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07 अगस्त 2012
'फायदेमंद नहीं है और चीनी का निर्यात'
कम बारिश के कारण चीनी उत्पादन में कमी की आशंका से हाल में इसकी कीमतें सुधरी हैं। आने वाले दिनों में निर्यात में गिरावट की संभावना है क्योंकि ब्राजील में इसका उत्पादन ठीक रह सकता है। भारतीय चीनी मिल संघ के महानिदेशक अविनाश वर्मा से इस बारे में अजय मोदी ने बातचीत की।
चीनी की कीमतों में अचानक तेजी का निर्यात पर असर होगा?
इस साल हमें 40 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति मिली थी। जुलाई के आखिर तक करीब 30 लाख टन चीनी निर्यात हुई है। करीब 6 लाख टन का निर्यात होना है। देश में कीमतें सुधरने और ब्राजील में उत्पादन बढऩे से वैश्विक बाजार में कीमतों में गिरावट आई है। इसलिए ताजा खरीद नजर नहीं आ रही है।
क्या देसी बाजार में उछाल बरकरार रह पाएगी?
कम बारिश से महाराष्ट्र व कर्नाटक में गन्ने के उत्पादन में कमी की संभावना से बाजार में तेजी आई है। हालांकि उत्पादन पर मॉनसून का असर सितंबर में ही साफ होगा। हमारे पास पिछले दो साल की सरप्लस चीनी है। लिहाजा, अगले सीजन में भी चीनी सरप्लस रहेगी।
चीनी से नियंत्रण हटाने की उद्योग की मांग अभी पूरी नहीं हो पाई है?
राशन की चीनी पर उद्योग को सालाना 3000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है। यह बोझ सरकार को उठाना चाहिए। दूसरा नियंत्रण चीनी का कोटा आवंटन के रूप में है, जो मिलें खुले बाजार में बेच सकती हैं लेकिन इसका फैसला सरकार करती है। हमने रिलीज व्यवस्था समाप्त करने, लेवी से मुक्ति और चीनी उद्योग को निर्यात व आयात का फैसला लेने में स्वतंत्रता देने की मांग की है।
लेवी चीनी पर पटना उच्च न्यायालय के आदेश का उद्योग पर असर ?
सरकार लेवी चीनी की नहीं उठाई गई मात्रा दो साल तक कैरी फॉरवर्ड करती है, जिसका मतलब है गुणवत्ता में खराबी, मिलों पर चीनी रखने की अतिरिक्त लागत और नकदी प्रवाह पर रोक। पुराने स्टॉक को बेचने की अनुमति मिलने पर मिलों को ताजा उत्पादन से चीनी की आपूर्ति करनी होती है। दोनों ही मामलों में पिछले साल की कीमतें चुकाई जाती हैं और मिलों का नुकसान बढ़ता जाता है। इस समय करीब 25 लाख टन चीनी लेवी के तौर पर आरक्षित है और इससे 9,000 करोड़ रुपये की कार्यशील पूंजी फंसी हुई है। अदालत ने कहा है कि मिलों का लेवी चीनी दायित्व अक्टूबर में शुरू होने वाले हर सीजन में नए सिरे से शुरू होगा। इसके तहत मिलों को नए सीजन की कीमतें मिलेंगी।
एथेनॉल मिश्रण में मसला सिर्फ कीमत का है या फिर उपलब्धता भी समस्या है?
पेट्रोल में 5 फीसदी एथेनॉल के मिश्रण के लिए तेल विपणन कंपनियों को 100 करोड़ लीटर एथेनॉल की दरकार है। देश में शीरे के जरिए हर साल 250 करोड़ लीटर अल्कोहल/एथेनॉल का उत्पादन होता है जबकि पेय क्षेत्र में ही 100 करोड़ लीटर की खपत हो जाती है और इस तरह से ईंधन एथेनॉल कार्यक्रम के लिए 150 करोड़ लीटर बचता है। (Bs Hindi)
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