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28 अप्रैल 2026

सीसीआई द्वारा कॉटन के बिक्री दाम बढ़ाने से हाजिर बाजार में इसके भाव तेज

नई दिल्ली। कॉटन कारपोरेशन आफ इंडिया, सीसीआई ने सोमवार को कॉटन की बिक्री कीमतों में 300 रुपये प्रति कैंडी की बढ़ोतरी की। अत: स्पिनिंग मिलों की खरीद शाम के सत्र में उत्तर भारत के राज्यों में इसके दाम तेज हुए।


सीसीआई ने सोमवार को फसल सीजन 2025-26 की कुल 17,500 गांठ कॉटन की बिक्री की तथा इस दौरान इसकी बिक्री कीमतों में 300 रुपये प्रति कैंडी की बढ़ोतरी की। पिछले सप्ताह भी निगम ने इसकी कीमत 800 रुपये प्रति कैंडी तक बढ़ाई थी।

कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया सीसीआई चालू फसल सीजन 2025-26 की खरीदी हुई लगभग 57,38,700 कपास गांठ की बिक्री अभी तक कर चुकी हैं।

सीसीआई ने पिछले सप्ताह में 20 अप्रैल से 24 अप्रैल के दौरान घरेलू बाजार में 3,92,700 गांठ, एक गांठ 170 किलो कॉटन की बिक्री की थी।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 6,060 से 6,260 रुपये प्रति मन बोले गए। हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 5,920 से 6,020 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम तेज होकर 5,940 से 6,300 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 58,000 से 59,000 रुपये कैंडी बोले गए।

देशभर की मंडियों में कपास की आवक 35,400 गांठ, एक गांठ-170 किलो की हुई।

घरेलू वायदा कारोबार में कॉटन की कीमतों में गिरावट का रुख रहा। एनसीडीईएक्स पर अप्रैल 26 महीने के वायदा अनुबंध में कपास के दाम 68 रुपये कमजोर होकर 1,710 रुपये प्रति 20 किलो रह गए। एमसीएक्स पर अप्रैल 26 के वायदा अनुबंध में कॉटन के भाव 28,400 रुपये प्रति कैंडी पर स्थिर हो गए। इस दौरान आईसीई के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग में कॉटन की कीमतों में तेजी का रुख रहा।

प्रमुख उत्पादक राज्यों में कपास की कीमत स्थिर बनी रही। जानकारों के अनुसार उत्पादक मंडियों में कपास की आवक सीमित मात्रा में ही हो रही है। घरेलू बाजार में स्पिनिंग मिलों की खरीद बढ़ने से उत्तर भारत में कॉटन की कीमतों में तेजी दर्ज की गई। व्यापारियों के अनुसार घरेलू बाजार में अधिकांश स्पिनिंग मिलों के पास कॉटन का बकाया स्टॉक कम है, जबकि यार्न में निर्यात मांग अच्छी बनी हुई है, इसलिए मिलों को कॉटन की ज्यादा खरीद सीसीआई से करनी पड़ रही है। सीसीआई घरेलू बाजार में लगातार कॉटन बेच रही है हालांकि निगम के पास अभी भी 50 लाख गांठ से ज्यादा का कॉटन का स्टॉक है। अत: घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतों में तेजी, मंदी काफी हद तक सीसीआई के बिक्री दाम पर निर्भर करेगी।

केंद्र सरकार ने मई के लिए 22.5 लाख टन चीनी का कोटा जारी किया

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने मई 2026 के लिए 22.5 लाख टन चीनी का कोटा जारी किया है, जोकि मई 2025 की तुलना में एक लाख टन कम है।


केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामले मंत्रालय मई 2026 के लिए 22.5 लाख टन चीनी का कोटा जारी किया है, जोकि अप्रैल 2026 के लिए जारी किए गए 23 लाख टन कोटे की तुलना में कम है, लेकिन मार्च 2026 के लिए जारी किए गए 22.5 लाख टन कोटे के बराबर है।

मई 2025 में, केंद्र सरकार ने घरेलू बाजार में बिक्री के लिए 23.5 लाख टन का मासिक चीनी को कोटा जारी किया था।

25 अप्रैल 2026

छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर जिंसों की खरीद अवधि बढ़ेगी, बिहार से दलहन खरीद शुरू

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ में पीएम-आशा योजना के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी पर जिंसों की खरीद कार्यों का विस्तार किया है और आत्मनिर्भर दलहन मिशन के तहत बिहार में पहली बार दलहन की खरीद शुरू की है।


उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय द्वारा जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, सरकार ने इन राज्यों से खरीद अभियान का नेतृत्व नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनसीसीएफ) और नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनएएफईडी) कर रहे हैं।

विज्ञप्ति में कहा गया है कि बिहार में, एनसीसीएफ ने केंद्रीय भंडारण निगम के सहयोग से डब्ल्यूडीआरए द्वारा अनुमोदित गोदामों के माध्यम से वैज्ञानिक भंडारण की सहायता से पहली बार मसूर (दाल) की संगठित खरीद शुरू की है।

तय लक्ष्य 32,000 टन के खरीद लक्ष्य के मुकाबले 22 अप्रैल तक बिहार से खरीद एजेंसियों ने 100.4 टन मसूर की खरीद समर्थन मूल्य पर की है। एनएएफईडी भी अपने सहकारी नेटवर्क के माध्यम से मूल्य समर्थन योजना के तहत राज्य में खरीद कार्यों को बढ़ाने की तैयारी कर रही है।

छत्तीसगढ़ में ई-संयुक्तता पोर्टल के माध्यम से किसानों की डिजिटल भागीदारी और दूरदर्शन के माध्यम से पहुंच के साथ ही सहभागिता सहित जागरूकता अभियानों के कारण पीएम-आशा के तहत जिंसों की खरीद में तेजी आई है। धमतरी, दुर्ग, बलोद, बलोदाबाजार, रायपुर, रायगढ़ और सारंगढ़ जैसे जिलों में 85 प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पीएसीएस) केंद्रों का एक नेटवर्क कार्यरत है, और सरगुजा, कोंडागांव और कोरिया में इसके विस्तार की योजना है।

एनसीसीएफ ने 63,325 टन चना और 5,360 टन मसूर की खरीद का लक्ष्य तय किया है, जिसमें 16,012 किसान चने के लिए और 451 किसान मसूर के लिए पंजीकृत करा चुके हैं। इसके मुकाबले, 22 अप्रैल 2026 तक, 9,032 टन चना और 7.98 टन मसूर की खरीद की गई है। इसके तहत 6,129 चना किसानों और 28 मसूर किसानों को लाभ हुआ। इस दौरान नेफेड ने राज्य स्तरीय एजेंसियों के माध्यम से 137 खरीद केंद्र खोले थे, साथ ही अतिरिक्त प्रत्यक्ष केंद्र भी खोले थे, जिनमें से 7 चने के लिए और 3 मसूर के लिए थे।

चने के लिए कुल 39,467 किसान और मसूर के लिए 510 किसानों का पंजीकरण किया गया था। इस दौरान 3,850 टन चना और 109 टन मसूर की खरीद एमएसपी पर की गई हे, जिससे 2,645 चना किसानों और 281 मसूर किसानों को लाभ हुआ।

सरकार की यह पहल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) आधारित खरीद प्रणाली को मजबूत करने के साथ ही किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने और उन्हें औपचारिक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकृत करने के केंद्र सरकार के निरंतर प्रयास को दर्शाती हैं।

ओडिशा से मूंग, उड़द, मूंगफली एवं सूरजमुखी और सरसों की खरीद को केंद्र ने दी मंजूरी

नई दिल्ली। ओडिशा के किसानों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी पर राज्य से मूंग, उड़द, मूंगफली एवं सूरजमुखी के साथ ही सरसों की खरीद को मंजूरी दी।


केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधवार को कृषि भवन, नई दिल्ली में ओडिशा के उप मुख्यमंत्री एवं कृषि व किसान सशक्तिकरण मंत्री कनक वर्धन सिंह के साथ हुई वर्चुअल बैठक में इसकी स्वीकृति दी। स्वीकृतियों का कुल एमएसपी मूल्य 1,428.31 करोड़ रुपये से अधिक होगा। बैठक में चौहान ने स्पष्ट कहा कि ओडिशा के किसानों की सहायता में कोई कमी नहीं रहने दी जाएगी। साथ ही खरीद प्रक्रिया पारदर्शी, ईमानदार और सीधे किसानों से सुनिश्चित होनी चाहिए।
 
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी का लाभ समय पर और पारदर्शी व्यवस्था के माध्यम से मिलना चाहिए, ताकि वास्तविक किसानों को सीधी राहत पहुंचे। बैठक में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ओडिशा के उप मुख्यमंत्री एवं कृषि मंत्री के साथ राज्य की कृषि उपज खरीद संबंधी मांगों की समीक्षा की। बैठक में राज्य सरकार द्वारा भेजे गए प्रस्तावों, उत्पादन अनुमानों और खरीद की आवश्यकता पर विचार करने के बाद केंद्र की ओर से पांच प्रमुख फसलों की खरीद के लिए स्वीकृति दी गई।

केंद्रीय मंत्री ने राज्य से 34,492 टन मूंग की खरीद की मांग को स्वीकृति दी गई, जिसका एमएसपी पर खर्च 302.42 करोड़ रुपये होगा। इस दौरान 1,19,387 टन उड़द की खरीद के लिए 931.21 करोड़ रुपये का खर्च आयेगा है। इसी तरह से 20,219 टन मूंगफली की समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए 146.85 करोड़ रुपये को मंजूरी दी है।

राज्य से 2,210 टन सूरजमुखी की खरीद की मांग को मानते हुए केंद्रीय मंत्री द्वारा मंजूरी प्रदान की गई, जिसका एमएसपी पर खरीद मूल्य 17.06 करोड़ रुपये है। सरसों के मामले में भी राज्य से 4,964 टन की मांग को स्वीकृत किया गया, जिसका एमएसपी पर खरीद में खर्च 30.77 करोड़ रुपये है।

यह पूरी प्रक्रिया पीएम-आशा के तहत 90 दिनों की अवधि के लिए प्रस्तावित है और राज्य सरकार पहले से ही पीओएस आधारित खरीद व्यवस्था पर काम कर रही है। बैठक के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने विशेष रूप से सूरजमुखी की खेती को लेकर प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि यह फसल कई क्षेत्रों से धीरे-धीरे समाप्त हो रही थी, ऐसे में ओडिशा में इसकी खेती होना एक उत्साहजनक कदम है। उन्होंने राज्य सरकार को भरोसा दिलाया कि सूरजमुखी के रकबे और उत्पादन को बढ़ाने के लिए केंद्र हर संभव सहयोग देगा तथा आवश्यकता पड़ने पर वैज्ञानिक एवं तकनीकी सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी।

केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा कि खरीद व्यवस्था की सतत निगरानी जरूरी है, ताकि किसी भी स्तर पर बिचौलियों को लाभ न मिले और वास्तविक किसानों की उपज ही समर्थन मूल्य पर खरीदी जाए। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ खरीद सुनिश्चित की जाती है, तो इससे ओडिशा के किसानों को वास्तविक लाभ मिलेगा। केंद्रीय कृषि मंत्री ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि खरीद पूरी तरह से पारदर्शी हो और ऐसी व्यवस्था बने जिसमें व्यापारी किसानों के नाम पर लाभ न उठा सकें।

गल्फ में अनिश्चितता के माहौल का घरेलू खाद्य तेल उद्योग पर असर, कमजोर मानसून की आशंका

नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के आसपास हाल के घटनाक्रमों से गल्फ क्षेत्र में अस्थिरता और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है, जिसका असर घरेलू खाद्य तेल उद्योग पर पड़ रहा है। उधर भारतीय मौसम विभाग, आईएमडी ने चालू सीजन में मानसून नॉर्मल से कमजोर होने की आशंका जताई है।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के अनुसार अमेरिका और ईरान के आसपास हाल के घटनाक्रमों ने गल्फ क्षेत्र में एक अस्थिर और अनिश्चितता का माहौल बना दिया है। हालांकि कुछ समय के लिए सीजफायर और होर्मुज स्ट्रेट के फिर से खुलने से शुरू में कुछ राहत मिली थी, लेकिन अब स्थिति साफ नहीं है, क्योंकि बीच-बीच में रुकावट आ रही है जोकि घरेलू तेल तिलहन उद्वयोग के लिए मुश्किलें बढ़ रही है। इससे शिपमेंट में कमी आई है साथ ही माल ढुलाई की लागत बढ़ गई है। अत: खाने के तेल और ऑयल मील के ट्रेड पर अनिश्चितता का माहौल है।

लड़ाई शुरू होने के बाद से, पॉलीइथाइलीन और पॉलीप्रोपाइलीन जैसे क्रूड से जुड़े उत्पादों की कीमतें जो कि प्लास्टिक पैकेजिंग के मुख्य इनपुट हैं की कीमत 50 से 60 फीसदी तक बढ़ गई हैं। इससे बोतलें और प्लास्टिक रैपर एफएमसीजी की कीमत बढ़ गई है। पैकेजिंग में आमतौर पर उत्पाद की लागत का 15 से 25 फीसदी हिस्सा होता है, जिसका मतलब है कि थोड़ी, बहुत बढ़ोतरी भी खाने के तेलों की कीमतों पर काफी असर डाल सकती है। इस संदर्भ में, लगातार बढ़ते तनाव का इस सेक्टर पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है, हालांकि हमें उम्मीद है कि लगातार कोशिशों से आने वाले महीनों में इसका टिकाऊ समाधान होगा, और ग्लोबल ट्रेड की स्थिति आसान हो जायेगी।

मानसूनी 2026 का आउटलुक – अनिश्चितता और उभरते जोखिमों का मौसम

भारतीय मौसम विभाग, आईएमडी ने शुरुआती अनुमान में 2026 का साउथ वेस्ट मॉनसून, का लॉन्ग पीरियड एवरेज (एलपीए) 92 फीसदी का अनुमान जारी किया है, जो कि नॉर्मल से नीचे की कैटेगरी में रहने की संभावना है। यह एलपीए 96 फीसदी और 104 फीसदी के बीच नॉर्मल मानसून से अलग होगा। सीजनल पैटर्न में समय और जगह के हिसाब से इसमें बदलाव हो सकते हैं, और मानसून के दूसरे आधे हिस्से में बारिश सामान्य की तुलना में कम होने की संभावना है। सेंट्रल और नॉर्थ-वेस्ट इंडिया के इलाकों में नॉर्मल से कम बारिश की संभावना ज्यादा हो सकती है, जबकि पूर्वी और नॉर्थ-ईस्ट इलाकों के कुछ हिस्सों तुलनात्मक रूप से बेहतर बारिश हो सकती है।

एल नीनो भी एक बड़ी चिंता बनी हुई है, क्योंकि यह आमतौर पर मानसून की तेजी को कम कर देता है। हालांकि इंडियन ओशन डाइपोल से न्यूट्रल से लेकर थोड़े पॉजिटिव सिग्नल कुछ सपोर्ट दे सकते हैं, लेकिन ओवरऑल आउटलुक कमजोर मानसून और बढ़ते जोखिम का संकेत देता है। साउथ वेस्ट मॉनसून इंडिया की इकोनॉमिक ग्रोथ के लिए जरूरी है, क्योंकि खरीफ फसलों के उत्पादन में बढ़ोतरी एक मजबूत रूरल इकोनॉमी को सपोर्ट करती है। अगर खरीफ सीजन में बारिश कम होती है, जिसका असर उत्पादन में कमी पर पड़ता है तो खाने की चीजों की महंगाई बढ़ सकती है। यह स्थिर यूएस एवं ईरान के बीच चल रहे तनाव की वजह से बढ़ती लागत और फ्यूल की बढ़ती कीमतों के बीच हो रहा है, जिससे कृषि उद्योग पर और दबाव बढ़ रहा है और यह सभी के लिए चिंता का विषय बन गया है।

सरसों का उत्पादन अनुमान

एसईए ने 30 मार्च 2026 को जयपुर में एक कॉन्फ्रेंस की थी, जिसमें रबी 2024–25 के सरसों के उत्पादन अनुमान पेश किए गए। इस दौरान 92.15 लाख हेक्टेयर में 115.2 लाख टन सरसों के उत्पादन का अनुमान लगाया गया। एक खास बात मस्टर्ड मॉडल फार्म (एमएमएफ) प्रोजेक्ट था, जिसे एडब्ल्यूएल और सॉलिडेरिडाड के साथ लागू किया गया था। फसल सीजन 2025–26 में इसे राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश में लगभग 3000 एकड़ के रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर प्रोग्राम में बदल दिया गया, जिससे मिट्टी की सेहत और किसानों की इनकम में सुधार के साथ-साथ 28 फीसदी तक की पैदावार में बढ़ोतरी हुई।

ऑयल मील का निर्यात – ग्लोबल दिक्कतों के बीच मार्केट में डायवर्सिटी लाने की जरूरत

वर्ष 2024-25 के दौरान, देश से लगभग 4.5 मिलियन टन ऑयल मील का निर्यात किया था, जिसकी कीमत 12,000 करोड़ रुपये लगभग (यूएसडी 1.35 बिलियन) से ज्यादा थी, जिसमें से  मिडिल ईस्ट और यूरोप को क्रमश: 20 फीसदी और 15 फीसदी का निर्यात हुआ था।। खाड़ी क्षेत्र में हाल ही बढ़े बनाव से परिवहन लागत एवं शिपिंग चुनौतियों के कारण मिडिल ईस्ट और यूरोप को निर्यात प्रभावित किया है। इसे कम करने के लिए, मौजूदा और दूसरे मार्केट में कोशिशों को मजबूत करने की जरूरत है। इस बारे में, एसईए जुलाई 2026 के दौरान अन्य मुख्य मार्केट में 10-12 बड़े निर्यातकों का एक ट्रेड डेलिगेशन भेजने की योजना बना रहा है ताकि इस कमी को पूरा किया जा सके।

चालू समर सीजन में फसलों की बुआई 4.41 फीसदी बढ़ी - कृषि मंत्रालय

नई दिल्ली। चालू समर सीजन 2026 में फसलों की कुल बुआई पिछले साल की तुलना में 4.41 फीसदी आगे चल रही है। इस दौरान दलहन एवं तिलहन की बुआई बढ़ी है, जबकि धान की रोपाई पिछले साल की तुलना में पिछड़ रही है।


कृषि मंत्रालय के अनुसार 17 अप्रैल 2026 तक देशभर में समर सीजन की फसलों की बुआई बढ़कर 69.06 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 66.14 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

समर की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू सीजन में घटकर केवल 30.64 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 32.31 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। समर सीजन में धान की रोपाई सामान्यत 31.49 लाख हेक्टेयर में होती है तथा फसल सीजन 2025 में इसकी रोपाई 33.28 लाख हेक्टेयर में हुई थी।

समर सीजन में दालों की बुआई बढ़कर 15.47 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 13.49 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। समर में दलहन की प्रमुख फसल मूंग की बुआई 11.73 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 10.69 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान उड़द की बुआई बढ़कर 3.45 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 2.61 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। अन्य दालों की बुआई चालू समर सीजन में 0.30 लाख हेक्टेयर में हुई है।

मोटे अनाजों की बुवाई चालू समर सीजन में बढ़कर 13.81 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई 12.70 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान समर मक्का की बुआई 8.46 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 7.85 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। इस दौरान ज्वार की बुआई 37 हजार हेक्टेयर, बाजरा की 4.74 लाख हेक्टेयर तथा रागी की 21 हजार हेक्टेयर में ही हुई है।

चालू समर सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई बढ़कर 9.14 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 7.65 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। मूंगफली की बुआई चालू समर सीजन में बढ़कर 5.51 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 4.20 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान सनफ्लावर की 39 हजार हेक्टेयर में और शीशम सीड की बुआई 3.18 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है।

18 अप्रैल 2026

मिलों की कमजोर खरीद से अरहर एवं उड़द के साथ चना में गिरावट, मसूर तथा मूंग स्थिर

नई दिल्ली। दाल मिलों की मांग कमजोर बनी रहने से घरेलू बाजार में शुक्रवार को अरहर एवं उड़द के साथ ही चना की कीमतों में मंदा आया, जबकि इस दौरान मसूर एवं के भाव लगभग स्थिर बने रहे।


उत्पादक मंडियों में अरहर, चना, मसूर एवं उड़द के साथ ही मूंग के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी से नीचे बने हुए हैं।

बर्मा से आयातित उड़द एफएक्यू एवं एसक्यू की कीमत चेन्नई में स्थिर हो गई। उड़द एफएक्यू के भाव अप्रैल एवं मई शिपमेंट के 835 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ पर स्थिर हो गए, जबकि इस दौरान एसक्यू उड़द के भाव अप्रैल एवं मई शिपमेंट के 930 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ बोले गए। लेमन अरहर फसल सीजन 2026 के भाव चेन्नई में अप्रैल एवं मई शिपमेंट के भाव 845 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ पर स्थिर हो गए। लेमन अरहर फसल सीजन 2025 के भाव चेन्नई में अप्रैल एवं मई शिपमेंट के भाव 825 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ बोले गए।

केंद्रीय पूल में दलहन का 22 लाख टन का स्टॉक हैं, जबकि केंद्र सरकार को 35 लाख टन बफर स्टॉक की जरूरत है। केंद्रीय पूल में दलहन के कुल स्टॉक में, मूंग 780,000 टन है, इसके बाद अरहर का स्टॉक 550,000 टन, मसूर का 400,000 टन और चना का लगभग 300,000 टन है। पिछले सीजन में कमजोर खरीद के कारण सरकार के पास उड़द का स्टॉक बहुत कम है।

चेन्नई में उड़द की कीमत स्थिर हो गई, साथ ही इस दौरान बर्मा में इनकी कीमत स्थिर बनी रही। घरेलू बाजार में दाल मिलों की मांग कमजोर बनी रहने लगातार तीसरे दिन उड़द की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। जानकारों के अनुसार अप्रैल मध्य के बाद और मई के मध्य तक म्यांमार से उड़द के कई शिपमेंट आने की उम्मीद है, इसलिए कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। उधर खपत का सीजन होने के बावजूद भी उड़द दाल मांग कमजोर है, जिससे स्टॉकिस्टों में घबराहट पूर्ण बिकवाली बनी हुई है। आगामी दिनों में इसकी कीमतों में तेजी, मंदी गर्मियों की फसल की आवक के साथ ही इसके आयात पड़ते के आधार पर बनेगी। आंध्र प्रदेश में रबी उड़द की लगातार आवक और म्यांमार से आयात की उपलब्धता भी कीमतों पर दबाव डाल रही है। हालांकि उड़द मोगर एवं गोटा में मांग पहले की तुलना में बढ़ी है। केंद्रीय पूल में उड़द का स्टॉक केवल 80,000 टन का ही है। मंडियों में उड़द की कीमत 7,800 रुपये प्रति क्विंटल एमएसपी की तुलना में डेढ़ से दो फीसदी नीचे हैं।

चेन्नई में लेमन अरहर की कीमत स्थिर हो गई, साथ ही इस दौरान बर्मा में इसके दाम लगातार तीसरे दिन भी स्थिर बने रहे। हालांकि घरेलू बाजार में दाल मिलों की मांग कमजोर होने से अरहर की कीमतों में गिरावट जारी रही। व्यापारियों के अनुसार चालू सप्ताह के आरंभ में बर्मा के साथ ही अफ्रीकी देशों से आयातित अरहर के दाम कमजोर हुए थे, जिससे घरेलू बाजार में इसकी कीमतों पर दबाव है। भाव में चल रही गिरावट को देखते हुए दाल मिलें केवल जरुरत के हिसाब से खरीद कर रही हैं। अरहर की समर्थन मूल्य पर कई राज्यों में खरीद हो रही है लेकिन खरीद भी सीमित मात्रा में ही हो रही है। केंद्र सरकार ने अरहर का समर्थन मूल्य 8,000 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है लेकिन उत्पादक मंडियों में देसी अरहर के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुकाबले सात से आठ फीसदी नीचे आ गए हैं। चालू सीजन में अरहर की समर्थन मूल्य पर खरीद दो लाख टन की हुई है।

अफ्रीकी देशों से आयातित सफेद अरहर के दाम नवा सेवा बंदरगाह पर 685 से 690 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ पर स्थिर हो गए। गजरी के दाम 680 से 685 डॉलर प्रति टन पर स्थिर हो गए। इस दौरान अरुषा अरहर के भाव 730 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ पर स्थिर हो गए।

दाल मिलों की मांग कमजोर होने से दिल्ली में चना की कीमत 25 रुपये नरम हुई। व्यापारियों के अनुसार चना में बढ़ी हुई कीमतों में मिलों की खरीद का समर्थन नहीं मिल पा रहा। इसलिए दाम कमजोर हुए हैं। हालांकि मध्य प्रदेश और राजस्थान की उत्पादक मंडियों में चना की दैनिक आवक बराबर बनी हुई है, लेकिन कुल आवक की तुलना में खरीद नहीं बढ़ पा रही। इसलिए चना की कीमतों में अभी बड़ी तेजी के आसार नहीं है। हालांकि चालू सीजन में पीली मटर का कुल आयात पिछले साल की तुलना में कम हुआ है, जिससे चना की मांग में बढ़ोतरी का अनुमान है। बंदरगाह पर आयातित का स्टॉक ज्यादा है लेकिन गुजरात एवं कर्नाटक तथा महाराष्ट्र की मंडियों में चना की आवक पहले की तुलना में कम हुई है। उत्पादक मंडियों में देसी चना के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी 5,875 रुपये प्रति क्विंटल से 10 फीसदी से ज्यादा नीचे बने हुए हैं।

ऑस्ट्रेलिया से आयातित चना के भाव केंटनर में अप्रैल एवं मई डिलीवरी के 580 डॉलर तथा वैसल में इसके दाम 540 डॉलर प्रति, टन सीएडंएफ पर स्थिर हो गए। तंजानिया के चना के भाव अप्रैल एवं मई शिपमेंट के नवा सेवा बंदरगाह पर 565 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ पर स्थिर हो गए।

चने की समर्थन मूल्य पर खरीद एक लाख टन की हुई है। मध्य प्रदेश और राजस्थान से खरीद बढ़ने की उम्मीद है।

देसी मसूर के दाम दिल्ली में स्थिर हो गए, साथ ही इस दौरान बंदरगाह पर आयातित की कीमत स्थिर बनी रही। व्यापारियों के अनुसार मसूर के भाव में यहां से बड़ी गिरावट के आसार नहीं है, क्योंकि उत्पादक मंडियों में इसके भाव समर्थन मूल्य से काफी नीचे बने हुए हैं। उत्पादक राज्यों मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की मंडियों में नई फसल की आवक अपेक्षा अनुरूप बढ़ नहीं पा रही है, क्योंकि जानकार उत्पादन कम मान रहे हैं। इस दाल मिलें जरुरत के हिसाब से खरीद ही कर रही है, हालांकि खपत का सीजन होने के कारण मसूर दाल में बिहार एवं बंगाल तथा असम की मांग बनी रहेगी। केंद्रीय पूल में चार लाख टन मसूर का स्टॉक है। मसूर के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी 7,000 रुपये प्रति क्विंटल से 3.5 से 4 फीसदी नीचे आ गए हैं।


कनाडा से एक जहाज जिसमें कुल 43,278.110 टन दलहन हैं, (11,000 टन मसूर और 32,278.110 टन पीली मटर) इसके 19 अप्रैल, 2026 को मुंद्रा बंदरगाह पर पहुंचने की उम्मीद है।

मसूर की समर्थन मूल्य पर खरीद सीमित मात्रा में ही हो रही है। केंद्रीय पूल में मसूर का स्टॉक 400,000 टन का है।

मूंग के दाम अधिकांश उत्पादक मंडियों में स्थिर बने रहे। व्यापारियों के अनुसार मूंग की कीमतों में अभी बड़ी तेजी के आसार नहीं है क्योंकि दाल मिलें जरूरत के हिसाब से ही खरीद कर रही है तथा कई राज्यों में मूंग की समर्थन मूल्य पर खरीद तो हो रही है, लेकिन कुल आवक की तुलना में खरीद सीमित मात्रा में ही हो रही है। मौसम अनुकूल रहा मूंग की आवक उत्पादक मंडियों में अभी बनी रहने की उम्मीद है। चालू समर सीजन में भी मूंग की बुआई बढ़ी है। उधर केंद्रीय पूल मूंग का स्टॉक सबसे ज्यादा है। अत: अभी इसके भाव में बड़ी तेजी मानकर व्यापार नहीं करना चाहिए। मूंग की कीमत उत्पादक मंडियों में एमएसपी 8,768 प्रति क्विंटल की तुलना में 18 से 20 फीसदी नीचे है।

चेन्नई में उड़द एफएक्यू के दाम 50 रुपये कमजोर होकर 7,800 से 7,825 रुपये प्रति क्विंटल रह गए, जबकि एसक्यू के भाव 50 रुपये घटकर 8,400 से 8,425 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए।

दिल्ली में उड़द एफएक्यू के दाम 75 रुपये घटकर 8,200 से 8,225 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए, जबकि एसक्यू के भाव 8,825 से 8,850 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

मुंबई में उड़द एफएक्यू के दाम 75 रुपये कमजोर होकर 7,900 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

कोलकाता में उड़द एफएक्यू के दाम 25 रुपये कमजोर होकर 8,100 से 8,125 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

गुंटूर में उड़द पॉलिश के दाम 50 रुपये घटकर 7,850 से 7,900 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। विजयवाड़ा में उड़द पॉलिश के भाव 7,950 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

चेन्नई में लेमन अरहर भाव शाम के सत्र में 25 रुपये कमजोर होकर 7,500 से 7,525 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

दिल्ली में लेमन अरहर के भाव शाम के सत्र में 7,725 से 7,750 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

मुंबई में लेमन अरहर के भाव शाम के सत्र में 25 रुपये कमजोर होकर 7,500 से 7,525 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

देसी अरहर के दाम कानपुर, सोलापुर, जलगांव और नागपुर में कमजोर हुए, जबकि अन्य अधिकांश उत्पादक मंडियों में स्थिर बने रहे।

मुंबई में अफ्रीकी देशों से आयातित अरहर के भाव स्थिर हो गए। सूडान से आयातित अरहर के भाव 6,750 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। इस दौरान गजरी अरहर के भाव 6,250 से 6,300 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए। मतवारा की अरहर का स्टॉक नहीं है। सफेद अरहर के दाम 6,300 से 6,350 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

दिल्ली में देसी मसूर के दाम 6,600 से 6,625 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

कनाडा की मसूर के दाम कंटेनर में 6,125 से 6,150 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। जबकि ऑस्ट्रेलिया की मसूर के भाव कंटेनर में 6,075 से 6,125 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए। कनाडा की मसूर के दाम मुद्रा बंदरगाह पर 5,925 से 5,950 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। हजिरा बंदरगाह पर इसके दाम 6,000 से 6,025 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। बरेली में देसी मसूर के भाव 6,550 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

दिल्ली में राजस्थान के नए चना के दाम 25 रुपये नरम होकर 5,475 से 5,500 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। इस दौरान मध्य प्रदेश के नए चना का व्यापार 25 रुपये घटकर 5,425 से 5,450 रुपये प्रति क्विंटल की दर से हुआ। जयपुर लाइन के चना के भाव 25 रुपये कमजोर होकर 5,450 से 5,475 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

इंदौर में बोल्ड किस्म के मूंग के दाम 8,200 से 8,400 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। इस दौरान जयपुर में चमकी मूंग के भाव 7,450 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर बने रहे। राजस्थान लाइन की मूंग के दाम दिल्ली में 7,000 से 7,900 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। अकोला में चमकी मूंग के दाम 8,300 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

चीनी उत्पादन में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक की 85 फीसदी से ज्यादा की हिस्सेदारी

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) में मध्य अप्रैल तक देशभर के राज्यों में चीनी का उत्पादन बढ़कर 273.90 लाख टन का हुआ है। इसमें महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक की हिस्सेदारी 235 लाख टन के साथ तकरीबन 85 फीसदी है।


नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) के आकड़ों के मुताबिक इन तीन राज्यों ने चीनी उत्पादन में हमेशा अहम भूमिका निभाई है। इन तीन राज्यों में चीनी रिकवरी देखी जाए तो उत्तर प्रदेश 10.20 फीसदी की रिकवरी दर के साथ सबसे आगे है।इसके बाद 9.50 फीसदी की रिकवरी दर के साथ महाराष्ट्र दुसरे और 8.60 फीसदी की रिकवरी के साथ कर्नाटक तीसरे नंबर पर है।

देशभर के राज्यों में 541 चीनी मिलों ने पेराई आरंभ की थी, जिनमें से 15 अप्रैल तक केवल 21 चीनी मिलों में पेराई चल रही है, बाकि सभी मिलों पेराई बंद कर चुकी है। चालू पेराई सीजन में देश में कुल 2865.21 लाख टन गन्ने की पेराई की गई है। पिछले सीजन की बात करें तो 2024-25 में 534 चीनी मिलों ने पेराई में हिस्सा लिया था और 15 अप्रैल 2025 तक 520 चीनी मिलें बंद हो गई थी। चीनी मिलों द्वारा 2,713.88 लाख टन गन्ना पेराई कर 254.30 लाख टन चीनी उत्पादन हुआ था। चालू सीजन में देश में चीनी रिकवरी की दर पिछले सीजन से ज्यादा बैठी है। देश में औसत चीनी रिकवरी 9.56 फीसदी है जबकि पिछले सीजन में इसी समय औसत चीनी रिकवरी की दर 9.37 फीसदी थी।

चीनी के उत्पादन के मामलें में महाराष्ट्र सबसे आगे है और उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर पर है। एनएफसीएसएफ के आंकड़ों के मुताबिक, महाराष्ट्र में अब तक 99.20 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका है जबकि उत्तर प्रदेश में अब तक 89.20 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। तीसरे नंबर पर कर्नाटक है। कर्नाटक में चालू सीजन में 15 अप्रैल तक 47.15 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है।

अन्य राज्यों में गुजरात में मध्य अप्रैल तक 7.50 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है जबकि आंध्रप्रदेश  0.70 लाख टन, बिहार में 5.80 लाख टन, हरियाणा में 4.50 लाख टन, मध्य प्रदेश में 4.50 लाख टन, पंजाब में 4.25 लाख टन, तमिलनाडु में 5.30 लाख टन तथा तेलंगाना में 2.00 लाख टन, उत्तराखंड में 2.85 लाख टन और अन्य राज्यों में कुल 0.95 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है।

सीसीआई ने कॉटन के बिक्री दाम बढ़ाए, गुजरात के साथ ही उत्तर भारत में इसके भाव तेज

नई दिल्ली। कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया, सीसीआई ने बुधवार को कॉटन की बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी की जिससे स्पिनिंग मिलों की खरीद बढ़ने से शाम के सत्र में गुजरात के साथ ही उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन की कीमतों में तेजी दर्ज की गई।


सीसीआई ने बुधवार को कॉटन की बिक्री कीमतों में 900 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी 356 किलो की बढ़ोतरी की। इस दौरान निगम ने फसल सीजन 2025-26 की कुल 60,100 गांठ कॉटन की बिक्री की, जिसमें से स्पिनिंग मिलों ने 23,000 गांठ एवं व्यापारियों ने 37,100 गांठ कॉटन की खरीद की।

गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव बुधवार को 300 रुपये तेज होकर 59,600 से 60,000 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो हो गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव तेज होकर 5,930 से 6,130 रुपये प्रति मन बोले गए।हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 5,780 से 5,930 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम तेज होकर 5,800 से 6,130 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 56,300 से 57,300 रुपये कैंडी बोले गए। देशभर की मंडियों में कपास की आवक 47,500 गांठ, एक गांठ-170 किलो की हुई।

घरेलू वायदा कारोबार में कॉटन की कीमतों में तेजी का रुख रहा। एनसीडीईएक्स पर अप्रैल 26 महीने के वायदा अनुबंध में कपास के दाम 22 रुपये तेज होकर 1,662 रुपये प्रति 20 किलो हो गए। इस दौरान आईसीई के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग में कॉटन की कीमतों में तेजी का रुख रहा।

प्रमुख उत्पादक राज्यों में कपास की कीमत स्थिर हो गई। जानकारों के अनुसार चालू सीजन में मार्च अंत तक उत्पादक मंडियों में 292.74 लाख गांठ से ज्यादा कॉटन की आवक हो चुकी है।

सीसीआई द्वारा बिक्री कीमत तेज करने से स्पिनिंग मिलों की मांग बढ़ गई, जिससे गुजरात के साथ ही उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन की कीमतों में तेजी आई। व्यापारियों के अनुसार घरेलू बाजार में अधिकांश स्पिनिंग मिलों के पास कॉटन का बकाया स्टॉक कम है, जबकि यार्न में निर्यात मांग अच्छी बनी हुई है, इसलिए मिलों को कॉटन की ज्यादा खरीद सीसीआई से करनी पड़ रही है। सीसीआई घरेलू बाजार में लगातार कॉटन बेच रही है तथा निगम के पास कॉटन का बंपर स्टॉक है। अत: घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतों में तेजी, मंदी काफी हद तक सीसीआई के बिक्री दाम पर निर्भर करेगी।

हाल ही में उद्योग ने इसके उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी की है जबकि चालू सीजन में कॉटन का आयात भी बढ़ेगा, हालांकि प्राइवेट जिनर्स के पास अच्छी क्वालिटी की कॉटन का बकाया स्टॉक कम है, जिस कारण उनकी बिकवाली भी कमजोर बनी हुई है।

अक्टूबर से मार्च के दौरान सोया डीओसी का निर्यात 30.57 फीसदी घटा - सोपा

नई दिल्ली। चालू फसल सीजन 2025-26 के पहली छमाही अक्टूबर 25 से मार्च 26 के दौरान देश से सोया डीओसी का निर्यात 30.57 फीसदी घटकर 7.72 लाख टन का ही हुआ है, जबकि इसके पिछले फसल सीजन की समान अवधि में 11.12 लाख टन का निर्यात हुआ था।


सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, सोपा के अनुसार चालू फसल सीजन 2025-26 के पहले छह महीनों अक्टूबर से मार्च के दौरान 44.98 लाख टन सोया डीओसी का उत्पादन हुआ है, जबकि इसके पिछले साल का करीब 0.68 लाख टन का बकाया स्टॉक बचा हुआ था। इस दौरान 7.72 लाख टन सोया डीओसी का निर्यात हुआ है जबकि 4.20 लाख टन की खपत फूड में एवं 32.50 लाख टन की फीड में हुई है। अत: पहली अप्रैल 2026 को मिलों के पास 1.24 लाख टन सोया डीओसी का बकाया स्टॉक बचा हुआ है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 1.10 लाख टन से ज्यादा है।

सोपा के अनुसार चालू फसल सीजन 2025-26 के पहले छह महीनों में देशभर की उत्पादक मंडियों में 63 लाख टन सोयाबीन की आवक हुई है, जबकि मार्च अंत तक 57 लाख टन की पेराई हुई है। इस दौरान 2.80 लाख टन सोयाबीन की खपत डारेक्ट हुई है जबकि 0.11 लाख टन का निर्यात हुआ है। अत: प्लांटों एवं व्यापारियों तथा किसानों के पास पहली अप्रैल 2026 को 51.10 लाख टन सोयाबीन का बकाया स्टॉक बचा हुआ है, जोकि इससे पिछले साल की समान अवधि के 63.01 लाख टन की तुलना में कम है।

सोपा के अनुसार फसल सीजन 2025-26 में देश में सोयाबीन का उत्पादन 110.26 लाख टन का हुआ था, जबकि 7.66 लाख टन का बकाया स्टॉक नई फसल की आवक के समय बचा हुआ था। अत: कुल उपलब्धता 117.92 लाख टन की बैठी है, जबकि फसल सीजन 2025-26 के पहले छह महीनों में ही करीब 6 लाख टन सोयाबीन का आयात हुआ है। फसल सीजन 2024-25 में 128.82 लाख टन सोयाबीन का उत्पादन हुआ था, जबकि नई फसल की आवक के समय 8.94 लाख टन का बकाया स्टॉक बचा हुआ था। अत: कुल उपलब्धता 137.76 लाख टन की बैठी थी, जबकि 0.02 लाख टन का ही आयात हुआ था।

14 अप्रैल 2026

चालू तेल वर्ष के पहले चार महीनों में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 8 फीसदी बढ़ा - एसईए

नई दिल्ली। चालू तेल वर्ष 2025-26 के पहले पांच महीनों नवंबर-25 एवं मार्च-26 के दौरान देश में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 8 फीसदी बढ़कर 6,572,131 टन का हुआ है, जबकि पिछले तेल वर्ष की समान अवधि में इनका आयात 6,096,923 टन का हुआ था। मार्च 2026 में खाद्य तेलों का आयात पिछले महीने (फरवरी, 2026) के 12.92 लाख टन की तुलना में 10 फीसदी होकर 11.93 लाख टन का रह गया।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार मार्च 2026 में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 11 फीसदी बढ़कर 1,186,569 टन का हुआ है, जबकि पिछले साल मार्च में इनका आयात 1,073,023 टन का हुआ था। इस दौरान खाद्य तेलों का आयात 1,173,168 टन का एवं अखाद्य तेलों का आयात 13,401 टन का हुआ है।

एसईए के अनुसार नवंबर’25 से मार्च’26 के आयात डेटा से पता चलता है कि भारत के खाद्य तेलों के आयात में पिछले साल समान अवधि के मुकाबले 8 फीसदी की मामूली बढ़ोतरी हुई है, जो विश्व सप्लाई पर लगातार इंडिपेंडेंस दिखाता है। हालांकि, मार्च में फरवरी की तुलना में गिरावट से पता चलता है कि विश्व बाजार में दाम तेज होना तथा रुपये में गिरावट और घरेलू उपलब्धता, खासकर सरसों की फसल आने की वजह से मांग प्रभावित हुई है।

दिसंबर और फरवरी के बीच आयात में तेज बढ़ोतरी विश्व बाजार में सप्लाई में रुकावट की चिंताओं की ओर इशारा करती है, खासकर सूरजमुखी के तेल पर असर डालने वाले चल रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष, पाम तेल के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया में सप्लाई-साइड की अनिश्चितताओं और मिडिल ईस्ट तनाव के कारण बढ़ी हुई माल ढुलाई लागत है। इसके अलावा, बड़े उत्पादक देशों में बायोफ्यूल की ओर झुकाव सहित मजबूत विश्व की मांग ने कीमतों को स्थिर रखा है, जिससे भारतीय रिफाइनर सावधानी से इंतजार करों एवं देखो की नीति अपना रहे हैं।

जानकारों के अनुसार आगे चलकर, जब तक विश्व बाजार में कीमत नरम नही होती या करेंसी की हालत बेहतर नहीं होती, तब तक शॉर्ट टर्म में आयात कम रहने की संभावना है, जबकि लॉन्ग टर्म में, देश जियोपॉलिटिकल रिस्क को कम करने के लिए घरेलू तिलहन उत्पादन में बढ़ोतरी पर फोकस करने के साथ ही आयात को बैलेंस करना जारी रख सकता है।

नवंबर’25 से मार्च’26 के दौरान नेपाल ने लगभग 162,000 टन रिफाइंड तेल निर्यात किया है, जिसमें 142,133 टन रिफाइंड सोया तेल, 12,123 टन रिफाइंड सूरजमुखी तेल और 6,793 टन आरबीडी पामोलिन शामिल है। फरवरी 2026 में, नेपाल ने लगभग 55,000 टन रिफाइंड तेल निर्यात किया, जिसमें मुख्य रूप से रिफाइंड सोया तेल और थोड़ी मात्रा में सूरजमुखी तेल के अलावा आरबीडी पामोलिन शामिल थे।

एसईए के अनुसार नवंबर 25 से मार्च 26 के दौरान 952,170 टन के मुकाबले केवल 192,486 टन रिफाइंड पाम तेल का आयात हुआ और नवंबर 24 से मार्च 25 के दौरान 4,978,288 टन के मुकाबले 6,260,337 टन क्रूड तेल का आयात हुआ। रिफाइंड तेल का रेश्यो तेजी से घटकर 16 फीसदी से 3 फीसदी ही रह गया, जबकि क्रूड पाम तेल के आयात में बढ़ोतरी की वजह से क्रूड तेल का रेश्यो एक साल पहले के 84 फीसदी से बढ़कर 97 फीसदी हो गया।

नवंबर’25 से मार्च’26 के आयात डेटा से पता चलता है कि देश इंडोनेशिया और मलेशिया से क्रूड पाम तेल के आयात पर सबसे ज्यादा निर्भर है। दोनों मिलकर 2.8 मिलियन टन से ज्यादा का योगदान देते हैं, जिससे भारत की खाने के तेल की मुख्य जरूरतों के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया पर निर्भरता ज्यादा है। साथ ही अर्जेंटीना और ब्राजील सोया तेल के आयात के लिए रीढ़ बने हुए हैं, जबकि रूस और यूक्रेन, ब्लैक सी क्षेत्र में चल रहे जियोपॉलिटिकल तनाव के बावजूद, सूरजमुखी तेल के जरूरी सप्लायर बने हुए हैं।

इंडोनेशिया द्वारा भविष्य में निर्यात पर रोक, बायोडीजल की शर्तें, या रूस-यूक्रेन संघर्ष में बढ़ोतरी जैसी कोई भी रुकावट सीधे देश में खाद्य तेलों की उपलब्धता और कीमतों पर असर डाल सकती है। रिफाइंड तेलों के लिए नेपाल का आयात के रूप में उभरना, भारत को घरेलू रिफाइनिंग क्षमता को कम करके और रेवेन्यू लीकेज की वजह से नुकसान पहुंचा रहा है।

कॉटन का उत्पादन बढ़कर 324 लाख गांठ होने का अनुमान - सीएआई

नई दिल्ली। उद्योग ने एक बार फिर कॉटन के उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी की है। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू फसल सीजन 2025-26 में देश में कॉटन का उत्पादन 3.50 लाख गांठ, (एक गांठ 170 किलो) बढ़कर 324 लाख गांठ होने का अनुमान है, जबकि इससे पहले 320.50 लाख गांठ के उत्पादन का अनुमान जारी किया था।


मालूम हो कि उद्योग ने दिसंबर 2025 में 309.50 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान जारी किया था, जोकि आरंभिक अनुमान से 4.50 लाख गांठ ज्यादा था। इसके बाद उद्योग ने इसे बढ़ाकर 317 लाख गांठ का कर दिया। मार्च में उद्योग ने एक फिर इसे बढ़ाकर 320.50 लाख गांठ कर दिया था।

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया, सीएआई के अनुसार महाराष्ट्र में कॉटन का उत्पादन इसके पहले के अनुमान से 7 लाख गांठ ज्यादा होने की उम्मीद है, जबकि गुजरात में पहले के अनुमान में 3 लाख गांठ एवं मध्य प्रदेश में 50 हजार गांठ की कमी आने का अनुमान है।

सीएआई के अनुसार उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन का कुल उत्पादन 29 लाख गांठ होने का अनुमान है। इसमें पंजाब की हिस्सेदारी 1.50 लाख गांठ, हरियाणा की 7 लाख गांठ के अलावा अपर राजस्थान में 12 लाख गांठ के अलावा लोअर राजस्थान में 8.50 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है।

मध्य भारत के राज्यों में कॉटन का उत्पादन 194.50 लाख गांठ होने का अनुमान है। इसमें गुजरात की हिस्सेदारी 72 लाख गांठ तथा महाराष्ट्र की 105 लाख गांठ के अलावा मध्य प्रदेश की 17.50 लाख गांठ है।

दक्षिण भारत के राज्यों में चालू फसल सीजन में 95 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है। इसमें तेलंगाना की हिस्सेदारी 45 लाख गांठ, आंध्र प्रदेश 18 लाख गांठ के अलावा कर्नाटक 27 लाख गांठ तथा तमिलनाडु में 5 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है।

अन्य राज्यों में ओडिशा में चालू सीजन में 3.50 लाख गांठ तथा अन्य राज्यों में 2 लाख गांठ के उत्पादन का अनुमान है।

सीएआई के अनुसार पहली अक्टूबर 2025 से 31 मार्च 2026 तक प्रमुख उत्पादक राज्यों की मंडियों में 292.74 लाख गांठ कॉटन की आवक हो चुकी है। अभी तक कुल आवकों में उत्तर भारत के राज्यों में 27.10 लाख गांठ की आवक हुई है जिसमें पंजाब की हिस्सेदारी 1.50 लाख गांठ, हरियाणा की 6.50 लाख गांठ तथा अपर राजस्थान की 10.90 लाख गांठ के अलावा लोअर राजस्थान की 8.20 लाख गांठ है।

मध्य भारत के राज्यों में 31 मार्च तक 171.43 लाख गांठ कॉटन की आवक हो चुकी है, जिसमें गुजरात की हिस्सेदारी 58.44 लाख गांठ, महाराष्ट्र की 96.39 लाख गांठ के अलावा मध्य प्रदेश की 16.60 लाख गांठ है।

दक्षिण भारत के राज्यों में मार्च अंत तक 88.86 लाख गांठ कॉटन की आवक हो चुकी है, जिसमें तेलंगाना में 45 लाख गांठ, आंध्र प्रदेश में 17.06 लाख गांठ तथा कर्नाटक में 24.75 लाख गांठ के अलावा तमिलनाडु में 2.05 लाख गांठ की हिस्सेदारी है।

ओडिशा में चालू सीजन में मार्च अंत तक 3.35 लाख गांठ तथा अन्य राज्यों में 2 लाख गांठ की आवक हुई है।

यूरोप में शिपमेंट बढ़ाने हेतु केंद्र ने चावल के निर्यात नियमों दी छूट, घरेलू बाजार में भाव तेज

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने कई यूरोपीय देशों को छह महीने के लिए बिना किसी जरूरी इंस्पेक्शन सर्टिफिकेट के बासमती और नॉन-बासमती चावल का निर्यात करने की इजाजत दे दी है। घरेलू बाजार में चावल के साथ ही धान की कीमतों में तेजी बनी हुई है। गेहूं की सरकारी खरीद शुरू होने के कारण हरियाणा एवं पंजाब की मंडियों में धान की आवक लगभग बंद है।


केंद्र सरकार द्वारा शुक्रवार को जारी एक अधिसूचना के अनुसार यूरोपियन यूनियन के सदस्य देशों, यूनाइटेड किंगडम, आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड के लिए निर्यात इंस्पेक्शन एजेंसियों से सर्टिफिकेशन की जरूरत जारी रहेगी, जबकि दूसरे यूरोपीय देशों को इस दौरान छूट दी गई है।

घरेलू बाजार में हाल ही में चावल के साथ ही धान की कीमतों में तेजी आई है। दिल्ली की नजफगढ़ मंडी में पूसा 1,121 किस्म के धान के भाव तेज होकर शुक्रवार को 4,871 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। इस दौरान हरियाणा की गोहाना मंडी में 1,885 किस्म के धान के दाम तेज होकर 4,400 से 4,800 रुपये तथा राजस्थान की कोटा मंडी में 1,509 किस्म के धान के दाम तेज होकर 3,900 से 4,200 रुपये और 1,718 किस्म के धान के भाव 4,000 से 4,661 रुपये तथा डीपी किस्म के धान के दाम तेज होकर 4,000 से 4,425 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।

राजस्थान लाइन से 1,718 किस्म के सेला चावल का व्यापार 8,500 से 8,700 रुपये तथा पंजाब लाईन 1885 किस्म के स्टीम चावल का व्यापार 9,400 से 9,600 रुपये प्रति क्विंटल की दर से हुआ। दिल्ली के नया बाजार में 1,121 किस्म के सेला चावल का भाव 9,400 से 9,600 तथा इसके स्टीम चावल का भाव 10,200 से 10,400 रुपये प्रति क्विंटल रहा।  

इस कदम का मकसद विश्व बाजार में बढ़ती मांग के समय चावल निर्यात को सपोर्ट देना है। द हंस इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 में भारत का चावल निर्यात 12.95 बिलियन डॉलर था, जबकि दालों और बाजरे के शिपमेंट की कीमत क्रमशः 855 मिलियन डॉलर और 59.20 मिलियन डॉलर थी, जो दुनिया भर में अलग-अलग तरह के अनाजों की बढ़ती मांग को दिखाता है।

केंद्रीय यूनियन कॉमर्स और इंडस्ट्री मंत्री पीयूष गोयल ने पहले कहा था कि 2014 और 2025 के बीच चावल का निर्यात 62 फीसदी बढ़ा है, जो ग्लोबल फूड मार्केट में भारत की बढ़ती मौजूदगी को दिखाता है।

देश में चावल का उत्पादन मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल के साथ ही मध्य प्रदेश और राजस्थान तथा बिहार आदि राज्यों में होता है, जबकि गेहूं का उत्पादन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में सबसे ज्यादा होता है।

इस साल की शुरुआत में, भारतीय खाद्य निगम, एफसीआई ने ग्लोबल मानवीय कामों के लिए 200,000 टन चावल सप्लाई करने के लिए वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के साथ एक एग्रीमेंट साइन किया था। यह एग्रीमेंट पांच साल के लिए अधिकृत है, और इसमें 31 मार्च, 2026 तक मौजूदा कीमत 2,800 रुपये प्रति क्विंटल तय की गई है।

चालू समर सीजन में दलहन, तिलहन एवं मोटे अनाजों की बुआई बढ़ी - कृषि मंत्रालय

नई दिल्ली। चालू समर सीजन 2026 में दलहन एवं तिलहन के साथ ही मोटे अनाजों की बुआई में बढ़ोतरी हुई है, जबकि इस दौरान धान की रोपाई में कमी आई है।


कृषि मंत्रालय के अनुसार 3 अप्रैल 2026 तक देशभर में समर सीजन की फसलों की बुआई 0.84 फीसदी बढ़कर 58.29 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 57.80 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

समर की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू सीजन में घटकर केवल 30.12 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 32.59 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। समर सीजन में धान की रोपाई सामान्यत 31.49 लाख हेक्टेयर में होती है तथा फसल सीजन 2025 में इसकी रोपाई 33.28 लाख हेक्टेयर में हुई थी।

समर सीजन में दालों की बुआई बढ़कर 8.79 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 7.02 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। समर में दलहन की प्रमुख फसल मूंग की बुआई 6.09 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 4.91 हजार हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान उड़द की बुआई बढ़कर 2.942 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 1.93 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। अन्य दालों की बुआई चालू समर सीजन में 0.28 लाख हेक्टेयर में हुई है।

मोटे अनाजों की बुवाई चालू समर सीजन में बढ़कर 11.64 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई केवल 10.77 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान समर मक्का की बुआई 7.18 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 7.01 लाख हेक्टेयर की तुलना में बढ़ी है। इस दौरान ज्वार की बुआई 32 हजार हेक्टेयर में, बाजरा की 3.91 लाख हेक्टेयर तथा रागी की 21 हजार हेक्टेयर में हुई है।

चालू समर सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई बढ़कर 7.74 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 7.42 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। मूंगफली की बुआई चालू समर सीजन में बढ़कर 4.59 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 4.20 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान सनफ्लावर की 38 हजार हेक्टेयर में और शीशम सीड की बुआई 2.71 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई क्रमश: 36 हजार हेक्टेयर और 2.80 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

केंद्र सरकार चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य बढ़ाकर 41 रुपये तय करें - एनएफसीएसएफ

नई दिल्ली। चीनी मिलों को वित्तीय संकट से उबारने और किसानों के बकाया भुगतान को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य (एमएसपी) को 31 रुपये से बढ़ाकर 41  रुपये प्रति किलो तय करें।


नेशनल फेडरेशन ऑफ कोआपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज (एनएफसीएसएफ) ने कोऑपरेटिव शुगर सेक्टर में बढ़ते फाइनेंशियल स्ट्रेस को दूर करने के लिए केंद्र सरकार से तुरंत पॉलिसी में दखल देने की मांग की है।

एनएफसीएसएफ के प्रेसिडेंट हर्षवर्धन पाटिल और मैनेजिंग डायरेक्टर प्रकाश नाइकनवरे के नेतृत्व में एक डेलिगेशन ने सेक्टर की चिंताओं को दूर करने के लिए नई दिल्ली में कोऑपरेशन मिनिस्ट्री के सचिव, आईएएस, डॉ. आशीष कुमार भूटानी से मुलाकात की। उन्होंने बताया कि कोऑपरेटिव शुगर मिलों पर गन्ने की बढ़ती लागत, चीनी की कम कीमतों और बढ़ते गन्ने के बकाए के कारण चीनी मिलों को फाइनेंशियल दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

गन्ना पेराई सीजन 2025-26 के लिए चीनी का उत्पादन कम हुआ है, लेकिन उत्पादक लागत जोकि करीब 4,100 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि चीनी के एक्स-मिल भाव 3,850 रुपये प्रति क्विंटल के बीच का अंतर फाइनेंशियल नुकसान का कारण बन रहा है, जिस कारण किसानों को समय पर भुगतान नहीं हो पा रहा है।

उन्होंने केंद्र सरकार से चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य (एमएसपी) 31 से बढ़ाकर 41 प्रति किलो करने की मांग की है। इसके साथ ही एथेनॉल के खरीद मूल्य में वृद्धि की जाए तथा चीनी उद्योग के लिए इथेनॉल उत्पादन कोटा 50 फीसदी तक बढ़ाया जाए। चीनी विकास निधि के तहत ओटीएस योजना में सुधार किया जाए, जिसमें मिलों को दंडात्मक ब्याज में 50 फीसदी की छूट मिले।

एनएफसीएसएफ ने इस बात पर जोर दिया कि कोऑपरेटिव चीनी मिलों को स्थिर करने, लिक्विडिटी में सुधार करने और गन्ना किसानों को तुरंत भुगतान करने के लिए समय पर सरकारी दखल देना बहुत जरूरी है। फेडरेशन कोऑपरेटिव चीनी सेक्टर की लंबे समय तक चलने वाली सस्टेनेबिलिटी पक्का करने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम करने का अपना वादा दोहराता है।

मार्च अंत तक उत्तर भारत के राज्यों में 25.49 लाख गांठ कॉटन की आवक हुई

नई दिल्ली। उत्तर भारत के राज्यों पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान की मंडियों में 31 मार्च 2026 तक 25.49 लाख गांठ, एक गांठ 170 किलो कॉटन की आवक हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 26.07 लाख गांठ की तुलना में कम है।


इंडियन कॉटन एसोसिएशन लिमिटेड, आईसीएल के अनुसार चालू फसल सीजन 2025-26 के दौरान उत्तर भारत के राज्यों में 25.91 लाख गांठ कॉटन का उत्पादन होने का अनुमान है जबकि इसके पिछले साल इन राज्यों में 27.77 लाख गांठ का उत्पादन हुआ था।

उत्तर भारत के राज्यों में 38,293 गांठ कॉटन का स्टॉक प्राइवेट गोदामों में बचा हुआ है, जबकि 10,961 गांठ अनजिंड कॉटन की बची हुई है। मार्च अंत तक इन राज्यों में 25.12 लाख गांठ की परेसिंग हो चुकी है।

उत्तर भारत के राज्यों से फसल सीजन 2025-26 में सीसीआई ने 5,97,122 गांठ कॉटन की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी पर की थी, जिसमें से निगम मार्च अंत तक 4,75,871 गांठ की बिक्री कर चुकी है। अत: सीसीआई के पास पहली अप्रैल को उत्तर भारत के राज्यों में फसल सीजन 2025-26 की खरीदी हुई कॉटन का 1,21,251 गांठ का स्टॉक बचा हुआ है। इसके अलावा निगम के पास फसल सीजन 2024-25 का 4,800 गांठ एवं फसल सीजन 2023-24 का 11,500 गांठ का स्टॉक बचा हुआ है।

इन राज्यों में एमएनसी कंपनियों के पास पहली अप्रैल को 14,200 गांठ कॉटन का स्टॉक है।

कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया, सीसीआई द्वारा कॉटन की बिक्री कीमतों में लगातार दूसरे दिन 100 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो की बढ़ोतरी करने से मंगलवार को शाम के सत्र में उत्तर भारत में कॉटन की कीमतों में तेजी दर्ज की गई।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 5,850 से 6,050 रुपये प्रति मन बोले गए। हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव 5,700 से 5,850 रुपये प्रति मन बोले गए।
ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम तेज होकर 5,750 से 6,050 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 55,800 से 56,800 रुपये कैंडी बोले गए।

चालू समर सीजन में फसलों की बुआई 4.73 फीसदी पिछड़ी - कृषि मंत्रालय

नई दिल्ली। चालू समर सीजन 2026 में फसलों की कुल बुआई पिछले साल की तुलना में 4.73 फीसदी पीछे चल रही है। इस दौरान दलहन एवं तिलहन की बुआई बढ़ी है, जबकि धान की रोपाई के साथ मोटे अनाज एवं तिलहनी फसलों की बुवाई पिछले साल की तुलना में पिछड़ रही है।


कृषि मंत्रालय के अनुसार 27 मार्च 2026 तक देशभर में समर सीजन की फसलों की बुआई घटकर 49.87 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 52.35 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

समर की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू सीजन में घटकर केवल 28.50 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 30.69 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। समर सीजन में धान की रोपाई सामान्यत 31.49 लाख हेक्टेयर में होती है तथा फसल सीजन 2025 में इसकी रोपाई 33.28 लाख हेक्टेयर में हुई थी।

समर सीजन में दालों की बुआई बढ़कर 6.06 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 5.60 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। समर में दलहन की प्रमुख फसल मूंग की बुआई 3.91 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 3.65 हजार हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान उड़द की बुआई बढ़कर 1.90 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 1.77 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। अन्य दालों की बुआई चालू समर सीजन में 0.25 लाख हेक्टेयर में हुई है।

मोटे अनाजों की बुवाई चालू समर सीजन में घटकर 9.34 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई 9.71 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। इस दौरान समर मक्का की बुआई 6.36 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 6.91 लाख हेक्टेयर की तुलना में कम है। इस दौरान ज्वार की बुआई 26 हजार हेक्टेयर, बाजरा की 2.50 लाख हेक्टेयर तथा रागी की 20 हजार हेक्टेयर में ही हुई है।

चालू समर सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई घटकर 5.97 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 6.34 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। मूंगफली की बुआई चालू समर सीजन में घटकर 3.56 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 4.08 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। इस दौरान सनफ्लावर की 34 हजार हेक्टेयर में और शीशम सीड की बुआई 2.02 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। 

खेती की नई तकनीक एवं प्रशिक्षण और बाजार का पूरा समाधान एक ही जगह - शिवराज सिंह

रायसेन/नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के रायसेन के दशहरा मैदान में 11 से 13 अप्रैल 2026 तक आयोजित होने वाला राष्ट्रीय स्तर का उन्नत कृषि महोत्सव–प्रदर्शनी एवं प्रशिक्षण देश के किसानों को “प्रयोगशाला से खेत तक” और “बीज से बाजार तक” की पूरी यात्रा एक ही मैदान पर दिखाते हुए विकास की राह पर लेकर जाएगा।


यह सिर्फ मेला नहीं, बल्कि तीन दिनों का ऐसा कृषि महाकुंभ है जो किसानों की तकदीर बदलने का सबसे बड़ा मौका है। इसके उद्घाटन सत्र में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह किसानों का उत्साह बढ़ाएं, साथ ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे। 13 अप्रैल को समापन सत्र में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की उपस्थिति में क्षेत्र के लिए समग्र कृषि रोडमैप जारी किया जाएगा।

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस आयोजन के संबंध में क्षेत्र के प्रबुद्धजनों, प्रगतिशील किसानों और पदाधिकारियों तथा सभी जनप्रतिनिधियों की बैठक लेकर विस्तृत चर्चा की और कहा कि मध्य प्रदेश के रायसेन में 11 से 13 अप्रैल तक होने वाला राष्ट्रीय स्तर का उन्नत कृषि महोत्सव खेती‑किसानी का असली गेम चेंजर साबित होगा। दशहरा मैदान, रायसेन में लगने वाले इस विशाल राष्ट्रीय कृषि मेले में नई खेती तकनीकों, उन्नत बीज, ड्रोन व आधुनिक मशीनों, सूक्ष्म सिंचाई, पशुपालन–मत्स्यपालन, प्रसंस्करण, किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) और ग्रामीण आजीविका के सैकड़ों स्टॉल लगेंगे, जहाँ किसान देखेंगे भी, सीखेंगे भी और तुरंत लाभ लेने के तरीके भी समझेंगे।

उन्होंने बताया कि समापन सत्र में रायसेन, विदिशा, सीहोर और आसपास के समान एग्रो‑क्लाइमेटिक कृषि‑जलवायु क्षेत्र के लिए विशेष कृषि रोडमैप प्रस्तुत किया जाएगा, जिसमें उत्पादन बढ़ाने से लेकर बाजार तक पहुंच मजबूत करने की स्पष्ट दिशा दी जाएगी और जिसका विमोचन नितिन गडकरी की गरिमामय उपस्थिति में होगा।

केंद्रीय कृषि मंत्री ने बताया कि लगभग तीन सौ स्टॉलों वाली यह बहु‑क्षेत्रीय प्रदर्शनी खेती के हर चरण– इनपुट से लेकर प्रसंस्करण और विपणन तक के समाधान एक ही जगह उपलब्ध कराएगी। इसमें कृषि, बागवानी, सूक्ष्म सिंचाई, कृषि मशीनरी व टेक्नोलॉजी, उर्वरक, कीटनाशक, बीज कंपनियां, डिजिटल कृषि, फसल बीमा, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), स्टेट एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (एसएयू), कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), पशुपालन, मत्स्य, ग्रामीण विकास, खाद्य प्रसंस्करण, माइक्रो–स्मॉल एंड मीडियम इंटरप्राइजेज (एमएसएमई), भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (नेफेड), एफपीओ और स्टार्टअप्स की सक्रिय भागीदारी रहेगी। उन्होंने कहा कि किसानों के लिए विषयवार सेमिनार–प्रशिक्षण सत्र, लाइव डेमो, नुक्कड़ नाटक, सांस्कृतिक कार्यक्रम और अलग‑अलग राज्यों से आए प्रगतिशील किसानों के अनुभव साझा करने के विशेष कार्यक्रम भी आयोजित होंगे, जिससे “खेती का गेम चेंजर– राष्ट्रीय कृषि मेला, रायसेन” का संदेश सिर्फ पोस्टर तक सीमित न रहकर जमीन पर दिखे।

शिवराज सिंह ने बताया कि मेले में अलग‑अलग हॉल में तीनों दिन लगातार सेमिनार और प्रशिक्षण सत्र होंगे, जिनमें फसल कटाई के बाद प्रबंधन, दलहन–तिलहन उत्पादकता वृद्धि, मृदा स्वास्थ्य, प्राकृतिक खेती, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, कीट प्रबंधन, बीज प्रणाली, फसल बीमा, एआई आधारित डिजिटल कृषि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाइड्रोपोनिक्स (जल‑आधारित खेती), प्रिसिजन फार्मिंग (सटीक खेती) और वर्टिकल फार्मिंग (ऊर्ध्वाधर खेती) जैसे विषय शामिल हैं। फील्ड में लाइव डेमो के जरिए ड्रिप और स्प्रिंकलर सूक्ष्म सिंचाई, फर्टिगेशन (उर्वरक मिश्रित सिंचाई), न्यूट्री‑केयर से संतुलित पोषण, ऑटोमेशन‑आधारित स्मार्ट फार्मिंग, टिश्यू कल्चर पौध, ड्रोन से छिड़काव, रीपर–बाइंडर, हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, बेलर, रोटावेटर जैसी आधुनिक मशीनें किसानों को चलाकर दिखाई जाएँगी और उन्हें हाथों‑हाथ प्रशिक्षण दिया जाएगा।

आईसीएआर द्वारा मृदा परीक्षण की मोबाइल मिनी‑लैब, समेकित कृषि प्रणाली व प्राकृतिक खेती के लाइव मॉडल, डेयरी, बकरी पालन, कुक्कुट व मत्स्य पालन की यूनिट, मोबाइल वेटरनरी यूनिट, बीज मिनिकिट वितरण, बीमा कंपनियों द्वारा मौके पर फसल बीमा और किसान शिकायत व परामर्श के लिए हेल्पडेस्क की विशेष व्यवस्था रहेगी, जिससे “बीज से बाजार तक, प्रयोगशाला से खेत तक” की पूरी कड़ी एक ही परिसर में दिखाई देगी।