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01 मई 2026

चालू पेराई सीजन में चीनी का उत्पादन 7 फीसदी बढ़कर 275 लाख टन के पार - इस्मा

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) में अप्रैल अंत तक देशभर के राज्यों में चीनी का उत्पादन फीसदी बढ़कर 275.28 लाख टन का हुआ है। जबकि पिछले पेराई सीजन की समान अवधि में इसका उत्पादन 256.49 लाख टन का हुआ था।


इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (इस्मा) के के अनुसार इस समय देशभर में केवल 5 चीनी मिलें ही पेराई कर रही हैं, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 19 चीनी मिलों में पेराई चल रही थी।

उत्तर प्रदेश में चालू पेराई सीजन में अप्रैल के अंत तक 89.65 लाख टन चीनी का उत्पादन ही हुआ है, जोकि पिछले पेराई सीजन की समान अवधि के 92.40 लाख टन की तुलना में कम है। राज्य की सभी चीनी मिलों में पेराई बंद हो चुकी है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 10 चीनी मिलों में पेराई चल रही थी।

इस्मा के अनुसार अप्रैल के अंत तक महाराष्ट्र और कर्नाटक में चीनी का उत्पादन क्रमशः 99.2 लाख टन और 48.01 लाख टन हुआ है, जो कि पिछले पेराई सीजन की इसी अवधि में क्रमश: 80.93 लाख टन और 40.40 लाख टन था। इन दोनों राज्यों में भी मुख्य सत्र के लिए सभी चीनी मिलें पेराई बंद कर चुकी हैं।

कर्नाटक में कुछ चीनी मिलें जून/जुलाई 2026 से विशेष सत्र के लिए फिर से गन्ने की पेराई आरंभ करेंगी। इसके अलावा, तमिलनाडु में भी कुछ चीनी मिलें विशेष सत्र के दौरान गन्ने की पेराई करेंगी। आमतौर पर कर्नाटक और तमिलनाडु में विशेष सत्र के दौरान लगभग 5 लाख टन चीनी का उत्पादन होता है।

दिल्ली में गुरुवार को चीनी के थोक भाव 4,340 रुपये और कानपुर में 4,360 प्रति क्विंटल रहे। इस दौरान मुंबई में चीनी के थोक दाम 4,120 रुपये कोलकाता में 4,350 रुपये प्रति क्विंटल। चीनी के खुदरा भाव दिल्ली में 46 रुपये और कानपुर में 46 रुपये तथा मुंबई में 45 रुपये और कोलकाता में 47 रुपये प्रति किलो रहे।

जानकारों के अनुसार गर्मी का सीजन बढ़ने से चीनी में बड़े उपभोक्ताओं की मांग मई में बढ़ेगी, जिससे इसकी मौजूदा कीमतों में तेजी आने का अनुमान है।

विश्व बाजार में रॉ शुगर की कीमतों में हाल ही में तेजी आई है। क्रूड तेल की कीमतों में आई तेजी के साथ ही ब्राजील में इथेनॉल में बढ़ते उपयोग और सीजन के आरंभ में कम सप्लाई से आईसीई शुगर वायदा बुधवार को 4 फीसदी बढ़कर 14.68 सेंट प्रति एलबी पर सेटल हुई थी। 

उपभोक्ता के हितों के लिए सरकार खाने के तेलों में स्टैंडर्ड पैकेजिंग बहाल करे - सोपा

नई दिल्ली। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (सोपा) ने उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार से खाने के तेलों के लिए स्टैंडर्ड पैकेजिंग बहाल करने की मांग की है। उपभोक्ता मामले मंत्रालय को पत्र लिख कर नॉन-स्टैंडर्ड पैक साइज के जरिए सिस्टमैटिक उपभोक्ताओं को दिए जो रहे धोखे पर रोशनी डाली।


सोयाबीन प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की सबसे बड़ी नेशनल बॉडी, सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (सोपा) ने आज भारत सरकार के केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामले मंत्रालय को पत्र लिखकर खाने के तेलों के लिए स्टैंडर्ड पैकेजिंग क्वांटिटी बहाल करने के लिए तुरंत एक्शन लेने की मांग की है। यह पत्र पांच नेशनल खाने के तेल इंडस्ट्री एसोसिएशन द्वारा डिपार्टमेंट को दिए गए एक जॉइंट रिप्रेजेंटेशन के बाद आया है, और सरकार का ध्यान जनवरी 2023 से पैक साइज के डीरेगुलेशन के कारण हुए बड़े पैमाने पर उपभोक्ताओं को दिए जा रहे धोखे की ओर खींचता है।

सोपा के अनुसार 1 जनवरी 2023 से पहले, देश में खाने के तेल की पैकेजिंग स्टैंडर्ड नेट क्वांटिटी नॉर्म्स के हिसाब से चलती थी। मैन्युफैक्चरर्स को तेल सिर्फ तय साइज में ही बेचना होता था। यानी 250 मिलीग्राम, 500 मिलीग्राम, एक किलो/लीटर, 5 किलो/लीटर, वगैरह। भाव ट्रांसपेरेंट थे और कॉम्पिटिशन बराबरी का था, जिस कारण उपभोक्ता एक नजर में उत्पाद की तुलना कर सकते थे।

1 जनवरी 2023 से, केंद्र सरकार ने इन स्टैंडर्ड क्वांटिटी की पाबंदियों को हटा दिया, ताकि मैन्युफैक्चरर्स और उपभोक्ता को अधिक आजादी मिल सके। एक अच्छे इरादे वाले रेगुलेटरी सुधार के तौर पर, इसने पैकेज पर 'यूनिट सेल प्राइस' (प्रति ग्राम या एमएल कीमत) बताने की जरूरत भी शुरू की, ताकि उपभोक्ता जानकारी के साथ तुलना कर सकें। हालांकि, नतीजा उसके उलटा रहा जो कि सोचा गया था।

असलियत: 40 ब्रांड्स के सर्वे से पता चला कि उनमें कोई एक जैसा नहीं है।

अलग-अलग ब्रांड्स के 40 खाद्य तेल पाउच के मार्केट सर्वे से पता चला है कि रिटेल शेल्फ पर आजकल कितनी नॉन-स्टैंडर्ड नेट क्वांटिटी मौजूद हैं। 350 ग्राम, 375 ग्राम, 400 ग्राम, 440 ग्राम, 750 ग्राम, 800 ग्राम, 810 ग्राम, 840 ग्राम, 850 ग्राम, 870 ग्राम, 880 ग्राम, 900 ग्राम, 910 ग्राम, 970 ग्राम - यह लिस्ट सिर्फ उदाहरण के लिए है। कानून के हिसाब से, किसी भी क्वांटिटी का इस्तेमाल करने की पूरी आजादी है।

कई मामलों में, पाउच के फिजिकल डाइमेंशन एक जैसे होते हैं, दिखने में एक जैसे लगते हैं लेकिन उनमें क्वांटिटी अलग-अलग होती है। शेल्फ पर 880 ml का पाउच और 910 ml का पाउच एक जैसे दिख सकते हैं। 880 ml पाउच की कीमत असल में कम होती है, और आम उपभोक्ता – जो दिखने वाले इशारों और असल कीमत के आधार पर शॉपिंग करता है – उसे स्वाभाविक रूप से लगता है कि कम कीमत वाला पाउच बेहतर है। असल में, 880 ml पाउच की कीमत प्रति लीटर ज्यादा होती है। यह धोखा बड़े पैमाने पर, असली और सिस्टमैटिक है।

धोखे का एक और पहलू उन ब्रांड्स से पैदा होता है जो टेंपरेचर बताए बिना मिलीलीटर में वॉल्यूम बताते हैं। चूंकि खाने के तेल गर्मी से फैलते और सिकुड़ते हैं, इसलिए 30°C पर एक लीटर का वजन 40°C पर एक लीटर के वजन के बराबर नहीं होता। टेम्परेचर रेफरेंस के बिना, कस्टमर के पास सही तुलना करने का कोई आधार नहीं होता।

नैतिक पहलू: ईमानदार कंपनियों को सजा मिल रही है

रेगुलेशन में ढील ने एक गलत कॉम्पिटिशन का माहौल बना दिया है। जिन मैन्युफैक्चरर्स ने स्टैंडर्ड, ट्रांसपेरेंट पैक साइज़ बनाए रखने का फैसला किया है, वे कम कीमत का दिखावा करने के लिए नॉन-स्टैंडर्ड पैक साइज का फायदा उठाने वाले कॉम्पिटिटर्स के हाथों मार्केट शेयर खो रहे हैं। नतीजतन, ईमानदार मैन्युफैक्चरर्स को भी सिर्फ कॉम्पिटिशन में बने रहने के लिए कन्फ्यूजन और नॉन-स्टैंडर्ड पैक साइज अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इसे पूरे उद्योग में उपभोक्ता ट्रांसपेरेंसी में सबसे नीचे जाने की होड़ चल रही है।

जैसा कि सोपा ने सरकार को लिखे लेटर में कहा है कि पसंद की आजादी देने के मकसद से उठाए गए कदम का नतीजा धोखा देने की आजादी है।

'यूनिट सेल प्राइस' फिक्स का फेलियर

उद्योग से जुड़े कुछ लोगों ने यह तर्क दिया है कि यूनिट सेल प्राइस (प्रति ग्राम या ml कीमत) की जरूरी घोषणा स्टैंडर्डाइजेशन को गैर-जरूरी बना देती है और उपभोक्ता घोषित प्रति-यूनिट कीमत से रिलेटिव वैल्यू कैलकुलेट कर सकते हैं। सोपा इस तर्क का कड़ा विरोध करता है।

आम रिटेल कंज्यूमर शॉपिंग करते समय प्रति-यूनिट कैलकुलेशन नहीं करता है। यूनिट प्राइस अक्सर पैसे में, अक्सर डेसिमल प्लेस के साथ — उदाहरण के लिए, 24.72 पैसे प्रति ml — छोटे प्रिंट में लिखा होता है जिसे शायद ही कभी पढ़ा जाता है। रिटेल स्टोर पर कंज्यूमर साइकोलॉजी और हाई स्पीड शॉपिंग यह पक्का करती है कि खरीदने के फैसलों में विज़ुअल क्यू और एब्सोल्यूट प्राइस ही हावी हों। 'यूनिट सेल प्राइस' उपाय थ्योरी के हिसाब से तो सही है लेकिन ज्यादातर उपभोक्ता के लिए प्रैक्टिकली बेअसर है।

सोपा का सरकार को प्रेजेंटेशन

29 अप्रैल 2026 को उपभोक्ता मामले मंत्रालय के सचिव को लिखे अपने पत्र में, सोपा ने

• नॉन-स्टैंडर्ड पैक साइज से होने वाले मार्केट-वाइड कंज्यूमर धोखे की ओर ध्यान दिलाया

• एक खाद्य तेल का खास उदाहरण दिया जो अभी अपने प्रोडक्ट को 19 अलग-अलग पैक साइज में बेच रहा है, जिनमें से कई दिखने में एक जैसे हैं, जबकि उनमें अलग-अलग मात्रा है - पैक साइज में क्वांटिटी में 25 या 50 ग्राम जितना कम का अंतर है।

• स्टैंडर्ड पैकेजिंग क्वांटिटी को तुरंत बहाल करने के लिए जॉइंट इंडस्ट्री रिकमेंडेशन को फिर से कंफर्म किया।

• सोपा ने मांग कि है कि मैन्युफैक्चरर्स को प्राइज एडजस्ट करने के लिए सही ट्रांजिशन टाइम दिया जाए।

चालू समर सीजन में फसलों की बुआई बढ़कर 72 लाख हेक्टेयर के पार - कृषि मंत्रालय

नई दिल्ली। चालू समर सीजन 2026 में फसलों की कुल बुआई पिछले साल की तुलना में तीन फीसदी बढ़ी है। इस दौरान दलहन एवं तिलहन की बुआई बढ़ी है, जबकि धान की रोपाई पिछले साल की तुलना में पिछड़ रही है।


कृषि मंत्रालय के अनुसार 24 अप्रैल 2026 तक देशभर में समर सीजन की फसलों की बुआई बढ़कर 72.30 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 70.19 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

समर की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू सीजन में घटकर केवल 30.68 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 32.31 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। समर सीजन में धान की रोपाई सामान्यत 31.49 लाख हेक्टेयर में होती है तथा फसल सीजन 2025 में इसकी रोपाई 33.28 लाख हेक्टेयर में हुई थी।

समर सीजन में दालों की बुआई बढ़कर 17.19 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 15.93 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। समर में दलहन की प्रमुख फसल मूंग की बुआई 13.17 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 12.99 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान उड़द की बुआई बढ़कर 3.72 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 2.75 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। अन्य दालों की बुआई चालू समर सीजन में 0.30 लाख हेक्टेयर में हुई है।

मोटे अनाजों की बुवाई चालू समर सीजन में बढ़कर 15.21 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई 14.25 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान समर मक्का की बुआई 9.50 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 8.50 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। इस दौरान ज्वार की बुआई 37 हजार हेक्टेयर, बाजरा की 5.10 लाख हेक्टेयर तथा रागी की 22 हजार हेक्टेयर में ही हुई है।

चालू समर सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई बढ़कर 9.21 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 7.71 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। मूंगफली की बुआई चालू समर सीजन में बढ़कर 5.51 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 4.20 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान सनफ्लावर की 39 हजार हेक्टेयर में और शीशम सीड की बुआई 3.25 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है।

28 अप्रैल 2026

सीसीआई द्वारा कॉटन के बिक्री दाम बढ़ाने से हाजिर बाजार में इसके भाव तेज

नई दिल्ली। कॉटन कारपोरेशन आफ इंडिया, सीसीआई ने सोमवार को कॉटन की बिक्री कीमतों में 300 रुपये प्रति कैंडी की बढ़ोतरी की। अत: स्पिनिंग मिलों की खरीद शाम के सत्र में उत्तर भारत के राज्यों में इसके दाम तेज हुए।


सीसीआई ने सोमवार को फसल सीजन 2025-26 की कुल 17,500 गांठ कॉटन की बिक्री की तथा इस दौरान इसकी बिक्री कीमतों में 300 रुपये प्रति कैंडी की बढ़ोतरी की। पिछले सप्ताह भी निगम ने इसकी कीमत 800 रुपये प्रति कैंडी तक बढ़ाई थी।

कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया सीसीआई चालू फसल सीजन 2025-26 की खरीदी हुई लगभग 57,38,700 कपास गांठ की बिक्री अभी तक कर चुकी हैं।

सीसीआई ने पिछले सप्ताह में 20 अप्रैल से 24 अप्रैल के दौरान घरेलू बाजार में 3,92,700 गांठ, एक गांठ 170 किलो कॉटन की बिक्री की थी।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 6,060 से 6,260 रुपये प्रति मन बोले गए। हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 5,920 से 6,020 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम तेज होकर 5,940 से 6,300 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 58,000 से 59,000 रुपये कैंडी बोले गए।

देशभर की मंडियों में कपास की आवक 35,400 गांठ, एक गांठ-170 किलो की हुई।

घरेलू वायदा कारोबार में कॉटन की कीमतों में गिरावट का रुख रहा। एनसीडीईएक्स पर अप्रैल 26 महीने के वायदा अनुबंध में कपास के दाम 68 रुपये कमजोर होकर 1,710 रुपये प्रति 20 किलो रह गए। एमसीएक्स पर अप्रैल 26 के वायदा अनुबंध में कॉटन के भाव 28,400 रुपये प्रति कैंडी पर स्थिर हो गए। इस दौरान आईसीई के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग में कॉटन की कीमतों में तेजी का रुख रहा।

प्रमुख उत्पादक राज्यों में कपास की कीमत स्थिर बनी रही। जानकारों के अनुसार उत्पादक मंडियों में कपास की आवक सीमित मात्रा में ही हो रही है। घरेलू बाजार में स्पिनिंग मिलों की खरीद बढ़ने से उत्तर भारत में कॉटन की कीमतों में तेजी दर्ज की गई। व्यापारियों के अनुसार घरेलू बाजार में अधिकांश स्पिनिंग मिलों के पास कॉटन का बकाया स्टॉक कम है, जबकि यार्न में निर्यात मांग अच्छी बनी हुई है, इसलिए मिलों को कॉटन की ज्यादा खरीद सीसीआई से करनी पड़ रही है। सीसीआई घरेलू बाजार में लगातार कॉटन बेच रही है हालांकि निगम के पास अभी भी 50 लाख गांठ से ज्यादा का कॉटन का स्टॉक है। अत: घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतों में तेजी, मंदी काफी हद तक सीसीआई के बिक्री दाम पर निर्भर करेगी।

केंद्र सरकार ने मई के लिए 22.5 लाख टन चीनी का कोटा जारी किया

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने मई 2026 के लिए 22.5 लाख टन चीनी का कोटा जारी किया है, जोकि मई 2025 की तुलना में एक लाख टन कम है।


केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामले मंत्रालय मई 2026 के लिए 22.5 लाख टन चीनी का कोटा जारी किया है, जोकि अप्रैल 2026 के लिए जारी किए गए 23 लाख टन कोटे की तुलना में कम है, लेकिन मार्च 2026 के लिए जारी किए गए 22.5 लाख टन कोटे के बराबर है।

मई 2025 में, केंद्र सरकार ने घरेलू बाजार में बिक्री के लिए 23.5 लाख टन का मासिक चीनी को कोटा जारी किया था।

25 अप्रैल 2026

छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर जिंसों की खरीद अवधि बढ़ेगी, बिहार से दलहन खरीद शुरू

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ में पीएम-आशा योजना के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी पर जिंसों की खरीद कार्यों का विस्तार किया है और आत्मनिर्भर दलहन मिशन के तहत बिहार में पहली बार दलहन की खरीद शुरू की है।


उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय द्वारा जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, सरकार ने इन राज्यों से खरीद अभियान का नेतृत्व नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनसीसीएफ) और नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनएएफईडी) कर रहे हैं।

विज्ञप्ति में कहा गया है कि बिहार में, एनसीसीएफ ने केंद्रीय भंडारण निगम के सहयोग से डब्ल्यूडीआरए द्वारा अनुमोदित गोदामों के माध्यम से वैज्ञानिक भंडारण की सहायता से पहली बार मसूर (दाल) की संगठित खरीद शुरू की है।

तय लक्ष्य 32,000 टन के खरीद लक्ष्य के मुकाबले 22 अप्रैल तक बिहार से खरीद एजेंसियों ने 100.4 टन मसूर की खरीद समर्थन मूल्य पर की है। एनएएफईडी भी अपने सहकारी नेटवर्क के माध्यम से मूल्य समर्थन योजना के तहत राज्य में खरीद कार्यों को बढ़ाने की तैयारी कर रही है।

छत्तीसगढ़ में ई-संयुक्तता पोर्टल के माध्यम से किसानों की डिजिटल भागीदारी और दूरदर्शन के माध्यम से पहुंच के साथ ही सहभागिता सहित जागरूकता अभियानों के कारण पीएम-आशा के तहत जिंसों की खरीद में तेजी आई है। धमतरी, दुर्ग, बलोद, बलोदाबाजार, रायपुर, रायगढ़ और सारंगढ़ जैसे जिलों में 85 प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पीएसीएस) केंद्रों का एक नेटवर्क कार्यरत है, और सरगुजा, कोंडागांव और कोरिया में इसके विस्तार की योजना है।

एनसीसीएफ ने 63,325 टन चना और 5,360 टन मसूर की खरीद का लक्ष्य तय किया है, जिसमें 16,012 किसान चने के लिए और 451 किसान मसूर के लिए पंजीकृत करा चुके हैं। इसके मुकाबले, 22 अप्रैल 2026 तक, 9,032 टन चना और 7.98 टन मसूर की खरीद की गई है। इसके तहत 6,129 चना किसानों और 28 मसूर किसानों को लाभ हुआ। इस दौरान नेफेड ने राज्य स्तरीय एजेंसियों के माध्यम से 137 खरीद केंद्र खोले थे, साथ ही अतिरिक्त प्रत्यक्ष केंद्र भी खोले थे, जिनमें से 7 चने के लिए और 3 मसूर के लिए थे।

चने के लिए कुल 39,467 किसान और मसूर के लिए 510 किसानों का पंजीकरण किया गया था। इस दौरान 3,850 टन चना और 109 टन मसूर की खरीद एमएसपी पर की गई हे, जिससे 2,645 चना किसानों और 281 मसूर किसानों को लाभ हुआ।

सरकार की यह पहल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) आधारित खरीद प्रणाली को मजबूत करने के साथ ही किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने और उन्हें औपचारिक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकृत करने के केंद्र सरकार के निरंतर प्रयास को दर्शाती हैं।

ओडिशा से मूंग, उड़द, मूंगफली एवं सूरजमुखी और सरसों की खरीद को केंद्र ने दी मंजूरी

नई दिल्ली। ओडिशा के किसानों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी पर राज्य से मूंग, उड़द, मूंगफली एवं सूरजमुखी के साथ ही सरसों की खरीद को मंजूरी दी।


केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधवार को कृषि भवन, नई दिल्ली में ओडिशा के उप मुख्यमंत्री एवं कृषि व किसान सशक्तिकरण मंत्री कनक वर्धन सिंह के साथ हुई वर्चुअल बैठक में इसकी स्वीकृति दी। स्वीकृतियों का कुल एमएसपी मूल्य 1,428.31 करोड़ रुपये से अधिक होगा। बैठक में चौहान ने स्पष्ट कहा कि ओडिशा के किसानों की सहायता में कोई कमी नहीं रहने दी जाएगी। साथ ही खरीद प्रक्रिया पारदर्शी, ईमानदार और सीधे किसानों से सुनिश्चित होनी चाहिए।
 
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी का लाभ समय पर और पारदर्शी व्यवस्था के माध्यम से मिलना चाहिए, ताकि वास्तविक किसानों को सीधी राहत पहुंचे। बैठक में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ओडिशा के उप मुख्यमंत्री एवं कृषि मंत्री के साथ राज्य की कृषि उपज खरीद संबंधी मांगों की समीक्षा की। बैठक में राज्य सरकार द्वारा भेजे गए प्रस्तावों, उत्पादन अनुमानों और खरीद की आवश्यकता पर विचार करने के बाद केंद्र की ओर से पांच प्रमुख फसलों की खरीद के लिए स्वीकृति दी गई।

केंद्रीय मंत्री ने राज्य से 34,492 टन मूंग की खरीद की मांग को स्वीकृति दी गई, जिसका एमएसपी पर खर्च 302.42 करोड़ रुपये होगा। इस दौरान 1,19,387 टन उड़द की खरीद के लिए 931.21 करोड़ रुपये का खर्च आयेगा है। इसी तरह से 20,219 टन मूंगफली की समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए 146.85 करोड़ रुपये को मंजूरी दी है।

राज्य से 2,210 टन सूरजमुखी की खरीद की मांग को मानते हुए केंद्रीय मंत्री द्वारा मंजूरी प्रदान की गई, जिसका एमएसपी पर खरीद मूल्य 17.06 करोड़ रुपये है। सरसों के मामले में भी राज्य से 4,964 टन की मांग को स्वीकृत किया गया, जिसका एमएसपी पर खरीद में खर्च 30.77 करोड़ रुपये है।

यह पूरी प्रक्रिया पीएम-आशा के तहत 90 दिनों की अवधि के लिए प्रस्तावित है और राज्य सरकार पहले से ही पीओएस आधारित खरीद व्यवस्था पर काम कर रही है। बैठक के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने विशेष रूप से सूरजमुखी की खेती को लेकर प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि यह फसल कई क्षेत्रों से धीरे-धीरे समाप्त हो रही थी, ऐसे में ओडिशा में इसकी खेती होना एक उत्साहजनक कदम है। उन्होंने राज्य सरकार को भरोसा दिलाया कि सूरजमुखी के रकबे और उत्पादन को बढ़ाने के लिए केंद्र हर संभव सहयोग देगा तथा आवश्यकता पड़ने पर वैज्ञानिक एवं तकनीकी सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी।

केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा कि खरीद व्यवस्था की सतत निगरानी जरूरी है, ताकि किसी भी स्तर पर बिचौलियों को लाभ न मिले और वास्तविक किसानों की उपज ही समर्थन मूल्य पर खरीदी जाए। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ खरीद सुनिश्चित की जाती है, तो इससे ओडिशा के किसानों को वास्तविक लाभ मिलेगा। केंद्रीय कृषि मंत्री ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि खरीद पूरी तरह से पारदर्शी हो और ऐसी व्यवस्था बने जिसमें व्यापारी किसानों के नाम पर लाभ न उठा सकें।