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06 फ़रवरी 2009
सरकार की लापरवाही से कड़वी हो गई चीनी
चीनी जितनी मीठी है उसकी राजनीति उतनी ही अधिक पेचीदा। यह शायद अकेला ऐसा उद्योग है, जो अभी तक सरकार के जबड़े के बीच जीभ की तरह फंसा हुआ है। थोड़ा बहुत इधर-उधर हुआ नहीं कि नुकसान का डर। यह बात केवल चीनी उद्योग के मामले में नहीं है बल्कि चीनी उत्पादन के लिए गन्ना पैदा करने वाले किसान के मामले में भी उतनी ही सही है। मजेदार बात यह है कि दोनों के बीच हर तीसरे साल जंग छिड़ती है,जो सड़कों से लेकर अब सुप्रीम कोर्ट तक जाने लगी है और सरकार है कि बिल्लियों की लड़ाई में बंदर का काम करने आ जाती है। यही नहीं सरकार में बैठे लोग चीनी लॉबी के प्रतिनिधियों के रूप में भी जाने जाते रहे हैं और उसका राजनीतिक लाभ भी उठाते रहे हैं। जहां तक उपभोक्ता की बात है तो सरकार के गलत फैसलों का खामियाजा उसे अधिक कीमत के रूप में भुगतना पड़ता है। यही वजह है कि एक बार फिर चीनी की कड़वाहट बढ़ गई है और वह भी चुनावी साल में। इसका खामियाजा सरकार को राजनीतिक नुकसान के रूप में भुगतना पड़ सकता है। फिलहाल खुदरा बाजार में इसकी कीमत 25 रुपये किलो को पार कर गई है और आने वाले दिनों में अगर यह 30 रुपये किलो की रिकार्ड कीमत पर पहुंच जाती है तो उसकी जिम्मेदार सिर्फ की गलत नीतियों की वजह से सड़ चुके आंकड़ा तंत्र को ही माना जा सकता है क्योंकि इस पर भरोसा कर किए गए फैसले दूरगामी रूप से घातक साबित हो सकते हैं। बात 2006-07 के गन्ना उत्पादन से शुरू होती है। उस साल कृषि मंत्रालय ने शुरुआती स्तर पर गन्ना उत्पादन के जो आंकड़े दिए, वे वास्तविक उत्पादन से करीब आठ करोड़ टन कम के थे। जिसके चलते उक्त पेराई सीजन (2006-07) में चीनी उत्पादन को वास्तविक उत्पादन से करीब 80 लाख टन कम करके आंका गया। यह साल तमाम कृषि जिन्सों की आसमान छूती कीमतों का था। जिसके लिए उस वक्त के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम सबसे ज्यादा चिंतित थे। नतीजन उन्होंने 2007 के जून माह में देश से चीनी निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। दिलचस्प बात यह है कि देश में चीनी की कीमतों पर अंकुश के लिए यह प्रतिबंध उस साल में लगा जब देश में रिकार्ड 283 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ और निर्यात बाजार में कीमतें 500 डॉलर प्रति टन पर चल रही थीं।नतीजा सामने था अगले साल देश में चीनी का भारी स्टॉक था और चीनी की एक्स-फैक्टरी कीमत घटकर 1200 रुपये प्रति क्विंटल के बीच आ गई। कृषि, खाद्य और उपभोक्ता मामले मंत्री शरद पवार के मुताबिक उस समय सरकार के लिए चीनी की बरदाश्त करने लायक कीमत 20 रुपये प्रति किलो थी लेकिन बाजार में यह घटकर 15 रुपये प्रति किलो से भी नीचे आ गई। नतीजा सामने था 2006-07 के लिए कई राज्यों में चीनी मिलों पर किसानों का बकाया हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच गया और चीनी मिलों ने सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में किसानों को गन्ने का 125 रुपये प्रति क्विंटल का राज्य प्रशासित मूल्य (एसएपी) देने की बजाय उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय का रुख कर लिया। पेराई सीजन 2007-08 में भी गन्ना किसानों को उचित दाम नहीं मिला। कई राज्यों में उक्त दोनों साल का गन्ना मूल्य विवाद के मामले अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।नतीजा यह हुआ कि देश के अधिकतर राज्यों में किसानों ने गन्ना क्षेत्रफल में जबरदस्त कटौती की। जिसका थोड़ा का अहसास 2007-08 में चीनी उत्पादन में करीब 20 लाख टन की गिरावट के रूप में सामने आया। लेकिन असली नजारा चालू सीजन में सामने आया। किसानों ने दूसरे साल और अधिक गन्ना क्षेत्रफल घटाया। जिसके चलते चालू साल (2008-09) में चीनी उत्पादन के करीब 100 लाख टन घटकर 160 लाख टन रह जाने के आसार हैं। नतीजतन पिछले साल के बकाया स्टॉक समेत देश में चीनी का कुल स्टॉक खपत के लगभग बराबर है। दिलचस्प बात यह है कि उत्पादन के मामले में सरकार इस बार भी लगातार भ्रामक आंकड़े देती रही और चीनी उत्पादन के शुरुआती 220 लाख टन के अनुमान को घटाकर अब 180 लाख टन किया गया है। साथ ही रॉ शुगर के आयात निर्यात नियमों में ढील देकर उसके घरेलू बाजार में बेचने का रास्ता साफ किया है। लेकिन अब शायद देर हो चुकी है। इस समय विश्व बाजार में व्हाइट शुगर की कीमत 390 डॉलर प्रति टन है जो समुद्री भाड़े और दूसरे खर्चो के बाद करीब 430 डॉलर में पड़ेगी यानी इसकी लागत ही करीब 22 रुपये किलो पड़ेगी और यही इस समय की थोक बाजार की दिल्ली में चीनी की कीमत है। जो खुदरा बाजार में उपभोक्ताओं को 25 रुपये किलो मिल रही है।लेकिन जैसे ही भारत विश्व बाजार में उतरेगा चीनी की अंतरराष्ट्रीय कीमत को बढ़ते देर नहीं लगेगी क्योंकि इंटरनेशनल शुगर ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक इस साल विश्व में चीनी का कुल उत्पादन खपत के मुकाबले कम है। इसलिए घरेलू बाजार में चीनी की कीमत को 30 रुपये किलो तक पहंचने से रोकना काफी मुश्किल होगा और वह भी आम चुनावों के समय। इसलिए यह कड़वाहट सरकार के भारत निर्माण के नारे में भी खलल डाल सकती है। लेकिन इस सबसे अलग सच यह है कि अभी भी चीनी उद्योग सबसे अधिक नियंत्रण में बंधे उद्योगों में से एक है जिसके हर कदम पर सरकार का दखल है। वहीं किसानों और उद्योग के बीच गन्ना मूल्य पर कोई दीर्घकालिक सहमति कायम हो सके, इसको लेकर सरकार दशकों से कोई ठोस नीति नहीं बना सकी है। हर चीनी चक्र के बाद एक घोटाला दिखता है और अगले चीनी मिलों और किसानों के बीच के झगड़े के बाद उपभोक्ता की जेब ढीली होती है। फायदा होता है तो ब्राजील के किसानों को या फिर ट्रेडरों को। (Business Bhaskar)
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