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27 फ़रवरी 2010
दूर नहीं होंगी कृषि की मुश्किलें
अगले वित्त वर्ष 2010-11 के लिए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा संसद पेश किए गए आम बजट में कृषि क्षेत्र के विकास का पहिया तेजी से घुमाने के लिए कई उपाय किए गए हैं लेकिन ये उपाय चुनौतियों के सामने अपर्याप्त नजर आते हैं। आज कृषि क्षेत्र में समग्र निवेश बढ़ाने की जरूरत है। निवेश मुख्य रूप से सिंचाई, जल प्रबंधन आदि में होना चाहिए। चुनौतियों की बात करें तो फर्टिलाइजर के बढ़ते दाम के किसानों के सामने मुश्किल आ रही है। बजट से पहले ही फर्टिलाइजर के दाम काफी बढ़ चुके हैं। डीजल के दाम बढ़ते हैं तो इससे भी खेती की गतिविधियों पर प्रभाव पड़ेगा। इससे देश के खाद्यान्न उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। खाद्य वस्तुओं की परिवहन लागत बढ़ने से भी किसानों की दिक्कतें बढ़ेगी। खाद्य वस्तुएं महंगी होने से आम उपभोक्ताओं की भी समस्याएं बढ़ सकती हैं। कृषि क्षेत्र के लिए बजट में सकारात्मक उपायों की बात की जाए तो पूवरेत्तर राज्यों में हरित क्रांति लाने के लिए 400 करोड़ रुपये का प्रावधान प्रभावशाली साबित हो सकता है। इन राज्यों में खेती को बढ़ावा मिल सकता है। फूड प्रोसेसिंग सेक्टर को ज्यादा मदद मिलने से भी कृषि क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा। यह कदम स्वागत योग्य है। देश में 60 हजार गांवों में दलहन और तिलहन की पैदावार बढ़ाने के लिए 300 करोड़ रुपये का प्रावधान करके इन दोनों ही खाद्य वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाने के लिए उपयोगी कदम उठाया गया है। इन दोनों वस्तुओं के मामले में देश की आयात पर बढ़ती निर्भरता चिंता बनी हुई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बजट में इस पर ध्यान देने से इनकी पैदावार बढ़ेगी तो आयात पर निर्भरता कम होगी। फसली कर्ज पर पांच फीसदी ब्याज का प्रस्ताव खेती के हालातों में बदलाव ला सकता है। हालांकि किसान 3-4 फीसदी ब्याज पर फसली कर्ज मिलने की उम्मीद करते हैं। मेरा विचार है कि कृषि क्षेत्र के लिए उठाए गए कदम सही दिशा में हैं लेकिन इस क्षेत्र की जरूरतें इससे पूरी नहीं होती हैं।टी। हक पूर्व चेयरमैन, कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (बिज़नस भास्कर)
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