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09 अप्रैल 2010
सरकार के आग्रह पर भी निजी कंपनियां गेहूं खरीदने को तैयार नहीं
गेहूं की बेहतर पैदावार सरकार के लिए फिर से मुश्किल बनती जा रही है। गिरते मूल्यों को थामने के लिए सरकार ने प्राइवेट कंपनियों से गेहूं खरीदने के लिए कहा है लेकिन उन्होंने इस पर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। गेहूं खरीदने के सरकार के आग्रह पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया देने के बजाय कंपनियों ने दीर्घकालिक नीति की मांग उठा दी। कंपनियां चाहती है कि कम पैदावार के समय उन पर कोई रोक-टोक नहीं होनी चाहिए। सप्लाई का दबाव बढ़ने के कारण उत्तर प्रदेश की मंडियों में गेहूं का भाव घटकर 1100 रुपये प्रति क्विटंल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे आ गया है। गुरुवार को कृषि मंत्री शरद पवार ने प्राइवेट कंपनियों आईटीसी, कारगिल, अदानी, ब्रिटानिया के अलावा रोलर फ्लोर मिल्र्स फेडरशन ऑफ इंडिया और ऑल इंडिया ब्रेड मैन्यूफैक्चर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों की बैठक बुलाई और एमएसपी पर गेहूं खरीदने का आग्रह किया। बैठक के बाद शरद पवार ने पत्रकारों को बताया कि अगर प्राइवेट कंपनिया गेहूं नहीं खरीदेंगी तो सरकार के पास और भी उपाय है। प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक को कानून की शक्ल मिलने के बाद इसे लागू करने के लिए सरकार को ज्यादा खाद्यान्न की आवश्यकता पड़ेगी। उन्होंने कहा कि गेहूं का उत्पादन बढ़कर 820 लाख टन होने का अनुमान है। बैठक में मौजूद रहे एक प्राइवेट कंपनी के अधिकारी ने बताया कि सरकार अगर दीर्घकालिक नीति बनाए तो हम खरीदने के लिए तैयार हैं। सरकार के पास एक अप्रैल को गेहूं का बकाया स्टॉक 70 लाख टन के तय मानकों के मुकाबले 161।25 लाख टन बचा था। चालू सीजन में भी उत्पादन ज्यादा होने का अनुमान है। इसके कारण आगे तेजी की उम्मीद न होने से प्राइवेट ट्रेडिंग कंपनियां गेहूं खरीद में रुचि नहीं ले रही है। उपभोक्ता उद्योग जैसे प्लोर मिल और ब्रेड व बिस्कुट कंपनियां भी सीमित खरीद कर रही हैं। (बिज़नस भास्कर....आर अस राणा)
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