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19 फ़रवरी 2009
मंदी की धुंध छंटने पर कमोडिटी से मिलेगा बेहतर रिटर्न
मुंबई: वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था की तेजी की रफ्तार थमने से सभी एसेट श्रेणियों पर असर पड़ा है और कमोडिटी भी इससे अलग नहीं है। सोने को छोड़कर धातु, कच्चा तेल और कृषि आधारित कमोडिटी, सभी के दाम 2008 की पहली छमाही के रिकॉर्ड ऊंचे स्तरों से काफी नीचे आ गए हैं। मसलन, पिछले साल जुलाई में अंतरराष्ट्रीय बाजार में 147 डॉलर प्रति बैरल की रिकॉर्ड ऊंचाई छूने वाला कच्चा तेल फिलहाल 34 डॉलर प्रति बैरल पर चल रहा है। इस दशक की शुरुआत में कमोडिटी में खासी बढ़त देखने को मिली थी, लेकिन जिन निवेशकों ने 2007 के अंत में कमोडिटी फंड में अपना पैसा लगाया था, उनकी रकम हवा हो गई और अब वे कमोडिटी में निवेश से झिझक रहे हैं। ऐसे निवेशक अभी तक अपने जख्मों को सहलाने में लगे हैं वहीं खरीदारों का एक वर्ग ऐसा भी है जो मौजूदा कीमतों को मौके के तौर पर देख रहे हैं और लंबी अवधि के निवेश पर निगाह रख कमोडिटी को अपनी शॉपिंग लिस्ट में रखे हुए हैं। जानकारों के मुताबिक इस वर्ग का मानना है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मंदी से बाहर निकलने पर उभरती हुए देश की आर्थिक तरक्की को भी रफ्तार मिलेगी। इससे कमोडिटी की मांग बढ़ेगी, लिहाजा कीमतों में भी तेजी आएगी। यानी लॉन्ग टर्म में कमोडिटी निवेश इन लोगों को सुरक्षित नजर आ रहा है। यही नहीं, पोर्टफोलियो डायवर्सिफिकेशन के लिए लिहाज से भी कमोडिटी आकर्षक विकल्प है। दुर्भाग्य से भारत में गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) को छोड़कर कोई दूसरा कमोडिटी ईटीएफ नहीं है। मतलब यह कि अगर आप कच्चे तेल में निवेश करना चाहते हैं तो मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज ऑफ इंडिया (एमसीएक्स) और नेशनल कमोडिटी और डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (एनसीडीएक्सई) पर वायदा सौदा करना होगा। इसके अलावा शेयर बाजार में सूचीबद्ध ओएनजीसी, आईओसी या बीपीसीएल जैसी कंपनियों के शेयर खरीदकर भी आप अप्रत्यक्ष रूप से कमोडिटी में निवेश कर सकते हैं। एक्सचेंज पर किसी कमोडिटी में लॉन्ग (खरीदारी) या शॉर्ट (बिकवाली) पोजिशन लेने के लिए न केवल उस कमोडिटी की बाजार में मांग और आपूर्ति के बारे में जानकारी होनी चाहिए बल्कि वायदा बाजार के पेंच भी समझ में आने जरूरी हैं। हालांकि, वायदा बाजार में निवेश जोखिम भरा हो सकता है। आप म्यूचुअल फंड के जरिए भी कमोडिटी में निवेश कर सकते हैं। कुछ म्यूचुअल फंड हाउस के पास कमोडिटी फंड हैं। ये फंड भारतीय या अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी कंपनियों के शेयरों में पैसा लगाते हैं। यहां समस्या यह है कि तीन साल का ट्रैक रिकॉर्ड रखने वाले एसबीआई कॉमा फंड के अलावा दूसरे सभी फंड नए हैं। उदाहरण के लिए रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज फंड केवल एक साल पुराना है। इस वजह से निवेशक के पास सही फैसला करने के लिए सीमित विकल्प बचते हैं। हालांकि, इन शेयरों की कीमत पर कई चीजों का असर पड़ता है, इसलिए इनमें काफी जोखिम होता है। ऐसा हो सकता है कि अगर स्टील की कीमतें बढ़ रही हों तो टाटा स्टील और सेल के शेयर उसी के मुताबिक न बढ़ें। दरअसल, शेयरों की कीमत के बढ़ने में कंपनी के फंडामेंटल का बड़ा योगदान होता है। इसलिए इस तरह के निवेश में काफी समझबूझ की जरूरत होती है। (ET Hindi)
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