26 मार्च 2010
मुश्किल वक्त में भी सोना चमका
नई दिल्ली / लंदन : सोने की कीमतों में शुक्रवार को घरेलू और विदेशी दोनों बाजारों में मामूली बदलाव देखने को मिला। घरेलू बाजार में सोने जार में खमें जहां थोड़ी तेजी आई, वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में यह मामूली गिरावट के साथ बंद हुआ। शुक्रवार को घरेलू बाजार में सोने की कीमतों में 30 रुपए का मामूली उछाल आया। दिल्ली सर्राफा बाजार में खरीदारी को समर्थन मिलने से सोने का भाव 30 रुपए उछलकर 16,940 रुपए प्रति 10 ग्राम रहा। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में शुक्रवार को सोना यूरो की कमजोरी का शिकार हुआ। डॉलर के मुकाबले यूरो के कमजोर होने से सोने की कीमतों में हल्की गिरावट आई। हालांकि, हालिया कारोबारी सत्रों में सोने ने डॉलर के मजबूत होने के बावजूद जिस तरह से खुद को बड़ी गिरावट से रोक रखा है, उसे देखकर कारोबारी काफी खुश नजर आ रहे हैं। न्यूयॉर्क में शुक्रवार को सोने की हाजिर कीमत 1,120.95 डॉलर प्रति औंस रही जबकि गुरुवार को सोना 1,125.45 डॉलर पर रहा था। इसी तरह से न्यूयॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज के कॉमेक्स डिवीजन पर सोने के अप्रैल फ्यूचर्स का भाव 5.90 डॉलर गिरकर 1,121.60 डॉलर प्रति औंस पर आ गया। एक एनालिस्ट के मुताबिक, 'एक ओर तो डॉलर की मजबूती का सोने पर दबाव बन रहा है जबकि दूसरी ओर बाजार में लगातार निवेशक आ रहे हैं। गोल्ड ने डॉलर की मजबूती के खिलाफ डटने की जबरदस्त क्षमता दिखाई है।' दिल्ली सर्राफा बाजार में स्टैंडर्ड गोल्ड और गहने दोनों के भाव खरीदारी के चलते 30 रुपए चढ़कर क्रमश: 16,940 रुपए और 16,790 रुपए पर पहुंच गए। कारोबारियों के मुताबिक, खरीदारी बाजार में सोने के लिए अच्छा संकेत बनी और इससे इसकी कीमतों में तेजी आई। शुक्रवार को दिल्ली में चांदी पर बिकवाली का दबाव रहा। इसके चलते इसमें 75 रुपए की गिरावट आई। तैयार चांदी की कीमत इस गिरावट के साथ 27,175 रुपए प्रति किलो रही।(इ टी हिंदी)
कृषि उत्पादन के लिए बेहतर तैयारी
नई दिल्ली : साल 2010-11 में कृषि उत्पादन में भारी बढ़ोतरी सुनिश्चित करने के लिए सरकार कोई भी कोर-कसर बाकी नहीं रखना चाहती है। शुरुआती संकेत बता रहे हैं कि साल 2010 में सूखे जैसे हालात नहीं पैदा होंगे। हालांकि सरकार ने सभी तरह के मानसून हालात में खरीफ फसलों का अधिकतम उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए तैयारी शुरू कर दी है। इसके तहत केंद्र ने राज्य सरकारों से बारिश से जुड़ी मुश्किलों से मुकाबला करने के लिए आपातकालीन योजना तैयार करने को कहा है। यहां दो दिनों तक चले खरीफ सम्मेलन में इससे जुड़ी अहम चिंताओं पर विचार किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वोत्तर राज्यों में जल संरक्षण के हालात काफी खराब हैं और ऐसे में इन राज्यों को ज्यादा सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है। इन राज्यों से सिंचाई और बाकी उद्देश्यों के लिए पानी के इस्तेमाल में काफी सावधानी बरतने को कहा गया है। इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा कृषि आंकड़ों के मामले पर खास तवज्जो की उम्मीद है। इसका मकसद प्रमुख फसलों के उत्पादन अनुमानों में होने वाली गड़बड़ी को रोकना और जिला और राज्य स्तर पर उत्पादन आंकड़ों को दुरुस्त करना है। सम्मेलन में कृषि मंत्री शरद पवार ने बताया कि पिछले खरीफ सीजन में आए जबरदस्त सूखे की वजह से अनाजों के उत्पादन और बढ़ोतरी के लक्ष्य को पाने में खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उनके मुताबिक, हालांकि खरीफ फसलों के नुकसान को कम कर और रबी फसलों की जल्दी बुआई के लिए मदद मुहैया कराकर इस संकट से निपटने की यथासंभव कोशिश की गई। साल 2009-10 में फसलों के उत्पादन संबंधी अनुमानों (खासकर शुगर) के बारे में सही वक्त पर जानकारी मुहैया नहीं कराए जाने के लिए उन्होंने राज्य सरकारों को दोषी ठहराते हुए कहा कि इस वजह से ऊंचे उत्पादन के गलत आंकड़े आए, जिसके परिणामस्वरूप चीनी की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला। पवार के मुताबिक, आगामी कृषि वर्ष में 4 फीसदी कृषि विकास दर हासिल करने के लिए तैयारियां जोरों पर हैं और इसके जरिए साल 2009-10 में कृषि उत्पादन में हुई गिरावट की क्षतिपूर्ति करने का प्रयास किया जाएगा। संकेत मिल रहे हैं कि अल नीनो का प्रभाव विकसित हो रहा है और इसके बाद के साल में सामान्यतया सामान्य बारिश होती है। फार्म सचिव पी के बसु ने इस सम्मेलन में किसानों को उचित वक्त पर खाद उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अगले खरीफ सीजन के दौरान उत्पादन बढ़ाने में इसकी भूमिका काफी अहम होगी। बसु ने राज्य सरकारों से न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी पॉलिसी को लागू करने के लिए सभी एहतियाती उपाय करने का अनुरोध किया। न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी पॉलिसी 1 अप्रैल 2010 से लागू होने वाली है। सम्मेलन में मौजूद विशेषज्ञों ने नकली कीटनाशकों के प्रयोग और मिट्टी जांच प्रयोगशालाओं की संख्या में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं होने पर खासी चिंता जताई। (ई टी हिंदी)
23 मार्च 2010
कृषि क्षेत्र को लेकर योजना आयोग गंभीर
नई दिल्ली : योजना आयोग ने कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सुधारों की वकालत की है। आयोग ने उपज बढ़ाने और खाद्यान्न की कीमतों पर काबू पाने की सरकार की मौजूदा रणनीति की कड़ी आलोचना भी की है। आयोग ने कहा है कि कृषि उत्पादों की कीमत तय करने में बाजार से जुड़े पहलू का ज्यादा ध्यान रखा जाना चाहिए और इसके लिए समर्थन मूल्य से खरीद मूल्य का ताल्लुक खत्म करना चाहिए। आयोग ने तमाम शुल्क और भंडार सीमा खत्म करने, देश भर में उत्पादों की बेरोकटोक आवाजाही को बढ़ावा देने और निर्यात तथा वायदा कारोबार पर पाबंदी खत्म करने का मशविरा भी दिया है। 11वीं योजना (2007-12) के मध्यवर्ती समीक्षा में आयोग ने कहा है कि 2005-06 और 2007-08 में कृषि क्षेत्र ने 4 फीसदी की दर से बढ़कर जहां बढि़या प्रदर्शन किया, वहीं पिछले दो साल का इसका प्रदर्शन दिखाता है कि सरकार की रणनीति ज्यादा प्रभावशाली नहीं रही है और इस क्षेत्र की वृद्धि दर बनाए रखने के लिए आपूर्ति के पहलू पर ज्यादा प्रयास किए जाने की जरूरत है। इस समीक्षा को अभी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई में पूर्ण योजना आयोग की ओर से मंगलवार को हरी झंडी दिखाई जानी है। दस्तावेज ने कहा गया है, 'इस बात का पर्याप्त विश्लेषण नहीं किया गया है कि इसका (2005-06 से तीन वर्षों में हासिल वृद्धि) कितना हिस्सा सरकारी रणनीति के तहत कृषि के लिए बढ़े आवंटन के दम पर आया है और कितना अनुकूल मौसम के कारण मिला है। यह भी साफ नहीं है कि इसमें बेहतर मांग और कीमतों के कारण निजी निवेश में बढ़ोतरी का इसमें कितना योगदान रहा है।' खाद्य मुद्रास्फीति दर पर काबू पाने में नाकामी को देखते हुए कृषि क्षेत्र से जुड़ी सरकारी नीतियों की चौतरफा आलोचना हो रही है। खाद्य मुद्रास्फीति दर फिलहाल लगभग 20 फीसदी के स्तर पर है, जो बीते कई वर्षों में नहीं देखा गया था। 2008-09 में कृषि उत्पादन की वृद्धि दर घटकर 1.6 फीसदी रह गई थी जबकि बारिश की पतली हालत के कारण रबी की फसलों की बुरी गत को देखते हुए 2009-10 में वृद्धि दर में 0.2 फीसदी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। सरकार ने अगले कारोबारी साल के लिए कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4 फीसदी पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। कृषि उत्पादन बढ़ाने से जुड़ी 11वीं योजना की रणनीति के तहत खाद्य सुरक्षा की चिंता पर गौर करते हुए आधुनिक तकनीकों तक किसानों की आसान पहुंच बनाने, सरकारी निवेश की मात्रा और उसका प्रभाव बढ़ाने, सब्सिडी को वाजिब बनाते हुए व्यवस्थागत समर्थन बढ़ाने और अधिक कीमत देने वाली फसलों और पशुपालन के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया है। (बीएस हिंदी)
अनुकूल मौसम से लीची उत्पादन बढ़ने का अनुमान
मौसम अनुकूल रहने की वजह से इस बार लीची के उत्पादन में बढ़ोतरी होने का अनुमान है। इसके कारण इस साल गर्मियों में लीची सस्ते मूल्य पर सुलभ होने की संभावना है।लीची उत्पादन में बिहार सबसे बड़ा राज्य है। बिहार स्थित मुजफ्फरपुर के लीची अनुसंधान संस्थान के डायरक्टर के। के. कुमार ने बिजनेस भास्कर को बताया कि पिछले साल अच्छी बारिश होने की वजह से लीची में इस बार फ्लावरिंग (फूल आना) अच्छी रही। साथ ही अभी तक तापमान भी लीची की फसल के लिए अनुकूल रहा है। यही कारण है कि बिहार में इस साल लीची का उत्पादन पिछले साल के मुकाबले 25 फीसदी तक अधिक होने की संभावना है। राज्य में करीब दो लाख टन लीची का उत्पादन हो सकता है। देश में लीची के कुल उत्पादन में 70 फीसदी हिस्सेदारी बिहार की है। बिहार की शाही लीची की विदेशों में भी काफी मांग रहती है।उत्तराखंड के नैनीताल जिले के लीची उत्पादक आर.एस. रंधावा का कहना है कि इस बार मौसम लीची के अनुकूल रहा है। इस वजह से राज्य के लीची उत्पादन में 10 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। उनके मुताबिक लीची क्वालिटी पिछले साल के मुकाबले काफी बेहतर रहने वाली है जो कि उत्पादक और उपभोक्ता दोनो के लिए अच्छी बात है। उत्तराखंड की रोजसेंटेड किस्म की लीची ज्यादा मशहूर है। उत्पादन बढ़ने की वजह से ग्राहकों को राहत मिल सकती है। रंधावा के अनुसार पिछले साल के मुकाबले लीची के दाम 15 फीसदी तक कम रह सकते है। गौरतलब है कि पिछले साल मौसम प्रतिकूल रहने की वजह से देश में इसके उत्पादन में 20 फीसदी की कमी आई थी। पिछले साल देश में करीब 3.36 लाख टन लीची का उत्पादन हुआ था। सबसे अधिक 50 फीसदी कमी बिहार में आई थी। उत्पादन घटने की वजह से लीची की कीमतांे में भारी इजाफा हुआ था। पिछले साल देश में इसके भाव 50-60 रुपये प्रति किलो थे। देश में लीची की पैदावार बिहार, उत्तराखंड, हिमाचल, पश्चिम बंगाल है। भारत का लीची उत्पादन और उत्पादकता दोनों के मामले में विश्व में दूसरा स्थान है। भारतीय लीची के प्रमुख आयातक देश नीदरलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कनाडा, रूस, यमन और लेबनान है। पिछले साल उत्पादन में कमी की वजह से लीची के निर्यात में भारी गिरावट आई थी। (बिज़नस भास्कर)
हफ्ते भर में काली मिर्च के दाम 10 फीसदी बढ़े
देश में काली मिर्च की पैदावार में 11 फीसदी की कमी की आशंका से स्टॉकिस्टों और मसाला निर्माताओं ने इसकी खरीद बढ़ा दी है। इसीलिए पिछले एक सप्ताह में कोच्चि मंडी में इसकी कीमतों में 10।6 फीसदी की तेजी आ चुकी है। कोच्चि में सोमवार को एमजी-वन कालीमिर्च के दाम बढ़कर 14,500 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। एनसीडीईएक्स में भी पिछले दस दिनों में इसके दाम करीब 12.8 फीसदी बढ़ चुके हैं। ऊंचे दाम पर निवेशकों की मुनाफावसूली से आंशिक गिरावट आ सकती है लेकिन भविष्य में कीमतें तेजी ही बनी रहेगी। केदरानाथ संस के डायरक्टर अजय अग्रवाल ने बिजनेस भास्कर को बताया कि काली मिर्च के घरेलू उत्पादन के अनुमान में कमी की आशंका से स्टॉकिस्टों और मसाला निर्माताओं ने खरीद बढ़ा दी है। जनवरी में घरेलू फसल का 50 हजार टन का उत्पादन होने का अनुमान लगाया गया था जबकि देश में 40 हजार टन पैदावार की संभावना है। इसीलिए पिछले एक सप्ताह में कोच्चि मंडी में काली मिर्च के दाम करीब 1,400 रुपये प्रति क्विंटल बढ़े हैं। 15 मार्च को कोच्चि में काली मिर्च का भाव 13,100 रुपये प्रति क्विंटल था। जबकि सोमवार को दाम बढ़कर 14,500 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। निर्यातक फर्म मैसर्स बाफना एंटरप्राइजेज के डायरक्टर आर. जैन ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय काली मिर्च की कीमतें बढ़कर 3400-3450 डॉलर प्रति टन हो गई है जबकि वियतनाम और इंडोनेशियाई की काली मिर्च के भाव 3200-3250 डॉलर प्रति टन है। पिछले ख्म् दिन में विदेशी बाजार में काली मिर्च के दाम करीब 200 डॉलर प्रति टन बढ़ चुके हैं लेकिन भाव में बढ़ोतरी होने के बाद भारत से निर्यात मांग पहले की तुलना में काफी कम हो गई है। वियतनाम में चालू सीजन में काली मिर्च की पैदावार पिछले साल के 90 हजार टन से बढ़कर 1.10 लाख टन होन का अनुमान है जबकि इंडोनेशिया की फसल अगस्त-सितंबर में आएगी। इंडोनेशिया के पास बकाया स्टॉक कम है इसीलिए आयातक वियतनाम से ही ज्यादा खरीद कर रहे हैं। हाजिर कीमतों में तेजी आने से वायदा में भी निवेशकों की खरीद बढ़ गई है। एनसीडीईएक्स पर अप्रैल महीने के वायदा अनुंबध की कीमतों में पिछले दस दिनों में 12.8 फीसदी की तेजी आकर सोमवार को भाव 14,635 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। कमोडिटी विशेषज्ञ अभय लाखवान ने बताया की वायदा में कीमतें एकतरफा बढ़ी है इसलिए निवेशकों की मुनाफावसूली से आंशिक गिरावट आ सकती है। भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार जनवरी महीने में भारत से कालीमिर्च के निर्यात में 28 फीसदी की कमी दर्ज की गई। जनवरी महीने में कालीमिर्च का निर्यात घटकर 1,500 टन का ही हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 2,100 टन का निर्यात हुआ था। चालू वित्त वर्ष के पहले दस महीनों (अप्रैल से जनवरी) के दौरान कुल निर्यात 24.5 फीसदी कम रहा है। इस दौरान कुल निर्यात घटकर 16,250 टन का ही हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 21,550 टन का निर्यात हुआ था। वित्त वर्ष 2009-10 में निर्यात का लक्ष्य 26,000 हजार टन का था। (बिज़नस भास्कर आर अस राणा)
सटोरियों ने बिगाड़ी हल्दी वायदा की चाल
मुंबई March 23, 2010
हल्दी के वायदा कारोबार में जारी भारी उठापटक को एफएमसी का 'कोड़ा' भी रोकने में नाकाम साबित हुआ है।
एफएमसी द्वारा स्पेशल मार्जिन लगाने के बावजूद हल्दी वायदा में अपर सर्किट और लोअर सर्किट का खेल बंद नहीं हो पा रहा है। दो हफ्ते के अंदर हल्दी वायदा में चार बार अपर और चार बार लोअर सर्किट लग चुका है और कीमतों में भी करीब 45 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। सटोरियों की सक्रियता को इसके लिए जिम्मेदार माना जा रहा है।
स्पेशल मार्जिन लगाने के बावजूद सोमवार को बाजार खुलते ही हल्दी अप्रैल और मई वायदा में दो फीसदी का अपर सर्किट लग गया। दोबारा कारोबार शुरू होने के थोड़ी देर बार ही दो फीसदी का लोअर सर्किट लग गया।
दरअसल, पिछले साल सबसे ज्यादा रिटर्न देने की वजह से इस बार हल्दी पर सटोरिये सबसे ज्यादा दांव लगा रहे हैं। वायदा कारोबार का असर हाजिर बाजार में भी देखने को मिल रहा है। हल्दी की सबसे बड़ी मंड़ी निजामाबाद (आंध्र प्रदेश) में सोमवार को हल्दी के दाम प्रति क्विंटल 544 रुपये उछलकर 11920 रुपये पर पहुंच गए, जबकि वायदा बाजार में हल्दी का भाव 11730 रुपये के आसपास रहा।
सटोरियों की सक्रियता को देखते हुए वायदा बाजार नियामक ने इसके कारोबार पर मार्जिन बढ़ा दिया। हल्दी वायदा में 13 फीसदी का मार्जिन देना होता है लेकिन कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए एफएमसी ने चार फरवरी को हल्दी वायदा में 10 फीसदी का अतिरिक्त मार्जिन लगा दिया।
एफएमसी का यह वार भी कारगर साबित नहीं हुआ तो 18 मार्च को एफएमसी ने दोबारा हल्दी वायदा में 10 फीसदी का और मार्जिन लगाने का फैसला किया। इस तरह इस समय हल्दी वायदा में कुल 33 फीसदी का मार्जिन लग चुका है। इसके बावजूद एक ही दिन में अपर और लोअर सर्किट लगने को कारोबारी चिंता का विषय मान रहे हैं।
हल्दी वायदा भाव इस समय 11730 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास है जबकि 13 मार्च को हल्दी अप्रैल 8770 रुपये पर था। शेयरखान कमोडिटी हेड मेहुल अग्रवाल के अनुसार, पिछले साल हल्दी की पैदावार कम थी जिससे बाजार में हल्दी कीमतें आसमान पर पहुंच गई थी। पिछले साल नवंबर में हल्दी 12400 रुपये के स्तर तक पहुंच गई थी।
इस साल 12000 के स्तर को छूने के बाद हल्दी के भाव नीचे गिरेंगे। मेहुल कहते हैं कि पिछले साल करीब 40 लाख बैग हल्दी का उत्पादन हुआ था और इस बार 52 लाख बैग का उत्पादन होने की उम्मीद है। हल्दी वायदा कारोबार में एक लॉट 10 टन का होता है और इस समय 33 फीसदी का मार्जिन लगा हुआ है।
भारी मार्जिन मनी को देखते हुए सटोरिये भी रिस्क लेने के पहले सौ बार सोचेंगे, क्योंकि नई फसल बाजार में आने का समय भी हो चुका है। बाजार के जानकारों का कहना है कि पिछले बार जब हल्दी की कीमतें बढ़ी थी तो सबसे ज्यादा सट्टा सांगली के कारोबारियों ने लगाया था जबकि इस बार राजस्थान के सटोरिये सक्रिय हैं। (बीएस हिंदी)
हल्दी के वायदा कारोबार में जारी भारी उठापटक को एफएमसी का 'कोड़ा' भी रोकने में नाकाम साबित हुआ है।
एफएमसी द्वारा स्पेशल मार्जिन लगाने के बावजूद हल्दी वायदा में अपर सर्किट और लोअर सर्किट का खेल बंद नहीं हो पा रहा है। दो हफ्ते के अंदर हल्दी वायदा में चार बार अपर और चार बार लोअर सर्किट लग चुका है और कीमतों में भी करीब 45 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। सटोरियों की सक्रियता को इसके लिए जिम्मेदार माना जा रहा है।
स्पेशल मार्जिन लगाने के बावजूद सोमवार को बाजार खुलते ही हल्दी अप्रैल और मई वायदा में दो फीसदी का अपर सर्किट लग गया। दोबारा कारोबार शुरू होने के थोड़ी देर बार ही दो फीसदी का लोअर सर्किट लग गया।
दरअसल, पिछले साल सबसे ज्यादा रिटर्न देने की वजह से इस बार हल्दी पर सटोरिये सबसे ज्यादा दांव लगा रहे हैं। वायदा कारोबार का असर हाजिर बाजार में भी देखने को मिल रहा है। हल्दी की सबसे बड़ी मंड़ी निजामाबाद (आंध्र प्रदेश) में सोमवार को हल्दी के दाम प्रति क्विंटल 544 रुपये उछलकर 11920 रुपये पर पहुंच गए, जबकि वायदा बाजार में हल्दी का भाव 11730 रुपये के आसपास रहा।
सटोरियों की सक्रियता को देखते हुए वायदा बाजार नियामक ने इसके कारोबार पर मार्जिन बढ़ा दिया। हल्दी वायदा में 13 फीसदी का मार्जिन देना होता है लेकिन कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए एफएमसी ने चार फरवरी को हल्दी वायदा में 10 फीसदी का अतिरिक्त मार्जिन लगा दिया।
एफएमसी का यह वार भी कारगर साबित नहीं हुआ तो 18 मार्च को एफएमसी ने दोबारा हल्दी वायदा में 10 फीसदी का और मार्जिन लगाने का फैसला किया। इस तरह इस समय हल्दी वायदा में कुल 33 फीसदी का मार्जिन लग चुका है। इसके बावजूद एक ही दिन में अपर और लोअर सर्किट लगने को कारोबारी चिंता का विषय मान रहे हैं।
हल्दी वायदा भाव इस समय 11730 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास है जबकि 13 मार्च को हल्दी अप्रैल 8770 रुपये पर था। शेयरखान कमोडिटी हेड मेहुल अग्रवाल के अनुसार, पिछले साल हल्दी की पैदावार कम थी जिससे बाजार में हल्दी कीमतें आसमान पर पहुंच गई थी। पिछले साल नवंबर में हल्दी 12400 रुपये के स्तर तक पहुंच गई थी।
इस साल 12000 के स्तर को छूने के बाद हल्दी के भाव नीचे गिरेंगे। मेहुल कहते हैं कि पिछले साल करीब 40 लाख बैग हल्दी का उत्पादन हुआ था और इस बार 52 लाख बैग का उत्पादन होने की उम्मीद है। हल्दी वायदा कारोबार में एक लॉट 10 टन का होता है और इस समय 33 फीसदी का मार्जिन लगा हुआ है।
भारी मार्जिन मनी को देखते हुए सटोरिये भी रिस्क लेने के पहले सौ बार सोचेंगे, क्योंकि नई फसल बाजार में आने का समय भी हो चुका है। बाजार के जानकारों का कहना है कि पिछले बार जब हल्दी की कीमतें बढ़ी थी तो सबसे ज्यादा सट्टा सांगली के कारोबारियों ने लगाया था जबकि इस बार राजस्थान के सटोरिये सक्रिय हैं। (बीएस हिंदी)
बिकवाली दबाव के चलते सोने में गिरावट जारी
नई दिल्ली March 23, 2010
कमजोर वैश्विक रुख के बीच बिकवाली के दबाव के चलते दिल्ली सर्राफा बाजार में सोमवार को सोने के भाव 10 रुपये टूटकर 16650 रुपये प्रति दस ग्राम बोले गए।
सोना स्टैंडर्ड और आभूषण के भाव 10 रुपये की गिरावट के साथ क्रमश: 16650 रुपये और 16500 रुपये प्रति दस ग्राम पर बंद हुए। सीमित कारोबार के दौरान गिन्नी के भाव 14000 रुपये प्रति आठ ग्राम पर अपरिवर्तित बंद हुए।
बाजार सूत्रों के अनुसार वैश्विक मंदी के बीच भारी बिकवाली दबाव के चलते सोने में गिरावट आई। एशिया में सोने के भाव 1.50 डॉलर गिरकर 1106.40 डॉलर प्रति आउंस रह गए। मौसमी मांग नहीं होने के कारण फुटकर कारोबारियों ने मौजूदा ऊंची कीमत पर खरीदारी नहीं की।
बिकवाली दबाव के चलते चांदी तैयार के भाव 200 रुपये की गिरावट के साथ 26800 रुपये और चांदी साप्ताहिक डिलिवरी के भाव 115 रुपये की हानि के साथ 26485 रुपये प्रति किलो पर बंद हुए।
चांदी सिक्का के भाव 100 रुपये टूटकर 33200-33300 रुपये प्रति सैकड़े पर बंद हुए। बाजार के जानकारों का कहना है कि मई के आखिरी सप्ताह में जब शादी-ब्याह का सीजन शुरू होगा तब इसमें तेजी देखने को मिल सकती है। (बीएस हिंदी)
कमजोर वैश्विक रुख के बीच बिकवाली के दबाव के चलते दिल्ली सर्राफा बाजार में सोमवार को सोने के भाव 10 रुपये टूटकर 16650 रुपये प्रति दस ग्राम बोले गए।
सोना स्टैंडर्ड और आभूषण के भाव 10 रुपये की गिरावट के साथ क्रमश: 16650 रुपये और 16500 रुपये प्रति दस ग्राम पर बंद हुए। सीमित कारोबार के दौरान गिन्नी के भाव 14000 रुपये प्रति आठ ग्राम पर अपरिवर्तित बंद हुए।
बाजार सूत्रों के अनुसार वैश्विक मंदी के बीच भारी बिकवाली दबाव के चलते सोने में गिरावट आई। एशिया में सोने के भाव 1.50 डॉलर गिरकर 1106.40 डॉलर प्रति आउंस रह गए। मौसमी मांग नहीं होने के कारण फुटकर कारोबारियों ने मौजूदा ऊंची कीमत पर खरीदारी नहीं की।
बिकवाली दबाव के चलते चांदी तैयार के भाव 200 रुपये की गिरावट के साथ 26800 रुपये और चांदी साप्ताहिक डिलिवरी के भाव 115 रुपये की हानि के साथ 26485 रुपये प्रति किलो पर बंद हुए।
चांदी सिक्का के भाव 100 रुपये टूटकर 33200-33300 रुपये प्रति सैकड़े पर बंद हुए। बाजार के जानकारों का कहना है कि मई के आखिरी सप्ताह में जब शादी-ब्याह का सीजन शुरू होगा तब इसमें तेजी देखने को मिल सकती है। (बीएस हिंदी)
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