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23 मार्च 2010
कृषि क्षेत्र को लेकर योजना आयोग गंभीर
नई दिल्ली : योजना आयोग ने कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सुधारों की वकालत की है। आयोग ने उपज बढ़ाने और खाद्यान्न की कीमतों पर काबू पाने की सरकार की मौजूदा रणनीति की कड़ी आलोचना भी की है। आयोग ने कहा है कि कृषि उत्पादों की कीमत तय करने में बाजार से जुड़े पहलू का ज्यादा ध्यान रखा जाना चाहिए और इसके लिए समर्थन मूल्य से खरीद मूल्य का ताल्लुक खत्म करना चाहिए। आयोग ने तमाम शुल्क और भंडार सीमा खत्म करने, देश भर में उत्पादों की बेरोकटोक आवाजाही को बढ़ावा देने और निर्यात तथा वायदा कारोबार पर पाबंदी खत्म करने का मशविरा भी दिया है। 11वीं योजना (2007-12) के मध्यवर्ती समीक्षा में आयोग ने कहा है कि 2005-06 और 2007-08 में कृषि क्षेत्र ने 4 फीसदी की दर से बढ़कर जहां बढि़या प्रदर्शन किया, वहीं पिछले दो साल का इसका प्रदर्शन दिखाता है कि सरकार की रणनीति ज्यादा प्रभावशाली नहीं रही है और इस क्षेत्र की वृद्धि दर बनाए रखने के लिए आपूर्ति के पहलू पर ज्यादा प्रयास किए जाने की जरूरत है। इस समीक्षा को अभी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई में पूर्ण योजना आयोग की ओर से मंगलवार को हरी झंडी दिखाई जानी है। दस्तावेज ने कहा गया है, 'इस बात का पर्याप्त विश्लेषण नहीं किया गया है कि इसका (2005-06 से तीन वर्षों में हासिल वृद्धि) कितना हिस्सा सरकारी रणनीति के तहत कृषि के लिए बढ़े आवंटन के दम पर आया है और कितना अनुकूल मौसम के कारण मिला है। यह भी साफ नहीं है कि इसमें बेहतर मांग और कीमतों के कारण निजी निवेश में बढ़ोतरी का इसमें कितना योगदान रहा है।' खाद्य मुद्रास्फीति दर पर काबू पाने में नाकामी को देखते हुए कृषि क्षेत्र से जुड़ी सरकारी नीतियों की चौतरफा आलोचना हो रही है। खाद्य मुद्रास्फीति दर फिलहाल लगभग 20 फीसदी के स्तर पर है, जो बीते कई वर्षों में नहीं देखा गया था। 2008-09 में कृषि उत्पादन की वृद्धि दर घटकर 1.6 फीसदी रह गई थी जबकि बारिश की पतली हालत के कारण रबी की फसलों की बुरी गत को देखते हुए 2009-10 में वृद्धि दर में 0.2 फीसदी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। सरकार ने अगले कारोबारी साल के लिए कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4 फीसदी पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। कृषि उत्पादन बढ़ाने से जुड़ी 11वीं योजना की रणनीति के तहत खाद्य सुरक्षा की चिंता पर गौर करते हुए आधुनिक तकनीकों तक किसानों की आसान पहुंच बनाने, सरकारी निवेश की मात्रा और उसका प्रभाव बढ़ाने, सब्सिडी को वाजिब बनाते हुए व्यवस्थागत समर्थन बढ़ाने और अधिक कीमत देने वाली फसलों और पशुपालन के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया है। (बीएस हिंदी)
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