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17 फ़रवरी 2014
चीनी विनियंत्रण का भी नहीं मिला मिलों को लाभ
अब तक चीनी कंपनियां कई दशकों से बरकरार नियंत्रणों से उद्योग को मुक्त कराने की कोशिश कर रही थीं। इस साल सरकार ने क्षेत्र को आंशिक नियंत्रण मुक्त कर भी दिया, लेकिन यह उद्योग दूसरे संकट में फंस गया है। ऐसे समय में जब गन्ने की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं, तब घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी के दामों में लगातार गिरावट आ रही है। पिछले साल 4 अप्रैल को चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त किया गया था। इसके बाद चीनी उद्योग के लिए बड़ी मात्रा में आपूर्ति के अनुबंध करने के असवर खुले थे। लेकिन उद्योग इन मौकों को भी नहीं भुना पा रहा है। भारतीय बाजार में चीनी की कीमतें विनियंत्रण की घोषणा के बाद मई के सर्वोच्च स्तर से करीब 12 फीसदी गिर चुकी हैं, जबकि पिछले साढे तीन महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी के दाम 20 फीसदी टूटे हैं।
अगर आज की तारीख में मिलें कच्ची चीनी का निर्यात करती हैं तो उन्हें कीमत 4,400 रुपये प्रति टन मिलती है, जो उनकी उत्पादन लागत से भी कम है। वहीं घरेलू बाजार में सफेद चीनी की बिक्री पर उन्हें महाराष्ट्र जैसे राज्य में 3,500 रुपये प्रति टन और उत्तर प्रदेश में 7,000 रुपये प्रति टन का घाटा हो रहा है। पहले, जब मिलों से कहा गया था कि न कोई लेवी कोटा होगा और न ही मुक्त बिक्री कोटा। उद्योग अपनी योजना के मुताबिक खुले बाजार में चीनी बेच सकेगा। राज्यों से कहा गया था कि वे अपनी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए चीनी खुले बाजार से खरीदें। इससे उद्योग को बड़ी मात्रा में चीनी बिक्री की संभावना दिखाई दी थी। हालांकि ज्यादातर राज्यों ने चीनी आपूर्ति के लिए सहकारी मिलों से करार किया और निजी मिलों को मायूस होना पड़ा।
विदेश में चीनी के भारी उत्पादन के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी के दामों में तेजी से गिरावट आई है और इस वजह से निर्यात भी नहीं हो रहा है। आइसक्रीम और शीतलपेय बनाने वाली कंपनियां सफेद चीनी की बड़ी खरीदार होती हैं और निजी मिलें गर्मियों के सीजन में आपूर्ति के लिए उनके साथ करार करती हैं। लेकिन यह मौका भी उनके हाथ नहीं लगा, क्योंकि लगातार गिरती कीमतों और अगले कुछ महीनों के दौरान कीमतों का रुझान कमजोर रहने के अनुमानों के कारण मुश्किल से ही कोई आइसक्रीम व शीतलपेय कंपनी आपूर्ति का करार कर रही है। इससे पहले यह संभव नहीं था, क्योंकि मिलों को ही नहीं पता होता था कि निश्चित समयावधि में वे कितनी चीनी बेच पाएंगी । क्योंकि बिक्री का कोटा सरकार द्वारा तय किया जाता था।
एक दिग्गज शीतलपेय कंपनी ने अपनी आंशिक जरूरत पूरी करने के लिए उत्तरी भारत की एक चीनी मिल के साथ करार किया है। डालमिया भारत शुगर ऐंड इंडस्ट्रीज ने आपूर्ति का करार किया है। हालांकि कंपनी के सीईओ बीबी मेहता ने कहा, 'चीनी उद्योग ने बड़े खरीदारों के साथ बड़ी आपूर्ति के अनुबंध करने का एक अन्य मौका भी खो दिया है, क्योंकि चीनी की कीमतों में गिरावट का रुख बना हुआ है और आगे का आउटलुक भी कमजोर बना हुआ है।'
पेट्रोल में एथेनॉल के मिश्रण की स्वीकृति से उद्योग के लिए तेल विपणन कंपनियों को इसकी आपूर्ति भी एक मौका था। हालांकि कुछ वजहों से तेल विपणन कंपनियां एथेनॉल की कम खरीद कर रही हैं। भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने कहा, 'मिलों पर गन्ना किसानों का बकाया 31 जनवरी, 2014 तक अब तक के सर्वोच्च स्तर 10,000 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। अगर सरकार नहीं जागी तो अगले कुछ महीनों में यह 15,000 करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा।' (BS HIndi)
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