23 मार्च 2010
कृषि क्षेत्र को लेकर योजना आयोग गंभीर
नई दिल्ली : योजना आयोग ने कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सुधारों की वकालत की है। आयोग ने उपज बढ़ाने और खाद्यान्न की कीमतों पर काबू पाने की सरकार की मौजूदा रणनीति की कड़ी आलोचना भी की है। आयोग ने कहा है कि कृषि उत्पादों की कीमत तय करने में बाजार से जुड़े पहलू का ज्यादा ध्यान रखा जाना चाहिए और इसके लिए समर्थन मूल्य से खरीद मूल्य का ताल्लुक खत्म करना चाहिए। आयोग ने तमाम शुल्क और भंडार सीमा खत्म करने, देश भर में उत्पादों की बेरोकटोक आवाजाही को बढ़ावा देने और निर्यात तथा वायदा कारोबार पर पाबंदी खत्म करने का मशविरा भी दिया है। 11वीं योजना (2007-12) के मध्यवर्ती समीक्षा में आयोग ने कहा है कि 2005-06 और 2007-08 में कृषि क्षेत्र ने 4 फीसदी की दर से बढ़कर जहां बढि़या प्रदर्शन किया, वहीं पिछले दो साल का इसका प्रदर्शन दिखाता है कि सरकार की रणनीति ज्यादा प्रभावशाली नहीं रही है और इस क्षेत्र की वृद्धि दर बनाए रखने के लिए आपूर्ति के पहलू पर ज्यादा प्रयास किए जाने की जरूरत है। इस समीक्षा को अभी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई में पूर्ण योजना आयोग की ओर से मंगलवार को हरी झंडी दिखाई जानी है। दस्तावेज ने कहा गया है, 'इस बात का पर्याप्त विश्लेषण नहीं किया गया है कि इसका (2005-06 से तीन वर्षों में हासिल वृद्धि) कितना हिस्सा सरकारी रणनीति के तहत कृषि के लिए बढ़े आवंटन के दम पर आया है और कितना अनुकूल मौसम के कारण मिला है। यह भी साफ नहीं है कि इसमें बेहतर मांग और कीमतों के कारण निजी निवेश में बढ़ोतरी का इसमें कितना योगदान रहा है।' खाद्य मुद्रास्फीति दर पर काबू पाने में नाकामी को देखते हुए कृषि क्षेत्र से जुड़ी सरकारी नीतियों की चौतरफा आलोचना हो रही है। खाद्य मुद्रास्फीति दर फिलहाल लगभग 20 फीसदी के स्तर पर है, जो बीते कई वर्षों में नहीं देखा गया था। 2008-09 में कृषि उत्पादन की वृद्धि दर घटकर 1.6 फीसदी रह गई थी जबकि बारिश की पतली हालत के कारण रबी की फसलों की बुरी गत को देखते हुए 2009-10 में वृद्धि दर में 0.2 फीसदी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। सरकार ने अगले कारोबारी साल के लिए कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4 फीसदी पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। कृषि उत्पादन बढ़ाने से जुड़ी 11वीं योजना की रणनीति के तहत खाद्य सुरक्षा की चिंता पर गौर करते हुए आधुनिक तकनीकों तक किसानों की आसान पहुंच बनाने, सरकारी निवेश की मात्रा और उसका प्रभाव बढ़ाने, सब्सिडी को वाजिब बनाते हुए व्यवस्थागत समर्थन बढ़ाने और अधिक कीमत देने वाली फसलों और पशुपालन के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया है। (बीएस हिंदी)
चीनी उद्योग ने लगाई संरक्षण की गुहार
मुंबई March 23, 2010
चीनी की कीमतों में नाटकीय रूप से आई गिरावट के चलते चीनी का उत्पादन करने वाली कंपनियों का मुनाफा घट रहा है, इसे देखते हुए चीनी उद्योग ने तत्काल सरकारी संरक्षण की गुहार लगाई है।
उद्योग के सर्वोच्च निकाय भारतीय चीनी उत्पादक संघ (इस्मा) ने कृषि मंत्रालय को पत्र लिखा है। इस चिट्ठी में कुछ सुझाव पेश किए गए हैं। इस्मा ने कहा है कि बड़ी मात्रा में चीनी इस्तेमाल करने वालों को इसका स्टॉक लंबी अवधि तक रखने की अनुमति दी जाए, कच्ची रिफाइंड चीनी पर आयात शुल्क लगाया जाए और चीनी की गिरती कीमतों को थामने के लिए निर्यात की अनुमति दी जाए।
इस्मा के अध्यक्ष और बलरामपुर चीनी के प्रबंध निदेशक विवेक सरावगी ने कहा - कई ऐसे मुद्दे हैं जो चीनी उत्पादकों के हितों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, लिहाजा इसे तत्काल सुलझाने की दरकार है। सरकार ने हाल में कोल्ड ड्रिंक निर्माता समेत बड़े कॉरपोरेट उपभोक्ताओं को सिर्फ 10 दिन की जरूरत के बराबर चीनी का स्टॉक रखने की अनुमति दी है जबकि इस आदेश से पहले ये उपभोक्ता एक महीने से ज्यादा की जरूरत के बराबर स्टॉक अपने पास रखते थे।
इस्मा की मांग है कि चीनी मिलों से उनके सालाना उत्पादन का 20 फीसदी लेवी कोटा तत्काल हटाया जाना चाहिए, जो कि उन्हें मौजूदा बाजार कीमत से करीब 60 फीसदी कम कीमत पर देना पड़ता है।
इससे पहले, जन वितरण प्रणाली के लिए 13.45 रुपये प्रति किलो की दर से लेवी कोटा की चीनी दी जाती थी और अगर कारोबारियों व स्टॉकिस्टों द्वारा पूरा माल नहीं उठाया जाता था तो यह मात्रा स्वत: ही फ्री कोटे में तब्दील हो जाती थी और चीनी मिलों के लिए यह काफी अच्छा होता था।
जब से सरकार ने लेवी कोटा के प्रावधान में संशोधन कर इसे साप्ताहिक रोलओवर का कर दिया है, चीनी मिल आर्थिक दबाव से जूझ रहे हैं। यह इकलौता ऐसा उद्योग है जो अपने उत्पादन का महत्वपूर्ण हिस्से की आपूर्ति पीडीएस के लिए करता है, जबकि बाकी अन्य उद्योगों के साथ ऐसी कोई बात नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी उद्योग में साप्ताहिक कोटा रिलीज सिस्टम को पिछले साल की तरह महीनेवार रिलीज में तब्दील किए जाने की बेहद जरूरत है। हाजिर बाजार में उतार-चढ़ाव होने पर चीनी मिल पहले अपने जोखिम को कम करने के लिए वायदा एक्सचेंज में हेजिंग करते थे।
चूंकि वायदा एक्सचेंज से इस उपकरण को हटा लिया गया है तो ऐसे में मिलों के पास कोई विकल्प नहीं बचा है। उचित व लाभकारी मूल्य (एफआरपी) के जरिए कच्चे माल की कीमत तय करना और पहले से तय पूर्ण नियंत्रित दर पर इसे बेचने के बजाय गन्ने की कीमत को चीनी की कीमत के अनुपात में तय किया जाना चाहिए।
जब जनवरी महीने की शुरुआत में चीनी की कीमत (एक्स-मिल) 42 रुपये प्रति किलो की ऊंची दर पर थी तब सरकार ने इसकी कीमत में कमी लाने के लिए विभिन्न कदम उठाए थे। अब यह मकसद हल हो गया है और चीनी की कीमत 32 रुपये प्रति किलो की उचित दर पर पहुंच गई है तो इस उद्योग के लिए संरक्षणवादी कदम उठाए जाने की दरकार है ताकि लंबे समय तय यह उद्योग टिका रहे। इस बीच, गन्ने की कीमत कम नहीं हुई है।
चीनी के सबसे बड़े उत्पादक राज्य महाराष्ट्र की मिलें वर्तमान में गन्ने की कीमत 275-300 रुपये प्रति क्विंटल चुका रही हैं जबकि उत्तर प्रदेश में गन्ना 260-280 रुपये प्रति क्विंटल पर उपलब्ध है। उद्योग का अनुमान है कि इस साल 168 लाख टन चीनी का उत्पादन होगा। पिछले साल 147 लाख टन चीनी उत्पादित हुई थी।
सरावगी ने कहा - स्थायी कारोबारी हित के लिए उद्योग की जरूरतों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर किसानों के बकाया राशि का भुगतान न होना और गन्ने की पराई के अव्यवहार्य होने के मामले से इनकार नहीं किया जा सकता।
गिरती कीमतों से उद्योग परेशान
भारतीय चीनी उत्पादक संघ ने कृषि मंत्रालय को पत्र लिख सुझाए उपाय इस्मा ने लंबी अवधि के लिए स्टॉक रखने, आयात शुल्क लगाने और निर्यात के लिए मांगी अनुमति कीमतें 32 रुपये प्रति किलो तक गिर चुकी हैं (बीस हिंदी)
चीनी की कीमतों में नाटकीय रूप से आई गिरावट के चलते चीनी का उत्पादन करने वाली कंपनियों का मुनाफा घट रहा है, इसे देखते हुए चीनी उद्योग ने तत्काल सरकारी संरक्षण की गुहार लगाई है।
उद्योग के सर्वोच्च निकाय भारतीय चीनी उत्पादक संघ (इस्मा) ने कृषि मंत्रालय को पत्र लिखा है। इस चिट्ठी में कुछ सुझाव पेश किए गए हैं। इस्मा ने कहा है कि बड़ी मात्रा में चीनी इस्तेमाल करने वालों को इसका स्टॉक लंबी अवधि तक रखने की अनुमति दी जाए, कच्ची रिफाइंड चीनी पर आयात शुल्क लगाया जाए और चीनी की गिरती कीमतों को थामने के लिए निर्यात की अनुमति दी जाए।
इस्मा के अध्यक्ष और बलरामपुर चीनी के प्रबंध निदेशक विवेक सरावगी ने कहा - कई ऐसे मुद्दे हैं जो चीनी उत्पादकों के हितों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, लिहाजा इसे तत्काल सुलझाने की दरकार है। सरकार ने हाल में कोल्ड ड्रिंक निर्माता समेत बड़े कॉरपोरेट उपभोक्ताओं को सिर्फ 10 दिन की जरूरत के बराबर चीनी का स्टॉक रखने की अनुमति दी है जबकि इस आदेश से पहले ये उपभोक्ता एक महीने से ज्यादा की जरूरत के बराबर स्टॉक अपने पास रखते थे।
इस्मा की मांग है कि चीनी मिलों से उनके सालाना उत्पादन का 20 फीसदी लेवी कोटा तत्काल हटाया जाना चाहिए, जो कि उन्हें मौजूदा बाजार कीमत से करीब 60 फीसदी कम कीमत पर देना पड़ता है।
इससे पहले, जन वितरण प्रणाली के लिए 13.45 रुपये प्रति किलो की दर से लेवी कोटा की चीनी दी जाती थी और अगर कारोबारियों व स्टॉकिस्टों द्वारा पूरा माल नहीं उठाया जाता था तो यह मात्रा स्वत: ही फ्री कोटे में तब्दील हो जाती थी और चीनी मिलों के लिए यह काफी अच्छा होता था।
जब से सरकार ने लेवी कोटा के प्रावधान में संशोधन कर इसे साप्ताहिक रोलओवर का कर दिया है, चीनी मिल आर्थिक दबाव से जूझ रहे हैं। यह इकलौता ऐसा उद्योग है जो अपने उत्पादन का महत्वपूर्ण हिस्से की आपूर्ति पीडीएस के लिए करता है, जबकि बाकी अन्य उद्योगों के साथ ऐसी कोई बात नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी उद्योग में साप्ताहिक कोटा रिलीज सिस्टम को पिछले साल की तरह महीनेवार रिलीज में तब्दील किए जाने की बेहद जरूरत है। हाजिर बाजार में उतार-चढ़ाव होने पर चीनी मिल पहले अपने जोखिम को कम करने के लिए वायदा एक्सचेंज में हेजिंग करते थे।
चूंकि वायदा एक्सचेंज से इस उपकरण को हटा लिया गया है तो ऐसे में मिलों के पास कोई विकल्प नहीं बचा है। उचित व लाभकारी मूल्य (एफआरपी) के जरिए कच्चे माल की कीमत तय करना और पहले से तय पूर्ण नियंत्रित दर पर इसे बेचने के बजाय गन्ने की कीमत को चीनी की कीमत के अनुपात में तय किया जाना चाहिए।
जब जनवरी महीने की शुरुआत में चीनी की कीमत (एक्स-मिल) 42 रुपये प्रति किलो की ऊंची दर पर थी तब सरकार ने इसकी कीमत में कमी लाने के लिए विभिन्न कदम उठाए थे। अब यह मकसद हल हो गया है और चीनी की कीमत 32 रुपये प्रति किलो की उचित दर पर पहुंच गई है तो इस उद्योग के लिए संरक्षणवादी कदम उठाए जाने की दरकार है ताकि लंबे समय तय यह उद्योग टिका रहे। इस बीच, गन्ने की कीमत कम नहीं हुई है।
चीनी के सबसे बड़े उत्पादक राज्य महाराष्ट्र की मिलें वर्तमान में गन्ने की कीमत 275-300 रुपये प्रति क्विंटल चुका रही हैं जबकि उत्तर प्रदेश में गन्ना 260-280 रुपये प्रति क्विंटल पर उपलब्ध है। उद्योग का अनुमान है कि इस साल 168 लाख टन चीनी का उत्पादन होगा। पिछले साल 147 लाख टन चीनी उत्पादित हुई थी।
सरावगी ने कहा - स्थायी कारोबारी हित के लिए उद्योग की जरूरतों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर किसानों के बकाया राशि का भुगतान न होना और गन्ने की पराई के अव्यवहार्य होने के मामले से इनकार नहीं किया जा सकता।
गिरती कीमतों से उद्योग परेशान
भारतीय चीनी उत्पादक संघ ने कृषि मंत्रालय को पत्र लिख सुझाए उपाय इस्मा ने लंबी अवधि के लिए स्टॉक रखने, आयात शुल्क लगाने और निर्यात के लिए मांगी अनुमति कीमतें 32 रुपये प्रति किलो तक गिर चुकी हैं (बीस हिंदी)
22 मार्च 2010
आवक बढ़ने से लाल मिर्च के दाम और गिरने के आसार
गुंटूर में लाल मिर्च की आवक बढ़कर 80-90 हजार बोरी (प्रति बोरी 40 किलो) की हो गई है। जबकि निर्यातकों और मसाला निर्माता कंपनियों की मांग पहले की तुलना में कम हो गई है। जिससे पिछले एक सप्ताह में हाजिर बाजार में आठ फीसदी और वायदा में 6।7 फीसदी की नरमी आई है। आगामी दिनों में आवक बढ़ने पर मौजूदा कीमतों में और भी मंदे की संभावना है। मैसर्स स्पाइस ट्रेडिंग कंपनी के प्रोपराइटर विनय भूभना ने बताया कि गुंटूर में लाल मिर्च की दैनिक आवक बढ़कर 80-90 हजार बोरी की हो गई है। उत्पादक क्षेत्रों में मौसम साफ बना हुआ है इसलिए आगामी दिनों में आवक बढ़कर एक लाख बोरी से ज्यादा हो जाएगी। जिससे मौजूदा कीमतों में और भी मंदे की ही संभावना है। हाजिर बाजार में पिछले आठ-नौ दिनों में कीमतें करीब 400 रुपये प्रति क्विंटल घट चुकी हैं। गुंटूर में तेजा क्वालिटी की लाल मिर्च के भाव घटकर 5200-5400 रुपये, 334 क्वालिटी की लालमिर्च के भाव 4100-4500 रुपये, ब्याडगी क्वालिटी के भाव 4100-4700 रुपये, सनम क्वालिटी की लालमिर्च के भाव 4200-4300 रुपये और फटकी क्वालिटी के भाव 2000-2500 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। मुंबई स्थित मैसर्स अशोक एंड कंपनी के डायरक्टर अशोक दत्तानी ने बताया कि पिछले महीने तक निर्यात मांग अच्छी बनी हुई थी लेकिन आवक बढ़ने और डॉलर कमजोर होने से चालू महीने में निर्यातकों की मांग कमजोर हो गई है। जिससे घरलू बाजार में गिरावट को बल मिला है। भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार चालू वित्त वर्ष के पहले दस महीनों (अप्रैल से जनवरी) के दौरान लाल मिर्च का निर्यात पिछले साल की तुलना में कम रहा है। चालू वित्त वर्ष के अप्रैल से जनवरी के दौरान कुल निर्यात 1.56 लाख टन का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 1.57 लाख टन का निर्यात हुआ था। हालांकि जनवरी में भारत से लाल मिर्च के निर्यात में 52 फीसदी की तेजी आकर कुल निर्यात 17,500 टन का हुआ। जबकि पिछले साल जनवरी में मात्र 11,500 टन का ही निर्यात हुआ था। दत्तानी ने बताया कि मार्च और अप्रैल में निर्यात मांग कमजोर रहेगी। मई के बाद फिर निर्यात मांग बढ़ने के आसार हैं। गुंटूर के व्यापारी कमलैश जैन ने बताया कि कीमतों में गिरावट आने से स्टॉक बढ़ना शुरू हो गया है। किसान घटे भाव में बिकवाली कम करके स्टॉक में ज्यादा माल रख रहे हैं। अभी तक कोल्ड स्टोर में करीब 20 लाख बोरी का स्टॉक हो चुका है जोकि पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले आठ लाख बोरी ज्यादा है। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश में अभी लाल मिर्च की आवक बनी हुई है जिससे उत्तर भारत की मांग भी कमजोर है। मई में मध्य प्रदेश में आवक समाप्त होने के बाद आंध्र प्रदेश से मांग बढ़ने की संभावना है। एनसीडीईएक्स पर अप्रैल महीने के वायदा अनुबंध के भाव 11 मार्च को 5,229 रुपये प्रति क्विंटल थे जोकि घटकर 4,875 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। (बिज़नस भास्कर...आर अस राणा)
नई फसल से पहले मेंथा तेल में तेजी के आसार
मेंथा की नई फसल की आवक मई के आखिरी सप्ताह में शुरू होने की संभावना है। जबकि इस समय अमेरिका और यूरोप की मांग अच्छी बनी हुई है। उत्पादक मंडियों में मेंथा तेल का स्टॉक कम होने से आवक पहले की तुलना में घट गई है। इसलिए मौजूदा कीमतों में आगामी दिनों में करीब पांच फीसदी की तेजी आने की संभावना है।अमेरिका और यूरोप के आयातक क्रिस्टल बोल्ड के आयात सौदे 15 से 15।50 डॉलर प्रति किलो (सीएंडएफ) के भाव पर कर रहे हैं। घरलू बाजार में मेंथा उत्पादों का बकाया स्टॉक मात्र 25-30 फीसदी ही बचा हुआ है। जबकि नई फसल की आवक मई के आखिरी सप्ताह में शुरू होगी तथा आवक का दबाव जून में बढ़ेगा। चूंकि ज्यादातर माल बड़े स्टॉकिस्टों के पास है इसीलिए उनकी बिकवाली भी कम आ रही है। जिससे मेंथा उत्पादों में तेजी का बल मिल रहा है। हालांकि चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों (अप्रैल से दिसंबर) के दौरान भारत से मेंथा उत्पादों का निर्यात 19 फीसद कम रहा है लेकिन चालू महीने में निर्यातकों की खरीद बढ़ी है। अप्रैल में भी निर्यातकों की मांग बराबर बनी रहने की संभावना है। गत वर्ष देश में मेंथा तेल का कुल उत्पादन 30 हजार टन रहा था। चालू सीजन में बुवाई पिछले साल के लगभग बराबर ही है तथा अभी तक मौसम भी फसल के अनुकूल ही रहा है। हालांकि अब उत्पादक मंडियों में पिछले सीजन के मेंथा तेल की आवक पहले की तुलना में कम हो गई है जिससे मौजूदा भावों में 25-30 रुपये प्रति किलो की तेजी आ सकती है। वर्तमान में उत्पादक मंडियों में मेंथा तेल की दैनिक आवक घटकर 100-150 ड्रम (प्रति ड्रम 180 किलो) रह गई है। जबकि जनवरी-फरवरी महीनों में दैनिक आवक 200 से 250 ड्रमों की हो रही थी। मेंथा तेल के भाव उत्पादक मंडियों में 660 रुपये प्रति किलो चल रहे हैं। जबकि क्रिस्टल बोल्ड के दाम 740 रुपये प्रति किलो चल रहे हैं। हालांकि वायदा बाजार में निवेशकों की मुनाफावसूली आने से मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) में अप्रैल महीने के वायदा अनुबंध में पिछले एक सप्ताह में करीब सात रुपये प्रति किलो की गिरावट आई है।13 मार्च को अप्रैल महीने के वायदा अनुबंध में मेंथा तेला का दाम 608 रुपये प्रति किलो था। जबकि शानिवार को इसका भाव घटकर 601 रुपये प्रति किलो रह गया। हाजिर में दाम बढ़ने से वायदा में भी निवेशकों की खरीद निकलने की संभावना है। भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार चालू वित्त वर्ष के अप्रैल से दिसंबर के दौरान मेंथा उत्पादों का निर्यात घटकर 12,875 टन ही रहा जबकि पिछले साल की समान अवधि में 15,950 टन का निर्यात हुआ था। मालूम हो कि मसाला बोर्ड ने वर्ष 2009-10 में निर्यात का लक्ष्य 22,000 टन का रखा है। देश में मेंथा के कुल उत्पादन में उत्तर प्रदेश का योगदान 70-80 फीसदी है। उत्तर प्रदेश की संभल, चंदौसी, रामपुर और बाराबंकी में मेंथा तेल का सबसे ज्यादा कारोबार होता है।- आर. एस. राणा rana@businessbhaskar.netबात पते कीचूंकि ज्यादातर माल बड़े स्टॉकिस्टों के पास है इसलिए उन्होंने बिकवाली घटा दी है। इससे मेंथा उत्पादों में तेजी का बल मिल रहा है। हालांकि मेंथा उत्पादों का निर्यात 19त्न कम रहा है। (बिज़नस भास्कर...आर अस राणा)
घरेलू दाम घटने से चना और मटर आयातकों को नुकसान
घरेलू बाजार में चने और मटर की कीमतों में आई गिरावट से आयातकों को नुकसान हो रहा है। घरेलू मंडियों में पिछले तीन महीने में चने की कीमतों में करीब 14 फीसदी और पीली मटर की कीमतों में 11.7 फीसदी की गिरावट आ चुकी है। दिसंबर-जनवरी में आयातकों ने ऊंचे दाम पर चने और मटर का आयात किया था लेकिन घरेलू बाजार में दाम घटने से मजूबरन आयातकों को भाव घटाकर बिकवाली करनी पड़ रही है। चेन्नई के दलहन आयातक एन. तिवारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि दिसंबर-जनवरी में भारतीय आयातकों ने आस्ट्रेलियाई मूल के चने के आयात सौदे 550 डॉलर प्रति टन की दर से किए थे। जबकि कनाडा और अमेरिका से पीली मटर के आयात सौदे इस दौरान 340-350 डॉलर प्रति टन (सीएंडएफ) की दर पर हुए थे। घरेलू मंडियों में दिसंबर-जनवरी में चने के दाम 2500 रुपये और मटर के 1700 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे थे। लेकिन उसके बाद से लगातार इनकी कीमतों में गिरावट आई। इस समय दिल्ली बाजार में चने के दाम घटकर 2150 रुपये और उत्तर प्रदेश की मंडियों में मटर के दाम घटकर 1500 रुपये प्रति क्विंटल रह गए हैं। इसीलिए आयातकों को मजबूरन भाव घटाकर बिकवाली करनी पड़ रही है। मुंबई के दलहन आयातक संतोष उपाध्याय ने बताया कि आस्ट्रेलियाई चने के दाम घटकर 500 डॉलर और कनाडा तथा अमेरिका की पीली मटर के दाम घटकर 280-300 डॉलर प्रति टन रह गए हैं। लेकिन आयातक नए आयात सौदे नहीं कर रहे हैं। वर्तमान में सरकारी कंपनियां ही आयात कर रही हैं। मैसर्स साजन राइस एंड दाल मिल के डायरक्टर एस. ए. जेठवानी ने बताया कि चालू फसल सीजन में देश में चने के उत्पादन में तो बढ़ोतरी होने का अनुमान है ही, इसके अलावा उत्पादक मंडियों में बकाया स्टॉक भी बचा है। वैसे भी कई राज्यों में दलहन पर स्टॉक लिमिट लगी होने के कारण मिलर और स्टॉकिस्टों की खरीद कम रहेगी। इसीलिए चने की गिरावट को बल मिल रहा है। कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के बाद मध्य प्रदेश की मंडियों में भी आवक शुरू हो गई है। अप्रैल महीने में राजस्थान और उत्तर प्रदेश में नई आवक शुरू जाएगी, जिससे मौजूदा कीमतों में और भी गिरावट की संभावना है। उत्पादक मंडियों में चने के दाम घटकर 1950-2050 रुपये प्रति क्विंटल रह गए हैं। उत्तर प्रदेश की मंडियोंे में मटर की आवक शुरू हो गई है तथा उत्पादक मंडियों में भाव घटकर 1500 रुपये प्रति क्विंटल रह गए हैं। अगले महीने आवक और बढ़ जाएगी। इसलिए मटर की मौजूदा कीमतों में भी मंदे की संभावना है। कृषि मंत्रालय द्वारा जारी दूसर अग्रिम अनुमान के मुताबिक चालू रबी में देश में चने का उत्पादन बढ़कर 74.6 लाख टन होने का अनुमान है। वर्ष 2008-09 में देश में 70.6 लाख टन का उत्पादन हुआ था। उधर आस्ट्रेलिया में भी चने का उत्पादन 10 फीसदी बढ़कर 4.22 लाख टन होने का अनुमान है। कारोबारियों के अनुसार मटर का घरेलू उत्पादन भी चालू रबी में 6 से 6.5 लाख टन होने का अनुमान है।बात पते कीआस्ट्रेलियाई चने के दाम घटकर 500 और कनाडा व अमेरिका की पीली मटर के दाम घटकर 280-300 डॉलर प्रति टन रह गए हैं। लेकिन आयातक नए आयात सौदे नहीं कर रहे हैं। (बिज़नस भास्कर.....आर अस राणा)
उड़ीसा में एल्युमीनियम उत्पादों पर 4 प्रतिशत वैट
भुवनेश्वर March 22, 2010
एल्युमीनियम क्षेत्र में सहायक और छोटी गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिए उड़ीसा सरकार ने राज्य में एल्युमीनियम उत्पादों पर 4 प्रतिशत का मामूली मूल्यवर्धित कर (वैट) लगाने का फैसला किया है।
जहां कुछ उत्पादों पर 4 प्रतिशत वैट लगता था, वहीं अन्य कुछ वस्तुओं पर 12.5 प्रतिशत तक वैट था। इसके चलते कैबिनेट ने फैसला किया कि यह दरें 4 प्रतिशत के हिसाब से एकसमान हों। यह राज्य में बिकने वाली सभी श्रेणी के उत्पादों के लिए लागू होगा।
वित्त सचिव जेके महापात्रा ने कहा कि मिलिट्री कैंटीनों में आने वाले सामानों पर लगने वाले प्रवेश शुल्क को खत्म कर दिया गया है। इसी तरह से पुराने टायर, पुराने वाहनों, तारपोलीन, प्लास्टिक फुटवीयर, एटीएफ पर भी कर कम रखा गया है।
पड़ोसी राज्यों में लगने वाले करों को ध्यान में रखते हुए कैबिनेट ने वित्त मंत्रालय के पुराने टायरों की बिक्री पर वैट में कमी करने के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी। यह 12.5 प्रतिशत से घटाकर 4 प्रतिशत कर दिया गया है।
साथ ही पुरानी कारों पर कर 12.5 प्रतिशत से घटाकर 2 प्रतिशत कर दिया गया है। मारुति उद्योग लिमिटेड ने उड़ीसा सरकार से पुरानी कारों की बिक्री पर वैट में कमी किए जाने की मांग की थी। इसी तरह से तारपोलीन पर कर घटाकर 4 प्रतिशत और 400 रुपये से कम दाम के फुटवीयर पर कर 4 प्रतिशत रखा गया है।
साथ ही एटीएफ पर 4 प्रतिशत वैट दर उन विमानों तक ही सीमित रखा गया है, जिनका वजह अधिकतम 40,000 किलोग्राम होगा। सरकार ने महंगाई की मार झेल रहे आम लोगों को राहत देते हुए आयातित चीनी पर लगने वाले 4 प्रतिशत वैट को खत्म कर दिया है। यह तीन महीने यानी अप्रैल-जून 2010 तक प्रभावी रहेगा। (बीएस हिंदी)
एल्युमीनियम क्षेत्र में सहायक और छोटी गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिए उड़ीसा सरकार ने राज्य में एल्युमीनियम उत्पादों पर 4 प्रतिशत का मामूली मूल्यवर्धित कर (वैट) लगाने का फैसला किया है।
जहां कुछ उत्पादों पर 4 प्रतिशत वैट लगता था, वहीं अन्य कुछ वस्तुओं पर 12.5 प्रतिशत तक वैट था। इसके चलते कैबिनेट ने फैसला किया कि यह दरें 4 प्रतिशत के हिसाब से एकसमान हों। यह राज्य में बिकने वाली सभी श्रेणी के उत्पादों के लिए लागू होगा।
वित्त सचिव जेके महापात्रा ने कहा कि मिलिट्री कैंटीनों में आने वाले सामानों पर लगने वाले प्रवेश शुल्क को खत्म कर दिया गया है। इसी तरह से पुराने टायर, पुराने वाहनों, तारपोलीन, प्लास्टिक फुटवीयर, एटीएफ पर भी कर कम रखा गया है।
पड़ोसी राज्यों में लगने वाले करों को ध्यान में रखते हुए कैबिनेट ने वित्त मंत्रालय के पुराने टायरों की बिक्री पर वैट में कमी करने के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी। यह 12.5 प्रतिशत से घटाकर 4 प्रतिशत कर दिया गया है।
साथ ही पुरानी कारों पर कर 12.5 प्रतिशत से घटाकर 2 प्रतिशत कर दिया गया है। मारुति उद्योग लिमिटेड ने उड़ीसा सरकार से पुरानी कारों की बिक्री पर वैट में कमी किए जाने की मांग की थी। इसी तरह से तारपोलीन पर कर घटाकर 4 प्रतिशत और 400 रुपये से कम दाम के फुटवीयर पर कर 4 प्रतिशत रखा गया है।
साथ ही एटीएफ पर 4 प्रतिशत वैट दर उन विमानों तक ही सीमित रखा गया है, जिनका वजह अधिकतम 40,000 किलोग्राम होगा। सरकार ने महंगाई की मार झेल रहे आम लोगों को राहत देते हुए आयातित चीनी पर लगने वाले 4 प्रतिशत वैट को खत्म कर दिया है। यह तीन महीने यानी अप्रैल-जून 2010 तक प्रभावी रहेगा। (बीएस हिंदी)
20 मार्च 2010
मक्का की कीमतें घटने के आसार
रबी मक्का की बिहार और आंध्र प्रदेश में आवक बढ़ने से अप्रैल महीने से इसकी कीमतें घटने के आसार हैं। भारत के मुकाबले अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम कम होने के कारण भारत से निर्यात पड़ते नहीं लग रहे हैं। जबकि नई फसल को देखते हुए घरलू बाजार में पोल्ट्री फीड निर्माताओं के साथ स्टॉर्च मिलों की मांग सीमित मात्रा में है। वायदा बाजार में पिछले चार दिनों में इसके दाम 2।4 फीसदी घटे हैं। हालांकि हाजिर में भाव स्थिर बने हुए हैं। पर आने वाले दिनों में उत्पादक राज्यों में आवक बढ़ने पर मौजूदा कीमतें करीब आठ-दस फीसदी तक गिर सकती हैं। वायदा में नरमीनेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज लिमिटेड (एनसीडीईएक्स) में अप्रैल महीने के वायदा अनुबंध में पिछले चार दिनों में मक्का के दाम 2.4 फीसदी घट चुके हैं। 15 मार्च को अप्रैल महीने के वायदा अनुबंध में भाव 899 रुपये प्रति `िंटल थे, जो कि शुक्रवार को घटकर 877 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। अप्रैल महीने के वायदा अनुबंध में 17,490 लॉट के खड़े सौदे हुए हैं। कमोडिटी विशेषज्ञ अभय लाखवान ने बताया कि बिहार की मंडियों में नई फसल की आवक शुरू हो गई है। अप्रैल के प्रथम सप्ताह में आवक बढ़ जाएगी, जिससे मौजूदा कीमतों में गिरावट दिख सकती है। विदेशों में दाम कमयू एस ग्रेन काउंसिल में भारत के प्रतिनिधि अमित सचदेव ने बताया कि मक्का के प्रमुख उत्पादक देशों अमेरिका, अर्जेंटीना और ब्राजील में उत्पादन ज्यादा होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव 197-198 डॉलर प्रति टन चल रहे हैं। जबकि रुपये के मुकाबले डॉलर कमजोर होकर 45.47 के स्तर पर आ गया है। इसलिए मौजूदा भावों में भारत से मक्का निर्यातकों को निर्यात पड़ते नहीं लग रहे हैं। इसीलिए घरलू उत्पादन पिछले साल से कम होने के बावजूद भी कीमतों में तेजी की संभावना नहीं है। उधर शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड (सीबीओटी) में जुलाई वायदा अनुबंध में पिछले सप्ताह 2.84 फीसदी की गिरावट आकर भाव 143.78 डॉलर प्रति टन रहे। सचदेव के अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार में मक्का का बड़े पैमाने पर एथनॉल में उपयोग होता है लेकिन इसके उपयोग की मात्रा कच्चे तेल के दाम पर निर्भर करती है। इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम 81.79 डॉलर प्रति बैरल है। अगर कच्चे तेल की कीमतों में पांच से सात डॉलर प्रति बैरल की और बढ़ोतरी आएगी तो फिर मक्का का एथनॉल में उपयोग बढ़ जायेगा, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में मक्का की कीमतों पर पड़ेगा।रबी में पैदावार ज्यादाकृषि मंत्रालय के अनुसार रबी में मक्का का उत्पादन 56.4 लाख टन होने का अनुमान है जोकि पिछले साल के 5.61 लाख टन से ज्यादा है। हालांकि रबी में मक्का की बुवाई पिछले साल के 11.75 लाख हैक्टेयर से घटकर 11.61 लाख हैक्टेयर में ही हुई है, लेकिन उत्पादक राज्यों में मौसम अनुकूल रहा है। स्नससे प्रति हेक्टेयर पैदावार में बढ़ोतरी होने की संभावना है। खरीफ और रबी को मिलाकर कुल उत्पादन पिछले साल के 197.3 लाख टन से घटकर 173 लाख टन ही होने का अनुमान है।बिहार में नई फसल की आवक शुरूबिहार की नौगछिया मंडी के मक्का व्यापारी पवन अग्रवाल ने बताया कि बिहार की उत्पादक मंडियों में नई फसल की छिटपुट आवक शुरू हो गई है। इस समय बिल्टी का भाव 950 रुपये प्रति `िंटल चल रहा है। चूंकि बिहार से ज्यादातर मांग उत्तर भारत की ही रहती है। मौजूदा भावों में बिहार से दिल्ली, पंजाब और हरियाणा के पोल्ट्री और स्टॉर्च निमार्ताओं के पड़ते नहीं लग रहे हैं इसलिए कीमतों में करीब 75-100 रुपये प्रति `िंटल की गिरावट आने की संभावना है।फीड निर्माताओं की मांग कमजोरकोलकाता के प्रमुख व्यापारी बिमल बंगानी ने बताया कि उत्तर भारत के पोल्ट्री फीड निर्माताओं के साथ स्टॉर्च मिलर बिहार की फसल को देखते हुए कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र से खरीद कम कर रहे हैं। इसीलिए इन राज्यों में भाव स्थिर बने हुए हैं। आंध्रप्रदेश की मंडियों में मक्का का भाव 860 रुपये, कर्नाटक की मंडियों में 850-860 रुपये और महाराष्ट्र की मंडियों में 840-850 रुपये प्रति `िंटल चल रहे हैं। दिल्ली बाजार में इस समय भाव 1050-1060 रुपये प्रति `िंटल हैं लेकिन मांग कमजोर होने से मौजूदा कीमतों में गिरावट के आसार हैं। मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 840 रुपये प्रति `िंटल है। बिहार की मंडियों में आवक का दबाव बनने पर मक्का के दाम एमएसपी से भी नीचे जाने की आशंका है। (बिज़नस भास्कर....आर अस राणा)
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