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09 मार्च 2009
चांदी में तेजी पर कभी भी बदल सकते हैं हालात
आर्थिक मंदी के दौर में शेयर के बजाय कीमती धातुओं में निवेशकों का भरोसा बढ़ रहा है। यही वजह है कि सोने के साथ चांदी में सवा महीने के दौरान घरलू बाजार में चांदी में 12 से 13 फीसदी की तेजी आई है। इस वजह से अब एक बार फिर चांदी 25000 रुपए किलो के आंकड़े तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।पिछले सप्ताह न्यूयार्क मर्केटाइल एक्सचेंज के कॉमेक्स डिवीजन में मई वायदा चांदी के भाव 1.6 फीसदी बढ़कर 13.333 डॉलर प्रति औंस हो गए। इस कारण मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज में भी मई वायदा चांदी 22635 रुपए किलो के स्तर पर टिकी रही। हाजिर बाजार में पिछले सप्ताह चांदी के भाव में मामूली सुधार रहा और जयपुर में चांदी हाजिर के भाव बिना किसी घटबढ़ के 21900 रुपए और अहमदाबाद में मामूली सुधार के साथ 22490 रुपए किलो हो गए। लेकिन पिछले सवा महीने में हाजिर और वायदा दोनों में ही चांदी के भावों में 12 से 14 फीसदी का सुधार हुआ है। चांदी में सुधार का प्रमुख कारण निवेश में बढ़ोतरी को माना जा रहा है। देश में सालाना करीब 3200 टन की खपत होती है इसमें 77 फीसदी से ज्यादा आयात की जाती है, जबकि 19 फीसदी पुरानी चांदी वापस बाजार में बिकने आ जाती और चार फीसदी ही देश में उत्पादित होती है। इस तरह आयात पर निर्भरता होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी के भाव काफी मायने रखते हैं। ऐसे में निवेशकों का रुझान बढ़ने से चांदी में चमक बरकरार रहने की संभावना है। हालांकि देश में कुल खपत की करीब एक फीसदी चांदी ही निवेश के लिए खरीदी जा रही है। लेकिन अब निवेश का हिस्सा बढ़ने की संभावना है। वैसे कुल खपत की पचास फीसदी आभूषण व बर्तनों में तथा करीब 39 फीसदी का उपयोग उद्योगों में किया जा रहा है। लेकिन वैश्विक मंदी और अमेरिका व यूरोप को आभूषण निर्यात में कमी से चांदी का आभूषणों व उद्योगों में उपयोग घटा है। पिछले वर्ष जुलाई में भारत में चांदी के भाव 26250 रुपए किलो के स्तर तक पहुंचने के बाद दिसंबर में 16500 रुपए किलो तक उतर गए थे। हालांकि इसके बाद चांदी फिर सुधार के रास्ते चली और आगे भी चांदी में सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। भले ही औद्योगिक परिदृश्य अच्छा न होने के कारण चांदी की खपत हल्की हो, लेकिन निवेशकों का रुचि इसमें लगातार बनी हुई है। इससे चांदी में तेजी का दौर जारी रह सकता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस लेवल पर अनायास बड़े पैमाने पर मुनाफा वसूली की बिक्री होने पर रुख में बदलाव हो सकता है। इससे निवेशकों को झटका लगता है। यह रुख कब बदलेगा, इसका आकलन लगाना मुश्किल है। (Business Bhaskar)
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