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04 नवंबर 2009
फसल हमारी, भाव तुम्हारे, ऐसा क्यों?
गन्ना म्हारा और भाव थारा, इब ना चलैगा। गन्ना उत्पादक किसानों का यह ऐलान भविष्य के लिए चेतावनी है, जिसे समझने की कोशिश न राज्य सरकारें कर रही हैं न केंद्र सरकार। पिछले कुछ समय से गन्ना उत्पादक किसानों में सरकार द्वारा तय किए गए समर्थन मूल्य को लेकर काफी रोष है। गन्ने की घोषित कीमत से नाखुश किसान अब आंदोलन की राह पर हैं। कहींखड़ी फसल जलायी जा रही है, कहीं आयातित चीनी की बोरियों में आग लगायी जा रही है तो कहीं किसान आत्महत्या को विवश हैं। फिलहाल आंदोलन उत्तरप्रदेश में हैं, क्योंकि गन्ने की खेती मुख्यत: यहींहोती है, लेकिन इस समस्या को केवल एक प्रदेश की समस्या मानकर नजरंदाज करना ठीक नहींहोगा। किसानों का यह आक्रोश आज गन्ने की कीमत को लेकर है, लेकिन कभी यह धान तो कभी गेहूं के समर्थन मूल्य पर भी भड़कता है। किसान व्यापारी नहींहैं, न ही वे विशुध्द व्यावसायिक रूप से खेती करते हैं। भारत में किसानों की बड़ी आबादी आज भी गरीबी और कर्ज के चंगुल में फंसी है तो सिर्फ इसलिए कि उन्हें उनकी मेहनत का पूरा हक नहींदिया जाता। किसानों का हितैषी बनने वाली विभिन्न सरकारें जो नीतियां मसीहाई अंदाज में लागू करती हैं, उनका लाभ असल हितग्राहियों तक तो कभी पहुंच ही नहींपाता। चाहे बैंक से सस्ती दर पर ब्याज लेने की योजना हो या ऋणमाफी की या उन्नत बीज और खाद उपलब्ध कराने की, इनसे खेत में जी-तोड़ मजदूरी करने वाले किसान को कभी लाभ नहींमिलता। इसका फायदा वे बड़े किसान उठाते हैं जो पहले से सक्षम हैं। ऐसे खुशहाल किसानों की तस्वीरें हम सरकारी या व्यावसायिक विज्ञापनों में देखते हैं। आधे पेट खाकर बीवी-बच्चों सहित खेत में कमर झुकाए किसान की असली पीड़ा इन विज्ञापनों में अक्सर छिप जाया करती है। कमर झुकाए ये किसान ही अब सीना तानकर खड़े होने का साहस कर रहे हैं और महेन्द्र सिंह टिकैत व वी एम सिंह जैसे किसान नेताओं की अगुवाई में चिल्लाकर कह रहे हैं कि अपनी फसल का भाव हम खुद तय करेंगे। इन किसानों का आरोप है कि चीनी मिल मालिकों से सांठ-गांठ कर सरकार ने गन्ने का उचित मूल्य तय नहीं किया है। दरअसल केंद्र सरकार ने देश में गन्ने के न्यूनतम आंविधिक मूल्य की व्यवस्था खत्म कर उचित लाभकारी मूल्य की व्यवस्था लागू की है। नए अध्यादेश में कहा गाय है कि अगर कोई राज्य सरकार केंद्र द्वारा घोषित उचित लाभकारी मूल्य से ज्यादा का भुगतान कराना चाहती है तो यह पैसा वह खुद दे। केंद्र ने गन्ने का उचित लाभकारी मूल्य 129।84 पैसे क्विंटल तय किया है। किसानों की मांग है कि कीमत 280 रुपए प्रति क्विंटल तय हो। जबकि उत्तर प्रदेश सरकार ने पुरानी व्यवस्था में गन्ने का राज्य परामर्शी मूल्य 165-170 रुपए क्विंटल तय किया है। केंद्र सरकार की व्यवस्था के अनुरूप कीमतों में अंतर का भुगतान राज्य सरकार को करना है, लेकिन फिलहाल मायावती सरकार ने इस पर विरोध जताते हुए भुगतान करने से इन्कार कर दिया है। केंद्र सरकार के समक्ष उत्तरप्रदेश सरकार और किसानों दोनों की नाराजगी को दूर करने की चुनौती है। शरद पवार महाराष्ट्र की सत्ता में भागीदारी के हिसाब-किताब से मुक्त हों तो इस ओर ध्यान दें। मायावतीजी की दिलचस्पी भी किसानों की समस्या से ज्यादा केंद्र को खरी-खोटी सुनाने में दिखती है। लेकिन कांग्रेस के समक्ष अपना हाथ किसानों के साथ करने या उनका साथ देने में पीछे कर लेने का प्रश्न है। मूल्यों में थोड़ी घट-बढ़ आपसी बातचीत से सुलझायी जा सकती है। किंतु जब मिल मालिकों या आयात में कुछ लोगाेंकी जेब भरने का स्वार्थ रहेगा तो किसानों के हित की बात कैसे सोची जाएगी। किसानों की मांग गलत नहींहै। 129.84 पैसे और 280 रु में काफी अंतर है। जब महंगाई सब ओर बढ़ रही है और चीनी के दाम भी बेतहाशा बढ़े हैं तब गन्ना उगाने वाले किसान को अपनी फसल सस्ते में बेचने पर मजबूर क्यों किया जाए। खेती-किसानी की उपेक्षा करने का नतीजा है कि कृषि का क्षेत्र लगातार घट रहा है और उत्पादन में कमी आ रही है। 2006-07 में 26.62 लाख हेक्टेयर में गन्ने का उत्पादन होता था, अब यह घटकर साढ़े सत्रह लाख के लगभग रह गया है और उत्पादन काफी घट गया है। नतीजा यह है कि ब्राजील से चीनी मंगायी जा रही है। जितना धन हम आयात में फूंक देते हैं, उतना किसानों को दें तो खेती का क्षेत्रफल बढ़ेगा, खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता बढेग़ी और किसानों की जीवनदशा भी सुधरेगी। किंतु विश्व बैंक के कर्जदार बन प्रसन्न हो रहे लोगों को यह बात कैसे अच्छी लग सकती है। (देशबंधु)
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