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28 जनवरी 2010
डेयरी फर्मों की पतली हालत, दूध में आएगा उबाल
आने वाले दिनों में अगर जल्दी ही दूध की कीमतें बढ़ती हैं तो इसका कारण देश में दूध की कमी होना नहीं होगा। इसकी असली वजह होगी शहरी इलाकों में दूध की आपूर्ति कम होना। बड़ी डेयरी फर्में जिन पर दूध की आपूर्ति की जिम्मेदारी रही है, वे निजी कंपनियों और फैक्टरियों के मुकाबले बाजार के हाशिए पर जा रही हैं। ऐसे में ज्यादा दाम देकर हम इन बड़ी डेयरी फर्मों के बाजार से बाहर निकलने की कीमत चुकाएंगे। दिल्ली इसका एकदम सटीक उदाहरण है। उत्तर प्रदेश दुनिया के सबसे बडे़ दूध निर्यातक न्यूजीलैंड से भी ज्यादा दूध का उत्पादन करता है। वहीं, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्य अकेले ऑस्ट्रेलिया को पछाड़ने का माद्दा रखते हैं। देश के कुल 10।80 करोड़ टन दुग्ध उत्पादन में से करीब आधे का योगदान उत्तर भारत करता है। इतने बड़े पैमाने पर दूध उत्पादन होने के बावजूद आखिर दूध की कमी कैसे है? नैशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) की मदर डेयरी भारत में श्वेत क्रांति की अगुवा और मिल्क इंडस्ट्री का एक बड़ा नाम है, लेकिन इसके पास पर्याप्त ताजा दूध नहीं है। यह राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार की डेयरी सहकारी समितियों से दूध खरीदती है। यह उपभोक्ताओं को सब्सिडी पर दूध नहीं देती है, ऐसे में यह किसानों को अच्छी कीमत भी चुका पाती है। हालांकि, इसका 30 फीसदी दूध मिल्क पाउडर और फैट का मिश्रण होता है। गर्मी में ऐसे दूध की हिस्सेदारी बढ़कर 50 फीसदी तक हो जाती है। पश्चिम और दक्षिण भारत की डेयरियां गर्मी के मौसम में इसी तरीके से दूध की आपूर्ति सुनिश्चित करती हैं। मदर डेयरी दिल्ली की लाइफ लाइन है। इसकी प्रतियोगियों में अमूल (गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन) और दूसरी निजी कंपनियां हैं। दूध की आपूर्ति का संकट हर तरफ है। मुंबई में रोजाना 50 लाख लीटर दूध की जरूरत होती है। हालांकि, राज्य की तीन डेयरी मिलकर सिर्फ 10 लाख लीटर दूध की आपूर्ति ही कर पाती हैं। कोऑपरेटिव के पास जाने के बजाय दूध निजी कंपनियों के पास जा रहा है। ऐसे में दुर्भाग्यवश सहकारी समितियों को अभी नुकसान उठाना पड़ रहा है। दरअसल यह दाम का मामला है। डेयरी को आपसी प्रतियोगिता के अलावा फैक्टरियों से भी कड़ी टक्कर लेनी पड़ती है। किसानों को इससे कोई मतलब नहीं है कि उनका दूध कौन खरीद रहा है। वे सबसे ज्यादा दाम लगाने वाले को ही दूध बेचते हैं। दूध की आपूर्ति कम होने से यह प्रतियोगिता और कड़ी हो गई है। डेयरी इंडिया 2007 के औद्योगिक आंकड़ों के मुताबिक यह सेक्टर बमुश्किल सालाना 3 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है। इस साल सूखा और चारे की कीमत बढ़ने के कारण दूध की लागत और बढ़ गई है। इसीलिए, किसान भी ज्यादा कीमत वसूल रहे हैं। (ई टी हिन्दी)
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