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26 दिसंबर 2008
इस साल उवर्रक सब्सिडी में तीन गुने की बढ़ोतरी
नई दिल्ली : वर्ष 2008 में उवर्रक सरकार के लिए ऐसे बुरे स्वप्न की तरह रहा जिसे वह जल्द ही भूलना चाहेगी क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतों में भारी तेजी के कारण उवर्रक सब्सिडी का बोझ तीन गुना बढ़ गया। संकट का पहला संकेत वैश्विक बाजारों में उर्वरकों की आसमान छूती कीमतें थीं। इसके बाद रुपए की कमजोरी के बीच मांग में तेजी आने से मुश्किलें बढ़ीं और बाद में वर्ष के उत्तरार्ध में जब कीमतें नरम हुई तब तक भारत का सब्सिडी बोझ भारत के कुल बजट व्यय का लगभग छठा हिस्सा हो गया। इस वृद्धि में आयात का भारी योगदान था जो वर्ष 2007-08 के 45,659 करोड़ रुपए के मुकाबले लगभग तीन गुना बढ़ गया। इससे केन्द्र और उद्योग दोनों जगहों के लिए मुश्किल का वक्त आ गया। एमओपी जैसे मुख्य उवर्रक किसानों को सरकार द्वारा निर्धारित कीमत पर प्रदान करते हैं जिसके बदले सरकार कंपनियों को उसकी क्षतिपूर्ति करती है। भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन वर्ष 2007-08 में 23 करोड़ 6.7 लाख टन रहा और वर्ष 2008-09 में सरकार उत्पादन में एक फीसदी की वृद्धि यानी 23 करोड़ 30 लाख टन करने का लक्ष्य रखती है। सरकार ने पहले ही वर्ष 2008-09 के लिए नकद और बांड के रूप में 89,000 करोड़ रुपए की सहायता प्रदान की है। आयातित उवर्रकों की कीमतें नीचे गिरी हैं और अगर रुपए का अवमूल्यन नहीं हुआ होता तो सब्सिडी की मात्रा कहीं और कम होती। (ET Hindi)
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