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07 फ़रवरी 2013
फीकी पड़ी बीटी कपास की चमक
नवीनता के अभाव और जलवायु में लगातार परिवर्तन के साथ विभिन्न कीटों के बढ़ते हमले की वजह से बैसीलस थुरिनजीनसिस (बीटी) कपास की फसल अपनी चमक तेजी से खो रही है। कपड़ा मंत्रालय के अधीन कॉटन एडवायजरी बोर्ड (सीएबी) से जुटाए गए आंकड़ों से यह स्पष्ट हो गया है कि कपास की पैदावार में वर्ष 2002 और 2006 के बीच की परिवर्तनकारी अवधि के बाद अब धीरे धीरे गिरावट आनी शुरू हो गई है। उस अवधि में बीटी कॉटन ने किसानों की दशा में बड़ा बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन उसके बाद किसानों ने लगातार इसकी पैदावार में गिरावट दर्ज की है। जहां कपास वर्ष 2006-07 में इसकी पैदावार 554.39 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी वहीं 2012-13 में यह घट कर लगभग 488.89 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रह जाने का अनुमान है।
किसानों द्वारा बीटी टेक्नोलॉजी को अपनाए जाने से पैदावार में शानदार तेजी देखने को मिली और इसके रकबे में भी इजाफा हुआ। लेकिन कृषि योग्य क्षेत्र में कमी के साथ पिछले कुछ वर्षों में कपास का उत्पादन घटा है।
हालांकि बीटी टेक्नोलॉजी की आविष्कारक अमेरिका की मोनसैंटो ने बॉलवर्म प्रतिरोधी बीटी कॉटन को आधुनिक एवं उन्नत बनाए जाने का दावा किया है, लेकिन यह प्रौद्योगिकी भारत में प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ाने में विफल रही है।
कृषि जैव प्रौद्योगिकी कंपनी और मोनसांटो की भारतीय इकाई की सहायक महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड्ïस कंपनी (माहिको) में प्रबंध निदेशक राजू बरवाले कहते हैं, 'बीटी कपास की औसतन पैदावार में गिरावट संभवत: इस फसल का गैर-उपयुक्त कृषि योग्य क्षेत्रों में विस्तार किए जाने की वजह से आई है। इसके अलावा अन्य कारकों की वजह से भी पैदावार में कमी आई है जिनमें पिछले कुछ वर्षों में कीटों के बढ़ते हमले प्रमुख रूप से शामिल हैं।'
हालांकि अभी भी भारत में मौजूदा औसतन कपास उत्पादकता 2002-2011 की अवधि में बीटी कॉटन को लॉन्च किए जाने के बाद से 474 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है जो 1993-2001 की बीटी कॉटन से पूर्व की अवधि से 158 फीसदी की वृद्घि है। तब यह उत्पादकता 300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी।
बारवाले ने कहा कि सौराष्ट्र, विदर्भ और उत्तरी कर्नाटक जैसे प्रमुख इलाकों में सूखे की वजह से खरीफ वर्ष 2012 के दौरान कपास की अनुमानित पैदावार कम है। सूखे ने इन क्षेत्रों में अन्य फसलों को भी नुकसान पहुंचाया है। (BS Hindi)
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