैंडी रह गए। इस दौरान आईसीई के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग में कॉटन शाम के सत्र में नरमी का रुख रहा।

स्पिनिंग मिलों की मांग सुधरने के कारण गुजरात में कॉटन की कीमतों में हल्का सुधार आया, लेकिन उत्तर भारत के राज्यों में स्थिर से नरम हुए। व्यापारी कॉटन के भाव में बड़ी तेजी के पक्ष में नहीं है। विश्व बाजार में हाल ही में कॉटन की कीमतों में मंदा आया है, जिस कारण स्पिनिंग मिल जरुरत के हिसाब से ही कॉटन की खरीद कर रही है। व्यापारियों के अनुसार चालू सीजन में कपास के उत्पादन में कमी आई थी, लेकिन एक तो घरेलू बाजार से कॉटन के निर्यात में कमी आई है, वहीं दूसरी तरफ चालू सीजन में अभी तक आयात ज्यादा मात्रा में हुआ है। घरेलू बाजार में सीसीआई के पास करीब 70 लाख गांठ का स्टॉक बचा हुआ है। इसलिए घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतों में तेजी, मंदी काफी हद तक सीसीआई के बिक्री भाव पर भी निर्भर करेगी।

अप्रैल में कैस्टर तेल के निर्यात में 13 फीसदी की कमी आई - एसईए

नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2025-26 के पहले महीने अप्रैल के दौरान कैस्टर तेल का निर्यात 12.95 फीसदी घटकर 63,373 टन का ही हुआ है जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष के अप्रैल के दौरान इसका निर्यात 72,801 टन का हुआ था।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के अनुसार अप्रैल में मूल्य के हिसाब से कैस्टर तेल का निर्यात घटकर 830.47 करोड़ रुपये का ही हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष के अप्रैल के दौरान इसका निर्यात 881.35 करोड़ रुपये का हुआ था।

व्यापारियों के अनुसार चालू सीजन में बुआई में आई कमी से कैस्टर सीड का उत्पादन कम होने का अनुमान है, तथा उत्पादक मंडियों में नई फसल की आवकों में पहले की तुलना में कमी आई है। ऐसे में जानकारों का मानना है कि आगे इसके भाव में सुधार आयेगा।

गुजरात में कैस्टर सीड के भाव गुरुवार को 1,230 से 1,255 रुपये प्रति 20 किलो पर स्थिर हो गए, तथा दैनिक आवक 75,000 बोरी (1 बोरी 35 किलो) की हुई। राजकोट में कैस्टर तेल कमर्शियल के भाव 5 रुपये तेज होकर 1,285 रुपये और एफएसजी के दाम 5 रुपये बढ़कर 1,295 रुपये प्रति 10 किलो बोले गए।

कृषि मंत्रालय के दूसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2024-25 के दौरान कैस्टर सीड का उत्पादन 17.30 लाख टन ही होने का अनुमान है, जोकि इसके पिछले फसल सीजन के 19.59 लाख टन की तुलना में कम है।

कृषि मंत्रालय के अनुसार खरीफ सीजन में कैस्टर सीड की बुआई 12 फीसदी घटकर केवल 8.67 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।