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07 अप्रैल 2010

डॉलर में गिरावट आने से सोने की रौनक बढ़ी

भले ही विदेश में सोना महंगा हो रहा हो लेकिन रुपया के मुकाबले डॉलर की कमजोरी से सोने के घरेलू भाव में स्थिरता आ गई हैं। पिछले एक माह से सोने के दाम 16500-16700 रुपये प्रति दस ग्राम के दायर में बने हुए हैं। उच्च स्तर 18340 रुपये प्रति दस ग्राम से करीब दो हजार रुपये कम भाव में सोना स्थिर होने से इसकी मांग सुधरने लगी है।मुंबई से बाजार में सोने का दाम मंगलवार को 16,515 रुपये प्रति दस ग्राम रहा। इसी तरह दिल्ली में भाव 16650 रुपये प्रति दस ग्राम रहा। मुंबई की ज्वैलरी फर्म रिद्धिसिद्धि बुलियंस लि। के डायरक्टर पृथ्वीराज कोठारी ने बताय कि सोने की दैनिक बिक्री बढ़कर करीब तीन गुनी हो गई है। इस समय देश के सबसे बड़े ज्वैलरी बाजार मुंबई में रोजाना 600-700 किलो सोने की बिक्री हो रही है। उनका कहना है कि सोने की ताजा मांग निकल रही है। कोठारी का कहना है कि अगर सोने के दाम और गिरते हैं तो मांग बढ़कर 1000-1500 किलो तक पहुंच सकती है। डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार मजबूत हो रहा है। यानि डॉलर का मूल्य गिरकर 18 माह के निचले स्तर पर पहुंच गया है। ऐसे में विदेशी सोना घरेलू बाजार में थोड़ा सस्ता पड़ रहा है। भले ही इससे सोने में बड़ी गिरावट नहीं आई है लेकिन विदेशी बाजार की तेजी के कारण घरेलू बाजार में दाम नहीं बढ़ रहे हैं। घरेलू बाजार में सोना 16300-16700 रुपये प्रति दस ग्राम के दायर में बने रहने की संभावना है। इसके अलावा मई में हिंदुओं की शादियों का सीजन शुरू हो जाएगा। इससे सोने की मांग और बढ़ने की उम्मीद बन गई है।इस साल जनवरी से मार्च के दौरान सोने का आयात 94-96 टन के बीच रहने का अनुमान है जबकि पिछले साल इस अवधि में 22.5 लाख टन सोने का आयात किया गया था। भारत में वैसे प्रत वर्ष 700-800 टन सोने का आयात किया जाता है लेकिन वर्ष 2009 में दाम ऊंचे रहने के कारण आयात घटकर 459 टन रह गया था।बात पते कीडॉलर 18 माह के निचले स्तर पर पहुंच गया है। ऐसे में विदेशी सोना घरेलू बाजार में थोड़ा सस्ता पड़ रहा है। भले ही इससे सोने में गिरावट नहीं आई है लेकिन विदेशी बाजार की तेजी से घरेलू बाजार में दाम नहीं बढ़ रहे हैं। (बिज़नस भास्कर)

यूपी में गेहूं खरीद की तैयारियां पूरी

उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा तय किए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य 1100 रुपये प्रति क्विंटल पर ही गेहूं की खरीद शुरू करने का फैसला किया है। खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के प्रमुख सचिव प्रींसिपल जेकब थॉमस ने बताया कि इस नीति के तहत सरकारी संस्थाएं गेहूं की किसानों से सीधे खरीद करके तुरंत भुगतान करेंगी। राज्य में खरीद 30 जून तक जारी रहेगी। सरकारी अवकाश के दिनों में खरीद केंद्र बंद रहेंगे।थॉमस ने बताया कि राज्य की सरकारी एजेंसियों के जरिये 39 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य तय किया गया है जबकि फूड कॉरपोरशन ऑफ इंडिया एक लाख टन गेहूं की खरीद करेगी। राज्य में गेहूं की सप्लाई के अनुसार लक्ष्य में संशोधन भी किया जा सकता है। सरकारी संस्थाओं द्वारा राज्य में 4406 खरीद केंद्र बनाए गए है, जहाँ से गेहूं की खरीद की जा सकती है।दक्षिणी राज्यों को गेहूं बिक्री जारीनई दिल्ली। केंद्र सरकार ने दक्षिणी राज्यों में खुले बाजार में गेहूं बिक्री योजना की अवधि बढ़ा दी है। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सरकार ने गैर उत्पादक राज्यों में औद्योगिक उपभोक्ता जैसे फ्लोर मिलों को गेहू की बिक्री 30 जून तक जारी रखने का फैसला किया है। कर दी है। यह स्कीम अभी तक मार्च तक के लिए लागू थी। अधिकारी के अनुसार कर्नाटक और तमिलनाडु के अलावा उत्तर-पूर्वी राज्यों में गेहूं की बिक्र जारी रहेगी। इन राज्यों की फ्लोर मिलों के अलावा बिस्कुट, ब्रेड निर्माता खरीद कर सकते हैं। सरकार ने गोदामों में रखे अतिरिक्त गेहूं को निकालने के लिए यह कदम उठाया है। एक अप्रैल से देश के विभिन्न इलाकों में नए गेहूं की खरीद शुरू हो चुकी है। (बिज़नस भास्कर)

बाजार में नहीं चीनी के खरीदार

नई दिल्ली April 06, 2010
चीनी की कीमतों में गिरावट का रुख जारी रहने से उठाव में भी लगातार नरमी बनी हुई है। मांग में कमी से मिलर्स के सामने चीनी बेचने की समस्या खड़ी हो गई है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के छह जिलों की 70 फीसदी चीनी मिलों में गन्ने की पेराई चल रही है। बाकी सभी मिलों में पेराई का काम बंद हो चुका है। 15-20 अप्रैल के बीच उत्तर प्रदेश की सभी चीनी मिलों में पेराई का काम बंद हो जाएगा।
थोक चीनी कारोबारियों के मुताबिक जनवरी-फरवरी माह के दौरान उन्हें चीनी मिलों से माल लेने में कम से कम दो दिन लग जाते थे। अब तो हाथोहाथ मिलों से चीनी की आपूर्ति हो जाती है। जाहिर है चीनी की मांग कम हो गई है और थोक बाजार में उठाव फरवरी के मुकाबले 30-40 फीसदी कम हो गया है।
मुरादाबाद जिले के अयोध्या शुगर मिल के अधिकारी ओमवीर सिंह कहते हैं, 'गर्मी पूरी तरह पड़ने लगी है और इस समय आइसक्रीम का उत्पादन अपने चरम पर होता है। चाकलेट निर्माता भी इस दौरान चीनी की खरीदारी करते हैं। लेकिन इस साल स्थिति बिल्कुल विपरीत है। आइसक्रीम एवं चाकलेट उद्योग से चीनी की मांग उम्मीद के मुकाबले काफी कम निकल रही है।'
चीनी कारोबारियों के मुताबिक गत 15 दिनों से चीनी में नरमी जारी है। चीनी के भाव 3150 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुके हैं। पिछले एक सप्ताह से चीनी के दाम में कमोबेश कोई बदलाव नहीं दर्ज किया गया है। गिरावट के रुख के कारण आइसक्रीम एवं चाकलेट, टॉफी उत्पादकों को चीनी के दाम में अभी और कमी का इंतजार है। इसलिए वे भारी मात्रा में चीनी खरीदने से बच रहे हैं।
कारोबारियों के मुताबिक अभी चीनी का उत्पादन भी जारी है। इससे भी उठाव में सुस्ती को बल मिल रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, गाजियाबाद, मुजफ्फरनगर, बागपत, बिजनौर एवं सहारनपुर की 70 फीसदी मिलों में अभी पेराई का काम जारी है।
इस प्रकार यह अब तय हो गया है कि उत्तर प्रदेश में पिछले साल के मुकाबले 5 लाख टन अधिक चीनी का उत्पादन होगा। इस साल उत्तर प्रदेश में 50 लाख टन से अधिक चीनी उत्पादन का अनुमान है।
कम दाम के बावजूद उठाव सुस्त
आइसक्रीम और चॉकलेट उद्योग से नहीं निकल रही है मांगचीनी खरीदारों को कीमत में और गिरावट की आसपश्चिमी उत्तर प्रदेश के 6 जिलों की 70 फीसदी मिलें अभी चल रही हैंपिछले साल के मुकाबले ज्यादा होगा उत्पादन (बीएस हिंदी)

अब हकीकत में बदलने वाला है डॉयमंड बोर्स का सपना

मुंबई April 06, 2010
करीब दो दशक पहले यह सोचा गया था कि हीरे के बाजार को दक्षिण मुंबई के पंचरत्न से पश्चिम के बाहरी इलाके में बने बांद्रा कुर्ला कॉम्पलेक्स में लाया जाए जो सिंगल विंडो की सुविधा के साथ एक नया कारोबारी केंद्र है।
यह सपना तब हकीकत में बदल गई जब एमएमआरडीए (मुंबई मेट्रोपोलिटन रिजनल डेवलपमेंट ऑथोरिटी) ने आखिरकार अधिकार प्रमाणपत्र 31 मार्च को बोर्स को दे दिया। बोर्स अब अप्रैल के अंत तक अपने सदस्यों से हिस्सेदारी के आवंटन पर विचार-विमर्श करने के लिए तैयार हैं।
उसके बाद सदस्य अपने मौजूदा परिसर को नए लोकेशन पर ले जाएंगे। बोर्स के अध्यक्ष अनूप मेहता को यकीन है कि दो महीने के भीतर नए परिसर में व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाएंगी। करीब 4 महीने में यह परिसर पूरी तरह से भर जाएगा।
आयातित कच्चे हीरे और निर्यात के माल की क्लियरिंग के लिए एक कस्टम ऑफिस बनाने की योजना है। कुछ बैंकों को स्थानीय रूप से परिचालन करना होगा ताकि आयातकों और निर्यातकों के बीच कारोबार के लिए गारंटी पेपर की प्रक्रिया आसानी से पूरी हो सके। इन सभी बाधाओं के बावजूद मेहता का कहना है कि परिसर में व्यावसायिक गतिविधि अब से 6 महीने में सामान्य हो जाएगा।
एमएमआरडीए के डिप्टी मेट्रोपोलिटन कमिश्नर अनिल वानखेड़े ने यह स्पष्ट किया कि अधिकार प्रमाणपत्र जारी किया गया है ताकि बिना किसी देरी के कारोबारी गतिविधियां शुरू हो जाएगी। वैश्विक हीरे के कारोबार में भारत की प्रमुख भूमिका के मद्देनजर विकास एक महत्वपूर्ण कदम है। फिलहाल दुनिया भर के 10 खराब हीरे में से 9 का प्रसंस्करण भारत में होता है।
मेहता का कहना है कि भारत डायमंड बोर्स का अच्छी तरह से विकास करने से भारत में ज्यादा कारोबार की गुंजाइश बनेगी। भारत डायमंड बोर्स की योजना नए दौर के कॉम्प्लेक्स की तरह ही बनाई गई है जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं मौजूद होंगी। इस कॉम्प्लेक्स में 30 बैंकों की योजना बनाई गई है।
इसके अलावा एक कस्टम हाउस की सुविधा भी होगी। सुरक्षा को वैश्विक बाजार के स्तर के मुताबिक ही रखा गया है और करीब 24,500 सेफ डिपोजिट वॉल्ट्स हैं। इस परियोजना की शुरूआत वर्ष 1992 में की गई थी और इसका प्रारंभिक अनुमान 600 करोड़ रुपये का है।
लेकिन बीडीबी कमेटी, आर्किटेक्ट और इसके ठेकेदार के बीच विवाद और सदस्यों द्वारा भुगतान न करने की वजह से यह परियोजना वर्ष 1998 में स्थगित कर दी गई। इसे वर्ष 2001 में फिर से शुरू किया गया।
सूत्रों के मुताबिक आवंटन के बाद भी कई जानकारियों के मुद्दे पर बोर्स के 2,427 सदस्यों की आपस में लड़ाई हो गई। इसी वजह से कई सदस्यों ने लागत के अंतर को देखते हुए भुगतान जारी नहीं किया। इससे कमेटी के सदस्यों के बीच में मतभेद शुरू हो गया।
हालांकि कई सदस्यों ने अपने बकाये की राशि को ब्याज सहित दे दिया है। अब भी 18 लाख वर्ग फुट के योजनागत क्षेत्र में से 14 लाख वर्ग फुट क्षेत्र का आवंटन पहले से ही कर दिया गया है। कुछ क्षेत्र सामान्य उपयोगिता के लिए रखा गया है जिसकी बिक्री नहीं की जाएगी और इसका इस्तेमाल, कस्टम क्षेत्र, कॉन्फ्रें स हॉल और दूसरी सुविधाओं के लिए किया जाएगा।
सदस्यों ने पहले से ही अपने आवंटित क्षेत्र के मुताबिक हिस्सेदारी के प्रमाणपत्र का आवंटन कर दिया गया है जिसमें न्यूनतम 300 वर्ग फीट और अधिकतम 15,000 वर्ग फुट है। बोर्स के उपाध्यक्ष सतीशचंद्र शाह का कहना है, 'अब सारे मतभेद खत्म हो गए हैं और अब हम भारतीय हीरा उद्योग की बेहतरी के लिए एक साथ काम करने के लिए तैयार हैं।'
पहले 20 लाख वर्ग मीटर के कुल कवरेज क्षेत्र के साथ 8 टॉवर का प्रावधान किया गया था ताकि एक ट्रेडिंग हॉल बनाया जा सके जो सदस्यों के लिए एक जरूरी चीज है। कस्टम क्षेत्र करीब 20 हजार वर्गफुट के करीब है। (बीएस हिंदी)

वर्ष 2009-10 में उत्पादन घटा

कोच्चि April 06, 2010
देश में प्राकृतिक रबर के उत्पादन में 2009-10 के दौरान 3.8 प्रतिशत की गिरावट आई है।
कुल उत्पादन पिछले वित्त वर्ष के 8,64,500 टन से घटकर 8,31,400 टन रह गया है। वहीं रबर की खपत में 6.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और यह 8,71,720 टन से बढ़कर 9,30,565 टन हो गया है। इससे पिछले 3-4 साल से इस जिंस की मांग आपूर्ति के बीच में अंतर बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं।
रबर बोर्ड के मुताबिक 2009-10 के दौरान पिछले साल की तुलना में रबर की खपत में बढ़ोतरी की प्रमुख वजह टायर क्षेत्र से बढ़ी हुई मांग है। सीएट, जेके और ब्रिजस्टोन टायर ने उत्पादन क्षमता में विस्तार किया है। साथ ही बिड़ला, अपोलो और टीवीएस श्रीचक्र टायर ने नए संयंत्र स्थापित किए हैं।
बोर्ड का यह भी मानना है कि चालू वित्त वर्ष में भी यही स्थिति बनी रहेगी, जिससे रबर की मांग और आपूर्ति के बीच अंतर और बढ़ेगा। बोर्ड के आरंभिक अनुमानों के मुताबिक देश में 31 मार्च तक रबर का कुल स्टॉक 2,48,000 टन था, जबकि पिछले साल की समान अवधि में रबर का स्टॉक 1,96,230 टन था। लेकिन बोर्ड के यह आंकड़े स्थानीय बाजार की धारणा से मेल नहीं खाते। (बीएस हिंदी)

गेहूं के भाव को लगा घुन

नई दिल्ली April 06, 2010
गेहूं के बीज बोते वक्त किसानों के चेहरों पर जो चमक थी, फसल काटने के बाद वह मुरझा गई है।
दरअसल आवक बढ़ते ही गेहूं के भाव को मंदी के घुन लगना शुरू हो गए। नई फसल आते ही उत्तर प्रदेश की 10 प्रमुख मंडियों में गेहूं के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से भी कम हो गए हैं।
बात उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं है। छत्तीसगढ़ की 4 और पश्चिम बंगाल की 1 मंडी में भी सूरत-ए-हाल ऐसा ही है। पंजाब और हरियाणा के किसान भी इसकी चपेट से बच नहीं पाए हैं और उन्हें भी गेहूं का एमएसपी भर ही मिल पा रहा है।
एमएसपी के पाट
देश भर में गेहूं का एमएसपी इस बार 1,100 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। लेकिन कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) के मुताबिक पिछले 2 दिन में उत्तर प्रदेश में हालत खराब हो गई है।
वहां बिल्सी, चंदौसी, झांसी, ललितपुर, माधोगढ़, पूरनपुर, रायबरेली, सीतापुर, अछलदा और बांगरमऊ मंडियों में किसानों को 1100 रुपये प्रति क्विंटल से कम कीमत पर गेहूं बेचना पड़ रहा है। राज्य के किसानों का कहना है कि मुरादाबाद से इलाहाबाद के बीच लगभग सभी मंडियों में गेहूं की आवक शुरू हो गई है, लेकिन सरकार की तरफ से गेहूं खरीद की कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है।
सरकार की इसी ढिलाई की वजह से मजबूरन किसानों को कम कीमत पर गेहूं बेचना पड़ रहा है। गेहूं की अगैती फसल की कटाई का काम काफी हद तक पूरा हो गया है। ऐसे में हरियाणा की विभिन्न मंडियों में भी 6 अप्रैल को 29000 टन से अधिक गेहूं की आवक हुई।
एपीएमसी की रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से किसी भी मंडी में गेहूं की कीमत 1,100 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर नहीं गई। इसी तरह पंजाब की 8 मंडियों में मंगलवार को गेहूं की लगभग 3000 टन की आवक रही और यहां भी कीमत 1,100 रुपये प्रति क्विंटल बताई गई।
मगर ये तो हैं खुश
अलबत्ता मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसान खुश हैं। इन दोनों राज्यों में उन्हें अच्छा भाव मिल रहा है। मध्य प्रदेश में गेहूं की खरीद 1,200 से 12,70 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर हो रही है और महाराष्ट्र में 1,250 से 1,600 रुपये प्रति क्विंटल पर गेहूं खरीदा जा रहा है।
नई आवक शुरू होते ही दिल्ली की अनाज मंडी में गेहूं दड़ा के भाव 1,150-1,160 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बताए जा रहे हैं। थोक कारोबारियों के मुताबिक निर्यात नहीं खुला तो अगले माह गेहूं के थोक दाम गिरकर 1,130-1,140 रुपये प्रति क्विंटल ही रह जाएंगे।
नहीं मिल रहा भाव
राज्य औसत भावउत्तर प्रदेश 930-1125पंजाब 1100-1105हरियाणा 1100मध्य प्रदेश 1200-1260महाराष्ट्र 1240-1650पश्चिम बंगाल 900-1200भाव रुपये प्रति क्विंटल में स्त्रोत : एपीएमसी (बीएस हिंदी)

रबर की कीमतों में तेजी जारी

कोच्चि April 06, 2010
घरेलू बाजार में प्राकृतिक रबर की कीमतें फिर रफ्तार पकड़ने लगी हैं। बेंचमार्क ग्रेड आरएसएस-4 की कीमतें 160 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गईं।
वहीं कोट्टायम बाजार में सोमवार को कीमतें 161 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गईं। महज तीन सप्ताह के भीतर रबर की कीमतों में 10 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी हुई है। इन कीमतों पर भी स्थानीय बाजार में रबर की बहुत कमी है।
रबर के प्रमुख कारोबारियों का कहना है कि इससे आने वाले दिनों में कीमतों में और बढ़ोतरी के संकेत मिल रहे हैं। प्राकृतिक रबर की बाजार में कमी के पीछे प्रमख वजह उत्पादकों और स्टॉकिस्टों के एक वर्ग द्वारा रबर का भंडारण है। कोच्चि के एक डीलर ने कहा कि जब कीमतें बढ़ रही हों तो ऐसा स्वाभाविक है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी तेजी चल रही है और वैश्विक रूप से कमी प्रमुख समस्या है। सिंगापुर बाजार में सोमवार को रबर की कीमतें 159.29 रुपये प्रति किलो रहीं। इस बढ़ोतरी के चलते केरल में रबर के पेड़ों से टैपिंग का काम भी जोर पकड़ चुका है। राज्य के मध्य और दक्षिणी इलाकों में टैपिंग का काम बहुत तेज है। पिछले सप्ताह बाजार 158 रुपये प्रति किलो पर बंद हुआ था।
इंडियन रबर डीलर्स फेडरेशन (आईआरडीएफ) के अध्यक्ष जार्ज वैली के मुताबिक भविष्य में भी कीमतों में तेजी बने रहने के आसार हैं, क्योंकि घरेलू मांग पूरी करने के लिए घरेलू आपूर्ति का ही सहारा है। मार्च और अप्रैल महीने में गर्मी ज्यादा होने की वजह से उत्पादन कम रहेगा और मई से ताजा स्टॉक आना शुरू होगा। आपूर्ति में कमी का फायदा रबर उत्पादकों को कुछ समय के लिए जरूर मिलेगा।
बहरहाल टैपिंग करने वाले मजदूरों की कमी की वजह से भी उत्पादन प्रभावित हो रहा है। केरल के कुछ हिस्सों में यह एक गंभीर समस्या बन चुकी है। टैपिंग करने वाले मजदूरों ने भवन और सड़कों के निर्माण काम की ओर रुख कर लिया है।
रबर बोर्ड ने टैपिंग करने वाले मजदूरों की सुविधा के लिए एक योजना चलाई है। रबर उत्पादक सोसाइटी के साथ मिलकर टैपर्स बैंक बनाया गया है, जिससे टैपर्स की कमी से बचा जा सके। टैपर्स बैंग, स्वयं सहायता समूह है, जो रबर उत्पादक सोसाइटी के बैनर तले काम करता है। इसमें 20-30 रबर टैपर्स शामिल होते हैं। यह बैंक मजदूरों के काम की सुरक्षा और आकर्षक वेतन मुहैया कराता है। (बीएस हिंदी)