Daily update All Commodity news like : Wheat, Rice, Maize, Guar, Sugar, Gur, Pulses, Spices, Mentha Oil & Oil Complex (Musterd seed & Oil, soyabeen seed & Oil, Groundnet seed & Oil, Pam Oil etc.)
10 नवंबर 2009
कांग्रेस को महंगा पड़ सकता है पवार का दांव
गन्ना किसानों और चीनी उद्योग की राजनीति के कुशल खिलाड़ी शरद पवार ने गन्ने की नई मूल्य व्यवस्था फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस (एफआरपी) के जरिये ऐसा दांव चला है जो कांग्रेस को भारी पड़ने वाला है। चालू साल के लिए इसे 129।84 रुपये प्रति क्विंटल रखा गया है जो पिछले साल किसानों को मिली कीमत से भी कम है। खास बात यह है कि इस सीजन (2009-10) में ही नहीं बल्कि आगे भी एफआरपी पवार के गढ़ महाराष्ट्र के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। लेकिन गन्ने के लिए राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) तय करने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, बिहार व मध्य प्रदेश में पवार का नया फामरूला कांग्रेस से बड़ी राजनीतिक कीमत लेकर जाएगा। जिस तरह से एफआरपी के विरोध में सोमवार को पूरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश लगभग रुक गया वह कांग्रेस के लिए अच्छा संकेत नहीं है।गन्ने का एसएपी देने वाले राज्यों के किसान एफआरपी को अपने साथ एक बड़ा धोखा मान रहे हैं। इस बात को हम गन्ना मूल्य पर चल रही सिरीज के पहले दो हिस्सों में साफ कर चुके हैं कि किस तरह से उत्तर भारत के राज्यों के मामले में एफआरपी एक विलेन की तरह काम कर सकता है। ऐसे में यहां गन्ने की खेती पर प्रतिकूल असर भी पड़ सकता है। एफआरपी के राजनीतिक नुकसान का अनुमान शरद पवार को भी हो गया है। यही वजह है कि इस संवाददाता के एक सवाल के जबाव में उन्होंने माना कि एफआरपी पर चीनी मिलों को गन्ना नहीं मिलेगा। पवार ने साफ किया कि मिलों को चीनी की ऊंची कीमतों के मुताबिक गन्ने का अधिक दाम देना पड़ेगा। एफआरपी को केवल एक रेफरेंस प्राइस की तरह लिया जाना चाहिए।सच बात यह है कि उक्त राज्यों में पवार का कोई राजनीतिक आधार नहीं है। राजनीतिक रूप से ये राज्य कांग्रेस के इलाके हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन अच्छा रहा था लेकिन गन्ना किसान अब वहां पवार और सोनिया गांधी के पुतले फूंक रहे हैं। मायावती ने भी इस मामले में राजनीतिक फायदा उठाने के लिए तुरंत प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को एफआरपी के विरोध और एसएपी कायम रखने के बारे में चिट्ठी लिख दी। साथ ही राज्य में रॉ शुगर की आवाजाही पर रोक लगाकर किसानों के विरोध को कम करने की कोशिश की है।दूसरी ओर अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल ने भी इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सोमवार को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जिस तरह से किसान सड़कों पर आये उससे लोकदल को इस मामले में ताकत दिखाने का मौका मिल गया है। इसके साथ ही अजित सिंह अब भाजपा, सपा और वाम दलों के साथ एफआरपी के लिए जारी अध्यादेश (आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में संशोधन का अध्यादेश) के संसद में विरोध की रणनीति बनाने की बात कर रहे हैं। लेकिन इस मुद्दे पर कांग्रेस को जैसे सांप सूंघ गया है। कांग्रेसी नेता पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए हैं। चीनी की कीमतें डेढ़ गुना हो जाने के बावजूद किसानों को पिछले साल से भी कम दाम वाले एफआरपी के पक्ष में खड़ा होना उनके लिए असंभव हो गया है। दूसरी ओर महाराष्ट्र में हमेशा से एसएमपी के आधार पर गन्ना मूल्य का भुगतान होता रहा है। चालू सीजन के लिए 9.5 फीसदी चीनी की रिकवरी पर एसएमपी मात्र 107 रुपये प्रति क्विंटल था। लेकिन अब इसी रिकवरी पर 129.84 रुपये प्रति क्ंिवटल का एफआरपी है। ऐसे में ऊंची रिकवरी वाले महाराष्ट्र के लिए भुगतान का ऊंचा आधार तय हो गया है। साथ ही वहां की सहकारी चीनी मिलों में किसानों की अपनी हिस्सेदारी है। इसलिए शुरू में ही वहां किसानों को 175 रुपये प्रति क्विंटल की औसत वाली पहली किस्त दी जा रही है। गन्ने की कटाई और ढुलाई का 25 रुपये का खर्च इसमें शामिल नहीं है। इसे जोड़ने पर यह 200 रुपये प्रति क्विंटल बैठता है। यही वजह है कि वहां से गन्ना मूल्य पर विरोध के स्वर नहीं उठ रहे हैं। यह साबित करता है कि पवार का राजनीतिक आधार फायदे में है। लेकिन कांग्रेस के ऊपर चीनी मिलों के पक्ष में खड़े होने के आरोप लग रहे हैं। (बिज़नस भास्कर)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें