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05 जनवरी 2009
अगली सर्दियों तक कमोडिटी की कीमतों में आएगी गरमी
नई दिल्ली : हमने पैसा बनाया और इसे गंवा भी दिया। क्या हम दोबारा पैसा बनाने में सफल हो सकेंगे? साल 2009 का सबसे बड़ा सवाल यही है। हर आदमी के दिमाग में यही सवाल है। मेरे घरवाले कहते हैं कि मैं ईराक के बारे में ब्लेयर के सिद्धांत 'मैं तब भी सही था और मैं अब भी सही हूं' पर यकीन करती हूं। अब इस साल के बारे में भी समझ लीजिए कि मेरी सोच यही है। कीमतों में कमी होगी पर यह ज्यादा वक्त चलने वाली स्थिति नहीं होगी। हमें खाने-पीने की चीजों की जरूरत होगी, साथ ही हमें कपड़ों और अपने घर की भी जरूरत होगी। इसके अलावा बच्चों के लिए मनोरंजन और अपने लिए काम की भी जरूरत होगी। सो, जरूरतों का या कहें मांग का लगातार बढ़ना जारी रहेगा। इसी तरह से इन जरूरतों को पूरा करने वाली चीजों में इस्तेमाल होने वाली कमोडिटी की भी मांग भी बनी रहेगी। अगर मांग में तेजी आती है तो इनकी कीमतों में इस साल कहीं तेज उछाल पैदा होगा। मौजूदा वक्त में चल रही कम कीमतों की वजह से नए निवेश, क्षमताओं और ऊंची उत्पादकता पर असर पड़ रहा है। इसका मतलब है कि सप्लाई में कमी पैदा होगी। मेरा दांव है कि साल 2009 में सर्दियों के आने तक मुद्रास्फीति की दर में फिर से उछाल पैदा होगा।इस साल सोने की कीमतों में उछाल आ सकता है, यह निवेशकों को आकषिर्त करने में कामयाब रहेगा। हालांकि, ज्वैलरी की मांग में कमी पैदा हो सकती है। खानों से होने वाली सप्लाई में कमी आने से सोने की कीमतों के इस साल बढ़ने की उम्मीद है। लेकिन प्लेटिनम पर इस वजह से दांव मत लगाइए कि यह इस वक्त सोने से सस्ता चल रहा है। कैटेलिस्ट वाली यूरोपीय डीजल कारों में प्लेटिनम के कुल उत्पादन का तिहाई हिस्सा इस्तेमाल होता है। जब तक कि यूरोपीय बाजारों में कारों की बिक्री में इजाफा नहीं होता है या खानों से होने वाले उत्पादन में कमी नहीं आती है प्लेटिनम की मांग इसी तरह से कमजोर रहेगी। ज्यादातर भारतीय कंपनियों को मुनाफे में नुकसान उठाना पड़ा है न कि सीधा नुकसान हुआ है। साल 2009 में इंटीग्रेटेड फूड और कमोडिटी कंपनियों को खास तौर पर फायदा होगा क्योंकि वो वक्त पर खरीदारी करती हैं और सस्ता कर्ज लेती हैं। इसकी मिसाल है, एशिया का सबसे बड़े इंटीग्रेटेड एग्रीबिजनेस ग्रुप विल्मर इंटरनेशनल। विल्मर पाम प्लांटेशन, पाम ऑयल प्रोसेसिंग, सोयाबीन प्रोसेसिंग, ब्रांडेड तेल उत्पादन और एग्रीकल्चर ट्रेडिंग के कारोबार में है। मेरिल लिंच ने पिछले महीने कहा था कि अगले वित्त वर्ष में विल्मर का इबिड्टा मार्जिन 9.3 फीसदी रह सकता है। साल 2006 से 2010 के बीच यह विल्मर का सबसे बढि़या कारोबारी प्रदर्शन होगा। विलय और अधिग्रहण इस दौरान काफी फायदेमंद रहेंगे। अब भारी संपत्तियां रखने वाले और अपने हितों में मस्त रहने वाले प्रमोटरों के दिन लद गए हैं। हर तरह की संपत्ति चाहे वह जमीन हो या शेयर- सबकी वैल्यू में गिरावट आ रही है। कंपनियों पर अपनी संपत्तियां बेचकर बकाए भुगतान करने का दबाव है। बेचने वालों की ज्यादा संख्या होने से माहौल बदल रहा है। ज्यादा पूंजी वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी रकम को भारतीय खाद्यान्न, खाद्य तेल, कॉफी और चीनी में लगा रही हैं। साल 2009 में बेहतर सौदों के होने की उम्मीद है। इस साल निर्यात के मुकाबले आयात ज्यादा मुनाफे वाला कारोबार रहेगा। मेरे इस तर्क के पीछे तीन कारण हैं। पहला- भारत में मांग अभी भी कायम है। इसके चलते संभावनाएं बनी रहेंगी। दूसरा- बाहरी देशों की सरकारें स्थानीय कंपनियों को मदद देने के लिए नियमों को कठोर कर सकती हैं। इससे भारतीय निर्यातकों के लिए समस्याएं पैदा होंगी। तीसरा- विकसित देशों में मांग के कम होने से निर्यात पर सब्सिडी को ज्यादा बढ़ाया जा सकता है। मिसाल के तौर पर, जर्मनी इस साल पश्चिमी यूरोप, चीन, भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में फूड और एग्री निर्यात पर 1.4 करोड़ यूरो की रकम खर्च करेगा। भारत को लक्ष्य करके जर्मन पोर्क और पोल्ट्री मीट समेत ऑगेर्निक उत्पादों का निर्यात किया जाएगा। सब्सिडाइज्ड उत्पादों के आयात से घरेलू कंपनियों के लिए उपभोक्ताओं को कम कीमत पर वस्तुएं मुहैया कराना संभव होगा। (ET Hindi)
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