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14 नवंबर 2009
भारत से कॉटन निर्यात पर उद्योग जगत की परस्पर विरोधी मांग
किसान द्वारा उत्पादित कपास पर व्यापार जगत के दो खेमे आमने-सामने आ चुका है। कॉटन व्यापार से जुड़े कारोबारियों ने उत्पादन और खपत के आधार पर कहा है कि भारत से कॉटन की विश्व बाजार में मांग अच्छी निकल रही है। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीएआई) का कहना है कि अगर इस पर रोक लगाई गई तो उद्योग को नुकसान होगा। दूसरी ओर टैक्सटाइल उद्योग कॉटन के निर्यात पर रोक या नियंत्रण रखने की मांग कर रहा है। फेडरेशन ऑफ इंडिया एक्सपोर्ट आर्गनाईजेशन (एफआईईओ) ने कॉटन के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है।देश में कॉटन की उपलब्धता मांग के मुकाबले ज्यादा है। सीएआई द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार चालू खरीफ सीजन में देश में कॉटन का उत्पादन 305 लाख गांठ (प्रति गांठ 170 किलो) होने का अनुमान है। नए सीजन के शुरू में 71।5 लाख गांठ का बकाया स्टॉक मिलाकर कुल उपलब्धता 376.5 लाख गांठ की बैठेगी। इसके अलावा सात लाख गांठ कॉटन का आयात होने की संभावना है। देश में मिलों की सालाना खपत 240 लाख गांठ की है जबकि 70 लाख गांठ का निर्यात होने की संभावना है। ऐसे में वर्ष 2010-2011 में शुरू होने वाले नए सीजन में 73.50 लाख गांठ का स्टॉक उपलब्ध रहेगा। सीएआई के अध्यक्ष धीरेन एन. सेठ ने बताया कि पिछले एक महीने में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉटन की कीमतों में 15 फीसदी का इजाफा हुआ है लेकिन घरेलू मंडियों में इस दौरान मात्र 10 फीसदी का इजाफा हुआ है। न्यूयार्क बोर्ड ऑफ ट्रेड में कॉटन के दिसंबर वायदा अनुबंध के भाव 11 नवंबर को बढ़कर 67.25 सेंट प्रति पाउंड हो गए। जबकि पिछले साल इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉटन के भाव 39.14 सेंट प्रति पाउंड थे। विश्व में कॉटन की उपलब्धता पिछले साल ज्यादा थी लेकिन चालू सीजन में चीन में पैदावार में कमी आने से भारत से कॉटन की मांग बढ़ी है। घरेलू मंडियों में शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव 24,600 से 24,700 रुपये प्रति कैंडी (प्रति कैंडी 356 किलो) चल रहे हैं। घरेलू मंडियों में भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से ऊपर होने के कारण कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) की खरीद लगभग ठप है। अक्टूबर महीने में देश की मंडियों में करीब 24.5 लाख गांठ की आवक हो चुकी है।दूसरी ओर एफआईईओ के अध्यक्ष का दावा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉटन के दाम तेज होने से भारत से कॉटन का निर्यात बढ़ रहा है। जबकि पैदावार में कमी आने से घरेलू मंडियों में कॉटन के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं जिससे कॉटन उद्योग को परेशानी हो रही है। इसलिए कॉटन के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जाए। (बिज़नस भास्कर)
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