नई
दिल्ली। प्रतिकूल मौसम के कारण चालू खरीफ सीजन में धान की रोपाई 12.40
फीसदी पिछड़ कर 12 अगस्त तक देशभर में 309.79 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई
है, जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी रोपाई 353.62 लाख हेक्टेयर में हो चुकी
थी।
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार चालू मानसूनी सीजन में पहली जून से
13 अगस्त तक देशभर में सामान्य की तुलना में आठ फीसदी ज्यादा बारिश हुई
है, लेकिन अगर सब डिवीजनों के आधार पर देखें तो देशभर के 17 फीसदी हिस्से
में बारिश सामान्य की तुलना में कम हुई है, जिसका असर धान की रोपाई पर पड़ा
है।
प्रमुख उत्पादक राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम
बंगाल में बारिश की कमी के कारण धान की रोपाई तो कम हुई है, साथ ही रोपाई
हो चुकी फसल को भी नुकसान का डर है। पहली से 13 अगस्त के दौरान जहां पूर्वी
उत्तर प्रदेश में बारिश सामान्य की तुलना में 43 फीसदी कम हुई है, वहीं
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस दौरान 40 फीसदी बारिश सामान्य से कम दर्ज की
गई।
बिहार में चालू मानसूनी सीजन में बारिश सामान्य की तुलना में 39
फीसदी कम, झारखंड में 40 फीसदी तो पश्चिम बंगाल में 38 फीसदी कम हुई है।
इस का असर धान की रोपाई पर भी पड़ा है।
उत्तर प्रदेश में चालू खरीफ
में 12 अगस्त धान की रोपाई 56.03 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है, जोकि
पिछले साल की समान अवधि के 59.40 लाख हेक्टेयर से कम है। इस दौरान पश्चिमी
बंगाल में धान की रोपाई केवल 24.30 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जोकि पिछले
खरीफ सीजन की समान अवधि के 35.53 लाख हेक्टेयर से कम है।
बिहार
में चालू खरीफ में 12 अगस्त तक धान की रोपाई केवल 26.27 लाख हेक्टेयर में
ही हो पाई है, जोकि पिछले खरीफ सीजन की समान अवधि के 30.27 लाख हेक्टेयर से
कम है। झारखंड में चालू खरीफ में धान की रोपाई घटकर केवल 3.88 लाख
हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले खरीफ में इस समय तक राज्य में 15.25
लाख हेक्टेयर में बुआई हो चुकी थी।
इसके अलावा अन्य धान उत्पादक
राज्यों आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, मध्य प्रदेश, ओडिशा और तेलंगाना
में भी धान की रोपाई पिछले साल की तुलना में पिछड़ रही है, जिसका असर चालू
खरीफ में धान उत्पादन पर पड़ने की आशंका है।
जानकारों के अनुसार अगर
आने वाले दिनों में धान के रोपाई क्षेत्रफल में बढ़ोतरी नहीं होती है तो
देश में सामान्यतः 2.71 टन प्रति हेक्टेयर की औसत चावल उत्पादकता के आधार
पर चालू खरीफ सीजन में चावल का उत्पादन करीब 110 लाख टन घटने की आशंका है।
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