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17 अगस्त 2012
'बंद हों इलायची के नीलामी केंद्र'
इडुक्की जिले (केरल) के इलायची उत्पादकों ने नीलामी केंद्र को बंद कर खुले बाजार की व्यवस्था अपनाने का अनुरोध किया है। हाल में उत्पादकों के एक वर्ग ने केंद्र से इलायची का फ्लोर प्राइस तय करने की भी गुहार लगाई क्योंकि कमजोर मॉनसून के चलते उत्पादन में गिरावट के बावजूद बाजार धराशायी हो रहा है। इसकी औसत कीमतें फिलहाल 810 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास है जबकि मार्च-अप्रैल में इलायची 850-900 रुपये प्रति किलोग्राम पर बिक रही थी।
उत्पादकों के मुताबिक इस सीजन की शुरुआत में ताजा फसल की आपूर्ति 50 फीसदी घटी क्योंकि खराब मौसम का बुआई पर असर पड़ा था। काफी गर्म मौसम और कमजोर मॉनसून के कारण जिले में इलायची के ज्यादातर बागानों को नुकसान पहुंचा। इलायची के उत्पादन में इस जिले का करीब 60 फीसदी योगदान है। कट्टाप्पना के एक उत्पादक ने कहा कि नीलामी के जरिए कारोबार की व्यवस्था के चलते कीमतों में गिरावट हो रही है। नीलामी केंद्र में कुछ कारोबारी कीमतों पर फैसला करते हैं और उत्पादकों को औसत कीमत से काफी कम मिलता है। मसाला बोर्ड से मिले लाइसेंस के आधार पर कारोबारी नीलामी में हिस्सा ले सकते हैं। ऐसे में किसानों को मुट्ठी भर कारोबारियों और नीलामी केंद्रों के भाव पर निर्भर रहना पड़ता है।
किसानों के नवगठित संगठन ह्यूमन राइट प्रोटेक्शन बॉडी के अध्यक्ष आर. नजल्लनी ने कहा कि इलायची का उत्पादन करने वाले किसान मुश्किलों से जूझ रहे हैं क्योंंकि इसकी प्रति किलोग्राम उत्पादन लागत करीब 800 रुपये बैठती है। मजदूरी में बढ़ोतरी और मजदूरों की किल्लत के चलते वे परेशानी में हैं। बागान में काम करने वालों की औसत मजदूरी बढ़कर 400 रुपये हो गई है। इस दर पर भी मजदूरों को काम पर लगाना काफी मुश्किल है क्योंकि जरूरत के मुताबिक मजदूर उपलब्ध नहीं हैं। इलायची और काली मिर्च जैसी फसलों में ज्यादा मजदूरों की दरकार होती है।
उन्होंने कहा कि खुले बाजार की व्यवस्था से इलायची की कीमतों का दायरा 1500 रुपये से 2500 रुपये सुनिश्चित हो सकता है। देश में सालाना 13,000 टन इलायची का उत्पादन होता है और इस साल उत्पादन 9000 टन से कम रहेगा। लेकिन नीलामी की व्यवस्था के चलते कीमत के मोर्चे पर इलायची की कमी अभी दिखी नहीं है। इस व्यवस्था में कारोबारियों का एक वर्ग कीमतें तय करता है और वे किसानों से औसत कीमतों से कम पर इसकी खरीद कर लेता है।
वैश्विक बाजार में इलायची की अच्छी मांग है क्योंकि दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक ग्वाटेमाला सालाना 25,000 टन इलायची बेच रहा है। लेकिन साल 2010-11 में भारत से 1175 टन इलायची का ही निर्यात हुआ जबकि साल 2011-12 में 4650 टन, जो अब तक का सर्वोच्च स्तर है। मसाला बोर्ड के मुताबिक 2003-09 के दौरान इलायची का निर्यात 500-750 टन के दायरे में था। किसानों ने कहा कि इलायची की अच्छी मांग है, लेकिन भारत वैश्विक बाजार का दोहन नहीं कर सकता। वैश्विक बाजार में मांग बढऩे से अफ्रीकी देशों मसलन नाइजीरिया ने बड़े पैमाने पर इलायची की खेती शुरू कर दी है। (BS Hindi)
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