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20 अगस्त 2009
राज्यों के लिए सूखा राहत की डगर हुई मुश्किल
इस साल देश में मानसून के असफल होने से अभी तक 260 जिले सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हैं और कुछ इस प्रक्रिया में हैं। लेकिन इस बार का सूखा कई तरह से चौंकाने वाला है और उसके चलते सरकार की किसानों को राहत देने की प्रक्रिया भी पुरानी पड़ती दिख रही है। यही वजह है कि सूखा प्रभावित राज्य पहले की तरह खाद्यान्न या रोजगार सृजन के कार्यक्रमों की मांग नहीं कर रहे हैं। कुछ राज्य बिजली और डीजल की मांग कर रहे हैं तो कुछ राज्यों की मांग खाद्यान्न से भरे बड़े गोदामों को खाली करने की है। सूखे पर प्रधानमंत्री के साथ मुख्यमंत्रियों और कैबिनेट सचिव के साथ राज्यों के मुख्य सचिवों की बैठक में यह मांगें सामने आई हैं। यह बात अलग है कि अभी तक केवल चार राज्यों ने केंद्र से राहत के पहले चरण यानी मेमोरेंडम जमा करने की रस्म पूरी की है।नेशनल रेनफेड एरिया अथॉरिटी के चेयरमैन डॉ.आर.एस. सामरा ने बिजनेस भास्कर को बताया कि इस साल हालात कुछ अलग हैं। एक ओर तो सिंचिंत सुविधाओं वाले हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश सूखे की चपेट में हैं। दूसरी ओर बाढ़ से प्रभावित रहने वाले बिहार, असम और पूर्वी उत्तर प्रदेश भी इस संकट का सामना कर रहे हैं। और तो और, हिमाचल और पूवरेत्तर के नगालैंड जैसे अधिक बारिश वाले राज्य भी सूखे की चपेट में हैं। एक तरह से यह पुरानी परंपरा को तोड़ने वाला सूखा है। राजस्थान में अक्सर सूखा पड़ता था, लेकिन इस बार वहां हालात उतने खराब नहीं हैं।जहां तक सूखा राहत का सवाल है तो राज्यों की सबसे पहली मांग 1400 मेगावाट के केंद्रीय पूल से अतिरिक्त बिजली की रही है। इन बैठकों में मौजूद एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक अधिकांश राज्य 400 से 500 मेगावाट अतिरिक्त बिजली मांग रहे हैं। इनमें से हरियाणा को 275 मेगावाट अतिरिक्त बिजली ड्रॉ करने का अधिकार केंद्र ने दे भी दिया है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने मांग रखी कि राज्य आठ रुपये प्रति यूनिट तक की कीमत पर बिजली खरीद कर सिंचाई के लिए दे रहा है, उसकी भरपाई की जाए। उक्त अधिकारी का कहना है कि सूखा राहत के लिए पहले अक्सर खाद्यान्न की मांग आती थी। लेकिन अब राज्य डीजल मांग रहे हैं। कई राज्यों में ट्रांसमिशन ढांचा कमजोर है, इस वजह से वहां अधिक लोड भी नहीं दिया जा सकता है।डॉ. सामरा के मुताबिक डीजल से सिंचाई की लागत बिजली के मुकाबले चार से पांच गुना अधिक होती है। इसी को आधार बनाकर राज्य डीजल पर सब्सिडी मांग रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि केंद्र द्वारा घोषित डीजल सब्सिडी की योजना को कांग्रेस शासित हरियाणा ने ही अव्यावहारिक करार दिया है। राज्य सरकारें प्रति हेक्टेयर 2,000 रुपये की अतिरिक्त लागत किसानों के लिए राहत के रूप में मांग रही हैं। उत्तर प्रदेश ने तो डीजल पर सब्सिडी के फॉमरूले को ही गलत करार दिया है। राज्य सरकार के मुताबिक आपदा राहत कोष (सीआरएफ) से केंद्र 75 से 100 फीसदी राहत देता है।किसानों को नहीं मिलेगी कर्ज माफीनई दिल्ली। देशभर में सूखे की स्थिति के बावजूद सरकार किसानों को किसी तरह की कर्ज माफी देने पर विचार नहीं कर रही है। इसके अलावा सरकार चालू वित्त वर्ष में किसी तरह की नई उधारी लेने की भी योजना नहीं बना रही है। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के प्रमुखों के साथ मंगलवार को हुई बैठक के बाद वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि सरकार को चालू वित्त वर्ष में छह फीसदी से ज्यादा की विकास दर हासिल करने की पूरी उम्मीद है। वित्तमंत्री के अनुसार अभी यह आकलन करना मुश्किल है कि मानसून का विकास दर पर क्या असर पड़ा है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि फिलहाल सरकार किसानों को कर्ज माफी देने के लिए किसी तरह के प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है।वित्त मंत्री ने सूखे की स्थिति में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की भूमिका पर कहा कि ग्रामीण बैंक अपने कुल कर्ज का 70 फीसदी कृषि क्षेत्र को ही देते हैं। इसे देखते हुए सरकार वर्ष 2010-11 तक ग्रामीण बैंकों के विस्तार के साथ उनका आधुनिकीकरण भी करेगी। इसके तहत अगले दो सालों में 2000 नई शाखाएं खोली जाएंगी और ग्रामीण बैंकों को भी कोर बैंकिंग के साथ जोड़ा जाएगा। उन्होंने बताया कि बीते वित्त वर्ष में ग्रामीण बैंकों ने 41,220 करोड़ रुपये के कर्ज दिए हैं। ग्रामीण बैंकों की माली हालत सुधारने के लिए 1,796 करोड़ रुपये रीकैपिटाइलेजशन के तहत उन्हें दिए गए हैं। किसानों को ऐसे मिलती है राहतजिलाधिकारी की तरफ से वसूली स्थगित कर दी जाती हैइसके बाद राज्य सरकार केंद्र को मेमोरेंडम देती हैकेंद्रीय टीम राज्य का दौरा कर रिपोर्ट तैयार करती हैइसकी सिफारिश पर सीआरआफ से राज्य को पैसा मिलता हैराज्य सरकार नुकसान के आधार पर मुआवजा देती है (Business Bhaskar)
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