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18 दिसंबर 2008
घंटे भर में गोल्ड पर लोन
सोने को लेकर भारतीयों की चाहत के बारे में सभी जानते हैं। पिछले 12 महीनों में इस कीमती धातु के दाम बढ़ने के बावजूद हम भौतिक और डीमैट रूप में इसका भंडार जमा करने का काम जारी रखे हुए हैं। इसके पीछे सांस्कृतिक, भावनात्मक और सुरक्षा से जुड़े कारण हैं। आज के दौर में सोना निवेश और बचत का एक अहम विकल्प बन गया है और प्रत्येक सजग निवेशक के पोर्टफोलियो में यह शामिल होता है। आंकड़ों पर नजर डालने से पता चलता है कि सोने के बाजार का आकार बहुत बड़ा है। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 800 टन सोना (इसमें जेवर, बार और सिक्के शामिल हैं) खरीदा जाता है। मार्च, 2008 में देश में लगभग 13000 टन सोना मौजूद था। इसमें 95 फीसदी आम जनता के पास था जिसका बाजार मूल्य 15.60 लाख करोड़ रुपए था। यह एक विडंबना है कि सोना भले ही सभी की पसंद है लेकिन तरलता के मामले में यह अच्छा नहीं है। ज्यादातर लोगों को इसे सुरक्षित रखने पर भी खर्च करना पड़ता है। सोने के बदले कर्ज लेने वाले लोगों की संख्या पर्सनल/कैश लोन या बीमा पॉलिसियों को गिरवी रखकर होम लोन या अन्य कर्ज लेने वालों से काफी अधिक है। सोने के गहनों के बदले में कर्ज लेने का चलन देश के ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से चल रहा है। इसमें स्थानीय साहूकार या सुनार ही जेवर के बदले कर्ज देते हैं। लेकिन इस सेक्टर में अब बैंक भी उतर गए हैं। बहुत सी गैर बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां (एनबीएफसी) लंबे समय से सोने के बदले कर्ज मुहैया करा रही हैं। ग्राहकों के निम्न वर्ग सोने के बदले कर्ज लेने का लाभ उठा सकते हैं: शहरी वेतनभोगी और स्व-रोजगार में जुटे लोग यह कर्ज केवल 60 मिनट में नजदीकी शाखा से लिया जा सकता है। इसके लिए कागजी कार्रवाई भी बहुत साधारण है। इस पर आपको केवल कर्ज की राशि पर ही ब्याज चुकाना होता है जबकि अन्य लोन में आपको मासिक किस्त (ईएमआई) के अनुसार ब्याज देना पड़ता है। इसे देखते हुए सोने के बदले कर्ज लेने से आप ब्याज के तौर पर काफी बचत कर सकते हैं। कम आय वाले ग्राहक कर्जदार की योग्यता देखने के लिए बैंक या वित्तीय संस्थान आयकर रिटर्न और सैलरी स्लिप जरूर देखते हैं। लेकिन ऐसे बहुत से लोग हैं जिनकी आय कम है और वे आयकर के दायरे में नहीं आते या फिर उन्हें वेतन नकद मिलता है। इन लोगों को अचानक जरूरत पड़ने पर कर्ज मिलने में काफी परेशानी होती है। ऐसे व्यक्तियों के लिए सोने के बदले कर्ज लेना सबसे अच्छा विकल्प है। ग्रामीण इलाकों और समाज के निम्न वर्ग के ग्राहक कर्ज का अधिकतर संगठित बाजार शहरी भारत पर केन्दित है। आंकड़ों से पता चलता है कि पर्सनल लोन की हिस्सेदारी वर्ष 2000 में 11.2 फीसदी से बढ़कर 2008 में 22 फीसदी हो गई थी। कृषि से जुड़े कर्जों का हिस्से के मामूली वृद्धि हुई है। 2000 में 9.9 फीसदी से बढ़कर 2008 में ये 11.8 फीसदी हो गए थे। आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि बैंकों के कुल लंबिज कर्ज में ग्रामीण और अर्द्धशहरी इलाकों की हिस्सेदारी 1997 से 2007 के बीच 28 फीसदी से घटकर 23 फीसदी रह गई है। इसे देखते हुए इन क्षेत्रों में सोने के बदले कर्ज उपलब्ध कराने के लिए बैंकों के पास अच्छे अवसर मौजूद हैं। (ET Hindi)
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