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08 जुलाई 2010
रिटेल एफडीआई का विरोध
मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के सरकारी प्रस्ताव पर कारोबारियों ने कड़ा ऐतराज जताया है। उनका कहना है कि सरकार के इस कदम से लगभग 1 लाख 25 हजार करोड़ रुपये का खुदरा कारोबार विदेशी कंपनियों के हाथों में चला जाएगा। इससे आने वाले समय में छोटे कारोबारियों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और देश भर के लगभग 10 करोड़ छोटे-बड़े खुदरा कारोबारी बेरोजगार हो सकते हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश समेत देश भर के खुदरा कारोबारी इस प्रस्ताव से काफी भड़क गए हैं। हालांकि, सरकार की तरफ से जारी परिचर्चा पत्र में मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई की मात्रा का खुलासा नहीं किया गया है। सरकार ने इस मसले पर लोगों से अपनी राय 31 जुलाई तक देने के लिए कहा है। उसके बाद ही इस मसले पर कोई फैसला किया जाएगा। कन्फेडरशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) के अध्यक्ष बी।सी. भरतिया का कहना है कि सरकार मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई लाने के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुकी है, अन्यथा इस मसले पर संसदीय समिति की रिपोर्ट पर जरूर गौर किया जाता। अपने परिचर्चा पत्र में सरकार यह जरूर बता रही है कि सिंगल ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआई से देश में कितना पैसा आया, लेकिन इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि भारत से विदेश में कितना पैसा गया। मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई से देश के कृषि उत्पादों पर पूर्ण रूप से विदेशी कंपनियों का कब्जा हो जाएगा। सरकार पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराती नहीं है और सवाल उठा रही है कि कृषि उत्पादों की बर्बादी रोकने के लिए कोल्ड स्टोरज कौन बनवाएगा। सीएआईटी के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल कहते हैं कि विदेशी कंपनियों के पास बहुत ज्यादा संसाधन होते हैं और वे शुरू में खरीद से भी कम दाम पर माल बेचेंगे। ऐसे में छोटे कारोबारी समाप्त हो जाएंगे। सरकार को मल्टी ब्रांड में एफडीआई की अनुमति देने के बजाय रिटेल क्षेत्र के असंगठित कारोबार को संगठित करने पर विचार करना चाहिए। दिल्ली मर्केटाइल एसोसिएशन के महासचिव सुरश बिंदल कहते हैं कि मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई से विदेशी कंपनियां यहां आएंगी और जैसा कि होता आया है, बड़ी मछलियां छोटी मछलियों को खा जाएंगी। भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के अध्यक्ष श्याम बिहारी मिश्रा के मुताबिक मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई की इजाजत से फुटकर कारोबार बंदी के कगार पर पहुंच जाएगा। वे कहते हैं कि अमेरिका व यूरोप के देशों में जनसंख्या कम है। इसलिए वहां मल्टी ब्रांड रिटेलिंग ठीक है। भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के महासचिव विजय प्रकाश जैन ने कहा कि सरकार अगर मल्टी ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश को मंजूरी देगी तो इससे हमारा खुदरा कारोबार पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। हमार यहां खुदरा में जिंसों के छोटे-छोटे कारोबारी हैं। उनके सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो जाएगा। हम इसके खिलाफ आंदोलन करेंगे। दिल्ली वेजिटेबल ऑयल ट्रेडर्स एसोसिएशन के सचिव हेमंत गुप्ता ने कहा कि सरकार विदेशी कंपनियों के दबाव में यह निर्णय ले रही है। इस समय सरकार ने होलसेल में विदेशी निवेश को मंजूरी दे रखी है। इसी वजह से घरेलू बाजार में उपलब्धता होने के बावजूद जिंसों के भाव बढ़ जाते हैं क्योंकि विदेशी कंपनियां ज्यादा मात्रा में खरीद कर लेती हैं। दिल्ली किराना कमेटी के सचिव ललित गुप्ता ने कहा कि इस कदम से छोटे कारोबारी तबाह हो जाएंगे। पंजाब और हरियाणा के रिटेल दुकानदारांे को भी इस कदम से कारोबार प्रभावित होने का डर सता रहा है। मल्टी ब्रांड किराना व्यवसायियांे और प्रोविजनल स्टोर संचालकांे को डर है कि इससे ब्रांडेड रिटेल स्टोर की बाढ़ सी आ जाएगी जिससे ये गली और मुहल्लों तक भी पहुंच जाएंगे। ऐसे में यहां के दुकानदारों का कामकाज प्रभवित होगा ही। इसके साथ ही ट्रेडर व उनसे जुड़े लाखों लोगों का रोजगार भी छिनेगा। चंडीगढ़ में किराना के थोक व्यापारी नेता रविप्रकाश कांसल कहते हैं कि केंद्र सरकार का किसानों की भलाई के नाम पर यह प्रयास है कि असंगठित क्षेत्र के छोटे दुकानदारों का रोजगार छिन कर विदेशी कंपनियांे के हाथों में सौंप दिया जाए। लुधियाना व्यापार मंडल के महासचिव महिंदर अग्रवाल का कहना है कि जिस तरह से अन्य विदेशी पेय कंपनियों ने घरेलू कारोबार को खत्म किया है उसी तरह विदेशी निवेश से रिटेल सेक्टर भी बुरी तरह प्रभावित होगा। लुधियाना की जोधा राम तरलोक चंद फर्म के मालिक जतिंद्र खरबंदा का कहना है कि बड़ी कंपनियां तामझाम के साथ ग्राहकों को खींचने में सफल हो जाएंगी। इससे छोटे दुकानदारों का कामकाज ठप हो जाएगा। केंद्र सरकार द्वारा मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई की अनुमति के लिए बहस शुरू करने मात्र से ही राजस्थान के खुदरा विक्रेताओं की भौंहें टेढ़ी हो गई हंै। ऑल इंडिया रिटेलर्स फेडरशन के महासचिव और राजस्थान प्रदेश खुदरा विक्रेता संघ के संरक्षक वेद प्रकाश डंग का कहना है कि इस कदम का मतलब यही है विदेशी कंपनियां अपने पैसे के बूते देश के छोटे खुदरा विक्रेताओं के कारोबार पर सीधा हमला करेंगी। ये कंपनियां देश के बड़े रिटेल घरानों के साथ मिलकर उत्पादकों से फैक्ट्री कीमत पर खरीदारी करेंगी। इससे उनको बीस से तीस फीसदी कम कीमत पर माल मिलेगा और फिर यह उसको अपने स्टोर्स के जरिए कम कीमतों पर बेचेंगी। वहीं, छोटे खुदरा विक्रेता तक पहुंचने वाला माल कई चैनलों से होकर आता है। इसी वजह से छोटे खुदरा विक्रेता इन बड़ी रिटेल कंपनियों के साथ मुकाबले में टिक नहीं पाएंगे। संघ के महामंत्री श्याम सुंदर मामोडिया का कहना है कि केंद्र सरकार किसानों के हित में एफडीआई को अनुमति देने की बात कह रही है। ऐसी ही बातें वायदा कारोबार शुरू करने से पहले कहीं गई थीं, लेकिन आज तक वायदा कारोबार से किसानों का भला नहीं हुआ। मध्य प्रदेश के सभी व्यापारी संगठनों ने भी मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई के प्रयासों का भारी विरोध किया है। कंज्यूमर प्रोडक्ट डिस्ट्रीब्यूटर एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रदीप जैन का कहना है कि देश के परंपरागत रिटेल कारोबार में एफडीआई को अनुमति देने से बेरोजगारी काफी बढ़ जाएगी। आज यह करोड़ों लोगों की आजीविका का साधन बना हुआ है। अहिल्या चैंबर्स ऑफ कॉमर्स के महासचिव सुशील सुरका का कहना है कि रिटेल में एफडीआई को अनुमति देने से महंगाई में कोई कमी नहीं होने जा रही है। इससे न तो उपभोक्ताओं को कम दामों पर सामान मिलेगा और न ही किसानों को कोई फायदा होना है। बड़ी कंपनियों के हाथों में रिटेल कारोबार जाने से किसानों एवं वेंडरों की परशानियां और बढ़ेंगी। उन्होंने कहा कि वालमार्ट के कई वेंडरों की आत्महत्या की खबरं आ रही हैं, यह इसका सबूत है। (बिज़नस भास्कर)
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