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01 मई 2026

मिलों की मांग कमजोर होने से उड़द एवं अरहर में गिरावट, मसूर तथा चना के दाम रुके

नई दिल्ली। दाल मिलों की मांग कमजोर बनी रहने से घरेलू बाजार में गुरुवार को उड़द एवं अरहर की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, जबकि इस दौरान मसूर एवं चना के दाम स्थिर हो गए। मूंग के दाम उत्पादक राज्यों में स्थिर से कमजोर हुए।


बर्मा का दलहन बाजार 1 मई को भी बंद रहेगा।

बर्मा से आयातित उड़द एफएक्यू एवं एसक्यू की कीमत चेन्नई में कमजोर हुई। उड़द एफएक्यू के भाव मई शिपमेंट के कमजोर होकर 820 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ रह गए, जबकि इस दौरान एसक्यू उड़द के भाव मई शिपमेंट के 915 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ रह गए। ब्राजील की उड़द के दाम जून एवं जुलाई शिपमेंट के कमजोर होकर 880 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ रह गए।

लेमन अरहर फसल सीजन 2026 के भाव चेन्नई में मई शिपमेंट के भाव 840 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ पर स्थिर हो गए। इस दौरान फसल सीजन 2025 के भाव चेन्नई में मई शिपमेंट के 815 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ बोले गए।

चेन्नई में उड़द की कीमतों में मंदा आया है, जबकि इस दौरान बर्मा में अवकाश के कारण बाजार बंद रहा। घरेलू बाजार में दाल मिलों की खरीद कमजोर बनी रहने से उड़द की कीमतों में नरमी आई। जानकारों के अनुसार हाल ही में बर्मा में उड़द की कीमतों में तेजी, मंदी बनी रही थी, जिस कारण दाल मिलें जरुरत के हिसाब से ही खरीद कर रही है। आयातकों को इन भाव में डिस्पैरिटी लग रही है, जिस कारण नीचे दाम पर बिकवाली भी कम आ रही है। इसलिए घरेलू बाजार में उड़द की कीमतों में ज्यादा मंदे के आसार नहीं है। आयातित उड़द की शिपमेंट पहले की तुलना में बढ़ी है, जबकि खपत का सीजन होने के बावजूद भी उड़द दाल मांग अपेक्षा अनुरूप कमजोर है। इसलिए आगामी दिनों में उड़द की कीमतों में तेजी, मंदी गर्मियों की फसल की आवक के साथ ही इसके आयात पड़ते के आधार पर बनेगी। आंध्र प्रदेश में रबी उड़द की आवक बराबर बनी हुई है। हालांकि उड़द मोगर एवं गोटा में मांग पहले की तुलना में बढ़ी है। उत्पादक मंडियों में उड़द की कीमत 7,800 रुपये प्रति क्विंटल एमएसपी की तुलना में नीचे बने हुए हैं।

चालू समर सीजन में उड़द की बुआई पिछले साल की तुलना में बढ़ी है तथा मध्य प्रदेश और गुजरात में गर्मियों की फसल की कटाई आरंभ हो गई है तथा मंडियों में छिटपुट आवक बनी है। माना जा रहा है कि अगले महीने के मध्य तक आवक बढ़ेगी।

चेन्नई में लेमन अरहर की कीमत स्थिर हो गई, जबकि अवकाश के कारण बर्मा का बाजार बंद रहा। घरेलू बाजार में दाल मिलों की मांग बनी रहने आयातित अरहर की कीमतों में मंदा आया, जबकि देसी के भाव स्थिर हो गए। व्यापारियों के अनुसार अरहर की कीमतों में अभी सीमित तेजी, मंदी बनी रहने की उम्मीद है। घरेलू बाजार में दाल मिलें जरुरत के हिसाब से ही अरहर की खरीद कर रही हैं। यही कारण है कि आयातकों को इन भाव में डिस्पैरिटी लग रही है तथा आयातकों की बिकवाली भी कमजोर है, इसके बावजूद भी कीमतों पर दबाव बना हुआ है। अरहर की समर्थन मूल्य पर कई राज्यों में खरीद हो रही है लेकिन खरीद भी सीमित मात्रा में ही हो रही है। केंद्र सरकार ने अरहर का समर्थन मूल्य 8,000 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है लेकिन उत्पादक मंडियों में देसी अरहर के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुकाबले नीचे बने हुए हैं। म्यांमार से अरहर की लगातार शिपमेंट आने के साथ, ही घरेलू मंडियों में देसी की आवक बनी हुई है।

सफेद अरहर के दाम मई शिपमेंट के नाव सेवा बंदरगाह पर 645 से 650 डॉलर एवं गजरी के दाम मई शिपमेंट के 635 से 640 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ पर स्थिर बने रहे।

दाल मिलों की मांग सीमित होने से दिल्ली में चना के दाम स्थिर हो गए। बुधवार को इसकी कीमतों में नरमी आई थी तथा नीचे दाम पर शाम को चना में कुछ ग्राहकी देखी गई। ऐसे में व्यापारी इसकी कीमतों में यहां से बड़ी गिरावट के पक्ष में नहीं है। मध्य प्रदेश और राजस्थान की उत्पादक मंडियों में चना की दैनिक आवक अगले महीने के मध्य तक कम हो जायेगी। चालू सीजन में 6 लाख टन से ज्यादा चना की खरीद हो चुकी है। हालांकि केंद्र सरकार ने समर्थन मूल्य पर 10 लाख टन चना खरीदने का लक्ष्य तय किया है। चालू सीजन में पीली मटर का कुल आयात पिछले साल की तुलना में कम हुआ है, जिससे चना की खपत बढ़ने का अनुमान है। बंदरगाह पर आयातित का स्टॉक ज्यादा है लेकिन गुजरात एवं कर्नाटक तथा महाराष्ट्र की मंडियों में चना की आवक पहले की तुलना में कम हुई है। उत्पादक मंडियों में देसी चना के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी 5,875 रुपये प्रति क्विंटल से नीचे बने हुए हैं।

ऑस्ट्रेलिया से आयातित चना के भाव केंटनर में मई एवं जून डिलीवरी के 580 डॉलर तथा वैसल में इसके दाम 560 डॉलर प्रति, टन सीएडंएफ पर स्थिर हो गए। तंजानिया के चना के भाव मई एवं जून शिपमेंट के नवा सेवा बंदरगाह पर 555 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ पर स्थिर हो गए।

पीली मटर पर 30 फीसदी आयात शुल्क है, जबकि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर बना हुआ है। अत: आयातित मटर के भाव 30 फीसदी शुल्क के बाद 4,200 से 4,300 रुपये प्रति क्विंटल भारतीय बंदरगाह पर पड़ रही है, जबकि घरेलू बाजार में इसके दाम 4,000 से 4,100 रुपये प्रति क्विंटल है। इसलिए पीली मटर का आयात कम हो रहा है।

देसी मसूर के दाम दिल्ली में स्थिर हो गए, साथ ही इस दौरान बंदरगाह पर आयातित मसूर की कीमत भी स्थिर हो गई। व्यापारियों के अनुसार मसूर की कीमतों में ज्यादा मंदे की उम्मीद नहीं है, क्योंकि हाल ही में उत्पादक मंडियों में इसकी दैनिक आवकों में कमी आई है। वैसे भी उत्पादक मंडियों में मसूर के भाव समर्थन मूल्य से काफी नीचे बने हुए हैं। उधर उत्पादक राज्यों मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की मंडियों में चालू सीजन में मसूर की आवक सामान्य की तुलना में कम रही, क्योंकि जानकार उत्पादन कम मान रहे हैं। इस दाल मिलें जरुरत के हिसाब से खरीद ही कर रही है, हालांकि खपत का सीजन होने के कारण मसूर दाल में बिहार एवं बंगाल तथा असम की मांग बनी रहेगी। मसूर के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी 7,000 रुपये प्रति क्विंटल से नीचे बने हुए हैं।

मूंग के दाम जयपुर में कमजोर हुए, जबकि अन्य अधिकांश उत्पादक मंडियों में स्थिर बने रहे। व्यापारियों के अनुसार मूंग की कीमतों में अभी बड़ी तेजी के आसार नहीं है क्योंकि दाल मिलें जरूरत के हिसाब से ही खरीद कर रही है तथा कई राज्यों में मूंग की समर्थन मूल्य पर खरीद तो हो रही है, लेकिन कुल आवक की तुलना में खरीद सीमित मात्रा में ही हो रही है। मौसम अनुकूल बना हुआ है इसलिए मूंग की आवक उत्पादक मंडियों में अभी बनी रहने की उम्मीद है। चालू समर सीजन में भी मूंग की बुआई पिछले साल की तुलना में बढ़ी है। उधर केंद्रीय पूल मूंग का स्टॉक सबसे ज्यादा है। अत: अभी इसके भाव में बड़ी तेजी मानकर व्यापार नहीं करना चाहिए। मूंग की कीमत उत्पादक मंडियों में एमएसपी 8,768 प्रति क्विंटल की तुलना में काफी नीचे चल रहे है।

चेन्नई में उड़द एफएक्यू के दाम 25 रुपये नरम होकर 7,875 से 7,900 रुपये प्रति क्विंटल रह गए, जबकि एसक्यू के भाव 8,575 से 8,600 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

दिल्ली में उड़द एफएक्यू के दाम 8,300 से 8,325 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए, जबकि एसक्यू के भाव 25 रुपये कमजोर होकर 8,900 से 8,925 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए।

मुंबई में उड़द एफएक्यू के दाम 25 रुपये कमजोर होकर 7,975 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

कोलकाता में उड़द एफएक्यू के दाम 8,125 से 8,150 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

गुंटूर में उड़द पॉलिश के दाम 25 रुपये नरम होकर 8,050 से 8,075 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। विजयवाड़ा में उड़द पॉलिश के भाव 8,050 से 8,100 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

चेन्नई में लेमन अरहर के भाव शाम के सत्र में 50 रुपये कमजोर होकर 7,550 से 7,575 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

दिल्ली में लेमन अरहर के भाव शाम के सत्र में 7,800 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए।

मुंबई में लेमन अरहर के भाव शाम के सत्र में 50 रुपये कमजोर होकर 7,550 से 7,775 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

देसी अरहर के दाम अधिकांश उत्पादक मंडियों में स्थिर बने रहे।

मुंबई में अफ्रीकी देशों से आयातित अरहर के भाव कमजोर हो गए। सूडान से आयातित अरहर के भाव 100 रुपये कमजोर होकर दाम 6,600 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। इस दौरान गजरी अरहर के भाव 50 रुपये घटकर 6,175 से 6,200 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए। मतवारा की अरहर का स्टॉक नहीं है। सफेद अरहर के दाम 50 रुपये कमजोर होकर 6,250 से 6,300 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

दिल्ली में देसी मसूर के दाम 6,725 से 6,750 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। चालू सप्ताह में इसके दाम 100 रुपये कमजोर हुए।

कनाडा की मसूर के दाम कंटेनर में 6,150 से 6,200 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। जबकि ऑस्ट्रेलिया की मसूर के भाव कंटेनर में 6,100 से 6,125 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए। कनाडा की मसूर के दाम मुद्रा बंदरगाह पर 5,900 से 5,925 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। हजिरा बंदरगाह पर इसके दाम 5,900 से 5,925 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। पटना में देसी मसूर के भाव 6,800 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

दिल्ली में राजस्थान के चना के दाम 5,525 से 5,550 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। इस दौरान मध्य प्रदेश के चना का व्यापार 5,475 से 5,500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से हुआ। जयपुर लाइन के चना के भाव 5,500 से 5,525 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

इंदौर में बोल्ड किस्म के मूंग के दाम 8,400 से 8,500 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। इस दौरान जयपुर में चमकी मूंग के भाव 100 रुपये कमजोर होकर 7,200 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। राजस्थान लाइन की मूंग के दाम दिल्ली में 7,000 से 7,800 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। अकोला में चमकी मूंग के दाम 8,400 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

चालू पेराई सीजन में चीनी का उत्पादन 7 फीसदी बढ़कर 275 लाख टन के पार - इस्मा

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) में अप्रैल अंत तक देशभर के राज्यों में चीनी का उत्पादन फीसदी बढ़कर 275.28 लाख टन का हुआ है। जबकि पिछले पेराई सीजन की समान अवधि में इसका उत्पादन 256.49 लाख टन का हुआ था।


इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (इस्मा) के के अनुसार इस समय देशभर में केवल 5 चीनी मिलें ही पेराई कर रही हैं, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 19 चीनी मिलों में पेराई चल रही थी।

उत्तर प्रदेश में चालू पेराई सीजन में अप्रैल के अंत तक 89.65 लाख टन चीनी का उत्पादन ही हुआ है, जोकि पिछले पेराई सीजन की समान अवधि के 92.40 लाख टन की तुलना में कम है। राज्य की सभी चीनी मिलों में पेराई बंद हो चुकी है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 10 चीनी मिलों में पेराई चल रही थी।

इस्मा के अनुसार अप्रैल के अंत तक महाराष्ट्र और कर्नाटक में चीनी का उत्पादन क्रमशः 99.2 लाख टन और 48.01 लाख टन हुआ है, जो कि पिछले पेराई सीजन की इसी अवधि में क्रमश: 80.93 लाख टन और 40.40 लाख टन था। इन दोनों राज्यों में भी मुख्य सत्र के लिए सभी चीनी मिलें पेराई बंद कर चुकी हैं।

कर्नाटक में कुछ चीनी मिलें जून/जुलाई 2026 से विशेष सत्र के लिए फिर से गन्ने की पेराई आरंभ करेंगी। इसके अलावा, तमिलनाडु में भी कुछ चीनी मिलें विशेष सत्र के दौरान गन्ने की पेराई करेंगी। आमतौर पर कर्नाटक और तमिलनाडु में विशेष सत्र के दौरान लगभग 5 लाख टन चीनी का उत्पादन होता है।

दिल्ली में गुरुवार को चीनी के थोक भाव 4,340 रुपये और कानपुर में 4,360 प्रति क्विंटल रहे। इस दौरान मुंबई में चीनी के थोक दाम 4,120 रुपये कोलकाता में 4,350 रुपये प्रति क्विंटल। चीनी के खुदरा भाव दिल्ली में 46 रुपये और कानपुर में 46 रुपये तथा मुंबई में 45 रुपये और कोलकाता में 47 रुपये प्रति किलो रहे।

जानकारों के अनुसार गर्मी का सीजन बढ़ने से चीनी में बड़े उपभोक्ताओं की मांग मई में बढ़ेगी, जिससे इसकी मौजूदा कीमतों में तेजी आने का अनुमान है।

विश्व बाजार में रॉ शुगर की कीमतों में हाल ही में तेजी आई है। क्रूड तेल की कीमतों में आई तेजी के साथ ही ब्राजील में इथेनॉल में बढ़ते उपयोग और सीजन के आरंभ में कम सप्लाई से आईसीई शुगर वायदा बुधवार को 4 फीसदी बढ़कर 14.68 सेंट प्रति एलबी पर सेटल हुई थी। 

उपभोक्ता के हितों के लिए सरकार खाने के तेलों में स्टैंडर्ड पैकेजिंग बहाल करे - सोपा

नई दिल्ली। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (सोपा) ने उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार से खाने के तेलों के लिए स्टैंडर्ड पैकेजिंग बहाल करने की मांग की है। उपभोक्ता मामले मंत्रालय को पत्र लिख कर नॉन-स्टैंडर्ड पैक साइज के जरिए सिस्टमैटिक उपभोक्ताओं को दिए जो रहे धोखे पर रोशनी डाली।


सोयाबीन प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की सबसे बड़ी नेशनल बॉडी, सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (सोपा) ने आज भारत सरकार के केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामले मंत्रालय को पत्र लिखकर खाने के तेलों के लिए स्टैंडर्ड पैकेजिंग क्वांटिटी बहाल करने के लिए तुरंत एक्शन लेने की मांग की है। यह पत्र पांच नेशनल खाने के तेल इंडस्ट्री एसोसिएशन द्वारा डिपार्टमेंट को दिए गए एक जॉइंट रिप्रेजेंटेशन के बाद आया है, और सरकार का ध्यान जनवरी 2023 से पैक साइज के डीरेगुलेशन के कारण हुए बड़े पैमाने पर उपभोक्ताओं को दिए जा रहे धोखे की ओर खींचता है।

सोपा के अनुसार 1 जनवरी 2023 से पहले, देश में खाने के तेल की पैकेजिंग स्टैंडर्ड नेट क्वांटिटी नॉर्म्स के हिसाब से चलती थी। मैन्युफैक्चरर्स को तेल सिर्फ तय साइज में ही बेचना होता था। यानी 250 मिलीग्राम, 500 मिलीग्राम, एक किलो/लीटर, 5 किलो/लीटर, वगैरह। भाव ट्रांसपेरेंट थे और कॉम्पिटिशन बराबरी का था, जिस कारण उपभोक्ता एक नजर में उत्पाद की तुलना कर सकते थे।

1 जनवरी 2023 से, केंद्र सरकार ने इन स्टैंडर्ड क्वांटिटी की पाबंदियों को हटा दिया, ताकि मैन्युफैक्चरर्स और उपभोक्ता को अधिक आजादी मिल सके। एक अच्छे इरादे वाले रेगुलेटरी सुधार के तौर पर, इसने पैकेज पर 'यूनिट सेल प्राइस' (प्रति ग्राम या एमएल कीमत) बताने की जरूरत भी शुरू की, ताकि उपभोक्ता जानकारी के साथ तुलना कर सकें। हालांकि, नतीजा उसके उलटा रहा जो कि सोचा गया था।

असलियत: 40 ब्रांड्स के सर्वे से पता चला कि उनमें कोई एक जैसा नहीं है।

अलग-अलग ब्रांड्स के 40 खाद्य तेल पाउच के मार्केट सर्वे से पता चला है कि रिटेल शेल्फ पर आजकल कितनी नॉन-स्टैंडर्ड नेट क्वांटिटी मौजूद हैं। 350 ग्राम, 375 ग्राम, 400 ग्राम, 440 ग्राम, 750 ग्राम, 800 ग्राम, 810 ग्राम, 840 ग्राम, 850 ग्राम, 870 ग्राम, 880 ग्राम, 900 ग्राम, 910 ग्राम, 970 ग्राम - यह लिस्ट सिर्फ उदाहरण के लिए है। कानून के हिसाब से, किसी भी क्वांटिटी का इस्तेमाल करने की पूरी आजादी है।

कई मामलों में, पाउच के फिजिकल डाइमेंशन एक जैसे होते हैं, दिखने में एक जैसे लगते हैं लेकिन उनमें क्वांटिटी अलग-अलग होती है। शेल्फ पर 880 ml का पाउच और 910 ml का पाउच एक जैसे दिख सकते हैं। 880 ml पाउच की कीमत असल में कम होती है, और आम उपभोक्ता – जो दिखने वाले इशारों और असल कीमत के आधार पर शॉपिंग करता है – उसे स्वाभाविक रूप से लगता है कि कम कीमत वाला पाउच बेहतर है। असल में, 880 ml पाउच की कीमत प्रति लीटर ज्यादा होती है। यह धोखा बड़े पैमाने पर, असली और सिस्टमैटिक है।

धोखे का एक और पहलू उन ब्रांड्स से पैदा होता है जो टेंपरेचर बताए बिना मिलीलीटर में वॉल्यूम बताते हैं। चूंकि खाने के तेल गर्मी से फैलते और सिकुड़ते हैं, इसलिए 30°C पर एक लीटर का वजन 40°C पर एक लीटर के वजन के बराबर नहीं होता। टेम्परेचर रेफरेंस के बिना, कस्टमर के पास सही तुलना करने का कोई आधार नहीं होता।

नैतिक पहलू: ईमानदार कंपनियों को सजा मिल रही है

रेगुलेशन में ढील ने एक गलत कॉम्पिटिशन का माहौल बना दिया है। जिन मैन्युफैक्चरर्स ने स्टैंडर्ड, ट्रांसपेरेंट पैक साइज़ बनाए रखने का फैसला किया है, वे कम कीमत का दिखावा करने के लिए नॉन-स्टैंडर्ड पैक साइज का फायदा उठाने वाले कॉम्पिटिटर्स के हाथों मार्केट शेयर खो रहे हैं। नतीजतन, ईमानदार मैन्युफैक्चरर्स को भी सिर्फ कॉम्पिटिशन में बने रहने के लिए कन्फ्यूजन और नॉन-स्टैंडर्ड पैक साइज अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इसे पूरे उद्योग में उपभोक्ता ट्रांसपेरेंसी में सबसे नीचे जाने की होड़ चल रही है।

जैसा कि सोपा ने सरकार को लिखे लेटर में कहा है कि पसंद की आजादी देने के मकसद से उठाए गए कदम का नतीजा धोखा देने की आजादी है।

'यूनिट सेल प्राइस' फिक्स का फेलियर

उद्योग से जुड़े कुछ लोगों ने यह तर्क दिया है कि यूनिट सेल प्राइस (प्रति ग्राम या ml कीमत) की जरूरी घोषणा स्टैंडर्डाइजेशन को गैर-जरूरी बना देती है और उपभोक्ता घोषित प्रति-यूनिट कीमत से रिलेटिव वैल्यू कैलकुलेट कर सकते हैं। सोपा इस तर्क का कड़ा विरोध करता है।

आम रिटेल कंज्यूमर शॉपिंग करते समय प्रति-यूनिट कैलकुलेशन नहीं करता है। यूनिट प्राइस अक्सर पैसे में, अक्सर डेसिमल प्लेस के साथ — उदाहरण के लिए, 24.72 पैसे प्रति ml — छोटे प्रिंट में लिखा होता है जिसे शायद ही कभी पढ़ा जाता है। रिटेल स्टोर पर कंज्यूमर साइकोलॉजी और हाई स्पीड शॉपिंग यह पक्का करती है कि खरीदने के फैसलों में विज़ुअल क्यू और एब्सोल्यूट प्राइस ही हावी हों। 'यूनिट सेल प्राइस' उपाय थ्योरी के हिसाब से तो सही है लेकिन ज्यादातर उपभोक्ता के लिए प्रैक्टिकली बेअसर है।

सोपा का सरकार को प्रेजेंटेशन

29 अप्रैल 2026 को उपभोक्ता मामले मंत्रालय के सचिव को लिखे अपने पत्र में, सोपा ने

• नॉन-स्टैंडर्ड पैक साइज से होने वाले मार्केट-वाइड कंज्यूमर धोखे की ओर ध्यान दिलाया

• एक खाद्य तेल का खास उदाहरण दिया जो अभी अपने प्रोडक्ट को 19 अलग-अलग पैक साइज में बेच रहा है, जिनमें से कई दिखने में एक जैसे हैं, जबकि उनमें अलग-अलग मात्रा है - पैक साइज में क्वांटिटी में 25 या 50 ग्राम जितना कम का अंतर है।

• स्टैंडर्ड पैकेजिंग क्वांटिटी को तुरंत बहाल करने के लिए जॉइंट इंडस्ट्री रिकमेंडेशन को फिर से कंफर्म किया।

• सोपा ने मांग कि है कि मैन्युफैक्चरर्स को प्राइज एडजस्ट करने के लिए सही ट्रांजिशन टाइम दिया जाए।

चालू समर सीजन में फसलों की बुआई बढ़कर 72 लाख हेक्टेयर के पार - कृषि मंत्रालय

नई दिल्ली। चालू समर सीजन 2026 में फसलों की कुल बुआई पिछले साल की तुलना में तीन फीसदी बढ़ी है। इस दौरान दलहन एवं तिलहन की बुआई बढ़ी है, जबकि धान की रोपाई पिछले साल की तुलना में पिछड़ रही है।


कृषि मंत्रालय के अनुसार 24 अप्रैल 2026 तक देशभर में समर सीजन की फसलों की बुआई बढ़कर 72.30 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 70.19 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

समर की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू सीजन में घटकर केवल 30.68 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 32.31 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। समर सीजन में धान की रोपाई सामान्यत 31.49 लाख हेक्टेयर में होती है तथा फसल सीजन 2025 में इसकी रोपाई 33.28 लाख हेक्टेयर में हुई थी।

समर सीजन में दालों की बुआई बढ़कर 17.19 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 15.93 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। समर में दलहन की प्रमुख फसल मूंग की बुआई 13.17 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 12.99 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान उड़द की बुआई बढ़कर 3.72 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 2.75 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। अन्य दालों की बुआई चालू समर सीजन में 0.30 लाख हेक्टेयर में हुई है।

मोटे अनाजों की बुवाई चालू समर सीजन में बढ़कर 15.21 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई 14.25 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान समर मक्का की बुआई 9.50 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 8.50 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। इस दौरान ज्वार की बुआई 37 हजार हेक्टेयर, बाजरा की 5.10 लाख हेक्टेयर तथा रागी की 22 हजार हेक्टेयर में ही हुई है।

चालू समर सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई बढ़कर 9.21 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 7.71 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। मूंगफली की बुआई चालू समर सीजन में बढ़कर 5.51 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 4.20 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान सनफ्लावर की 39 हजार हेक्टेयर में और शीशम सीड की बुआई 3.25 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है।