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29 जनवरी 2009
मांग घटने के बावजूद आसमान छू रहा है मक्के का भाव
बंगलुरु: पोल्ट्री इंडस्ट्री की ओर से मांग कमजोर रहने की आशंका के बीच मक्के की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से कारोबारी और विश्लेषक हैरान हैं। मौजूदा वित्त वर्ष में पोल्ट्री इंडस्ट्री में ब्रायलर आउटपुट में 15 से 20 फीसदी की कमी आने की आशंका जताई जा रही है। गौरतलब है कि देश में होने वाले कुल मक्का उत्पादन का करीब 80 फीसदी हिस्सा जानवरों के खाने और औद्योगिक कार्यों में इस्तेमाल होता है। मक्के का उत्पादन न करने वाले लेकिन इसकी ज्यादा खपत वाले उत्तरांचल जैसे अधिकतर राज्यों में इसकी कीमत करीब 10,700 रुपए प्रति टन पर है। इसमें साल-दर-साल आधार पर करीब 13.3 फीसदी की तेजी आई है। इसी तरह प्रमुख कमोडिटी एक्सचेंज एनसीडीईएक्स पर मक्के के फरवरी कॉन्ट्रैक्ट की कीमत दिसंबर 2008 के 750-770 रुपए प्रति क्विंटल से बढ़कर इस साल जनवरी में 857-860 रुपए प्रति क्विंटल हो गई है। केंद सरकार ने खरीफ साल 2008 के लिए मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 8,400 रुपए प्रति टन तय किया था जबकि खरीफ साल 2007 के लिए सरकार ने मक्के की एमएसपी 6,200 रुपए प्रति टन तय की थी। इसे देखते हुए मक्के की कीमतों में बढ़ोतरी की एकमात्र तार्किक वजह यही दिख रही है कि बेहतर कीमतों की आस में किसान अपने भंडार को बाजार में नहीं उतार रहे हैं। भारत में खरीफ साल 2008 में मक्के की पैदावार 1.3 करोड़ टन से कुछ ज्यादा रही है जबकि इससे पिछले साल इसकी पैदावार करीब 1.51 करोड़ टन रही थी। दुनिया भर में चल रही खराब आर्थिक स्थितियों के चलते विश्लेषक मान रहे हैं कि मक्के का निर्यात इस साल 2.5 लाख टन से भी कम ही रहेगा। इस इंडस्ट्री के एक जानकार के मुताबिक, 'मार्च में आने वाली रबी फसल को देखते हुए कीमतों में गिरावट आ सकती है। मक्के की ऊंची कीमतों के स्थिर बने रहने की कोई वजह नहीं है। पोल्ट्री इंडस्ट्री में उत्पादन में सालाना 15 से 20 फीसदी की कमी आती दिख रही है। मक्के की कीमतों में आई 14 फीसदी की तेजी से पोल्ट्री इंडस्ट्री पर असर पड़ा है। ग्राहकों के बीच पोल्ट्री मांग की कमी चल रही है। ऐसे में पोल्ट्री इंडस्ट्री के लिए मक्के की कीमतों में आई तेजी को ग्राहकों पर डालना मुश्किल पड़ रहा है।' (ET Hindi)
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