मुंबई August 31, 2009
कपास के इतिहास में पहली बार बुआई का अनुमानित क्षेत्रफल 1 करोड़ हेक्टेयर के आंकड़े पर पहुंच गया है।
यह कपास वर्ष 2009-10 (अक्टूबर-सितंबर) के लिए मील का पत्थर है। इसके लिए मॉनसूनी बारिश में कमी और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी की भूमिका को अहम माना जा रहा है।
दक्षिण भारत के राज्यों, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में अभी भी बुआई का काम जारी है। कॉटन एडवाइजरी बोर्ड (सीएबी) के अनुमानों के मुताबिक अभी 3.5-4 लाख हेक्टेयर कपास की खेती के बारे में रिपोर्ट नहीं मिली है, इसे भी बुआई के क्षेत्रफल में शामिल कर लिया जाए तो कुल क्षेत्रफल 96.55 लाख हेक्टेयर हो जाएगा, जो मील का पत्थर होगा।
यह महत्वपूर्ण है कि दक्षिण भारत के किसान मूंगफली, सोयाबीन, गन्ने आदि की खेती की बजाय कपास की खेती की ओर आकर्षित हुए, क्योंकि इन इलाकों में चालू मॉनसून सत्र के दौरान बारिश में 25 प्रतिशत कमी आई है।
भारत सरकार के टेक्सटाइल कमिश्नर एबी जोशी ने कहा, 'अगस्त 2008 से अब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य में 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है। अब बुआई लगभग पूरी हो चुकी है। किसानों ने उस फसल का चयन कर लिया है, जिसमें उन्हें मुनाफे की उम्मीद है। पिछले साल एमएसपी में कोई उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं हुई थी, लेकिन इस साल किसानों ने कपास की फसल में ज्यादा रुचि दिखाई है क्योंकि इसकी फसल को कम बारिश में भी उगाया जा सकता है।'
अगस्त 29 तक के आंकड़ों के मुताबिक बुआई का कुल क्षेत्रफल 96.55 लाख हेक्टेयर है, जिसमें पहले साल की तुलना में 2.65 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी हुई है। बीटी कपास के क्षेत्रफल में 10.55 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और कुल क्षेत्रफल 76.20 लाख हेक्टेयर हो गया है जिसका क्षेत्रफल कपास के कुल क्षेत्रफल का 80 प्रतिशत होता है।
बीटी कपास का वाणिज्यीकरण भारत में 2002 में हुआ था, जिसे भारतीय किसानों ने तेजी से अपना लिया। प्रवर्धित बीज की वजह से भारत में कपास उत्पादन की स्थिति वैश्विक क्षितिज पर तेजी से बढ़ी।
इस समय भारत दुनिया का दूसरा बड़ा कपास उत्पादक और निर्यातक देश बनकर उभरा है। मानसेंटो होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड के भारत क्षेत्र के प्रमुख शेखर नटराजन ने कहा कि यह महज 7 साल की छोटी अवधि में हुआ है। (बीएस हिन्दी)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें