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24 जनवरी 2013
'जिंस कारोबार पर सीटीटी न लगाने का अनुरोध'
देश की शीर्ष औद्योगिक संस्थाओं ने आगामी केंद्रीय बजट 2013-14 में सरकार के जिसों के लेन-देन पर कर (सीटीटी) लगाने के संभावित कदम का कड़ा विरोध किया है। बजट की घोषणा 28 फरवरी को होगी।
बजट पूर्व सुझावों में भारतीय औद्योगिक परिसंघ (सीआईआई) ने कड़े शब्दों में कहा है कि एक्सचेंज पर होने वाले जिंसों के कारोबारी लेन-देन पर सीटीटी से छूट जारी रहनी चाहिए। औद्योगिक संस्था ने तर्क दिया है कि सीटीटी लगाने से न केवल कारोबार की लेन-देन लागत बढ़ेगी, बल्कि जोखिम प्रबंधन लागत भी बढ़ेगी और इससे वास्तविक कारोबारी विमुख होंगे। साथ ही वे जिंस डेरिवेटिव ट्रेङ्क्षडग के बजाय अनाधिकारिक और अवैध 'डब्बा कारोबार' की ओर उन्मुख होंगे, जो नियामकीय नियंत्रण के दायरे से बाहर है। यहां तक की अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से भी पता चलता है कि लेन-देन पर कर लगाने या बढ़ाने से कारोबार कम होता है।
जिंस वायदा कारोबार के दायरे से बाहर के कुछ नीहित स्वार्थ वाले लोगों के एक वर्ग द्वारा यह सुझाव दिया है। सीटीटी लगाने से लेन-देन की लागत 8 गुना बढ़कर 0.17 फीसदी हो जाएगी। जिंसों के लेन-देन पर कर से ये महंगी हो जाएंगी। इससे जिंस डेरिवेटिव्ज का इस्तेमाल कर जोखिम की हेजिंग करने वाले लोग इससे विमुख होंगे।
इसके नतीजतन मात्रा कम होने और बिड-आस्क स्पे्रड्स में बढ़ोतरी के जरिये बाजार तरलता कम होगी। कम तरलता से कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ेगा और अनुचित कीमतें निर्धारित होंगी। इससे कारोबारी मात्रा में गिरावट आएगी और बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। कुछ प्रायोगिक कार्यक्रमों से निष्कर्ष निकला है कि सीटीटी लगाने से मात्रा में होने वाली कमी के चलते इस कर के जरिये राजस्व जुटाने का मकसद पूरा नहीं हो सकेगा। बहुत से अध्ययनों से पता चलता है कि सीटीटी लगाने से सरकार के राजस्व में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं होगी। वास्तव में अगर सीटीटी के कारण आने वाले समय में कारोबारी मात्रा में कमी आती है तो सरकार को इस कर से प्राप्त होने वाले राजस्व की तुलना में ज्यादा राजस्व का नुकसान हो सकता है। इसके अलावा कारोबार का बड़ा हिस्सा विदेशी एक्सचेंजों में स्थानांतरित हो जाएगा। इस तरह सीआईआई का मानना है कि जिंस डेरिवेटिव्ज लेन-देन पर कर से इसका मकसद पूरा नहीं हो पाएगा।
जनरल एंटी अवॉयडेंस रूल्स (गार) पर सोम समिति की रिपोर्ट का विरोध करते हुए फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री ( फिक्की) ने कहा, 'सूचीबद्ध प्रतिभूतियों से प्राप्त होने वाले लाभ पर लगने वाला कर सरकार को समाप्त करना चाहिए। यह लाभ चाहे पूंजी लाभ हो या कारोबारी आय। इससे पूंजी बाजार में भागीदारी के लिए निवेशकों को प्रोत्साहन मिलेगा।' सोम समिति ने 1 सितंबर 2012 को एसटीटी दोगुना करने की सिफारिश की थी।
इसी तरह का विचार जाहिर करते हुए एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एसोचैम) ने सरकार को एसटीटी घटाने और प्रतिभूतियों पर स्टांप शुल्क को तर्कसंगत बनाकर ब्रोकर समुदाय को बचाने का सुझाव दिया है। इसने तर्क दिया है कि एसटीटी खरीदार और विक्रेता दोनों पर लगता है। इसके कारण कारोबारी मात्रा पर असर पड़ता है, इसलिए एसटीटी को कम किया जाना चाहिए।
एसटीटी का संग्रहण अप्रैल से नवंबर 2012 के बीच 12.9 फीसदी घटकर 2,905 करोड़ रुपये रहा है, जो पिछले साल की समान अवधि में 3335 करोड़ रुपये था। एसटीटी हटाने से लेन-देन की लागत घटेगी, शेयर कारोबार की संस्कृति को प्रोत्साहन मिलेगा और खुदरा भागीदारी में इजाफ होगा इससे कारोबारी मात्रा में बढ़ोतरी होगी। एसटीटी हटाना प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रवाह के लिए प्रमुख आकर्षण होगा, जिससे बाजार में तेजी आ सकती है।
जिंस एक्सचेंजों ने वित्त मंत्री पी चिदंबरम से ऐसे समय सीटीटी लागू नहीं करने का आग्रह किया है जब भारत में निवेश और कारोबारी सेंटीमेंट अनुकूल नहीं है और सरकार निवेश को पटरी पर लाने के लिए लगातार कोशिश कर रही है। वायदा बाजार आयोग द्वारा जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि अप्रैल से दिसंबर 2012 के दौरान जिंस वायदा कारोबार में 5.54 फीसदी गिरावट आई है। हाल ही में पांचों राष्ट्रीय जिंस एक्सचेंजों के अधिकारियों ने कहा था कि सीटीटी लगाने से जिंस कारोबार की मात्रा भारत में कम होगी और यह अन्य अनुकूल देशों जैसे सिंगापुर, दुबई, लंदन और न्यूयॉर्क में स्थानांतरित हो जाएगी। (BS Hindi)
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