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04 मई 2009
गलत नीतियों का नतीजा हैं चीनी की बेकाबू कीमतें
इन दिनों बीजेपी के एक चुनावी पोस्टर में चीनी की आसमान छूती कीमतों का हवाला देकर वोट मांगे जा रहे हैं। दरअसल पिछले छह महीनों में खुले बाजार में चीनी के दाम डेढ़ गुना बढ़ गए हैं। अठारह से बीस रुपये प्रति किलो बिकने वाली चीनी अब 28-30 रुपये प्रति किलो बिक रही है। नतीजतन राजनीतिक पार्टियों के लिए यह आम लोगों को अपील करने वाला मुद्दा बन गया है। लोगों के लिए चीन का स्वाद लगातार कड़वा होता जा रहा है। अब सवाल यह है कि क्या आने वाले दिनों में हम सस्ती चीनी खरीद पाएंगे? दरअसल मांग की तुलना में आपूर्ति कम होना ही चीनी संकट की असली वजह है। वर्ष 2007-2008 के दौरान चीनी का उत्पादन 2.64 करोड़ का था। लेकिन वर्ष 2008-2009 (अक्टूबर से सितंबर ) में चीनी का उत्पादन 1.42 करोड़ टन रहने का अनुमान है। ओपनिंग स्टॉक 80.10 लाख टन का है। जबकि अनुमानित मांग 2.30 करोड़ टन की है। यह स्थिति सरकार की गलत नीतियों का नतीजा है। यूपीए सरकार ने पिछले पांच साल के दौरान गेहूं औैर चावल के एमएसपी में तो इजाफा किया लेकिन गन्ने की एसएमपी नहीं बढ़ाई। पिछले तीन साल में ज्यादातर फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफा हुआ लेकिन गन्ने के एसएमपी में शायद ही कोई वृद्धि हुई। इस समय गेहूं का एमएसपी 1080 रुपये प्रति क्विंटल है जबकि चावल का 900 से 950 रुपये प्रति क्विंटल। जबकि गन्ने का एसएमपी सिर्फ 140 रुपये प्रति क्विंटल है। ऐसे में कोई किसान क्या खाकर गन्ने की खेती करेगा। साफ है कि किसानों ने गन्ने का रकबा घटा दिया। उत्तर प्रदेश में गन्ने के रकबे में तीन लाख हेक्टेयर की कमी आई है। हरियाणा में 40 और पंजाब में 29 लाख हेक्टेयर में गन्ने की फसल नहीं ली गई। सरकार ने एक और बड़ी गलती की है। वर्ष 2008 के अगस्त-सितंबर में गन्ने के रकबे में कमी और फसल की खराब हालत की तस्वीर साफ हो गई थी। लेकिन सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। पिछले साल तो हम चीनी का निर्यात कर रहे थे लेकिन इस साल हम रॉ और व्हाइट शुगर का आयात कर रहे हैं। लेकिन अब भी मांग की तुलना में आपूर्ति काफी कम है। यही वजह है कि अगले कुछ महीनों तक चीनी के दामों में राहत मिलने की कोई गुंजाइश नहीं दिखती। आने वाले दिनों में चीनी के दामों में नरमी न आने की एक बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम ज्यादा होना भी है। दुनिया भर में चीनी के उत्पादन में गिरावट आई है। इसलिए सरकार को मौजूदा हालात से सबक लेने की जरूरत है। सही पूर्वानुमान और उसके बाद बाजार में मांग और आपूर्ति के नियामक तत्वों में संतुलन के बाद ही चीनी के दाम स्थिर रह सकते हैं। वरना ऐसी लचर नीतियों की वजह से हम आगे भी महंगी चीनी की कड़वाहट झेलते रहेंगे। (Business Bhaskar)
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