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29 अगस्त 2009
गेहूं, जौ की उपयुक्त किस्में सुझरइ
मानसून की बेरुखी से देश के अधिकांश हिस्से में सूखे जैसे हालात बनने से खरीफ पैदावार में भारी गिरावट आने के आसार हैं। सरकार इसकी भरपाई रबी फसलों से करना चाहती है। करनाल के गेहूं अनुसंधान निदेशालय ने उत्तर-पश्चिमी भारत के राज्यों के लिए उपयुक्त गेहूं और जौ की किस्मों की सिफारिश की है। शुक्रवार को 48वें अखिल भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान कार्यकर्ता सम्मेलन में वैज्ञानिकों के बीच इन किस्मों पर गहन विचार विमर्श किया गया। सम्मेलन के उद्घाटन के बाद भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. मंगला राय ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि गेहूं और जौ का उत्पादन बढ़ाने के लिए कृषि वैज्ञानिक प्रति हैक्टेयर ज्यादा पैदावार और नई किस्में विकसित कर रहे हैं। वैज्ञानिकों को अनुसंधान के लिए धन की कमी आड़े नहीं आने दी जाएगी। पहले भी वैज्ञानिकों ने अनेक किस्में विकसित की हैं, लेकिन बदलती जलवायु और पानी की कमी के कारण और नई किस्मों की जरूरत है। गेहूं अनुसंधान निदेशालय के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. एस. एस. सिंह ने बताया कि नई किस्में और नई तकनीक के माध्यम से मानसून में कमी के बावजूद किसान बेहतर उत्पादन ले सकते हैं। उत्तर-पश्चिम भारत के विभिन्न राज्यों के मुताबिक निदेशालय ने गेहूं और जौ की उन्नत किस्में लगाने की सलाह दी है। सम्मेलन में आए वैज्ञानिक अपने-अपने क्षेत्र में गेहूं व जौ की उपयुक्त की सिफारिश करेंगे और किसानों को जानकारी सुलभ कराएंगे। निदेशालय की सिफारिश केअनुसार पंजाब के किसान अगर समय पर गेहूं की बुवाई करते हैं तो सिंचित क्षेत्र में डीबीडब्ल्यू 17, पीबीडब्ल्यू 550, पीबीडब्ल्यू 343 और पीबीडब्ल्यू 502 की बुवाई करें तथा जो किसान जौ की बुवाई करना चाहते हैं उन्हें सिंचित क्षेत्र में आरडी 2552 किस्म की बुवाई करनी चाहिए। (बिज़नस भास्कर)
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