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10 नवंबर 2010
आम के निर्यात पर ऊंची फीस का मुद्दा उठाया भारत ने
भारत और अमेरिका के मंत्रियों और अधिकारियों के बीच कृषि क्षेत्र के मसलों पर भी बातचीत हुई। भारत ने आम के निर्यात पर अमेरिका में काफी ज्यादा फाइनोसेनेटरी फीस लगने का मसला उठाया। वहीं अमेरिका में जौ और पशु आहार वस्तुओं के लिए भारतीय बाजार खोलने की बात कही। अमेरिकी कृषि विभाग के मंत्री टॉम जे. विलसेक के साथ बातचीत के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने संवाददाताओं को बताया कि बातचीत सिर्फ सामान्य मसलों पर ही हुई। भारत से अमेरिका को आम का निर्यात करने की अनुमति तो है लेकिन इसके निर्यात पर फीस इतनी ज्यादा है कि आमों का निर्यात व्यावसायिक दृष्टि से व्यावहारिक नहीं है। पवार के अनुसार अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि यह फीस सभी देशों के लिए समान है। ऐसे में भारत के लिए विशेष छूट देना संभव नहीं है।भारत से आमों का निर्यात 18 वर्षों के अंतराल के बाद 2007 में शुरू हुआ था। भारत अमेरिका को हर साल 250 टन आमों का निर्यात करता है जबकि वहां 500 टन आम निर्यात किए जाने की गुंजाइश है। फाइटोसेनेटरी इंस्पेक्शन मुख्य रूप से खाद्य वस्तुओं में दूसरी तरह की गंदगी को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है ताकि खाद्य वस्तुओं से मानव स्वास्थ्य की कोई समस्या पैदा न हो और वनस्पति पर कोई प्रभाव न पड़े।पवार ने बताया कि अमेरिका भारत को जौ और पशु आहार निर्यात करने का इच्छुक है। अमेरिकी अधिकारियों ने कुत्तों के लिए खाद्य वस्तुएं निर्यात करने में दिलचस्पी दिखाई। अमेरिकी कृषि विभाग ने मांग की कि दोनों देशों को कृषि वस्तुओं का बाजार खोलना चाहिए। अमेरिकी अधिकारियों ने यह जानने की कोशिश की कि क्या भारत अमेरिकी जौ को अपने यहां अनुमति देगा। इस पर पवार ने अरगोट घास पर आपत्ति की। जौ के साथ अरगोट घास मिली आती है। भारत में जौ बहुत महत्वपूर्ण फसल नहीं है। पंजाब में थोड़ी जौ उगाई जाती है। पवार ने कहा कि अगर अमेरिका से जौ की सप्लाई होती है तो इससे भारतीय किसानों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। जौ की अमेरिका से सप्लाई होने पर भारतीय ब्रेवरीज इंडस्ट्री जैसे युनाइटेड ब्रेवरीज ग्रुप को फायता हो सकता है। पवार ने जोर देकर कहा कि अभी ये सिर्फ सुझाव हैं। इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। अभी हमनें सिर्फ बैठकर चर्चा की है। (Business Bhaskar)
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