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30 जून 2010
सरकारी रुख से चीनी उद्योग निराश
महंगाई को लेकर परशान केंद्र सरकार ने चीनी पर आयात शुल्क लगाने के मामले में फैसला टाल दिया। चीनी उद्योग ने इस पर गहरी निराशा व्यक्त की है और कहा है कि सरकार को फैसला टालने का निश्चय करने से पहले चीनी की बढ़ती लागत पर ध्यान देना चाहिए था।उद्योग ने कहा कि वह सरकार से रिफाइंड शुगर पर आयात शुल्क लगाने का दुबारा अनुरोध करगा, ताकि घरलू उद्योग को संरक्षण मिल सके। गौरतलब है कि पिछले सप्ताह अधिकार प्राप्त मंत्री समूह (ईजीओएम) ने चीनी पर आयात शुल्क लगाने के बार में फैसला टाल दिया था। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के डिप्टी डायरक्टर जनरल एम. एन. राव ने कहा कि महंगाई से चिंतित सरकार द्वारा रिफाइंड शुगर के आयात पर शुल्क लगाने का फैसला टालना दुर्भाग्यपूर्ण है। राव ने कहा कि सरकार को यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि चीनी के दाम पिछले साल के स्तर पर आ जाएंगे। अक्टूबर से शुरू हुए सीजन 2009-10 के दौरान मिलों ने 250 रुपये प्रति क्विंटल के मूल्य पर गन्ने की खरीद की है। सरकार चीनी की ऊंची उत्पादन लागत को कैसे नजरंदाज कर सकती है। चीनी के दाम जनवरी में 50 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए थे, जबकि इन दिनों दाम 32-34 रुपये प्रति किलो चल रहा है। लेकिन चीनी का मूल्य पिछले साल से अभी भी ज्यादा है। नेशनल फेडरशन ऑफ कोआपरटिव शुगर फैक्ट्रीज के मैनेजिंग डायरक्टर विनय कुमार ने कहा कि हमें निराशा हुई है कि सरकार ने इस मुद्दे पर फैसला टाल दिया। इस पर फैसले के लिए हम दुबारा सरकार से बात करेंगे। अगर आयात शुल्क नहीं लगता है तो हम किसानों को अगले सरकार गन्ने का अच्छा दाम नहीं दे पाएंगे। पिछले साल मिलों ने 250 रुपये प्रति क्विंटल से भी ऊंचा दाम दिया था जबकि केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित फेयर एंड रिम्यूनरटिव प्राइस (एफआरपी) 130 रुपये प्रति क्विटंल तय किया गया था। उससे पिछले साल 2008-09 में वैधानिक न्यूनतम मूल्य (एसएमपी) 81 रुपये प्रति क्विंटल था। (बिज़नस भास्कर)
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