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07 जनवरी 2009
कपास की कीमतों में कमी के लिए सरकार पर दबाव
अहमदाबाद : अंतरराष्ट्रीय बाजार के मुकाबले घरेलू बाजार में कपास महंगा है। मंदी की मार से कराह रही टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर कपास की ऊंची कीमतों के चलते दोहरी मार पड़ रही है। ऐसे में यह इंडस्ट्री कीमतों को कम करने के सिलसिले में कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) को निर्देश देने के लिए सरकार से गुहार लगाने जा रही है। इंडस्ट्री सरकार से कॉटन की कीमतों को कम करके 20000 रुपए प्रति कैंडी (356 किलो) के स्तर पर लाने की मांग कर रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास इसी कीमत पर बिक रहा है। साल 2008-09 के कपास सीजन के लिए सरकार ने इसके न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को 40 फीसदी बढ़ाकर 22500 रुपए प्रति कैंडी कर दिया है। फरवरी के अंत तक बाजार में कपास का नया स्टॉक आने की उम्मीद है। पिछले साल से गंभीर संकट से जूझ रही टेक्सटाइल इंडस्ट्री कारोबार को बचाने के लिए सरकार से कपास की कीमतों को अंतरराष्ट्रीय बाजार के मुताबिक करने की मांग कर रही है। देश में हर साल टेक्सटाइल सेक्टर करीब 240 लाख गांठ कपास खरीदता है। अभी कपास की ऊंची कीमतों के चलते टेक्सटाइल सेक्टर इसकी खरीदारी करने में खुद को असमर्थ पा रहा है। मौजूदा सीजन में टेक्सटाइल इंडस्ट्री ने साल 2007-08 के मुकाबले केवल एक तिहाई कपास की खरीदारी की है। साल 09 में कपास की कीमत 30000 रुपए प्रति कैंडी थी, जो अभी गिरकर 22500 रुपए प्रति कैंडी हो गई है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास इससे 10000-2000 रुपए कम पर बिक रहा है। टेक्सटाइल सेक्टर के एक विश्लेषक कहते हैं, 'केंद्र के कपास की एमएसपी को 40 फीसदी बढ़ाने से विदेशी बाजारों के मुकाबले यहां कीमतों में काफी अंतर पैदा हो गया है। कताई मिलों में पहले ही लाखों लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। अब टेक्सटाइल मिलों के कॉटन की खरीदारी न किए जाने से यह संकट और गहरा गया है। सीसीआई पहले ही एमएसपी दर पर कपास की 47 लाख गांठें खरीद चुका है। टेक्सटाइल सेक्टर को आने वाले वक्त में कॉटन की कीमतों में गिरावट की कोई उम्मीद नहीं है।' टेक्सटाइल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ईटी को बताया कि सीसीआई एक स्वतंत्र संस्था है। ऐसे में इसे कम कीमत पर कॉटन बेचने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। (ET Hindi)
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