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30 दिसंबर 2009
डॉलर कमजोर होने से कॉपर पांच फीसदी तेज
यूरो के मुकाबले डॉलर कमजोर होने के कारण लंदन में कॉपर की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा कॉपर की वैश्विक मांग बढ़ने की वजह से भी लंदन के साथ घरेलू बाजार में इसकी कीमतों में बढ़ोतरी को बल मिला हैं। अगले साल भी इसके मूल्यों में तेजी के आसार हैं। पिछले दो सप्ताह के दौरान लंदन मेटल एक्सचेंज (एलएमई) कॉपर तीन माह अनुबंध के दाम बढ़कर 6,905 डॉलर से बढ़कर 7,261 डॉलर प्रति टन हो गए। घरेलू बाजार में इस दौरान कॉपर के दाम 324 रुपये से बढकर 343 रुपये प्रति किलो हो गए। कॉपर कारोबारी सुरेश चंद गुप्ता ने बिजनेस भास्कर को बताया कि यूरो के मुकाबले डॉलर फिर गिरने लगा है। डॉलर के मुकाबले यूरो का एक्सचेंज रेट 1.51 डॉलर से गिरकर 1.43 डॉलर पर आ गया है। इस वजह से एलएमई में कॉपर के दाम बढ़े। इससे लंदन में निवेशकों की होल्डिंग लागत घट रही है। इसी कारण तेजी का माहौल बना हुआ है। जिससे घरेलू बाजार में भी मूल्यों में बढ़ोतरी हुई है। दरअसल घरेलू बाजार में कॉपर के दाम एलएमई के अनुरूप रहते हैं। मेटल विश्लेषक अभिषेक शर्मा के अनुसार आर्थिक हालात तेजी से सुधरने की वजह से चीन में कॉपर की मांग बढ़ रही हैं। नवंबर के दौरान चीन में कॉपर का आयात 10 फीसदी बढकर 2.90 लाख टन हो गया है। इस वजह से भी इसके मूल्यों में तेजी आई है। वहीं भारत में चालू वित्त वर्ष में अक्टूबर माह तक 4.57 लाख टन कॉपर का उत्पादन हुआ है, पिछली समान अवधि में यह 3.65 लाख टन था।एंजिल ब्रोकिंग के विश्लेषक अनुज गुप्ता का कहना है कि चीन, अमेरिका में इक्विटी मार्केट सुधरने से कॉपर की औद्योगिक मांग और सुधरने की संभावना है। सथ ही भारत में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी बढ़ने से देश में अगले साल भी कॉपर की मांग बढ़ने की उम्मीद हैं।चीन अगले साल मांग बढ़ने की उम्मीद में कॉपर का स्टॉक बढा सकता हैं। इंटरनेशनल कॉपर स्टडी ग्रुप (आईसीएसजी) के मुताबिक अगले साल चीन में अगले कॉपर की खपत आठ फीसदी बढ़कर 58.3 लाख टन तक पहुंच सकती हैं।लिहाजा अगले साल भी चीन में कॉपर का आयात अधिक होने की संभावना है। ऐसे में कॉपर की कीमतों में तेजी बनी रह सकती है। इसके अलावा चिली की प्रमुख कॉपर माइन चुकई में हड़ताल की वजह से भी कॉपर के मूल्यों में तेजी को बल मिल सकता हैं। उल्लेखनीय है कि कॉपर की सबसे अधिक खपत इलैक्ट्रिकल में 42 फीसदी, भवन निर्माण में 28 फीसदी, ट्रांसपोर्ट में 12 फीसदी, कंज्यूमर प्रोडक्ट में 9 फीसदी और इंडस्ट्रियल मशीनरी में 9 फीसदी होती है।इसका सबसे अधिक उत्पादन एशिया में 43 फीसदी होता है इसके बाद 32 फीसदी अमेरिका,19 फीसदी यूरोप में किया जाता है। (बिसनेस भास्कर)
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