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02 जुलाई 2009
आर्थिक सर्वेक्षण: व्यापक आर्थिक सुधारों पर जोर
02 जुलाई 2009इंडो-एशियन न्यूज सर्विसनई दिल्ली। वैश्विक वित्तीय संकट के प्रतिकूल असर को स्वीकार करते हुए गुरुवार को लोकसभा में पेश ‘आर्थिक समीक्षा 2008-09’ में बीते वित्त वर्ष में विकास की दर 6.7 फीसदी रहने की सम्भावना जताई गई है। समीक्षा के अनुसार मंदी के चलते अक्टूबर-दिसम्बर 2008 के बीच करीब पांच लाख कामगारों को नौकरियां गंवानी पड़ीं। वहीं सरकार के प्रोत्साहन पैकेजों के कारण राजकोषीय घाटा बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद का 5.2 फीसदी हो गया।समीक्षा के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष में कृषि एवं संबंधित गतिविधियों के विकास में 1.6 प्रतिशत तक की गिरावट आई, जबकि नीतियों, बेहतर आधारभूत संरचनाओं और वित्तीय क्षेत्रों में सुधार से प्रत्यक्ष विदेश निवेश (एफडीआई) के प्रवाह में तेजी आई। देश में व्यापार क्षेत्र की स्थिति उत्साहवर्धक नहीं होने के बीच बैंकों ने 2,64,455 करोड़ रुपए के ऋण वितरित किए।वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा पेश समीक्षा में कहा गया है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, विनिवेश, कराधान और सब्सिडी के क्षेत्र में व्यापक सुधार कर प्रतिकूल वैश्विक स्थिति के बावजूद चालू वित्त वर्ष में देश 7.75 फीसदी की विकास दर को हासिल कर सकता है। यदि मानसून सामान्य रहा तो अर्थव्यवस्था अनुमान से अधिक तेजी से विकास करेगी।बीते वित्त वर्ष में कृषि एवं संबंधित गतिविधियों के विकास में (संशोधित अनुमान के अनुसार) 1.6 प्रतिशत तक की गिरावट को अलग कर दिया जाए तो पिछले तीन वर्षों (2005-06 से 2007-08) के दौरान 4.9 प्रतिशत से अधिक की औसत वृद्धि के साथ कृषि क्षेत्र ने समग्र वृद्धि में शानदार योगदान दिया। समीक्षा में कहा गया है कि कृषि वृद्धि में तेजी से उतार-चढ़ाव आए हैं तथा यह प्रकृति की अनिश्चिता के कारण भी असुरक्षित है।समीक्षा के मुताबिक देश में व्यापार क्षेत्र की सम्भावना उत्साहवर्धक नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का अनुमान है कि विश्व के उत्पादन में 1.3 प्रतिशत की नकारात्मक वृद्धि होगी और विश्व व्यापार के परिणाम में नकारात्मक 11 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है।निर्यात में गिरावट से सेवाओं व वस्तुओं के व्यापार के प्रभावित होने की संभावना है। वर्ष 2010 में आईएमएफ के अनुमानों के अनुसार स्थिति के सुधरने की सम्भावना है। ऐसे में सेवा क्षेत्र के लिए विशिष्ट नीतियों की एक रूपरेखा तैयार किए जाने की आवश्यकता है जिसका उद्देश्य न केवल वर्तमान वैश्विक अर्थ संकट के प्रभाव से बचना है बल्कि अर्थव्यवस्था और कुल निर्यात की वृद्धि में तेजी लाना है।समीक्षा में मंदी के नकारात्मक असर से अर्थव्यवस्था को बचाए रखने के लिए किए गए उपायों की चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि सरकार ने मांग बढ़ाने और रोजगार सृजन के लिए सरकारी परियोजनाओं पर खासा धन खर्च किया जिसके चलते राजकोषीय घाटे में वृद्धि हुई और यह 2008-09 में सकल घरेलू उत्पाद का 5.2 फीसदी हो गया जबकि 2007-08 में यह 2.7 फीसदी था।भारतीय रिजर्व बैंक ने मौद्रिक स्थिति ठीक करने और नकदी बढ़ाने के अनेक उपाय किए जिनमें नकद आरक्षी अनुपात, सांविधिक तरलता अनुपात और महत्वपूर्ण नीतिगत दरों में कटौती शामिल है। इसका उद्देश्य उत्पादक क्षेत्रों की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए बाजार में नकदी का प्रवाह सुगम करना था।सरकार ने वैश्विक मंदी का असर दूर करने के लिए कई कदम उठाए जिनमें श्रम प्रधान निर्यातों के लिए ज्यादा ऋण की उपलब्धता, लदान से पहले और बाद के लिए अधिक ऋण मुहैय्या करवाना और सीमा उत्पाद कर की वापसी अदायगी शामिल है।समीक्षा के मुताबिक बीते वर्ष में निर्धनता की दर में काफी गिरावट हुई लेकिन कुपोषण की स्थिति अब भी गम्भीर बनी हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2005-06 के अनुसार तीन साल से छोटे उम्र के बच्चों में कुपोषण की मात्रा 45.9 फीसदी है जो अब भी बहुत ज्यादा है। इसमें 1998-99 में 47 फीसदी के स्तर से कोई खास कमी नहीं आई है। ऐसे में वर्तमान नीतियों और कार्यक्रमों में संशोधन की जरूरत है।बीते वर्ष देश का विदेशी ऋण बढ़कर 224.77 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया। विदेशी ऋण में मार्च 2007 की तुलना में 53.44 अरब अमेरिकी डॉलर की वृद्धि हुई। दीर्घकालिक ऋण में 34.6 अरब अमेरिकी डॉलर और अल्पावधि ऋण में 18.9 अरब अमरिकी डॉलर की वृद्धि हुई।इधर, घरेलू ऋण बाजार में वर्ष 2008-09 के दौरान सहकारी और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों सहित सभी बैंकों ने 2,64,455 करोड़ रुपए के ऋण वितरित किए जबकि लक्ष्य 2,80,000 करोड़ रुपये का ऋण वितरित करने का था।वर्ष 2008-09 के दौरान (फरवरी 2009 तक) कुल 26,828 करोड़ रुपए की सीमा वाले 47.26 लाख किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए गए।कृषि ऋण माफी और ऋण राहत योजना के तहत सरकार ने वाणिज्यिक बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों तथा सहकारी ऋणदाता संस्थाओं को प्रथम किस्त के रूप में 25,000 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए। इसमें से 17,500 करोड़ रुपए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों तथा सहकारी संस्थाओं को अस्थाई नकद सहायता के रूप में उपलब्ध कराए गए जबकि 7,500 करोड़ रुपए वाणिज्यिक बैंकों को उपलब्ध कराए गए।समीक्षा में गैर-सूचीबद्ध सार्वजनिक कम्पनियों को सूचीबद्ध कर उनमें 10 फीसदी तक विनिवेश, घाटे में चल रही सार्वजनिक कम्पनियों की नीलामी, दोहरे कराधान से बचने के लिए लाभांश वितरण कर को युक्ति संगत बनाने, सीमा शुल्क छूट पर पुनर्विचार, फ्रिंज बेनिफिट टैक्स (एफबीटी) समाप्त करने, कमोडिटी और सिक्योरिटी ट्रांजेक्शन कर को खत्म करने, रसोई गैस सिलेंडर पर सब्सिडी सीमित कर उसे प्रति परिवार छह से आठ सिलेंडर करने, केरोसिन सब्सिडी केवल उन्हीं परिवारों को दी जाए जिनके घर में बिजली और रसोई गैस सिलेंडर नहीं हो, ईंधन, खाद्यान्न और उर्वरक सब्सिडी में कटौती, बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश सीमा 49 प्रतिशत तक वृद्धि, स्वास्थ्य, मौसम बीमा में 100 फीसदी विदेशी निवेश, प्रत्येक वर्ष विनिवेश से 25,000 करोड़ रुपए जुटाना, लाभ कमाने वाली गैर नवरत्न कम्पनियों की 5 से 10 फीसदी हिस्सेदारी की बिक्री जैसे कदम उठाने के सुझाव दिए गए हैं। (Josh)
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