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25 फ़रवरी 2009
खाद्यान्न जरूरत बीटी से ही पूरी होगी : वैज्ञानिक
भले ही कपास उत्पादन में बायोटेक्नालॉजी (बीटी) का उपयोग खूब बढ़ा हो लेकिन खाद्यान्न उत्पादन में बीटी के इस्तेमाल पर तर्को को जमकर धार दी जा रही है। बीटी के पक्षधर वैज्ञानिकों ने कहा है कि खाद्यान्न की बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्लांट बायोटेक्नोलॉजी का इस्तेमाल जरूरी है। हालांकि दूसरी ओर विरोधी वैज्ञानिकों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई है।कोलकाता विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. स्वप्न दत्ता और कटक (ओडीसा) स्थित सेंट्रल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीआरआरआई) के वनस्पति सुधार के प्रमुख डा. जी जे एन राव ने संवाददाताओं को बताया कि प्लांट बायोटेक्नोलॉजी में वह क्षमता है जिससे फसल की पैदावार बढ़ सकती है। इससे खाद्यान्न की बढ़ती मांग की चुनौती का सामना किया जा सकता है। डा. दत्ता ने कहा कि वर्ष 2017 तक भारत की जनसंख्या 130 करोड़ हो जाने का अनुमान है तथा केंद्र सरकार के अनुमान के मुताबिक उस समय पारंपरिक तरीकों से खाद्यान्न उत्पादन बढ़ने के बावजूद 1.40 करोड़ टन खाद्यान्न की कमी होगी।कम पैदावार और बढ़ती मांग की वजह से धान की उपज बढ़ाने के लिए गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है। गोल्डन चावल के मुद्दे पर वैज्ञानिकों ने कहा कि चावल के उत्पादन में वृद्धि के अलावा उसकी पौष्टिकता को बढ़ाना, पर्यावरण की बेहतरी, कीड़ों व रोगों (येला स्टैम बोरर एवं लीफ फोल्डर) के विरुद्ध उसकी क्षमता में बढ़ोतरी होगी। बीटी धान किसान दोगुनी पैदावार ले सकते हैं। राव ने इस मौके पर कहा कि बायोटेक धान निर्विवाद रूप से फायदेमंद है। यह किस्म भारत में उत्पादन संबंधी अवरोधों को दूर करने, उत्पादन बढ़ाने और केमिकल पेस्टीसाइड का इस्तेमाल घटाकर पर्यावरण को सुरक्षित बनाने में सक्षम है। दूसरी ओर भारतीय कृषक समाज के अध्यक्ष कृष्ण बीर चौधरी ने दुनिया के करीब दो दर्जन प्रमुख वैज्ञानिकों के हवाले से कहा कि बायोटैक से तैयार चावल के खाने से बच्चों में जन्मजात रोगों की आशंका बढ़ जाती है। कई वैज्ञानिक और संस्थाएं इन बायोटेक फसलों को जैव विविधता और मानव जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा मानती हैं। (Business Bhaskar)
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