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31 October 2012

अमूल का निर्यात 66 फीसदी बढऩे की संभावना

चालू वित्त वर्ष 2012-13 में अमूल के दूध उत्पादों के निर्यात में 66.6 फीसदी बढ़कर होकर कुल निर्यात 125 करोड़ रुपये का होने का अनुमान है। नए विस्तार के तहत अमूल हरियाणा के मानेसर और धारुहेड़ा के बाद रोहतक में भी 150 करोड़ रुपये का निवेश कर 10 लाख लीटर प्रति दिन क्षमता की दूध डेयरी खोलने जा रही है। गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन फेडरेशन लिमिटेड (जीसीएमएमएफ) के मैनेजिंग डायरेक्टर आर एस सोढ़ी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि चालू वित्त वर्ष में अमूल ब्रांड के दूध उत्पादों के निर्यात में 66.6 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल निर्यात 125 करोड़ रुपये का होने का अनुमान है जबकि वर्ष 2011-12 में अमूल के दूध उत्पादों का कुल निर्यात 75 करोड़ रुपये का हुआ था। उन्होंने बताया कि नए विस्तार के तहत अमूल हरियाणा के रोहतक जिले में 150 करोड़ रुपये का निवेश कर दूध डेयरी खोलेगी, जिसकी पैकेजिंग क्षमता 10 लाख लीटर प्रतिदिन की होगी। इसका निर्माण अक्टूबर 2013 तक पूरा होने की उम्मीद है। रोहतक में अमूल की सहयोगी सहकारी संस्था साबरकांठा जिला कोऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन लिमिटेड, हिम्मतनगर दूध प्लांट लगाएगी। इसके अलावा, मुंबई और कोलकाता में भी नए प्लांट लगाने की योजना है। दिल्ली और एनसीआर में दूध की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अमूल ने हाल ही में धारुहेड़ा में 450 करोड़ रुपये का निवेश कर 30 लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता की देश की सबसे बड़ी दूध डेयरी खोली है। इसके अलावा, अमूल का एक प्लांट मानेसर में भी है जिसकी दैनिक पैकेजिंग क्षमता 10 लाख लीटर की है। उन्होंने बताया कि अमूल इस समय दिल्ली और एनसीआर में दैनिक 24 लाख लीटर दूध की सप्लाई करता है तथा वर्ष 2013 तक अमूल की कुल पैकेजिंग क्षमता 50 लाख लीटर प्रतिदिन हो जाएगी। नवंबर-दिसंबर महीने में दूध की आपूर्ति बढऩे की संभावना है तथा मार्च 2013 तक दूध की मौजूदा कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना नहीं है। जीसीएमएमएफ का वार्षिक टर्नओवर 11,700 करोड़ रुपये का है तथा फेडरेशन में 17 जिला स्तरीय यूनियन हैं जिनसे 16,200 ग्रामीण डेयरी सहकारी सोसायटियां जुड़ी हुई है। इनसे 32 लाख किसान जुड़े हैं। (Business Bhaskar)

कमोडिटी फ्यूचर के लिए छवि बदलना आवश्यक : थॉमस

केंद्रीय खाद्य और उपभोक्ता मामले मंत्री केवी थॉमस ने कहा है कि देश में कमोडिटी फ्यूचर बाजार की परिपक्वता का मानदंड केवल इसके द्वारा किए गए कारोबार की मात्रा ही नहीं है बल्कि कार्य क्षमता, प्राइस डिस्कवरी और प्राइस रिस्क मैनेजमेंट आदि कुछ दूसरे तथ्य भी इसमें शामिल हैं। एक समारोह में बोलते हुए केवी थॉमस ने कहा कि कमोडिटी फ्यूचर बाजार को खाद्य कमोडिटीज की कीमतों में सट्टेबाजी और कृत्रिम महंगाई के लिए जाना जाता है और बाजार के सामने अपनी इस छवि को बदलना बड़ी चुनौती है। थॉमस ने कहा कि अगर बाजार अपनी इस छवि को बदलने में कामयाब रहता है तो वह किसानों को भी इसमें भागीदारी निभाने के लिए आकर्षित कर सकता है। साथ ही स्टॉक एक्सचेंजों के ब्रोकर्स से अलग ग्राहक भी इस बाजार को मिल जाएंगे। इस अवसर पर उपभोक्ता मामले मंत्रालय के सचिव पंकज अग्रवाल ने कहा कि जहां तक बाजार के नियमन की बात है तो नियंत्रक का काम बाजार में ईमानदारी को स्थापित करना और बढ़ाना होता है और इससे बाजार में पारदर्शिता आती है। एफएमसी के अध्यक्ष रमेश अभिषेक ने कहा कि यह बहुत जरूरी है कि कमोडिटी फ्यूचर में निवेशकों के हितों की रक्षा को सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने कहा कि कमोडिटी बाजार में वित्तीय पारदर्शिता बढऩे से एक तरफ जहां बाजार ज्यादा सुरक्षित होता है वहीं दूसरी तरफ इससे निवेशकों के हितों की सुरक्षा भी होती है। उन्होंने कि पारदर्शिता और ईमानदारी को बढ़ावा देकर ही बाजार के साथ ज्यादा लोगों को भागीदार बनाया जा सकता है जिसमें किसान और दूसरे निवेशक शामिल हैं। (Business Bhaskar)

कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर में ज्यादा गिरावट नहीं : पवार

केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा है कि वित्त वर्ष २०१२-१३ में कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन पिछले साल जैसा तो नहीं होगा लेकिन यह प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद द्वारा बताए गए अनुमान से बेहतर रहेगा। वित्त वर्ष २०११-१२ के दौरान देश में कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर २.८ फीसदी रही थी। इस साल अगस्त माह में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने कहा था कि देश में कमजोर मानसून के कारण चालू वित्त वर्ष के दौरान कृषि क्षेत्र की विकास दर में गिरावट आएगी और यह ०.५ फीसदी तक सिमट सकती है। इस परिषद के अध्यक्ष सी रंगराजन कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि परिषद द्वारा कृषि वृद्धि दर में गिरावट आने का अनुमान सही है। बीते वित्त वर्ष में कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा था और खाद्यान्न उत्पादन पिछले ६० सालों के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था। पिछले साल देश का खाद्यान्न उत्पादन २५७४.४ लाख टन रहा था। पवार ने कहा कि देश के चार राज्यों कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात में कमजोर मानसून के चलते सूखे की स्थिति बनी है लेकिन इस साल देश का खाद्य उत्पादन पिछले पांच सालों के औसत से ठीक रहने की संभावना है। उन्होंने कहा कि मै यह कह सकता हूं कि देश में उत्पादित होने वाले खाद्यान्न के भंडारण के लिए स्टोरेज की समस्या बनी रहेगी। कृषि मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक खरीफ सीजन में कम मानसून के कारण उत्पादन प्रभावित होगा। मंत्रालय ने अपने प्राथमिक अनुमानों में कहा है कि इस साल खरीफ सीजन में उत्पादन १० फीसदी घटकर ११७१.८ लाख टन रह सकता है। पवार ने उम्मीद जताई है कि रबी सीजन के दौरान कृषि उत्पादन अच्छा प्रदर्शन करेगा। उन्होंने कहा कि इस महीने गेहूं की बुवाई शुरू हुई है और मिट्टी में पर्याप्त नमी है। इसलिए इस बात की पूरी उम्मीद है कि पंजाब, हरियाणा, यूपी, गुजरात और राजस्थान व मध्य प्रदेश में गेहूं की अच्छी बुवाई होगी। मंत्रालय ने इस साल रबी सीजन के दौरान १२०० लाख टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य तय किया है। (Business Bhaskar)

मूंगफली उत्पादन घटने के आसार

खरीफ सीजन में गुजरात के प्रमुख मूंगफली उत्पादक बारिश की कमी से साल 2012-13 में इसका उत्पादन घटेगा। उद्योग के विशेषज्ञों ने संकेत दिया है कि देश में मूंगफली का कुल उत्पादन करीब 40 फीसदी घटने की संभावना है और यह साल 2011-12 के खरीफ सीजन के 41.7 लाख टन के मुकाबले खरीफ सीजन 2012-13 में घटकर 25 लाख टन रह जाएगा। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि गुजरात में इस साल सिर्फ 6.95 लाख टन मूंगफली का उत्पादन होगा जबकि 2011-12 में 17.35 लाख टन मूंगफली का उत्पादन हुआ था। इस तरह राज्य में उत्पादन में करीब 60 फीसदी की गिरावट दर्ज की जाएगी। सेंट्रल ऑर्गनाइजेशन फॉर ऑयल ऐंड ट्रेड (सीओओआईटी) के उपाध्यक्ष अशोक सेतिया ने कहा, गुजरात में सौराष्ट्र के प्रमुख उत्पादक इलाकों व कर्नाटक के कुछ इलाकों में उत्पादन तेजी से घटा है। आंध्र प्रदेश में हालांकि बुआई स्थिर रही है, लेकिन साल 2012-13 में उत्पादन में गिरावट की आशंका है। देश में मूंगफली का कुल उत्पादन करीब 40 फीसदी घटने की संभावना है। एसईए के खरीफ में मूंगफली उत्पादन अनुमान 2012 (गुजरात) के मुताबिक, गुजरात सरकार ने 2012-13 में मूंगफली का कुल रकबा 12.2 लाख हेक्टेयर रहने की बात कही है। हालांकि बारिश में कमी के चलते मूंगफली की कटाई 25 फीसदी कम रकबे यानी 9.16 लाख हेक्टेयर में हुई है। इसके परिणामस्वरूप मूंगफली का उत्पादन घटकर 6.95 लाख टन रहने की संभावना है। बारत में मूंगफली का कुल रकबा खरीफ 2011-12 के 43.2 लाख हेक्टेयर के मुकाबले घटकर 39 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो करीब 10 फीसदी की गिरावट दर्शाता है। गुजरात के बाद आंध्र प्रदेश मूंगफली की बुआई के मामले में दूसरा सबसे बड़ा राजज्य है और यहां करीब 10 लाख हेक्टेयर में मूंगफली की बुआई होती है। राजकोट में खाद्य तेल के विशेषज्ञ गोविंदभाई पटेल ने मूंगफली तेल की कीमतों में तीव्र बढ़ोतरी की संभावना को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, कुल उपभोग में मूंगफली की हिस्सेदारी महज 1 फीसदी है। (BS Hindi)

सरकार को अच्छी रबी फसल की उम्मीद

कृषि मंत्री शरद पवार ने आज कहा कि रबी फसल की बेहतर संभावनाओं के मद्देनजर 2012-13 के फसल वर्ष में देश में 25 करोड़ टन अनाज उत्पादन की उम्मीद है हालांकि यह पिछले फसल वर्ष के मुकाबले करीब तीन फीसदी कम होगा।गेहूं और चावल के रिकॉर्ड उत्पादन के मद्देनजर जुलाई-जून 2011-12 में 25.74 करोड़ टन अनाज पैदा हुआ था जो अब तक का कीर्तिमान है। खरीफ मौसम में कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्सों में सूखे के कारण कुल अनाज का उत्पादन घटने के आसार है। कृषि मंत्रालय प्रारंभिक अनुमान लगाया है कि खरीफ फसलों का उत्पाद 10 फीसदी घटकर 11.71 करोड़ टन रहेगा। लेकिन मंत्रालय को उम्मीद है कि इस कमी की काफी कुछ भरपाई रबी फसल के उत्पादन से हो जाएगी। पवार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार संबंधी खाद्य मंत्रियों के सम्मेलन में कहा, 'हालांकि शुरुआती खरीफ अनुमान में इस साल कुल अनाज उत्पादन में आंशिक गिरावट के संकेत हैं लेकिन हमें उम्मीद है कि रबी फसल की अच्छी संभावना के कारण वर्ष 2012-13 के दौरान कुल 25 करोड़ टन का उत्पादन हो सकेगा।' उन्होंने कहा कि 'पूर्वी भारत में हरित क्रांति' कार्यक्रम में प्रगति हुई है और कहा कि देश का धान उत्पाद आने वाले वर्षो में और बढ़ेगा। पिछले कुछ वर्षों में कृषि उत्पादन पर संतोष जाहिर करते हुए पवार ने कहा, 'कृषि मंत्री के तौर पर मुझे कुछ समय पहले गेहूं का आयात करना खलता था। जबकि आज हमने कृषि उत्पादों के निर्यात का रिकॉर्ड स्तर पार कर लिया है। हमने करीब एक करोड़ टन चावल और करीब 30 लाख टन गेहूं का निर्यात किया है।' मंत्री ने कहा कि अनाजों की कुल उपलब्धता और इसका दक्षतापूर्वक वितरण देश की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण है। (BS Hindi)

सोने की खरीद फरोख्त पर नहीं मिलेगा कर्ज

केंद्रीय बैंक महंगाई बढऩे की एक प्रमुख वजह सोने के प्रति निवेशकों की बढ़ती चाहत मानता है। सोने की मांग को नियंत्रित करने के लिए रिजर्व बैंक ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे सोना खरीदने के लिए किसी भी तरह का कर्ज नहीं देंगे। इन निर्देशों के बाद बैंक किसी भी सोना कारोबारी को अब कर्ज नहीं दे सकेंगे। रिजर्व बैंक के इन निर्देशों पर एंजेल ब्रोकिंग की नलिनी राव कहती हैं कि इसका असर सोना कारोबारियों और फर्मों पर पड़ेगा क्योंकि ये कंपनियां बैंक से कर्ज लेकर सोने का कारोबार करती हैं। उनका कहना है कि कंपनियां सोना खरीदने के लिए कर्ज नहीं लेती हैं लेकिन जो कर्ज लिया जाता है उसका उपयोग कमोडिटी एक्सचेंजों में सोने की हेजिंग या फिर सोने का स्टॉक बढ़ाने के लिए किया जाता है। रिजर्व बैंक के इस फैसले का सोने की कीमतों पर असर पड़ सकता है। घरेलू बाजार में माल कम होने पर कीमतें बढ़ सकती हैं और यह बी संभव है कि कारोबारियों की संख्या कम होने से कीमतें घट जाएं। बाम्बे बुलियन एसोसिएशन के अध्यक्ष पृथ्वीराज कोठारी के मुताबिक इससे उनके कारोबार में कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि सोना खरीदने के नाम पर बैंक पहले ही उन्हें कर्ज नहीं दे रहे थे। अलबत्ता, इसका असर गोल्ड फाइनेंस कंपनियों के कारोबार पर पड़ सकता है। बैंक से सोना कारोबारी जो कर्ज लेते हैं वह सोना खरीदने के लिए नहीं बल्कि कारोबार बढ़ाने के लिए लेते हैं जिसमें नए शोरुम खोलना आदि शामिल है। कोठारी के मुताबिक आरबीआई के इस फैसले से सटोरियों पर लगाम लग सकती है। मुंबई ज्वैलर्स एसोसिएशन के कुमार जैन कहते हैं कि सीधे तौर पर हमारे कारोबार पर कोई असर नहीं पडऩे वाला है दूसरी तरफ बहुत सारे स्वर्ण कारोबारी इस निर्देश पर असमंजस में हैं। कारोबारियों का कहना है कि बहुत सारी गोल्ड कंपनियों ने ज्वैलरी खरीदने के लिए एसआईपी जैसी योजनाएं चला कर रखी हैं जिन पर बैंक कर्ज देते हैं। ये कंपनियां बिक्री बढ़ाने के लिए ग्राहकों को आसान कर्ज देती हैं। (BS Hindi)

टायर विनिर्माताओं को राहत

पर्याप्त सबूत के अभाव में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने अपोलो टायर्स, एमआरएफ, जेके टायर, सिएट और बिड़ला टायर्स समेत टायर विनिर्माताओं को क्लीन चिट दे दी है। इन विनिर्माताओं पर सांठगांठ का आरोप था। आयोग ने अपने आदेश में कहा है, यह निष्कर्ष निकालना सुरक्षित है कि सतही आधार पर उद्योग सांठगांठ से जुड़ी कुछ विशेषताओं का प्रदर्शन करता है, लेकिन किसी गठजोड़ के अस्तित्व का कोई ठोस सबूत नहीं है। कारोबार के लिहाज से उद्योग को हमेशा ही आयात से जुड़े प्रतिस्पर्धी खतरों से दो-चार होता है। हालांकि आयोग के एक सदस्य इससे असहमत थे। शिकायतकर्ता ऑल इंडिया टायर डीलर्स फेडरेशन (एआईटीडीएफ) ने सीसीआई के इस आदेश के खिलाफ अपीलीय अथॉरिटी द कंपिटीशन अपीलेट ट्राइब्यूनल (कॉम्पैक्ट) जाने का फैसला किया है। यह आदेश इस वास्तविकता के बाद आया जबकि आयोग के महानिदेशक (जांच) ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश की प्रमुख टायर कंपनियों ने सामंजस्य के साथ काम किया और उद्योग के संगठन ऑटोमोटिव टायर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (एटमा) ने कीमत, निर्यात और आयात आदि से जुड़ी सूचनाओं के आदानप्रदान के लिए सदस्यों को प्लैटफॉर्म उपलब्ध कराया। इसके अलावा आयोग के बोर्ड के छह सदस्यों में से एक ने अंतिम आदेश असहमति जताई। आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, यह मामला बंद हो गया है और ज्यादातर सदस्यों ने सांठगांठ के खिलाफ अपनी राय दी क्योंकि टायर कंपनियों के खिलाफ उपलब्ध सबूत पर्याप्त नहीं है। टायर विनिर्माताओं के सांठगांठ के खिलाफ नियामक साल 2010 से जांच कर रहा है और यह शिकायत एआईटीडीएफ ने की थी। एआईटीडीएफ ने साल 2007 में कंपनी मामलों के मंत्रालय को टायर व ट्रांसपोर्ट में सांठगांठ की जांच के लिए शिकायत सौंपी थी। तब मंत्रालय ने साल 2008 में मामला एमआरटीपी आयोग को सौंप दिया था। साल 2010 में यह शिकायत सीसीआई के पास हस्तांतरित कर दी गई थी। टायर विनिर्माताओं के हक में फैसला आने के बाद टायर डीलर्स एसोसिएशन ने कहा है कि वह इस फैसले के खिलाफ कॉम्पैक्ट के पास जाएंगे। एआईटीडीएफ ने कहा, इस फैसले के खिलाफ टायर डीलर कॉम्पैक्ट के पास अपील करेंगे। सांठगांठ की मौजूदगी तब मानी जाती है जब दो या दो से अधिक कंपनियां कीमतें तय करने, उत्पादन व आपूर्ति सीमित करने, बाजार हिस्सेदारी या बिक्री के कोटे का आवंटन आदि के लिए आपसी समझौता करती हैं। प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 3 के तहत सांठगांठ पर पाबंदी है। हाल में आयोग ने सीमेंट कंपनियों की आपसी सांठगांठ की जांच की थी और अपने आदेश के तहत उन पर भारी जुर्माना लगाया था। कंपनियों ने हालांकि अब इस आदेश के खिलाफ कॉम्पैक्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस प्रगति पर नजर रखने वालों का कहना है कि सीमेंट कंपनियों के खिलाफ आदेश के बाद से ही आयोग पर औद्योगिक लॉबी का दबाव था और शायद इसी वजह से टायर विनिर्माताओं के खिलाफ आदेश में नरमी बरती गई हो। हालांकि सीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस मुद्दे पर टिप्पणी से इनकार कर दिया। टायर कंपनियों की सांठगांठ के खिलाफ सीसीआई यह आदेश जून में ही आना था, लेकिन इस निष्कर्ष तक पहुंचने में थोड़ा वक्त लग गया। (BS Hindi)

देश में इस साल कॉफी उत्पादन में गिरावट की संभावना

कॉफी का उत्पादन दो हफ्ते बाद शुरू होने वाला है, लेकिन बागान मालिकों को उम्मीद नहीं है कि इस साल कॉफी बोर्ड रिकॉर्ड उत्पादन का अनुमान हासिल कर पाएगा। बागान मालिकों को लगता है कि इस साल कॉफी का उत्पादन पिछले साल के करीब 3 लाख टन पर रह सकता है। कॉफी बोर्ड ने मौजूदा साल में रिकॉर्ड 3,25,300 टन कॉफी उत्पादन का अनुमान जाहिर किया है, जो पिछले साल के मुकाबले 3.5 फीसदी की बढ़त दर्शाता है। साल 2011-12 में देश में 3.14 लाख टन कॉफी का उत्पादन हुआ था। कर्नाटक प्लांटर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष मर्विन रॉड्रिग्स ने कहा कि कर्नाटक के प्रमुख उत्पादक इलाके में इस साल की शुरुआत में फूल लगने के पहले की अवधि में हमने बारिश में करीब 40 फीसदी की कमी रही थी, जिसका असर उत्पादन पर पड़ेगा। अरेबिका बागानों में वाइट स्टेम बोरर नामक कीटों के हमले की भी खबरें हैं। अरेबिका के लिए यह ऑफ-ईयर है। उन्होंने कहा कि अरेबिका के उत्पादन वाले दक्षिणी कुर्ग इलाके में इस साल अच्छी बारिश नहीं हुई है। इलाके में सूखे का लंबा दौर चला है। हालांकि सितंबर में बारिश से स्थिति थोड़ी सुधरी है, जिससे बीन्स का विकास बेहतर हुआ है। मौजूदा कॉफी वर्ष में अरेबिका का उत्पादन कर्नाटक के कुछ इलाकों में नवंबर के दूसरे हफ्ते में शुरू होने की संभावना है। रोबस्टा की तुड़ाई दिसंबर के आखिर में शुरू होगी। फूल लगने की अवधि से पहले कॉफी बोर्ड के अनुमान में कहा गया था कि अरेबिका का उत्पादन 1.04 लाख टन रहेगा जबकि रोबस्टा का उत्पादन 2,21,300 टन। हालांकि कर्नाटक प्लांटर्स एसोसिएशन का अनुमान है कि अरेबिका का उत्पादन 85 से 90,000 टन के बीच होगा जबकि रोबस्टा का 2.10 लाख टन। रॉड्रिग्स ने कहा कि इस साल अरेबिका के उत्पादन में 10,000 टन की कमी आएगी जबकि रोबस्टा का उत्पादन पिछले साल के मुकाबले इतने ही अंतर से बढ़ेगा। इस बीच, कॉफी के उत्पादन में ज्यादा अंतर नहीं होने से निर्यात पर शायद ही बहुत ज्यादा असर देखने को मिलेगा क्योंकि यहां से देसी फसल के अलावा आयातित बीन्स को संवर्धित कर निर्यात किया जाता है। मौजूदा कैलेंडर वर्ष के पहले 10 महीने में देश से 2,80,623 टन कॉफी का निर्यात हुआ है जबकि एक साल पहले की इतनी ही अवधि में 3,03,966 टन कॉफी का निर्यात हुआ था, जो 7.67 फीसदी की गिरावट दर्शाता है। कीमत के लिहाज से निर्यातकों की आय 4231 करोड़ रुपये रही, जो पिछले साल के 4239 करोड़ रुपये से थोड़ी कम है। प्रति इकाई कीमत 1,50,764 रुपये प्रति टन रही, जो पिछले साल के 1,39,456 रुपये के मुकाबले थोड़ी ज्यादा है। (BS Hindi)

अगले सत्र से तैयार होगा राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी प्रबंधन संस्थान

सोनीपत, 22 अक्तूबर (निस)। खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय खाद्य प्रोद्यौगिकी उद्यमिता और प्रबन्धन संस्थान आगामी शिक्षा सत्र 2012-13 से पूरी दुनिया के साथ चलने के लिए तैयार हो जाएगा। संस्थान का मुख्य उद्देश्य देश को वैश्विक चुनौतियों के लिए तैयार करके जरूरतों को पूरा करना है। केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री चरण दास महंत ने राष्ट्रीय खाद्य प्रोद्यौगिकी उद्यमिता और प्रबन्धन संस्थान के अधिकारियों की हरियाणा राज्य औद्योगिक संरचना विकास निगम कुण्डली में आयोजित बैठक में कहा कि खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में लोगों की जरूरत को पूरा करने के लिए संस्थान में सभी सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं ताकि किसी भी उद्यमी की समस्या का निराकरण अविलम्ब हो सके। इसके साथ ही लोगों को संस्थान में प्रशिक्षण देकर खाद्य सामग्रियों को तैयार करने तथा उसको लम्बे समय तक सुरक्षित रखने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा और वैश्विक चुनौतियों के अनुरूप उन्हें प्रवाह में चलने के योग्य बनाया जाएगा। केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री श्री महंत ने कहा कि संस्थान जहां उद्यमियों की समस्याओं का समाधान करेगा वहीं इस संस्थान में नए उत्पादन तैयार करने, खाद्य सामग्रियों को जांचने, खाद्य के क्षेत्र में नयी खोज करने, नैनो प्रौद्योगिकी को विकसित करने और खाद्य प्रसंस्करण में प्रबन्धन पर काम किया जाएगा। केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री महंत ने संस्थान के विकास कार्यों का जायजा भी किला। खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी मंत्रालय के संयुक्त सचिव अजीत कुमार ने इस अवसर पर संस्थान के विकास कार्यों के बारे में विस्तार से जानकारी दी और भरोसा दिलाया कि संस्थान अपनी समयावधि में सभी लक्ष्यों को पूरा करेगा। इस अवसर पर राष्ट्रीय खाद्य प्रोद्यौगिकी उद्यमिता और प्रबन्धन संस्थान के निदेशक सुधीर कुमार, केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री चरण दास महंत के निजी सचिव विवेक कुमार देवा गगन, उपमण्डल अधिकारी (ना०) जगनिवास सोनीपत, खण्ड विकास एवं पंचायत अधिकारी नरेश छिक्कारा तथा कृषि विभाग के अधिकारी तथा संस्थान के अन्य अधिकारी भी उपस्थित थे। (Dainik Trbun)

चुनौतियों का सामना करने को तैयार : महंत

सोनीपत, जासंकें : खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता और प्रबंधन संस्थान (निफ्टम) बड़ी उपलब्धि साबित होगा। यहां पर देश के युवाओं को वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार किया जा सकेगा। यह जानकारी केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री चरण दास महंत ने दी। वह शनिवार को राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता और प्रबंधन संस्थान, कुंडली में अधिकारियों की बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि निफ्टम का शिक्षा सत्र 2012-13 से शुरू हो जाएगा। उन्होंने कहा कि संस्थान जहां उद्यमियों की समस्याओं का समाधान करेगा, वहीं इस संस्थान में नए उत्पादन तैयार करने, खाद्य सामग्रियों को जांचने, खाद्य के क्षेत्र में नई खोज करने, नैनो प्रौद्योगिकी को विकसित करने, दवाई की जगह खाद्य भोजन तैयार करने की तकनीक विकसित की जाएगी। कृषि मंत्री ने कहा कि संस्थान में न केवल अपने देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार किया जाएगा, बल्कि वैश्विक चुनौतियों के आधार पर कार्य होगा। महंत ने संस्थान के सभी विकास कार्यो का जायजा लिया व निरीक्षण भी किया। इस दौरान खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी मंत्रालय के संयुक्त सचिव अजीत कुमार ने संस्थान के विकास कार्यो के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इस अवसर पर राष्ट्रीय खाद्य प्रोद्यौगिकी उद्यमिता और प्रबंधन संस्थान के निदेशक सुधीर कुमार, केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री के निजी सचिव विवेक कुमार, एसडीएम जगनिवास, खंड विकास एवं पंचायत अधिकारी नरेश छिक्कारा आदि मौजूद रहे। (Jagran)

27 October 2012

Soybean: NCDEX

Soybean: NCDEX November soybean futures traded slightly higher in the last week and breached the three week’s high on account of firm overseas market due to improved demand in the domestic market from stockists and solvent extractors due to better export order of domestic soy meals provided support to the prices. Additionally, there were thin arrivals in the last weak due to festivals (Dussehra). As per USDA’s net weekly export sales report, net export sales for soybean came at 522,200 tonnes for the current marketing year and none for the next marketing year. As of October 18th, cumulative soybean sales stand at 73% of the USDA forecast for current marketing year vs. a 5 year average of 50%. Total net meal sales came in at 176,600 tonnes and total net oil export sales reported at 12,000 tonnes. Outlook for this week: Soybean is expected to trade slightly higher on account of improved demand of soybean in the domestic market from stockists and solvent extractors due to increased export order soy meal are supportive for prices. NCDEX November Soybean shall find a support at 3300/3200 levels and Resistance 3435/3525 levels. Recommendation for this week: Buy NCDEX November Soybean between 3300-3320, SL-3190 and Target- 3435/3520.

Energy: MCX

Energy: MCX November crude oil futures traded lower in the last week on account of lower global demand due to slow growth in China and Japan. US crude oil inventory increased more than expectation also added bearish market sentiments. As per Energy Information Administration (EIA), U.S. commercial crude oil inventories increased by 5.9 million barrels to 375.1 million barrels from the previous week. Total motor gasoline inventories increased by 1.4 million barrels and distillate fuel inventories decreased by 0.6 million barrels last week. Additionally, strength in dollar index also exerted downside pressure on crude oil price. Price movement in the last week: MCX November crude oil prices opened the week at Rs 4911/bbl, fell sharply and touched a low of Rs 4610/bbl and finally closed at Rs 4635/bbl (Thursday, October 25, 2012) with a loss of Rs 279/bbl (down 5.68%) compared with a previous week’s close. Outlook for this week: MCX November Crude oil is expected to trade lower on the back higher inventories coupled with lower global demand. Additionally, appreciation in the Indian rupee against the US dollar may exert downside pressure at domestic bourses. MCX November crude oil shall find a support at 4520 /4400 levels and Resistance 4790/4860 levels. Recommendation for this week: Sell MCX November Crude between 4770-4790, SL-4865 and Target- 4520/4450.

Base Metals:

Base Metals: Base metals pack traded lower in the last week at Multi Commodities Exchange (MCX) and breached 8 week’s low on the back of slow down of China’s economy and poor exports data from Japan. Japan‘s export was down by 10.3 percent in the month of September from a year earlier, the most since the aftermath of last year’s earthquake. Caterpillar Inc., the largest maker of construction and mining equipment forecast sales growth at the slowest in four years, fanning concern that a global slowdown may sap demand for the metals. Further, the Spanish economy contracted for a fifth quarter in the three months through September, adding pressure on Spain to seek more European aid. Moody’s Investors Service, a week after deciding against cutting Spain’s credit-rating to below investment grade, lowered Catalonia and four other Spanish regions. Additionally, appreciation of Indian rupee against US dollar also added bearish market sentiments. Price movement in the last week: MCX November Copper prices opened the week at Rs 434.35/kg, traded lower and touched a low of Rs 422.10/kg and finally closed at Rs 423.65/Kg (Thursday, October 25, 2012) with a loss of Rs 11.40/kg (down 2.62%) as compared with previous week’s close. Outlook for this week: Base metals are expected to trade lower on concerns of slowing growth in China and Japan. Further, there is no specific plan to resolve euro zone debt crisis. Additionally, increased in inventories of red metals at LME warehouses is negative for base metal prices. MCX November Copper shall find a support at 416/408 levels and resistance 430/435 levels. Recommendation for this week: Sell MCX November Copper between 428-430, SL-436, Target 416/409.

Gold: MCX

Gold: MCX December gold futures traded lower in the last week and breached the eight weeks price low on account of appreciating Indian rupee against the U.S. dollar. Favorable economic data from U.S. like unexpected jump in durable goods orders and a fall in unemployment claims made bullion to trade under pressure. U.S. advance Gross Domestic Product (GDP) for the third quarter is expected higher than the previous quarter, indicating well for the economy, by which gold prices to decline further. ¬¬¬¬¬Price Movement in the last week: MCX December gold prices opened the week at Rs 31,252/10 grams, traded lower but found good support at Rs 30,827/10 grams. Later price bounced back slightly from low and finally closed at Rs 30,926/10 grams (Thursday, October 25, 2012) with a loss of Rs 361/10 grams (down 1.15%) as compared with previous week’s close. Outlook for this week: MCX December Gold futures are expected to trade slightly lower on account appreciating Indian rupee against US dollar. Further, better economic data from US may reduce the demand for gold. MCX December gold shall find a support at 30,630/30,500 levels and resistance 31,150/31,300 levels. Spot Gold has support at 1680/1662 and resistance at 1715/1732 levels. Recommendation for this week: Sell MCX December Gold between 31100-31150, SL-31310 and Target- 30630/30500.

पकने से पहले ही कटने लगा प्याज

कीमतों में बढ़ोतरी का फायदा उठाने के लिए प्रमुख उत्पादक इलाकों में प्याज उगाने वाले किसानों ने खरीफ के प्याज की कटाई इसके पकने से पहले ही शुरू कर दी है। इसका बुरा असर अगले साल नजर आ सकता है क्योंकि पकने से पहले उत्पादित प्याज का जीवनकाल काफी कम होता है। कृषि उत्पाद विपणन समिति वाशी में औसत गुणवत्ता वाले प्याज की कीमतें गुरुवार को 1300-1400 रुपये प्रति क्विंटल रहीं जो इस महीने की शुरुआत में 600-700 रुपये प्रति क्विंटल थी। बेंचमार्क लासालगांव बाजार (नासिक) में प्याज का भाव गुरुवार को 1200-1400 रुये प्रति क्विंटल थी जबकि 1 अक्टूबर को यहां भाव 500-600 रुपये प्रति क्विंटल था। खरीफ सीजन के प्याज की बुआई मॉनसून की बारिश के बहाल होने के साथ शुरू हुई थी और बुआई में करीब दो महीने की देरी हुई थी। इसके परिणामस्वरूप प्याज के उत्पादन में भी आनुपातिक देरी की संभावना थी। सामान्य परिस्थितियों में अक्टूबर के पहले हफ्ते में प्याज की आवक मंडियों में शुरू होती है, लेकिन खरीफ के प्याज की आवक इस साल दिसंबर या जनवरी की शुरुआत मेंं होने की संभावना थी। राष्ट्रीय बागवानी शोध व विकास संघ (एनएचआरडीए) के निदेशक आर पी गुप्ता ने कहा, अपने उत्पाद की कीमत ज्यादा हासिल करने के लिए किसानों ने परिपक्व होने से पहले ही प्याज की कटाई शुरू कर दी। चूंकि इसकी बुआई दो महीने की देरी से हुई थी, लिहाजा इसके परिपक्व होने में समय लगेगा। त्योहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही मांग में तेजी आ गई। इसके उलट त्योहारी सीजन में बाजार बंद होने के चलते प्रमुख मंडियों में आपूर्ति सिकुड़कर एक चौथाई रह गई थी। इसके परिणामस्वरूप मंडियों में आपूर्ति सीमित रही जबकि गोदामों में प्याज का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध था। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा के चलते बाजार चार दिन तक बंद रहे। दूसरे राज्यों में भी दुर्गापूजा व बकरीद की वजह से बाजार बंद रहे। ऐसे में ट्रक भी इस हफ्ते सड़कों से दूर रहे और इस वजह से मंडियों में प्याज की आवक नहीं हुई। वाशी मंडी में कुल आवक औसतन 50-60 ट्रक रही जबकि अक्टूबर की शुरुआत में यह 180-200 ट्रक थी। लासालगांव हाजिर बाजार में भी प्याज की आवक गुरुवार को घटकर 200 ट्रक रह गई जबकि महीने की शुरुआत में आवक 400 ट्रक थी। लासालगांव के प्याज कारोबारी संजय सनप के मुताबिक, इस सीजन में प्याज उत्पादन में देरी के चलते इस जिंस की आपूर्ति पिछले कुछ हफ्ते से प्रभावित हुई है। चूंकि नई फसल दो महीने बाद मंडियों में आएगी, लिहाजा तब तक बाजार में मजबूती बनी रहेगी। सनप का अनुमान है कि प्याज की कीमतें जल्द ही खुदरा उपभोक्ताओं के लिए 1600 रुपये प्रति क्विंटल को छू जाएंगी और इसकी लागत 24-26 ररुपये प्रति किलोग्राम बैठेगी। गुप्ता के मुताबिक, नए सीजन की फसल की आवक तक मांग पूरा करने के लिए पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि प्याज की कीमतें बढऩे की कोई ठोस वजह नहीं है क्योंकि फसल खराब होने की भी खबरें नहीं आई है। उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि इस सीजन में प्याज की फसल ठीक-ठाक रहेगी, लेकिन अभी भी कीमतें बढ़ रही हैं। एनएचडीआरएफ के मुताबिक, देश में खपत और निर्यात के लिए प्याज की सालाना मांग 157 लाख टन है। इस बीच, रिजवी एक्सपोट्र्स के युसूफ रिजवी ने कहा कि कीमतों में बढ़ोतरी की प्रमुख वजह निर्यात मांग में आई तेजी है। विशेषज्ञों को हालांकि लगता है कि परिपक्वता से पहले उत्पादित प्याज का जीवनकाल कम होता है और इसके परिणामस्वरूप ज्यादा बर्बादी होती है। ज्यादा प्याज बर्बाद होने से अगले सीजन में प्याज की ज्यादा किल्लत हो सकती है। (BS Hindi)

कमोडिटी एक्सचेंजों में वायदा कारोबार 4.5 फीसदी घटा

सोने व चांदी में वायदा कारोबार 28 फीसदी घटकर 43.75 लाख करोड़ रुपये रह गया देश के कमोडिटी एक्सचेंजों में कुल वायदा कारोबार चालू वित्त वर्ष 2012-13 में 15 अक्टूबर तक 4.5 फीसदी गिरकर 94.72 लाख करोड़ रुपये रह गया। फॉरवर्ड मार्केट्स कमीशन (एफएमसी) के अनुसार सोने व चांदी में निवेशकों की दिलचस्पी घटने के कारण वायदा कारोबार में कमी आई है। पिछले साल अप्रैल से 15 अक्टूबर के बीच कुल 99.18 लाख करोड़ रुपये क कारोबार हुआ था। एफएमसी के ताजा आंकड़ों के मुताबिक पिछले साढ़े छह माह के दौरान बुलियन कमोडिटी का कुल वायदा कारोबार 28 फीसदी घटकर 43.75 लाख करोड़ रुपये रह गया। पिछले साल समान अवधि में 60.36 लाख करोड़ रुपये का कारोबार हुआ था। लेकिन बुलियन को छोड़कर बाकी सभी कमोडिटी के वायदा कारोबार में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। एनर्जी कमोडिटी जैसे क्रूड ऑयल में कारोबार 42 फीसदी बढ़कर 20.79 लाख करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल समान अवधि में 14.61 लाख करोड़ रुपये का कारोबार हुआ था। बेस मेटल्स जैसे कॉपर में 23 कारोबार 17.29 लाख करोड़ रुपये हो गया। जबकि पिछले साल इस दौरान 14.10 लाख करोड़ रुपये का कारोबार हुआ था। एग्री कमोडिटी का कारोबार 28 फीसदी घटकर 12.88 लाख करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल अप्रैल से 15 अक्टूबर के बीच 10.09 लाख करोड़ रुपये का कारोबार हुआ था। वायदा कारोबार में आ रही कमी पर एफएमसी के चेयरमैन रमेश अभिषेक ने हाल में कहा था कि वह कारोबार में कमी पर ज्यादा चिंतित नहीं हैं। उन्हें मुख्य चिंता वायदा कारोबार की क्वालिटी को लेकर है। (Business Bhaskar)

26 October 2012

सप्लाई बढऩे से गुड़ के मूल्य में गिरावट

थोक बाजार में सप्लाई तेज होने के कारण गुड़ की कीमतों में नरमी दर्ज की जा रही है। पिछले १५-२० दिन में गुड़ की थोक कीमतें करीब 20 रुपये गिरकर 1130-1135 रुपये प्रति मन (40 किलो) के स्तर पर आ गई हैं। कारोबारियों के मुताबिक त्योहारी सीजन में गुड़ की मांग बढऩे की संभावना से बाजारों में गुड़ की सप्लाई तेज हो गई। ऐसे में मांग से ज्यादा सप्लाई होने के कारण गुड़ के भाव में गिरावट दर्ज की जा रही है। दिल्ली थोक बाजार में भी स्टॉकिस्टों व खुदरा कारोबारियों की ओर से मांग कमजोर होने व उत्पादक क्षेत्रों से आपूर्ति ज्यादा होने के कारण भावों में गिरावट दर्ज की गई है। पिछले पंद्रह दिन में दिल्ली थोक बाजार में गुड़ की कीमतों में 300-700 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट दर्ज की गई है। गुड़ के थोक कारोबारी अशोक कुमार गुप्ता ने बताया कि त्योहारी सीजन को देखते हुए बाजार में गुड़ की सप्लाई तेज हो रही है, लेकिन मांग की तुलना में सप्लाई ज्यादा होने से कीमतें नीचे आ रही हैं। दिल्ली थोक बाजार में इस दौरान गुड़ पेड़ी के भाव में सबसे ज्यादा गिरावट देखने को मिली है। गुड़ पेड़ी का भाव 3,700-3,750 रुपये से गिरकर 3,000-3,100 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। इसके अलावा गुड़ चाकू का भाव 3,250-3,300 रुपये से गिरकर 2,950-3,000 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर आ गया। गुड़ ढैया के दाम भी 3,500-3,550 रुपये प्रति क्विंटल से कम होकर 3,200-3,300 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। मुजफ्फरनगर मंडी में गुड़ के थोक कारोबारी जयप्रकाश ने बताया कि बीस दिन पहले उत्पादक क्षेत्रों से सीमित सप्लाई के कारण गुड़ के भाव में भारी तेजी देखने को मिली थी। मुजफ्फरनगर मंडी में गुड़ का भाव 1,154 रुपये प्रति 40 किलो के स्तर पर पहुंच गया था। उन्होंने बताया कि अक्टूबर महीने के शुरू में बाजारों में त्योहारी सीजन की मांग बढऩे के कारण भी बाजार में गुड़ के भावों में तेजी को बल मिल रहा था, लेकिन त्योहारों के नजदीक आने पर उत्पादक क्षेत्रों से गुड़ की सप्लाई में आई अचानक तेजी के कारण भावों में काफी गिरावट आई है। (Business Bhaskar)

ग्वार गम के निर्यात में 580 फीसदी की जोरदार बढ़त

आर एस राणा नई दिल्ली चालू वित्त वर्ष 2012-13 के पहले पांच महीनों (अप्रैल से अगस्त) के दौरान ग्वार गम के निर्यात में मूल्य के हिसाब से 580.36 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। चालू वित्त वर्ष 2012-13 के अप्रैल से अगस्त के दौरान 19,869.89 करोड़ रुपये मूल्य का ग्वार गम का निर्यात हुआ है। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि खाड़ी देशों के साथ-साथ अमेरिका और यूरोप की मांग बढऩे से ग्वार गम पाउडर के निर्यात में चालू वित्त वर्ष में भारी बढ़ोतरी हुई है। चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीनों में ही ग्वार गम का निर्यात मूल्य के हिसाब से 580.36 फीसदी बढ़कर 19,869.89 करोड़ रुपये का हो गया जबकि पिछले साल की समान अवधि में 2,920.49 करोड़ रुपये मूल्य का ग्वार गम का निर्यात हुआ था। एपीडा के अनुसार वित्त वर्ष 2011-12 में ग्वार गम का कुल निर्यात 7.06 लाख टन का हुआ था जो वित्त वर्ष 2010-11 के 4.41 लाख टन से ज्यादा था। टिकू राम गम एवं केमिकल प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर विपिन अग्रवाल ने बताया कि उत्पादक मंडियों में ग्वार सीड की नई फसल की आवक शुरू हो गई है तथा चालू सीजन में ग्वार सीड का उत्पादन पिछले साल से बढऩे की संभावना है। इसलिए महीने भर से निर्यात सौदों में कमी आई है। आयात नई फसल को देखते हुए नए आयात सौदे सीमित मात्रा में कर रहे हैं। नवंबर महीने में पैदावार की स्थिति साफ होने के बाद निर्यात सौदों में तेजी आने की संभावना है उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार ग्वार सीड और ग्वार गम में वायदा कारोबार सभी पक्षों की राय के बाद ही लिया जाएगा। चालू साल के फरवरी-मार्च में ग्वार और ग्वार गम की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी, जिसके बाद सरकार ने 22 मार्च 2012 को इसके वायदा कारोबार पर रोक लगा दी थी। मार्च महीने में उत्पादक मंडियों में ग्वार गम का दाम बढ़कर एक लाख रुपये प्रति क्विंटल और ग्वार सीड का दाम 33,000 रुपये प्रति क्विंटल हो गया था। वर्तमान में उत्पादक मंडियों में ग्वार सीड का दाम 10,200 रुपये और ग्वार गम का 28,500 रुपये प्रति क्विंटल है। हरियाणा ग्वार गम एंड केमिकल के डायरेक्टर सुरेंद्र सिंघल ने बताया कि नए सीजन में ग्वार की पैदावार बढ़कर 1.75 से 2 करोड़ बोरी (एक बोरी-एक क्विंटल) होने का अनुमान है जबकि पिछले साल पैदावार करीब 1.50 करोड़ बोरियों की हुई थी। राजस्थान तथा हरियाणा की उत्पादक मंडियों में दैनिक आवक 20,000 से 22,000 बोरियों की हो रही है। नवंबर में आवक बढ़कर एक लाख बोरी दैनिक की हो जाएगी। (Business Bhaskar.....R S Rana)

बासमती की कीमतों में उछाल

पंजाब और हरियाणा के बासमती उत्पादकों के चेहरे एक बार फिर दमकने लगे हैं क्योंकि इस साल नई फसल की कीमतें 20-25 फीसदी बढ़ गई हैं। निर्यातकों के मुताबिक, इस साल बासमती की कीमतें मोटे तौर पर किसानों की उम्मीद के मुताबिक हैं। निर्यातकों का कहना है कि निर्यात में बढ़ोतरी, कैरीओवर स्टॉक में कमी और डॉलर के मुकाबले रुपये की आकर्षक विनिमय दर आदि कुछ ऐसी वजहें हैं जिसके चलते इस साल बासमती किसानों की बल्ले-बल्ले हो रही है। देश में बासमती के कुल उत्पादन में पंजाब और हरियाणा की हिस्सेदारी करीब 80 फीसदी है। बासमती निर्यातकों के मुताबिक, पूसा-1121 किस्म की कीमतें इस साल 2100-2300 रुपये प्रति क्विंटल है जबकि पिछले साल इसकी कीमतें 1700 रुपये प्रति क्विंटल थी। पंजाब और हरियाणा में मुख्य रूप से पूसा-1121 किस्म उगाई जाती है और कुल रकबे में इसकी हिस्सेदारी करीब 75 फीसदी है। ऑल इंडिया राइस एक्सपोट्र्स एसोसिएशन (एआईआरईए) के अध्यक्ष एम पी जिंदल ने कहा कि इस साल बासमती की कीमतें 20-25 फीसदी बढ़ी हैं। हरियाणा राइस एक्सपोट्र्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुशील कुमार जैन का कहना है कि पिछले साल के मुकाबले इस साल निर्यातकों के पास कैरीओवर स्टॉक में कमी और डॉलर की ऊंची कीमतों के चलते किसानों को ज्यादा रकम हासिल हो रही है। चमन लाल सेतिया एक्सपोट्र्स लिमिटेड के कार्यकारी निदेशक राजीव सेतिया ने कहा, नई फसल की कीमतों में इजाफे की मुख्य वजह यह है कि पिछले साल बासमती की कीमतें बहुत ज्यादा दबी रह गई थी। पिछले साल पूसा-1121 की कीमतें 1500 रुपये प्रति क्विंटल के निचले स्तर पर चली गई थी। इस साल नई फसल की कीमतें काफी हद तक स्थिर रही हैं। एम पी जिंदल के मुताबिक, इस साल बासमती का उत्पादन पिछले साल के मुकाबले थोड़ा कम रहने का अनुमान है। पिछले साल कुल उत्पादन 15 करोड़ बोरी रहा था जबकि इस साल उत्पादन में 6 फीसदी की गिरावट आएगी क्योंकि पारंपरिक बासमती के रकबे में कमी दर्ज की गई है। जिंदल के मुताबिक, हालांकि इस साल बासमती का निर्यात पिछले साल के मुकाबले 25 फीसदी ज्यादा होगा क्योंकि इस वित्त वर्ष के शुरुआती दौर में यानी अप्रैल-जुलाई में काफी कुछ निर्यात हो चुका है। जिंदल का मानना है कि इस साल बासमती का निर्यात करीब 40 लाख टन रहेगा जबकि पिछले साल 32 लाख टन बासमती का निर्यात हुआ था। निर्यातकों का कहना है कि उच्च निर्यात की कामयाबी हासिल करना काफी कुछ ईरान के बाजार पर निर्भर करेगा, जो देश में भी बासमती की कीमतों की दिशा तय करेगी। ऑल इंडिया राइस एक्सपोट्र्स एसोसिएशन (एआईआरईए) के महासचिव आर एस शेषाद्रि ने कहा, ईरान के बाजार में नकदी अगले 3-5 महीने के लिए बासमती की कीमतें तय करेंगी। कुल बासमती निर्यात में ईरान को 11 लाख टन का निर्यात होने का अनुमान है। अमेरिकी प्रतिबंध के चलते ईरान डॉलर में कारोबार नहीं कर पा रहा है और इससे भारतीय निर्यातक बड़े पैमाने पर प्रभावित हुए हैं। एक निर्यातक जगदीश सूरी ने कहा, बामसती की कीमतें ऊंची रहेंगी या नहीं, यह ईरान के बाजार पर निर्भर करेगा। अगर ईरान बासमती की खरीद करता है तो कीमतें ऊंची होंगी और इसकी तरफ से खरीदारी नहीं होने पर लंबी अवधि में कीमतें नीचे आएंगी। (BS Hindi)

'विनियंत्रण से बढ़ेगा चीनी कंपनियों का मुनाफा'

क्रिसिल ने कहा है कि चीनी क्षेत्र को पूर्ण रूप से विनियंत्रित करने की सी रंगराजन समिति की सिफारिशें अगर मान ली जाती है तो उसके द्वारा रेटिंग की जाने वाली चीनी उत्पादक कंपनियों का मुनाफा वित्त वर्ष 2012-13 में 50 फीसदी यानी 600 करोड़ रुपये बढ़ जाएगा। दूसरे शब्दों में, नियंत्रण के मौजूदा परिदृश्य में अनुमानित मुनाफे के मुकाबले रेटिंग वाली कंपनियों का मुनाफा 50 फीसदी बढ़ सकता है। क्रिसिल ने यह अध्ययन खुद के द्वारा रेटिंग की गई 47 चीनी उत्पादक कंपनियों पर किया है। क्रिसिल के वरिष्ठ निदेशक (बैंक लोन क्रेडिट) सुबोध राय ने कहा कि इसके अलावा गन्ना किसानों को भी विनियंत्रण का फायदा मिल सकता है क्योंकि उनकी बकाया रकम घटेगी और चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी का लाभ भी उन्हें मिलेगा। पूर्ण विनियंत्रण के अलावा सी रंगराजन की अगुआई वाली समिति ने गन्ने की राज्य परामर्श कीमत (एसएपी) को समाप्त करने और घरेलू बाजार में चीनी की बिक्री पर नियामकीय नियंत्रण हटाने को कहा है। साथ ही वैश्विक कारोबार यानी निर्यात पर मात्रात्मक पाबंदी और जूट बोरी पैकिंग की अनिवार्यता समाप्त करने की सिफारिश की गई है। केंद्र सरकार कंपनियों के लिए गन्ने की खरीद कीमत (जिसे उचित व लाभकारी मूल्य - एफआरपी कहा जाता है) तय करती है। हालांकि गन्ना का उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और पंजाब गन्ने के लिए एसएपी का भी ऐलान करते हैं। समिति ने एसएपी समाप्त करने को कहा है और सलाह दी है कि कंपनियां चीनी व इसके उपोत्पाद से मिलने वाली रकम का 70 फीसदी किसानों के साथ साझा करें। राय ने कहा, मुझे लगता है कि गन्ने की कीमत का जुड़ाव अंतिम उत्पाद से करने का सुझाव उद्योग के लिए सकारात्मक है और इससे क्रिसिल द्वारा रेटिंग की जाने वाली कंपनियों का मुनाफा 450 करोड़ रुपये बढ़ जाएगा। मौजूदा नियमों के तहत चीनी कंपनियों को अपने उत्पादन का 10 फीसदी हिस्सा सब्सिडी वाली कीमत पर सरकार को देना होता है, जो लेवी चीनी कहलाती है और इसका वितरण राशन की दुकानों के जरिए होता है। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार निर्यात पर प्रतिबंध लगाती है और इस वजह से कंपनियां निर्यात बाजार का फायदा नहीं उठा पाती। कंपनियों को जूट की बोरियों में चीनी की पैकिंग अनिवार्य रूप से करनी होती है, जिससे उसकी लागत 400 रुपये प्रति टन बढ़ जाती है। क्रिसिल के निदेशक (बैंक लोन रेटिंग) मनीष गुप्ता ने कहा, हमें लगता है कि लेवी कोटा समाप्त करने और पैकिंग के लिए प्लास्टिक की बोरी के इस्तेमाल से कंपनियों का मुनाफा 150 करोड़ रुपये बढ़ जाएगा। (BS Hindi)

चीनी पर आयात शुल्क बढ़ाने की वकालत

मौजूदा पेराई सीजन में कच्ची चीनी का आयात और सफेद चीनी के निर्यात के विरोध के मसले पर निजी व सहकारी चीनी मिलों के सुर एक जैसे हैं। हालांकि आयात शुल्क के मामले में उनके बीच मतभेद है। निजी चीनी मिलों के संगठन भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) ने केंद्र सरकार से चीनी पर आयात शुल्क मौजूदा 10 फीसदी से बढ़ाकर 25 फीसदी करने का अनुरोध किया है। दूसरी ओर, फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज इन महाराष्ट्र (170 सहकारी मिलों की अग्रणी संस्था) ने 10 फीसदी आयात शुल्क लगाने की सिफारिश की है, लेकिन यह भी मांग की है कि कच्ची चीनी का आयात और फिर इसके बराबर सफेद चीनी का निर्यात करने वाली मिलों से 10 फीसदी लेवी चीनी वसूली जानी चाहिए। इस चीनी का वितरण जन वितरण प्रणाली के तहत होता है। इसके अलावा फेडरेशन ने कहा है कि इन चीनी मिलों को उत्पाद कर से छूट नहीं मिलनी चाहिए। 22 अक्टूबर को इस्मा के अध्यक्ष गौतम गोयल ने केंद्र सरकार को विस्तार से बताया था कि भारतीय चीनी के लिए वैश्विक बाजार अनुपयुक्त है, लिहाजा आयात से देश में चीनी की उपलब्धता बढ़ जाएगी और इस चीनी के लिए बाहर कोई बाजार नहीं मिलेगा। इससे चीनी मिलों का वित्तीय बोझ बढ़ेगा और इससे गन्ने का बकाया बढ़ जाएगा। यह असर वैसे समय में नजर आएगा जब 2013-14 के कटाई सीजन में गन्ने का रकबा घटेगा और चीनी की उपलब्धता भी अचानक कम हो जाएगी। इस्मा ने कहा, साल 2013-14 से देश शुद्ध आयातक बनने पर बाध्य हो जाएगा। फेडरेशन के चेयरमैन विजयसिंह मोहिते पाटिल ने कहा, आयात की दरकार नहीं है क्योंकि इससे देसी बाजार में चीनी की कीमतें कम हो जाएंगी, खास तौर से महाराष्ट्र में, जहां अपर्याप्त गन्ने के चलते चीनी का उत्पादन घटेगा। मौजूदा समय में चीनी की एक्स-मिल कीमतें 3220-3250 रुपये प्रति क्विंटल के दायरे में है जबकि वैश्विक कीमतें 3050-3100 रुपये प्रति क्विंटल है। कच्ची व सफेद चीनी के आयात पर सरकार को 10 फीसदी आयात शुल्क समाप्त नहीं करना चाहिए। लेकिन ऐसे समय में उन मिलों से लेवी चीनी का दायित्व पूरा करने और उत्पाद कर का भुगतान करने के लिए कहा जाना चाहिए। सहकारी चीनी उद्योग का नजरिया मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण व सहकारिता मंत्री हर्षवर्धन पाटिल ने साझा किया, जिन्होंने संकेत दिया कि गन्ने की कमी के चलते महाराष्ट्र में चीनी का उत्पादन 40 फीसदी घटेगा। दूसरी ओर, इस्मा ने कहा कि 65 लाख टन के ओपनिंग स्टॉक और घरेलू जरूरतें पूरी करने के बाद करीब 15 लाख टन का भंडार रहने के बाद भारत इस सीजन में 20 लाख टन चीनी का निर्यात आसानी से कर सकता है। ऐसा नहीं है कि आयातित कच्ची चीनी से तैयार सफेद चीनी देश में गन्ने से तैयार चीनी के मुकाबले सस्ती है। अगर ऐसा होता है तो गन्ना खरीद के मामले में स्पष्ट तौर पर यह हतोत्साहित करने वाला कदम होगा और अगर यह खरीदा जाता है तो आयातित कच्ची चीनी सस्ती होने के कारण इसे बेचना काफी मुश्किल होगा। अनुपयुक्त निर्यात बाजार के चलते मिलों के पास चीनी का बड़ा स्टॉक जमा हो जाएगा और किसानों को समय पर भुगतान नहीं हो पाएगा। इस्मा ने कहा, इसके चलते गन्ने का बकाया बढ़ेगा और गन्ने का रकबा भी 2013-14 के सीजन में दूसरी फसलों में चला जाएगा। (BS Hindi)

चीनी पर आयात शुल्क में बदलाव का फैसला 3 महीने बाद ही: पवार

नई दिल्ली:कृषि मंत्री शरद पवार ने आज कहा कि सरकार चीनी पर आयात शुल्क की दरों में बदलाव का फैसला 3 महीने बाद ही करेगी ताकि फैसले से पहले इस पेराई मौसम की प्रगति का अनुमान ले लिया जाए। फिलहाल साफ चीनी और कच्ची चीनी पर आयात शुल्क 10-10 फीसदी है। खाद्य मंत्रालय साफ चीनी पर आयात शुल्क बढ़ाकर 20 फीसदी करने का प्रस्ताव मंत्रिमंडल के लिए भेजने की तैयारी में है ताकि घरेलू बाजार में चीनी की बाढ़ रोकी जा सके, पर साथ ही वह कच्ची चीनी के सस्ते आयात का दरवाजा खुला रखने के लिए इस पर शुल्क समाप्त करने के विकल्प पर भी विचार कर रहा है। पवार ने आज यह पूछने पर कि क्या यह चीनी से जुड़े आयात शुल्क में बदलाव के लिए उपयुक्त समय है, कहा, ‘‘हमें थोड़ा इंतजार करना चाहिए।’’ उन्होंने कहा कि 3 महीने इंतजार किया जा सकता है। पवार ने कहा कि घाटे में चल रही दिल्ली मिल्क स्कीम (डी.एम.एस.) को कम्पनी का रूप देने के प्रस्ताव को मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने के बाद ही उसकी डोर अमूल को थमाने के प्रस्ताव पर गौर किया जाएगा। अमूल ब्रांड का स्वामित्व रखने वाली गुजरात सहकारिता दुग्ध विपणन महासंघ (जी.सी.एम.एम.एफ.) ने डी.एम.एस. को चलाने में रुचि प्रकट की है तथा कृषि मंत्रालय को एक प्रस्ताव दिया है। पवार ने कहा, ‘‘हमने (अमूल के प्रस्ताव के बारे में) कोई फैसला नहीं किया है, वास्तव में मंत्रिमंडल के समक्ष डी.एम.एस. के निगमीकरण के लिए प्रस्ताव है। हम (निगमीकरण के बारे में) मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद अमूल के प्रस्ताव के बारे में सोचेंगे।’’ (Punjab Kesri)

25 October 2012

धनतेरस के लिए सोने की बुकिंग

कीमती धातुओं की कीमतों में गिरावट के चलते उपभोक्ताओं ने वायदा अनुबंध में सोने व चांदी की बड़ी मात्रा की बुकिंग की है और इसमें ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों शामिल है। फाइनैंशियल टेक्नोलॉजी द्वारा प्रवर्तित नैशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड में पिछले एक महीने में करीब 2 टन सोने व 25 टन चांदी की बुकिंग हुई है। बुकिंग कराने वाले ज्यादातर खुदरा निवेशक हैं और ये तत्काल डिलिवरी नहीं लेते। एनएसईएल के प्रबंध निदेशक अंजनी सिन्हा ने कहा, डीमैट में सर्राफे रखने वाले ग्राहकों की तरफ से हमें धनतेरस (दीवाली से पहले) पर डिलिवरी देने का अनुरोध प्राप्त हुआ है। उन्होंने कहा कि छोटे खुदरा निवेशकों की तरफ से ऑर्डरों की बाढ़ आ गई है, जो अपने खाते में छोटी-छोटी खरीद करते हैं ताकि उचित वक्त पर डिलिवरी योग्य मात्रा उनके पास उपलब्ध हो जाए। सोने की न्यूनतम डिलिवरी योग्य मात्रा 8 ग्राम तय की गई है जबकि चांदी के मामले में यह 1 किलोग्राम है। पिछले एक महीने में एक्सचेंज को खुदरा व वैयक्तिक कारोबारियों की तरफ से करीब 20,000 अनुरोध प्राप्त हुए हैं। इससे पता चलता है कि निवेशक रुपये में उतारचढ़ाव व वैश्विक कीमतों में नरमी का फायदा उठाने के लिए आगे आए हैं, जिसकी वजह से भारत में कीमतें नियंत्रित हैं। फिलहाल ऑर्डर पिछले साल के मुकाबले 75 फीसदी ज्यादा है। भारत में धनतेरस के दिन कीमती धातुओं की खरीद शुभ मानी जाती है। ऐसे में हर कोई इस मौके पर सोना-चांदी खरीदना चाहता है। सिन्हा ने कहा, उपभोक्ताओं को लगता है कि दीवाली के दौरान सर्राफे की कीमतें नई ऊंचाई पर पहुंचेंगी, ऐसे में वे उस समय इसकी डिलिवरी लेने के लिए अग्रिम बुकिंग कर चुके हैं। ताजा बुकिंग के साथ एनएसईएल के पास सोने व चांदी की कुल होल्डिंग क्रमश: 12 व 230 टन हो चुकी है। ऐसा ही रुख हाजिर बाजार में भी देखा जा रहा है। आभूषण के खुदरा विक्रेताओं के यहां भी धनतेरस पर डिलिवरी के लिए बुकिंग हुई है। शहर के एक कारोबारी पुष्पक बुलियन ने पिछले हफ्ते बिक्री में 20 फीसदी की उछाल दर्ज की है। सोमवार को भी वहां बिक्री में उछाल आई क्योंकि खुदरा निवेशकों ने ऊंची कीमतों की आस में सोने-चांदी की बुकिंग की। पिछले कुछ सालों में सोने-चांदी की कीमतों के रुख को देखते हुए ग्राहकों को मौजूदा कीमतों पर दांव लगाना सुरक्षित लग रहा है। पुष्पक बुलियन के निदेशक केतन श्रॉफ ने कहा, इसी वजह से ग्राहक धनतेरस पर डिलिवरी लेने के लिए सोने की बुकिंग कर रहे हैं। इस बीच, सोने की कीमतें 12 सितंबर से अब तक 3.72 फीसदी टूट चुकी हैं। 12 सितंबर को ही अमेरिका में क्यूई-3 का ऐलान हुआ था। (BS Hindi)

रिकॉर्ड स्तर पर गोल्ड ईटीएफ कारोबार

सोने का भाव चढऩे से आभूषण बनाने वाले परेशान हैं, लेकिन गोल्ड ईटीएफ निवेशकों का दुलारा बन गया है। इस साल सितंबर में निवेशकों ने इसमें रिकॉर्ड 11,000 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम लगा दी। माना जा रहा है कि त्योहारी मौसम के दौरान अक्टूबर और नवंबर में निवेश और बढ़ जाएगा। गोल्ड ईटीएफ की शुरुआत 2007 में हुई थी और उसके बाद से अब तक निवेशकों की संख्या 80 गुना हो चुकी है। नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) से मिले आंकड़ों के मुताबिक इसके तहत लगी रकम पिछले साल के मुकाबले इस साल 37 फीसदी बढ़ी है। इस साल अगस्त में इसमें 10,701 करोड़ और सितंबर में 11,198 करोड़ रुपये लगे, जबकि पिछले साल सितंबर में आंकड़ा केवल 8,173 करोड़ रुपये था। गोल्ड ईटीएफ का औसत डिलिवरी मूल्य भी साल भर में 17 फीसदी बढ़कर 433 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। ऐंजल ब्रोकिंग की नलिनी राव ने बताया कि देश में 14 म्युचुअल फंड गोल्ड ईटीएफ की 25 योजनाएं चला रहे हैं। अब कुछ संपत्ति प्रबंधन कंपनियों ने 10 ग्राम से कम सोना देना शुरू कर दिया है और कुछ एसआईपी के माध्यम से निवेश करा रही हैं, जो छोटे निवेशकों को भा रहा है। ईटीएफ में निवेश से कर में भी फायदा मिलता है क्योंकि उसमें बिक्री कर, मूल्यवद्र्घित कर और प्रतिभूति लेनदेन कर नहीं लगते। इसके अलावा सोने की गुणवत्ता भी खरी होती है। इसमें रिटर्न भी शानदार होता है। पांच साल पहले ईटीएफ शुरू होते वक्त सोना 10,000 रुपये प्रति 10 ग्राम बिक रहा था, लेकिन अब उसकी कीमत 30,000 रुपये प्रति 10 ग्राम से ज्यादा है। गोल्ड ईटीएफ का कारोबार एनएसई पर होता है, जिसके प्रवक्ता ने बताया कि निवेशक सोने को पहले धातु के रूप में खरीदते थे, लेकिन अब चलन बदल रहा है। अगस्त 2011 में 56,000 लोग ईटीएफ में सौदे कर रहे थे, जिनकी तादाद अब 79,000 हो गई है। इसी कारण एनएसई को धनतेरस और दीवाली पर पिछले साल के मुकाबले दोगुने कारोबार की उम्मीद है। पिछली धनतेरस पर एक्सचेंज ने गोल्ड ईटीएफ में 636.04 करोड़ रुपये का कारोबार दर्ज किया था। उस दिन 24.61 लाख यूनिट के सौदे हुए थे, जो रिकॉर्ड था। इस साल भी अक्षय तृतीया पर गोल्ड ईटीएफ में 608 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ था, जो पिछले साल की अक्षय तृतीया के मुकाबले 44 फीसदी अधिक था। (BS Hindi)

महंगाई का रोना, आया कम कैरेट का सोना

धनतेरस और दीवाली नजदीक आते ही आभूषण कारोबारियों के चेहरे खिल जाते हैं, लेकिन महंगाई ने इस बार उन्हें बेनूर कर दिया है। सोना सस्ता हो रहा है, लेकिन महंगाई के कारण ग्राहक दुकानों पर फटकने को तैयार नहीं हैं। इसलिए कारोबारी कम वजन का सोना और कम कैरेट के सिक्के देने के लिए भी तैयार हो गए हैं। अक्टूबर की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 1,795.55 डॉलर प्रति औंस था, जो 23 अक्टूबर को 1,710 डॉलर रह गया। देसी बाजार में भी सोना इस दौरान 32,200 रुपये से गिरकर 30,500 रुपये प्रति 10 ग्राम रह गया। चांदी भी महीने भर में करीब 3,000 रुपये गिरकर 60,000 रुपये प्रति किलोग्राम रह गई है। मुंबई ज्वैलर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष कुमार जैन कहते हैं कि सोने-चांदी के भाव पहुंच से बाहर होने और महंगाई बढऩे के कारण बाजार में ग्राहक नहीं आ रहे हैं। फिर भी जैन को धनतेरस और दीवाली के कारण अगले 15 दिन में बाजार गुलजार होने की उम्मीद है। अलबत्ता ग्राहकों को लुभाने के लिए प्रमुख कंपनियां रिद्घिसिद्घि बुलियंस और फिनकर्व बुलियन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बुलियन इंडिया पर थोक भाव में सोना-चांदी बेच रही हैं। रिद्घिसिद्घि बुलियंस के निदेशक पृथ्वीराज कोठारी ने बताया कि इसमें 1 ग्राम, 5 ग्राम और 10 ग्राम वजन की सोने की छड़ें ग्राहक खरीद सकते हैं। चांदी की छड़ें 10 ग्राम, 20 ग्राम, 50 ग्राम और 100 ग्राम वजन में मिलेंगी। दिलचस्प है कि कंपनी इसमें 300 रुपये का सोना भी ग्राहकों को बेच रही है और उसे मुफ्त में ग्राहकों के घर तक पहुंचा रही है। इसमें ब्रोकरेज और खाता शुल्क भी नहीं वसूला जा रहा है। ग्राहकों की जेब हल्की देखकर कारोबारी कम कैरेट के सिक्के और आभूषण भी बेचने लगे हैं। ऐसे सिक्के बेचने वाले नाइन डायमंड के निदेशक संजय शाह कहते हैं, 'सोना बहुत महंगा है। यही देखकर हमने 8, 10, 12, 15 और 16 कैरेट के सिक्के उतारे हैं। धनतेरस और दीवाली पर लोग 1 सिक्का जरूर खरीदना चाहते हैं और इस योजना को वे हाथोहाथ ले रहे हैं।' बाजार में छूट भी मिल रही है। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल डाक विभाग के साथ सिक्कों पर 7 फीसदी छूट दे रहा है। ये सिक्के डाकघरों में बिक रहे हैं। जानकारों के मुताबिक ऐसी कई दूसरी योजनाएं भी बाजार में हैं और खरीदारी से पहले ग्राहकों को उनकी टोह ले लेनी चाहिए। (BS Hindi)

चीनी उद्योग को डिकंट्रोल करने पर सरकार गंभीर

साक्षात्कार : प्रो. के. वी. थॉमस [+] ओजीएल के तहत चीनी निर्यात रहेगा जारी [+] गेहूं और चावल निर्यात की अच्छी संभावनाएं [+] चावल के भंडारण में कोई परेशानी नहीं [+] ग्वार वायदा कारोबार दोबारा शुरू करने पर फैसला सभी की राय के बाद [+] मुद्रास्फीति दर काफी हद तक सामान्य के करीब चीनी उद्योग को विनियंत्रित करने पर प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन सी. रंगराजन की अध्यक्षता में गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। सरकार इस पर पूरी गंभीरता से विचार कर रही है। प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक के समर्थक खाद्य एवं उपभोक्ता मामले राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रो. के. वी. थॉमस के मुताबिक इस विधेयक को संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में लाने की सरकार की पूरी तैयारी है। उम्मीद है कि वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) को भी पूर्ण स्वायत्तता देने वाले फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट रेग्युलेशन एक्ट (एफसीआरए) को संसद में मंजूरी मिल जाएगी, जिससे जिंस बाजार में कारोबार करने वाले छोटे निवेशकों के साथ-साथ किसानों को भी फायदा होगा। व्हाइट चीनी के आयात पर आयात शुल्क को 10 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी करने का प्रस्ताव है। साथ ही, रॉ-शुगर के आयात को शुल्क मुक्त करने का भी प्रस्ताव है। खाद्यान्न के निर्यात के लिए एक पारदर्शी नीति बनाने पर विचार चल रहा है। खाद्यान्न के भंडारण और खरीफ विपणन सीजन में चावल की सरकारी खरीद से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर प्रो. के. वी. थॉमस से बिजनेस भास्कर के शशि झा और आर. एस. राणा ने विस्तृत बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश: शुगर विनियंत्रण पर सी. रंगराजन कमेटी अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप चुकी है। इस पर खाद्य मंत्रालय की अपनी क्या राय है? खासकर यह देखते हुए कि इससे पहले भी इस पर पहले भी दो कमेटी अपनी रिपोर्ट सौंप चुकी हैं लेकिन दोनों रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी गई? इस बार ऐसा नहीं होगा। सरकार सी. रंगराजन की रिपोर्ट को लेकर पूरी तरह से गंभीर है। रिपोर्ट फिलहाल प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के पास है। यह कमेटी प्रधानमंत्री ने गठित की थी। हमें अभी अधिकारिक रूप से रिपोर्ट नहीं मिली है। या तो प्रधानमंत्री कार्यालय विश्लेषण के बाद हमें रिपोर्ट भेजे अथवा प्रधानमंत्री कार्यालय रिपोर्ट भेजकर हमारी राय मांगे तो खाद्य मंत्रालय इस पर कुछ कह सकता है। जिस समय इस कमेटी का गठन किया गया था तो खाद्य मंत्रालय ने कहा था कि इस कमेटी की सिफारिशों के प्रति सरकार गंभीर है। चीनी उद्योग के विनियंत्रण से कंपनियों के साथ ही किसानों और उपभोक्ताओं को भी फायदा होगा। चीनी आयात पर सरकार की आयात शुल्क लगाने की कोई योजना है? इसके अलावा पीडीएस में चीनी के दाम बढ़ाने और पीडीएस में चीनी की मात्रा कम करने की भी कोई योजना है? व्हाइट चीनी के आयात पर आयात शुल्क को 10 से बढ़ाकर 20 फीसदी करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा रॉ-शुगर के आयात को भी शुल्क मुक्त करने का सरकार का प्रस्ताव है। वर्तमान में व्हाइट और रॉ-शुगर आयात पर 10 फीसदी का आयात शुल्क है। पीडीएस में चीनी के दाम बढ़ाने और लेवी चीनी की मात्रा जो फिलहाल 10 फीसदी है, को घटाने की अभी कोई योजना नहीं है। चालू पेराई सीजन 2012-13 (अक्टूबर से सितंबर) में देश में चीनी का उत्पादन करीब 25 लाख टन कम होने की आशंका है। ऐसे में ओपन जरनल लाइसेंस (ओजीएल) के तहत क्या चीनी निर्यात जारी रखा जाएगा? चालू पेराई सीजन में देश में चीनी का उत्पादन 230 से 235 लाख टन ही होने का अनुमान है जो पिछले साल के 262 लाख टन से कम है। लेकिन अक्टूबर के शुरू में देश में चीनी का बकाया स्टॉक करीब 60 लाख टन का बचा हुआ है। देश में चीनी की सालाना खपत करीब 220 लाख टन की होती है। ऐसे में देश चीनी की कुल उपलब्धता मांग के मुकाबले ज्यादा है इसीलिए ओजीएल में चीनी का निर्यात जारी रहेगा। क्या सरकार संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में फूड सिक्योरिटी विधेयक पेश करने की योजना बना रही है? क्या पुराने विधेयक में कोई बदलाव भी करने की भी योजना है? खाद्य सुरक्षा बिल इस समय संसद की स्थाई समिति के पास है तथा उम्मीद है कि संसदीय समिति शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले ही अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप देगी। ऐसे में सरकार की पूरी कोशिश है कि इसे संसद के आगामी शीतकालीन सत्र के दौरान पेश किया जाए। जहां तक बदलाव का सवाल है तो फिलहाल इसके बारे में अभी ठोस रूप से कुछ कहना मुश्किल है। हाल ही में फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) को कैबिनेट ने अपनी मंजूरी दी है। आपके हिसाब से इस विधेयक से देश के किसानों और छोटे निवेशकों को किस प्रकार मदद मिलेगी? और क्या इसे संसद में पारित करा लिया जाएगा? एफसीआरए विधेयक से वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) को सेबी की तरह अधिकार मिल जाएंगे। इससे ब्रोकरों पर जुर्माने की राशि बढ़ जाएगी, जिससे ब्रोकर मनमानी नहीं कर पाएंगे। एफएमसी अपने कार्य के निष्पादन में ज्यादा स्वतंत्र हो जाएगी जिससे एक्सचेंजों में काम करने वाले छोटे निवेशकों तक इसका लाभ पहुंचेगा। साथ ही, किसानों को भी इसका फायदा होगा। ईरान को गेहूं निर्यात पर अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया है? सरकार खाद्यान्न निर्यात के लिए क्या कोई योजना बना रही है? गेहूं निर्यात पर बात करने के लिए ईरान की एक टीम भारत आई थी, जिसे करनाल बंट को लेकर कुछ आपत्तियां थीं। लेकिन ईरान से आई टीम ने भारतीय गेहूं की क्वालिटी को लेकर संतोष जताया है तथा सालाना करीब 10 लाख टन गेहूं निर्यात की बातचीत अंतिम चरण में है। ईरान के अलावा, मलेशिया और अधिकांश आसियान देशों में भारतीय खाद्यान्न खासकर गेहूं और चावल निर्यात की अच्छी संभावनाएं हैं। सितंबर 2011 से अभी तक देश से करीब 61 लाख टन गैर-बासमती चावल और 25 लाख टन गेहूं का निर्यात प्राइवेट निर्यातकों द्वारा किया जा चुका है। खाद्यान्न उत्पादों के निर्यात के लिए लंबी अवधि की नीति बनाने पर सरकार गंभीर है। उम्मीद है अगले साल गेहूं और चावल के निर्यात में और बढ़ोतरी होगी। केंद्रीय पूल में गेहूं का बंपर स्टॉक मौजूद है इसके बावजूद, गेहूं उत्पादों खासकर आटा की कीमतों में तेजी आई है? गेहूं उत्पादों की कीमतों में आई तेजी के पीछे कई कारण है। गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में पिछले दो-तीन सालों में भारी बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, गेहूं की खरीद में मंडी टैक्स और अन्य कई खर्चे जुड़ जाते हैं जिसकी वजह से गेहूं के दाम बढ़े हैं। गेहूं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार की ओएमएसएस में 70 लाख टन अतिरिक्त गेहूं का आवंटन नवंबर 2012 से मार्च 2013 तक करने की योजना है। (Business Bhaskar....R S Rana)

23 October 2012

त्योहारी मांग से खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी

वैश्विक स्तर पर खाद्य तेलों के भाव में मजबूती और घरेलू बाजार में भी त्योहारी सीजन की मांग से खाद्य तेल महंगे हो रहे हैं। खाद्य तेल कारोबारियों के मुताबिक पिछले पंद्रह दिन में घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में 20 रुपये प्रति दस किलो (ढाई-तीन फीसदी) की तेजी दर्ज की गई है। कारोबारियों का अनुमान है कि खाद्य तेलों में वैश्विक तेजी व त्योहारी मांग से कीमतों में और मजबूती आने की संभावना है। इंडोनेशिया में क्रूड पाम तेल के निर्यात पर टैक्स में कटौती से अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम तेलों की कीमतों में मजबूती दर्ज की जा रही है। इसका असर घरेलू बाजार में भी खाद्य तेलों की कीमतों पर पड़ रहा है। व्यापारियों का कहना है कि क्रशिंग प्लांटों की ओर से सोयाबीन की सक्रिय खरीद शुरू होने व इसकी आपूर्ति कम होने की वजह से सोया तेल की भी कीमतों में मजबूती का रुख दर्ज किया जा रहा है। इससे भी खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी को बल मिल रहा है। खाद्य तेलों के थोक कारोबारी हेमंत गुप्ता ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में मजबूती के साथ घरेलू बाजार में त्योहारी सीजन की मांग निकलने से कीमतों में 20 रुपये प्रति दस किलो की तेजी दर्ज की गई है। आगामी दिनों में दीवाली के आसपास कीमतों में और तेजी आने की संभावना है। दिल्ली थोक बाजार में पिछले पंद्रह दिन में सोया तेल के दाम 20 रुपये बढ़कर 640-700 रुपये प्रति दस किलो हो गए हैं। इसके अलावा सरसों तेल (कच्ची घानी) का भाव 860-900 रुपये प्रति दस किलो और सरसों तेल (पक्की घानी) का भाव 910-960 रुपये प्रति दस किलो चल रहा है। खारी बावली स्थित खाद्य तेलों के व्यापारी अतर सिंह का कहना है कि त्योहारी मांग निकलने से तेलों के मूल्य में मजबूती दर्ज की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी के कारण खाद्य तेलों में तेजी को समर्थन मिल रहा है। ऐसे में त्योहारी सीजन के दौरान कीमतों में तेजी रहने की संभावना है। (Business Bhaskar)

त्योहारी मांग से खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी

वैश्विक स्तर पर खाद्य तेलों के भाव में मजबूती और घरेलू बाजार में भी त्योहारी सीजन की मांग से खाद्य तेल महंगे हो रहे हैं। खाद्य तेल कारोबारियों के मुताबिक पिछले पंद्रह दिन में घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में 20 रुपये प्रति दस किलो (ढाई-तीन फीसदी) की तेजी दर्ज की गई है। कारोबारियों का अनुमान है कि खाद्य तेलों में वैश्विक तेजी व त्योहारी मांग से कीमतों में और मजबूती आने की संभावना है। इंडोनेशिया में क्रूड पाम तेल के निर्यात पर टैक्स में कटौती से अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम तेलों की कीमतों में मजबूती दर्ज की जा रही है। इसका असर घरेलू बाजार में भी खाद्य तेलों की कीमतों पर पड़ रहा है। व्यापारियों का कहना है कि क्रशिंग प्लांटों की ओर से सोयाबीन की सक्रिय खरीद शुरू होने व इसकी आपूर्ति कम होने की वजह से सोया तेल की भी कीमतों में मजबूती का रुख दर्ज किया जा रहा है। इससे भी खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी को बल मिल रहा है। खाद्य तेलों के थोक कारोबारी हेमंत गुप्ता ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में मजबूती के साथ घरेलू बाजार में त्योहारी सीजन की मांग निकलने से कीमतों में 20 रुपये प्रति दस किलो की तेजी दर्ज की गई है। आगामी दिनों में दीवाली के आसपास कीमतों में और तेजी आने की संभावना है। दिल्ली थोक बाजार में पिछले पंद्रह दिन में सोया तेल के दाम 20 रुपये बढ़कर 640-700 रुपये प्रति दस किलो हो गए हैं। इसके अलावा सरसों तेल (कच्ची घानी) का भाव 860-900 रुपये प्रति दस किलो और सरसों तेल (पक्की घानी) का भाव 910-960 रुपये प्रति दस किलो चल रहा है। खारी बावली स्थित खाद्य तेलों के व्यापारी अतर सिंह का कहना है कि त्योहारी मांग निकलने से तेलों के मूल्य में मजबूती दर्ज की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी के कारण खाद्य तेलों में तेजी को समर्थन मिल रहा है। ऐसे में त्योहारी सीजन के दौरान कीमतों में तेजी रहने की संभावना है। (Business Bhaskar)

त्योहारी मांग से खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी

वैश्विक स्तर पर खाद्य तेलों के भाव में मजबूती और घरेलू बाजार में भी त्योहारी सीजन की मांग से खाद्य तेल महंगे हो रहे हैं। खाद्य तेल कारोबारियों के मुताबिक पिछले पंद्रह दिन में घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में 20 रुपये प्रति दस किलो (ढाई-तीन फीसदी) की तेजी दर्ज की गई है। कारोबारियों का अनुमान है कि खाद्य तेलों में वैश्विक तेजी व त्योहारी मांग से कीमतों में और मजबूती आने की संभावना है। इंडोनेशिया में क्रूड पाम तेल के निर्यात पर टैक्स में कटौती से अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम तेलों की कीमतों में मजबूती दर्ज की जा रही है। इसका असर घरेलू बाजार में भी खाद्य तेलों की कीमतों पर पड़ रहा है। व्यापारियों का कहना है कि क्रशिंग प्लांटों की ओर से सोयाबीन की सक्रिय खरीद शुरू होने व इसकी आपूर्ति कम होने की वजह से सोया तेल की भी कीमतों में मजबूती का रुख दर्ज किया जा रहा है। इससे भी खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी को बल मिल रहा है। खाद्य तेलों के थोक कारोबारी हेमंत गुप्ता ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में मजबूती के साथ घरेलू बाजार में त्योहारी सीजन की मांग निकलने से कीमतों में 20 रुपये प्रति दस किलो की तेजी दर्ज की गई है। आगामी दिनों में दीवाली के आसपास कीमतों में और तेजी आने की संभावना है। दिल्ली थोक बाजार में पिछले पंद्रह दिन में सोया तेल के दाम 20 रुपये बढ़कर 640-700 रुपये प्रति दस किलो हो गए हैं। इसके अलावा सरसों तेल (कच्ची घानी) का भाव 860-900 रुपये प्रति दस किलो और सरसों तेल (पक्की घानी) का भाव 910-960 रुपये प्रति दस किलो चल रहा है। खारी बावली स्थित खाद्य तेलों के व्यापारी अतर सिंह का कहना है कि त्योहारी मांग निकलने से तेलों के मूल्य में मजबूती दर्ज की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी के कारण खाद्य तेलों में तेजी को समर्थन मिल रहा है। ऐसे में त्योहारी सीजन के दौरान कीमतों में तेजी रहने की संभावना है। (Business Bhaskar)

चावल की सरकारी खरीद काफी धीमी

चालू खरीफ विपणन सीजन 2012-13 में चावल की सरकारी खरीद 20.3 फीसदी पिछड़कर कुल खरीद 43.84 लाख टन की हो पाई है। जबकि पिछले साल की समान अवधि में 55.07 लाख टन चावल की सरकारी खरीद हुई थी। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अनुसार चालू खरीफ विपणन सीजन 2012-13 में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर हरियाणा में चावल की खरीद में बढ़ोतरी हुई है लेकिन पंजाब में खरीद में कमी आई है। पहली अक्टूबर से शुरू हुई खरीद में हरियाणा से अभी तक 15.50 लाख टन चावल की खरीद हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 13.86 लाख टन की खरीद हुई थी। पंजाब से चालू खरीफ विपणन सीजन में 28.26 लाख टन चावल की ही खरीद एमएसपी पर हो पाई है जबकि पिछले साल इस समय तक 39.92 लाख टन चावल की खरीद हो चुकी थी। अन्य राज्यों चंडीगढ़, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में एमएसपी पर चावल की खरीद अभी शुरू ही हुई है। (Business Bhaskar)

बढ़ती मांग से 10 फीसदी चढ़ गए सोयाबीन के दाम

स्टॉकिस्ट व तेल मिल वालों ने निचले स्तर से सोयाबीन की खरीद तेज कर दी है, जिससे सोयाबीन के दाम चढऩे लगे हैं। आवक घटने से भी कीमतों में तेजी को बल मिला है। सप्ताह भर में सोयाबीन 10 फीसदी से ज्यादा महंगी हो चुकी हैं। सोपा के संयोजक राजेश अग्रवाल ने कहा कि बीते दिनों में सोयाबीन के दाम गिरकर 2,900-2,950 रुपये प्रति क्विंटल के निचले स्तर तक चले गए थे, जिससे आवक में कमी आई है। इसके बाद सोयाबीन 300 रुपये चढ़कर 3,200- 3,250 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच चुका है। कमोडिटीइनसाइटडॉटकॉम के वरिष्ठ जिंस विश्लेषक प्रशांत कपूर कहते हैं कि सोयाबीन के दाम अचानक गिरने और नवरात्रों की वजह से मंडियों में आवक 8 लाख की बजाय 5 से 6 लाख बोरी (100 किलोग्राम) हो रही है। इसके अलावा निचले स्तर पर खरीद भी बढ़ी है। इंडियाबुल्स कमोडिटी लिमिटेड के सहायक उपाध्यक्ष (शोध) बदरुद्दीन बताते हैं कि इस माह 20 तारीख तक मलयेशिया से पाम तेल का निर्यात 24 फीसदी बढ़ा है। (BS Hindi)

'सकारात्मक रहेगा कृषि का विकास'

योजना आयोग के सदस्य अभिजीत सेन ने कहा है कि खरीफ उत्पादन के अग्रिम अनुमान में एक साल पहले के मुकाबले बड़ी गिरावट के बावजूद इस साल कृषि क्षेत्र का विकास सकारात्मक रहेगा और इसमें 1-1.5 फीसदी की बढ़ोतरी की संभावना है। सेन ने सोमवार को कहा, मुझे उम्मीद है कि रबी और पशुधन क्षेत्र में इस साल सुधार आएगा। ऐसे में आखिर में यह सकारात्मक साबित होगा। हालांकि कृषि क्षेत्र में 3-3.5 फीसदी के सामान्य विकास की उम्मीद के मुकाबले आपूर्ति से जुड़े मुद्दे महंगाई के मोर्चे पर उस हद तक अपना प्रभाव छोड़ेंगे, जितना यह विकास के इच्छित स्तर से कम होगा। खरीफ सीजन के अग्रिम अनुमान से पता चलता है कि वास्तविक उत्पादन करीब 8 फीसदी घटेगा और पिछले खरीफ सीजन के अग्रिम अनुमान के मुकाबले (कीमत के लिहाज से) इसमें 4-5 फीसदी की कमी दर्ज होगी। उत्पादन में गिरावट मोटे तौर पर बारिश में सामान्य के मुकाबले 8 फीसदी की कमी के चलते दर्ज होगी जबकि पिछले साल की समान अवधि में सामान्य से 2 फीसदी ज्यादा बारिश हुई थी। सेन के मुताबिक, कुल कृषि उत्पादन में खरीफ फसलों की हिस्सेदारी एक चौथाई है, वहीं पशुधन क्षेत्र का योगदान 50 फीसदी है। उन्होंने कहा, मोटे अनाज और दलहन के उत्पादन में तीव्र गिरावट देखी गई है, इसके अलावा दूसरी फसलों के उत्पादन में भी सामान्य गिरावट दर्ज हुई है, लेकिन चावल के उत्पादन में ज्यादा गिरावट नहीं आई है। सेन ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार शीघ्रता से बाजार में और ज्यादा अनाज जारी नहीं करती है तो मोटे तौर पर पशुओं के चारे में इस्तेमाल किए जाने वाले मोटे अनाज की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। सेन ने कहा, वादे के मुताबिक खाद्यान्न जारी करने में देरी से इसका असर दूध व पशुधन उत्पादों पर पड़ सकता है, जो अब तक स्थिर रहा है। चावल व गेहूं की कीमतों में उछाल की कोई वजह नहीं है, लेकिन इसके निर्यात से कीमतों पर दबाव बढ़ा है। महंगाई के मसले पर उन्होंने कहा कि इसकी सामान्य दिशा 8 फीसदी के स्तर से नीचे है, लेकिन अगले कुछ महीनों में यह ऊंची रह सकती है क्योंकि हाल में तेल की कीमतों में हुए इजाफे का पूरा असर तब तक सामने आ जाएगा। सितंबर के दो हफ्ते में ही तेल की कीमतों में बढ़त का असर दिखा है और हर क्षेत्र में इसका असर अक्टूबर के बाद से नजर आने लगेगा। उन्होंने यह भी कहा कि परिवहन खर्च में इजाफे से कृषि जिंसों की कीमतों पर भी असर दिखेगा। (BS Hindi)

खाद्य सुरक्षा के लिए मोटे अनाजों का भी उत्पादन बढ़ाने के प्रयास

आर एस राणा नई दिल्ली प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक में अतिरिक्त खाद्यान्न की आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए सरकार ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है। खरीफ बुवाई सीजन 2013 में मोटे अनाजों जैसे बाजरा, मक्का, ज्वार और रागी की फसलों को भी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) के तहत शामिल किया जाएगा। अभी तक एनएफएसएम में चावल, गेहूं और दलहन की फसलें ही शामिल थीं। एनएफएसएम के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक में गेहूं, चावल और दलहनों के साथ ही मोटे अनाजों को भी शामिल किया गया है। प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत लाभार्थियों को गेहूं और चावल के साथ मोटे अनाजों में बाजरा का आवंटन भी किए जाने की योजना है। ऐसे में गेहूं, चावल के साथ ही मोटे अनाजों का भी उत्पादन बढ़ाना जरूरी है। इसी को ध्यान में रखते हुए कृषि मंत्रालय ने 12वीं पंचवर्षीय योजना में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन स्कीम में मोटे अनाजों मक्का, बाजरा, ज्वार और रागी को भी शामिल करने की योजना बनाई है। खरीफ 2013 में होने वाली मोटे अनाजों की बुवाई एनएफएसएम के तहत होगी। उन्होंने बताया कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत चावल, गेहूं और दलहनी फसलों के उत्पादन में बढ़ोतरी पर जोर दिया गया था। एनएफएसएम की योजनाओं के परिणामस्वरूप ही वर्ष 2011-12 में देश में चावल और गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन क्रमश: 10.43 और 9.39 करोड़ टन का हुआ था। दलहन का उत्पादन भी वर्ष 2010-11 में देश में रिकॉर्ड 182.4 लाख टन का हुआ था। मोटे अनाजों मक्का, ज्वार, बाजरा और रागी की घरेलू खपत लगातार बढ़ रही है। मक्का की घरेलू खपत तो बढ़ ही रही है, साथ ही निर्यात में भी बढ़ोतरी हो रही है। जून-जुलाई में मानसूनी वर्षा कम होने से चालू खरीफ में मोटे अनाजों की पैदावार में कमी आने की आशंका है। कृषि मंत्रालय के आरंभिक अनुमान के अनुसार वर्ष 2012-13 खरीफ सीजन में बाजरे का उत्पादन घटकर 66 लाख टन, ज्वार का उत्पादन 26.3 लाख टन और मक्का का 148.9 लाख टन ही होने का अनुमान है जबकि वर्ष 2011-12 खरीफ में बाजरा का उत्पादन 100.5 लाख टन, ज्वार का 32.4 लाख टन और मक्का का 162.2 लाख टन का हुआ था। (Business Bhaskar....R S Rana)

22 October 2012

कई वर्षो में भी चीनी डिकंट्रोल होना मुश्किल

चीनी उद्योग पर लगी पाबंदियां हटाने के लिए सरकारी पैनल ने सिफारिशें की है। लेकिन उद्योग की सभी पाबंदियां हटने में अभी कई वर्ष लग सकते हैं। बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच के रिसर्च एनालिस्ट संजय सतपति ने एक नोट में कहा है कि हम डिकंट्रोल प्रस्तावों को सकारात्मक कदम मानते हैं। लेकिन वास्तव में डिकंट्रोल होने में कई वर्षो का समय लग सकता है। चीनी उत्पादन में भारत के प्रमुख प्रतिस्पर्धी ब्राजील के मुकाबले कम उत्पादकता होने से दीर्घकाल में नुकसान होने का अंदेशा है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के प्रमुख सी. रंगराजन की अगुवाई वाली एक विशेषज्ञ समिति ने मिलों पर लेवी चीनी का दायित्व हटाने और नॉन लेवी चीनी बिक्री के लिए प्रशासनिक पाबंदियां हटानी चाहिए। नोट में कहा गया है कि अक्टूबर से शुरू हुए नए सीजन में चीनी उत्पादन को लेकर अनिश्चितता है क्योंकि इस साल मानसूनी बारिश कम हुई। इस वजह से रंगराजन समिति की सिफारिशें तुरंत लागू करना मुश्किल है। कमेटी की सिफारिशों से मिलों का मार्जिन बढ़ने और किसानों को गन्ने की आय घटने की संभावना है क्योंकि कमेटी ने मिलों की 70 फीसदी आय (एक्स-मिल मूल्य के मुकाबले 75 फीसदी) किसानों को गन्ने की कीमत के तौर पर देने का सुझाव दिया है। कमेटी ने राज्यों द्वारा तय होने वाला स्टेट एडवायजरी प्राइस (एसएपी) हटाने का सुझाव दिया है। पिछले दो वर्षो में गन्ने का एसएपी बढ़ाने से किसानों को 80 फीसदी तक आय मिली है। सतपति ने कहा कि किसान अपना हिस्सा घटाने के लिए राजी नहीं होंगे। इस समय उत्तर प्रदेश में चीनी का भाव 35 रुपये प्रति किलो चल रहा है। यह मूल्य पिछले साल के मुकाबले करीब 20 फीसदी ज्यादा है। लेकिन किसानों की आय में सिर्फ 4 फीसदी की बढ़ोतरी होगी। (Business bhaskar)

मांग की आंच से उबलने लगी दाल

खरीफ सीजन में दलहन के कम उत्पादन का असर अब कीमतों पर दिखाई देने लगा है। अक्टूबर में दालों की कीमतों में 15 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। देश में दालों की बढ़ती मांग की वजह से इस साल दलहन में तेज उछाल की आशंका अभी से जताई जाने लगी है। माना जा रहा है कि इस त्योहारी सीजन में कीमतें और 10 फीसदी तक बढ़ सकती है। खरीफ सीजन में रकबे में आई कमी और कमजोर उत्पादन का सबसे ज्यादा असर मूंग और चने पर पड़ा है। इस महीने की शुरुआत में चना 4225 रुपये प्रति क्ंिवटल बिक रहा था, जो बढ़कर 4940 रुपये प्रति क्ंिवटल हो गया है। मूंग की कीमतें तो पिछले 30 महीनों का रिकॉर्ड तोड़कर 5700 रुपये प्रति क्ंिवटल के पार पहुंच चुकी है। बाजार के जानकारों की मानी जाए तो चालू त्योहारी सीजन में मूंग जल्द ही 6000 रुपये प्रति क्ंिवटल और चना 5000 रुपये प्रति क्ंिवटल के पार पहुंच सकता है। इस महीने थोक बाजार में चना दाल की कीमतें करीब 16 फीसदी बढ़कर 7000 रुपये प्रति क्ंिवटल, मूंग दाल करीब 8 फीसदी बढ़कर 7600 रुपये प्रति क्ंिवटल, मसूर दाल 4 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 6800 रुपये प्रति क्विंटल हो गई। हालांकि अरहर दाल 7400 रुपये प्रति क्ंिवटल और उड़द 6800 रुपये प्रति क्ंिवटल पर चल रही हैं, जिनके दामों में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। दलहन की कीमतों आई तेजी पर ऐंजल ब्रोकिंग की वेदिका नार्वेकर का कहना है कि पिछले 15 दिनों में दलहन विशेषकर चने की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है, जिसमें मुनाफावसूली हो सकती है। लेकिन तेज त्योहारी मांग और खरीफ सीजन में कम उत्पादन के कारण बाजार में आपूर्ति कमजोर बनी रह सकती हैं, जिसके कारण कीमतों में बढ़ोतरी तय है। लेकिन ताजा खबरों के मुताबिक रबी सीजन में दलहन फसलों की अच्छी बुआई हो रही है, अगर खरीफ सीजन की भरपाई रबी सीजन में होती है तो कीमतों पर लगाम लग सकती है। दलहन मामलों के जानकार मेहुल अग्रवाल का कहना है कि पिछले साल की अपेक्षा इस बार दालों का महंगा होना तय है क्योंकि सरकार ने लगभग सभी दालों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा दिया है। इसके अलावा डीजल-पेट्रोल के दाम बढऩे के वजह से भाड़ा और फसलों की लागत भी बढ़ गई है। पिछले साल की अपेक्षा इस साल औसतन लागत 15 फीसदी बढ़ गई है, जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि इस साल दालों की कीमतों में औसतन 20-25 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। कृषि मंत्रालय से प्राप्त ताजा आंकड़ों के अनुसार खरीफ सीजन में 99.81 लाख हेक्यर क्षेत्र में दलहन की बुआई हुई थी जबकि पिछले साल इस समय तक दलहन फसलों का रकबा 108.28 लाख हेक्टेयर था। कृषि मंत्रालय के पहले अग्रिम अनुमान के अनुसार इस साल खरीफ सीजन में दलहन फसलों का कुल उत्पादन में 14.6 फीसदी कमी आने की आशंका है। अनुमान के मुताबिक खरीफ सीजन 2012 में 52.6 लाख टन दलहन की पैदावार होने का अनुमान है जबकि पिछले खरीफ सीजन में दलहन फसलों का उत्पादन 61.6 लाख टन हुआ था। वर्ष 2011-12 के चौथे और अंतिम अनुमान में सरकार ने वर्ष 2011-12 में दलहन का उत्पादन 172.10 लाख टन होने की बात कही थी जबकि 2010-11 में दलहन का उत्पादन 182.80 लाख टन हुआ था। अनुमान के मुताबिक 2011-12 में चना का उत्पादन 75.8 लाख टन, अरहर 26.5 लाख टन, उड़द 18.3 लाख टन और मूंग 17.1 लाख टन होने की बात कही गई थी। एसोचैम की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012-13 में देश में करीब 210 लाख टन दलहन की जरूरत होगी। जबकि दो साल पहले तक देश में दलहन की सालाना खपत करीब 180-190 लाख टन हुआ करती थी। एसोचैम के मुताबिक दालों की मांग में साल दर साल बढ़ोतरी होगी। वर्ष 2013-14 में दालों की मांग बढ़कर 214.2 लाख टन और 2014-15 में यह मांग 219.1 लाख टन तक पहुंच जाएगी। (BS Hindi)

महंगाई बिगाड़ेगी त्योहारी बजट

सरकारी आंकड़े महंगाई में कमी की बात चाहे कह रहे हैं, लेकिन दशहरा और दीवाली पर रसोई का बजट महंगाई से चौपट होना लगभग तय है। त्योहारों के लिए थोक बाजारों में खरीदारी शुरू हो गई है और कीमतों की बेल भी चढऩे लगी है। चीनी और मेवे से लेकर खोये और चने पर महंगाई सवार है, केवल खाद्य तेल राहत दिला रहे हैं, जिनके दाम दीवाली तक बढऩे की संभावना नहीं है। दीवाली पर आपकी जेब सबसे ज्यादा मिठाई काटेगी क्योंकि चीनी पिछले साल के मुकाबले 20 फीसदी महंगी है। चीनी विक्रेता कंपनी एसएनबी एंटरप्राइजेज के मालिक सुधीर भालोटिया ने बताया कि दिल्ली में त्योहारी मांग के कारण चार-पांच दिन में ही चीनी 100 रुपये चढ़कर 3,800 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच गई है। दीवाली तक इसमें 50 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी और आ सकती है। मेवे भी डॉलर की मजबूती से उछल रहे हैं। मेवा कारोबारी ऋषि कुमार मंगला ने बताया कि मेवों का आयात महंगा हो रहा है। इसलिए बादाम 40 रुपये महंगा होकर 470 से 550 रुपये और काजू भी इतना ही उछलकर 560 से 800 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रहा है। (BS Hindi)

यूरिया में उछाल की मांग पर जेना ने उठाया सवाल

उपभोक्ताओं की संवेदनशील प्रकृति (किसानों) के चलते देश में उर्वरक क्षेत्र की छवि नीतिगत अकर्मण्यता की है। हाल के वर्षों में उर्वरकों की कीमतों में काफी इजाफा हुआ है, जिसकी वजह से सरकार ज्यादा खपत वाले उर्वरक यूरिया को डी-रेग्युलेट करने के प्रति सतर्क है। बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में रसायन व उवर्रक राज्य मंत्री श्रीकांत जेना ने यूरिया की कीमतें बढ़ाने की उद्योग की मांग और इसके नजरिये पर सवाल उठाया और कहा कि यूरिया का डी-रेग्युलेशन एक विकल्प है और इसे तभी आजमाया जाएगा जब देश की सभी यूरिया इकाइयां गैस आधारित हो जाएंगी। हाल के हफ्तों में उर्वरक उद्योग ने सुधार में खुद के हिस्से की मांग की है और वह मांग है यूरिया की कीमतों में 40 फीसदी तक के इजाफे की। फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन और कोरोमंडल इंटरनैशनल लिमिटेड के चेयरमैन ए वेल्लयन ने हाल में यूरिया की कीमतें कम से कम 40 फीसदी बढ़ाने की मांग की है। जेना ने इस मांग पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि उद्योग को किस तरह फायदा होगा जब यूरिया की कीमतें बढ़ाई जाएंगी? उन्होंने कहा कि देश भर में यूरिया उद्योग की तरह दूसरा कोई उद्योग सुरक्षित नहीं है। उन्होंने कहा कि यह ऐसा उद्योग है जो उत्पादन लागत पर सीधे-सीधे 12 फीसदी मुनाफा हासिल करता है। उद्योग के अधिकारियों ने हालांकि कहा कि सरकार की तरफ से मिलने वाले वास्तविक मुनाफे का आकलन भारांकित औसत के आधार पर होता है।। जिसका मतलब यह हुआ कि अगर प्लांट की क्षमता कम है तो इसका मुनाफा भी घटेगा। लेकिन अगर किसी प्लांट की क्षमता अच्छी है तो इसका मुनाफा 12 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता। साथ ही फिक्स्ड कॉस्ट का आकलन साल 2002 की कीमतों के आधार पर होता है। जेना ने कहा, अगर मिट्टी की सेहत और संतुलित उर्वरक के इस्तेमाल का मामला उठाया जाएगा तो यह बेहतर साबित होगा। (BS Hindi)

19 October 2012

बांग्लादेशी जलमार्ग से त्रिपुरा पहुंचेगा अनाज

भारतीय खाद्य निगम अगले कुछ महीने में कोलकाता से अनाज का परिवहन उत्तर पूर्वी राज्य त्रिपुरा में करने के लिए भारत व बांग्लादेश की सीमा पर स्थित जलमार्ग का इस्तेमाल करेगा। इतिहास में पहली बार ऐसा होने वाला है। एफसीआई चेयरमैन अमर सिंह के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की नदियों के जरिए खाद्यान्न का परिवहन बांग्लादेश के आशुगंज नदी बंदरगाह तक किया जाएगा और फिर वहां से ट्रक के जरिए इसे त्रिपुरा भेजा जाएगा। सिंह ने कहा, त्रिपुरा को अनाज की किल्लत का सामना करना पड़ता है और राज्य की अवस्थिति को देखते हुए पश्चिम बंगाल से वहां अनाज पहुंचने में वक्त लग जाता है। ऐसे में सहजता से अनाज के परिवहन की खातिर हमने बांग्लादेश सरकार से आशुगंज नदी बंदरगाह का इस्तेमाल करने के लिए समझौता किया है। अनाज का परिवहन गंगा व पद्मा नदी के जरिए किया जाएगा और इसके लिए नौका का इस्तेमाल किया जाएगा। एक अधिकारी ने कहा, एक नौके में करीब 1000-1200 टन अनाज का परिवहन किया जा सकता है और दिलचस्प यह है कि पारंपरिक ट्रकों के मुकाबले इसमें कम समय लगता है। कुल मिलाकर एफसीआई ने खुले में रखे गेहूं का करीब 81 फीसदी सुरक्षित जगहों पर भेजने में कामयाबी हासिल की है, जो देश भर में अनाज के परिवहन के बड़े मामलों में से एक था। इस साल 1 जून से करीब 78 लाख टन अनाज (मुख्य रूप से गेहूं) असुरक्षित स्थानों पर रखा हुआ था और करीब 68 लाख टन अनाज सितंबर तक सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया है। सिंह ने कहा, एफसीआई रोजाना करीब 3.75 लाख टन गेहूं की ढुलाई करता है। आने वाले दिनों में बाकी स्टॉक भी सुरक्षित स्थानों पर भेज दिया जाएगा। जून में खरीदी गई गेहूं की अतिरिक्त मात्रा का बड़ा हिस्सा असुरक्षित स्थानों पर पड़ा हुआ था। एफसीआई अनाज के भंडारण, खरीद और वितरण करने वाली नोडल एजंसी है और इसकी योजना अगले कुछ सालों में मानवीय श्रम के जरिए होने वाले संचालन में 80 फीसदी की कमी लाने की है। इस साल एफसीआई और राज्य की एजेंसियों ने 381.4 लाख टन गेहूं की खरीद की है, जो 2011-12 के मुकाबले 35 फीसदी ज्यादा है। अधिकारियों ने कहा कि 1 अक्टूबर को एफसीआई के पास 710 लाख टन अनाज के भंडारण की जगह थी। (BS Hindi)

चीन की खरीद से बढ़ेगा सूती धागे का निर्यात

चीन की तरफ से कपास आयात में करीब 50 फीसदी की कटौती के ऐलान के बाद कपास सलाहकार बोर्ड ने हालांकि साल 2012-13 के लिए निर्यात अनुमान में कमी कर दी है, लेकिन चीन के बढ़ते ऑर्डर से भारत से सूती धागे का निर्यात बढ़ रहा है। चीन को सूती धागे के निर्यात में बढ़ोतरी का रुख जारी रहने की संभावना है क्योंकि चीन में उपलब्ध कपास की कीमत वैश्विक बाजार के मुकाबले करीब 20 सेंट प्रति पाउंड ज्यादा है और इसी वजह से वहां सूती धागे की उत्पादन लागत बढ़ गई है। इसके परिणामस्वरूप चीन में स्पिनिंग का काम धीमा पड़ गया है। चूंकि वहां उत्पादन लागत में इजाफे के साथ मजदूरी की लागत बढ़ रही है, लिहाजा मिलें वैल्यू ऐडेड उत्पादों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। वर्धमान ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक एस पी ओसवाल ने कहा, चीन न सिर्फ भारत से सूती धागे का आयात कर रहा है बलिल्क वह इंडोनेशिया व पाकिस्तान जैसे देशों से भी इसकी खरीद कर रहा है। हमें निश्चित तौर पर इसका फायदा मिल रहा है। भारतीय स्पिनर खुश हैं क्योंकि धागे के बढ़ते ऑर्डर के चलते वे अपनी क्षमता का इस्तेमाल करने की स्थिति में हैं। कपास सलाहकार बोर्ड ने इस वित्त वर्ष में 92 करोड़ किलोग्राम सूती धागे के निर्यात का लक्ष्य जाहिर किया है, वहीं डीजीएफटी के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष में देश से 82.76 करोड़ किलोग्राम धागे का निर्यात हुआ था। डीजीएफटी की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक, इस वित्त वर्ष में सितंबर तक भारत से 46.15 करोड़ किलोग्राम सूती धागे का निर्यात हुआ है। भारत से मुख्य तौर पर चीन, बांग्लादेश, कोरिया और हॉन्गकॉन्ग को सूती धागे का निर्यात होता है, जिसके करीब 30 फीसदी हिस्से का निर्यात चीन को हो चुका है। कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज (सिटी) के महासचिव डी के नायर ने कहा, चीन ने हालांकि भारत से सूती धागे का आयात बढ़ाया है, बावजूद इसके बांग्लादेश इस कपास वर्ष में भारतीय सूती धागे के निर्यात का सबसे बड़ा गंतव्य बना रहेगा। लेकिन अगर चीन स्पिनिंग के काम में कटौती जारी रखता है तो यह अनुपात कुछ अवधि में बदल सकता है। कपास सलाहकार बोर्ड के मुताबिक, इस कपास वर्ष में कपास का निर्यात 70 लाख गांठ रहने का अनुमान है जबकि पिछले साल 120 लाख गांठ कपास का निर्यात हुआ था। (BS Hindi)

नीलामी शुरू न होने से इलायची में भारी गिरावट

बिडिंग प्राइस के टिक साइज पर प्लांटर्स व कारोबारियों के बीच गतिरोध जारी उत्पादक क्षेत्रों में इलायची की तुड़ाई का पीक सीजन चल रहा है लेकिन प्लांटर्स और ट्रेडर्स के बीच बिडिंग भाव को लेकर चल रहा गतिरोध समाप्त नहीं होने से इसकी कीमतों में गिरावट बनी हुई है। वायदा बाजार में महीने भर में इसकी कीमतों में 15 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आ चुकी है। इलायची उत्पादक संघ के सचिव के. के. देवसिया ने बताया कि प्लांटर्स और ट्रेडर्स के बीच इलायची के बिडिंग भाव को लेकर 25 सितंबर से गतिरोध बना हुआ है। प्लांटर्स चाहते है कि बिडिंग भाव में बदलाव का टिक साइज 50 पैसे से बढ़ाकर 5 रुपये प्रति किलो किया जाना चाहिए। जबकि ट्रेडर्स इसमें केवल 50 पैसे की बढ़ोतरी करते एक रुपये प्रति किलो तय करना चाहते है। इसी गतिरोध के चलते 25 सितंबर से इलायची की नीलामी नहीं हो पा रही है। जबकि उत्पादक क्षेत्रों में दूसरी तुड़ाई शुरू होने से बोल्ड क्वालिटी के मालों की आवक बढ़ गई है। इसीलिए इलायची की कीमतों में लगातार गिरावट बनी हुई है। हालांकि उत्पादक क्षेत्रों में बारिश की कमी के कारण चालू सीजन में देश में इलायची की पैदावार में 15 से 18 फीसदी की कमी आने की आशंका है। सेमैक्स एजेंसी के मैनेजिंग डायरेक्टर एम. बी. रुबारल ने बताया कि भारतीय इलायची का दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में 12 से 20 डॉलर प्रति किलो है जबकि ग्वाटेमाला का भाव 11 से 17 डॉलर प्रति किलो है। ग्वाटेमाला के पास इलायची का बकाया स्टॉक नहीं के बराबर है जबकि नई फसल की आवक नवंबर में बनेगी। ऐसे में वर्तमान में भारतीय इलायची की निर्यात मांग तो अच्छी है लेकिन नीलामी नहीं होने से निर्यातक नए निर्यात सौदे नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने बताया कि चालू वित्त वर्ष के अप्रैल से सितंबर के दौरान अभी तक करीब 1,000 से 1,200 टन इलायची का निर्यात हो चुका है। भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार वित्त वर्ष 2012-13 में मसाला बोर्ड ने निर्यात का लक्ष्य 3,000 टन का रखा है। अग्रवाल स्पाइसेज के पार्टनर अरुण अग्रवाल ने बताया कि चालू सीजन में इलायची की पैदावार में तो कमी आने की आशंका है लेकिन उत्पादक क्षेत्रों में करीब 3,000 से 3,500 टन का बकाया स्टॉक बचा हुआ है। ऐसे में कुल उपलब्धता करीब 20,000 से 22,000 टन की ही बैठेगी। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर नवंबर महीने के वायदा अनुबंध में महीने भर में इलायची की कीमतों में 15.1 फीसदी की गिरावट आई है। 17 सितंबर को नवंबर महीने के वायदा अनुबंध में इलायची का भाव 1,060 रुपये प्रति किलो था जबकि बुधवार को भाव घटकर 899 रुपये प्रति किलो रह गया। (Business Bhaskar....R S Rana)

व्हाइट शुगर पर ड्यूटी बढ़ाने और रॉ पर हटाने का विचार

नई दिल्ली केंद्र सरकार व्हाइट शुगर पर आयात शुल्क बढ़ाकर दोगुना यानि 20 फीसदी कर सकती है और रॉ शुगर पर लगने वाला 10 फीसदी शुल्क हटा सकती है। केंद्रीय खाद्य मंत्री के. वी. थॉमस के अनुसार घरेलू चीनी मिलों को विदेश से आयातित व्हाइट शुगर (तैयार चीनी) से बचाने के लिए यह कदम उठाने पर विचार कर रही है। इस समय इन दोनों किस्मों की चीनी पर एक समान 10 फीसदी आयात शुल्क लगता है। व्हाइट शुगर पर ड्यूटी बढ़ाने के लिए उद्योग मांग कर रहा था। रॉ शुगर से आयात शुल्क हटाने से मिलों को रिफाइनिंग का काम मिल जाएगा। सस्ती व्हाइट शुगर आयात होने से घरेलू मिलों को इससे सीधे टक्कर मिल रही थी। थॉमस ने कहा कि इसके बारे में फैसला कैबिनेट द्वारा किया जाएगा। लेकिन इससे पहले कृषि और वाणिज्य मंत्रालय से परामर्श किया जाएगा। थॉमस ने संवाददाताओं को बताया कि अगले 10-15 दिनों के भीतर कैबिनेट इस प्रस्ताव पर विचार कर सकती है। इस साल मानसून कमजोर रहने से गन्ना और चीनी का उत्पादन घटने की संभावना से भारतीय मिलों ने पाकिस्तान से 5,000 टन चीनी आयात के सौदे किए थे। (Business Bhaskar)

मलेशिया भी भारतीय गेहूं आयात करने का इच्छुक

मलेशियाई मंत्री ने गेहूं की नियमित खरीद में रुचि दिखाई ईरान के बाद मलेशिया ने भी भारत से नियमित रूप से गेहूं आयात करने में दिलचस्पी दिखाई है। मलेशिया भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापारिक संबंध बढ़ाने के लिए सक्रिय है जबकि भारत में अनाज का रिकॉर्ड स्टॉक है। भारत ने पिछले साल सितंबर में गेहूं के निर्यात पर रोक हटा दी थी। पिछले तीन वर्षों से देश में गेहूं व चावल का बंपर उत्पादन होने के कारण अच्छा स्टॉक हो गया है। केंद्रीय खाद्य मंत्री के. वी. थॉमस ने मलेशिया के कृषि मंत्री दातुक सेरी नोह बिन उमर के साथ बातचीत के बाद संवाददाताओं को बताया कि जिस तरह ईरान ने भारत से नियमित रूप से गेहूं खरीद के लिए पहल की है, मलेशिया ने भी इसी तरह का दीर्घकालिक रिश्ते बनाने में दिलचस्पी दिखाई है। उन्होंने बताया कि अभी भारत से प्राइवेट स्तर पर व्यापारियों द्वारा छोटी मात्रा में मलेशिया को गेहूं का निर्यात किया जा रहा है। लेकिन अब वह राजनयिक माध्यम से बड़ी मात्रा में गेहूं नियमित रूप से आयात करने का इच्छुक है। थॉमस के अनुसार मलेशियाई सरकार द्वारा इस संबंध में औपचारिक प्रस्ताव भेजे जाने के बाद फैसला किया जाएगा। हमने उन्हें औपचारिक प्रस्ताव भेजने के लिए कहा है। इसके अलावा भारतीय गेहूं की क्वालिटी जांच के लिए तकनीकी टीम भेजने के लिए मलेशिया से कहा गया है। थॉमस के साथ मलेशियाई मंत्री की बैठक में पाम तेल के मसले पर भी बातचीत की गई। ईरान के साथ गेहूं निर्यात सौदे में प्रगति के बारे में पूछे जाने पर थॉमस ने बताया कि ईरान के स्तर पर मसले सुलझने बाकी हैं। उनका समाधान उसे ही करना है। देश में जरूरत से ज्यादा स्टॉक होने के कारण सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं निर्यात करने का प्रयास कर रही है। (Business Bhaskar)

17 October 2012

भू-अधिग्रहण विधेयक का रास्ता साफ

मसौदे का प्रावधान - पीपीपी और निजी परियोजनाओं के लिए भूमि का अधिग्रहण तभी होगा, जब जमीन गंवाने वाले दो-तिहाई लोग भर देंगे हामी पहले क्या था - मूल प्रस्ताव में यह प्रावधान था कि भूमि गंवाने वाले 80 फीसदी लोगों से सहमति मिलने के बाद ही भूमि अधिग्रहण हो एक और बाधा खत्म - पिछली तारीख से प्रभावी होने वाला कोई प्रावधान नहीं है अंतिम मसौदे में, भू-अधिग्रहण को कानूनन प्रभावी बनाने के लिए तय की जाएगी कट-ऑफ डेट विधेयक को संसद के शीतकालीन सत्र में पेश करने में कोई अड़चन नहीं लंबे समय से अटके पड़े विवादास्पद भूमि अधिग्रहण विधेयक का रास्ता अब जाकर साफ हुआ है। मंगलवार को तमाम मतभेद खत्म कर मंत्री समूह (जीओएम) ने इस विधेयक को हरी झंडी दिखा दी। इसके साथ ही भूमि अधिग्रहण विधेयक को पहले कैबिनेट और फिर संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किए जाने में अब कोई अड़चन नहीं रह गई है। सूत्रों के मुताबिक भूमि अधिग्रहण विधेयक के अंतिम मसौदे में यह प्रावधान है कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) वाली परियोजनाओं के साथ-साथ निजी परियोजनाओं के लिए भूमि का अधिग्रहण तभी हो पाएगा, जब जमीन गंवाने वाले दो-तिहाई लोग इसके लिए हामी भर देंगे। यहां पर जमीन गंवाने वाले लोगों से आशय उन व्यक्तियों से है जिनसे कोई भूमि खरीदी जानी है। सूत्रों ने बताया कि इस विधेयक के अंतिम मसौदे में पिछली तारीख से प्रभावी होने वाला कोई प्रावधान नहीं है। इसका मतलब यही है कि पहले हो चुके भूमि अधिग्रहण इस विधेयक के प्रावधानों से प्रभावित नहीं होंगे। सूत्रों के मुताबिक भूमि अधिग्रहण को कानूनन प्रभावी बनाने के लिए एक खास तारीख (कट-ऑफ डेट) तय की जाएगी जिसके बारे में बाद में निर्णय लिया जाएगा। उपर्युक्त मुद्दों पर जीओएम में तीखे मतभेद देखे जा रहे थे। अनेक मंत्री पिछली तारीख से भूमि अधिग्रहण विधेयक के प्रावधानों को लागू किए जाने के पक्ष में नहीं थे। इसके अलावा भूमि गंवाने वाले 80 फीसदी लोगों से सहमति मिलने के बाद ही किसी जमीन के अधिग्रहण का रास्ता साफ माने जाने के पक्ष में भी कई मंत्री नहीं थे। कृषि मंत्री एवं उपर्युक्त जीओएम के प्रमुख शरद पवार ने तकरीबन एक घंटे चली बैठक के बाद कहा, 'भूमि अधिग्रहण विधेयक के मसौदे को अंतिम रूप दे दिया गया है।' इस बैठक के दौरान 'उचित मुआवजा का अधिकार, पुनर्वास एवं भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता' विधेयक पर विचार-विमर्श किया गया। पवार ने यहां 14 सदस्यीय जीओएम की तीसरी बैठक के बाद संवाददाताओं को बताया, 'भूमि अधिग्रहण विधेयक से जुड़े उन सभी मुद्दों पर कुछ हद तक सहमति हो गई है जिन पर मंत्रियों की अलग-अलग राय थी।' (Business Bhaskar)

स्टार्च विनिर्माताओं ने घटाई उत्पादन क्षमता

मक्के की ऊंची कीमतों और स्टार्च व ग्लूकोज की घटती मांग के चलते होने वाले नुकसान को कम करने के लिए स्टार्च विनिर्माताओं ने अपनी उत्पादन क्षमता में कटौती की है और फिलहाल वे अपनी क्षमता का 70 फीसदी ही इस्तेमाल कर रहे हैं। मक्के की कीमतें उच्चस्तर से 15 फीसदी नरम होने से राहत मिली है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। मक्के की कीमतें मध्य जून में 11000 रुपये प्रति टन थीं, लेकिन बारिश में देरी के चलते अगस्त के आखिर तक इसमें 43 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। ऊंची कीमतों पर हालांकि मांग एक मसला बन गया और बारिश में भी सुधार आया, जिसके परिणामस्वरूप मक्के की कीमतें उच्चस्तर से करीब 16 फीसदी नीचे आ गईं। कीमतों में कमी से राहत तो मिली है, लेकिन खरीफ में मक्के के कम उत्पादन अनुमान से चिंता बढ़ी है। ऐसे में उच्चस्तर से मक्के की कीमतों में आई नरमी अस्थायी साबित हो सकती है। ऑल इंडिया स्टार्च मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विशाल मजीठिया ने कहा, उद्योग ने उत्पादन क्षमता में कटौती की है क्योंकि मांग कम है और ज्यादातर इकाइयां फिलहाल 70 फीसदी क्षमता पर संचालित हो रही हैं जबकि दीवाली से यह आमतौर पर 90 फीसदी क्षमता पर संचालित होती थीं। कपड़ा इकाइयों ने स्टार्च के ऑर्डर में कटौती की है। उद्योग के एक अन्य अधिकारी ने कहा, कुछ इकाइयों ने उत्पादन बंद कर दिया है क्योंकि मक्के की कीमतों (फिलहाल 13,500 रुपये) में इजाफे के बावजूद अंतिम उत्पादों स्टार्च व ग्लूकोज की कीमतें 22-23 रुपये प्रति किलोग्राम पर स्थिर हैं क्योंकि बाजार ऊंची कीमतें स्वीकार नहीं कर रहा है। साल की ज्यादातर अïवधि में मक्के की कीमतें 10,000-11,000 रुपये प्रति टन रही हैं। ज्यादातर कंपनियों ने मक्के की औसत कीमतें 11 रुपये प्रति किलो रहने के अनुमान के आधार पर दवा कंपनियों को ग्लूकोज की आपूर्ति 22 रुपये प्रति किलो पर करने का सालाना अनुबंध किया था। उद्योग का आकलन फिलहाल गलत साबित हुआ है क्योंकि कच्चे माल की कीमतें 15 रुपये के पार चली गईं, हालांकि फिलहाल यह 13-13.5 रुपये प्रति किलोग्राम है जबकि अंतिम उत्पाद की कीमतें स्थिर हैं। उद्योग के एक कंसल्टेंट ने कहा, मौजूदा साल में मक्के की कीमतों में उतारचढ़ाव को देखते हुए ज्यादातर स्टार्च कंपनियां ग्लूकोज की आपूर्ति के लिए सालाना अनुबंध करने की इच्छुक नहीं हैं। कृषि मंत्रालय ने इस साल खरीफ सीजन में 148.9 लाख टन मक्के के उत्पादन का अनुमान जताया है जबकि पिछले सीजन में 162.2 लाख टन मक्के का उत्पादन हुआ था। पिछले साल रबी सीजन में 50 लाख टन मक्के का उत्पादन हुआ था और अब तक निर्यात 35 लाख टन को पार कर चुका है। अमेरिकी अनाज परिषद के प्रतिनिधि (भारत) अमित सचदेव ने कहा, कई मंडियों में मक्के की कीमतें फिलहाल 12,000 रुपये प्रति टन हैं, जो करीब-करीब न्यूनतम समर्थन मूल्य के आसपास है। नया एमएसपी 1 अक्टूबर से प्रभावी है और यह मक्के के लिए 11,750 रुपये प्रति टन तय किया गया है। निजामाबाद मंडी में हालांकि कीमतें 13,750 रुपये प्रति टन हैं। रकबे में गिरावट और बारिश में देरी के अलावा कीमतों में बढ़ोतरी की एक वजह निर्यात के आकर्षक मौकों का उपलब्ध होना रहा और कई निर्यातकों ने मक्का निर्यात का अनुबंध 15,500 रुपये प्रति टन पर किया है। जब उन्होंने अनुबंध किया था तब अमेरिकी डॉलर 56 रुपये के आसपास था, जो अब घटकर 53 पर आ गया है और अब निर्यातकों का आकलन बदल रहा है। नाम न छापने की शर्त पर एक निर्यातक ने कहा, रुपये में बढ़त के चलते हम आयातकों से दरों पर फिर से बातचीत की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि निर्यात से मिलने वाली रकम घट रही है क्योंकि हमने ऊंची कीमतों पर बाजार से मक्का खरीदा था। (BS Hindi)

ईरान को नियमितखरीदार बनाने के लिए सस्ते गेहूं का ऑफर

भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने ईरान को दीर्घकालिक खरीदार बनाने के लिए 10 डॉलर प्रति टन सस्ता गेहूं देने पेशकश की है। इसके तहत ईरान को शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड (सीबॉट) के प्रचलित भाव से 10 डॉलर प्रति टन सस्ती दरों पर गेहूं की सप्लाई की जाएगी। दिसंबर में दो लाख टन और अगले तीन साल तक प्रति वर्ष दस लाख टन गेहूं निर्यात करने की योजना बनाई गई है। एफसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ईरान को सीबॉट के मुकाबले 10 डॉलर प्रति टन कम भाव पर गेहूं बेचने की पेशकश की है। इसके तहत जिस महीने में गेहूं निर्यात का सौदा होगा, उस महीने के सीबॉट के औसत भाव पर सप्लाई की जाएगी। इस समय ईरान को भारतीय गेहूं का निर्यात 315 डॉलर प्रति टन (एफओबी) के भाव पर होगा। सीबॉट में मंगलवार को गेहूं का दाम 325 डॉलर प्रति टन रहा। एफसीआई के अध्यक्ष एवं प्रबंधक निदेशक डॉ. अमर सिंह ने बताया कि ईरान को दिसंबर महीने में दो लाख टन और सालाना 10 लाख टन गेहूं अगले तीन साल तक निर्यात करने पर बातचीत चल रही है। यह गेहूं प्रमुख उत्पादक राज्यों पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश से निर्यात करने की योजना है। ईरान को गेहूं निर्यात की बातचीत सरकारी स्तर पर चल रही है। हाल में एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल ईरान गया था। गेहूं के बंपर उत्पादन को देखते हुए केंद्र सरकार ने सितंबर 2011 में प्राइवेट निर्यातकों को गेहूं निर्यात की अनुमति दी थी, जिसमें से करीब 25 लाख टन गेहूं का निर्यात हो भी चुका है। उन्होंने बताया कि मार्च 2012 में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने केंद्रीय पूल से सार्वजनिक कंपनियों एमएमटीसी, पीईसी और एसटीसी के माध्यम से 20 लाख टन गेहूं के निर्यात की अनुमति दी थी। इसमें से नवंबर 2012 तक 6.40 लाख टन गेहूं के निर्यात सौदे हो चुके हैं तथा 3 लाख टन की शिपमेंट भी हो चुका है। बाकी बचे हुए गेहूं का शिपमेंट भी अगले महीने तक होने की उम्मीद है। एफसीआई और राज्य सरकारों को मिलाकर कुल 714 लाख टन खाद्यान्न की कुल भंडारण क्षमता है जबकि केंद्रीय पूल में 665.26 लाख टन खाद्यान्न का स्टॉक मौजूद है जोकि तय मानकों बफर 212 लाख टन से ज्यादा है। अमर सिंह ने बताया कि 181.08 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता को मंजूरी दी जा चुकी है जो अगले दो साल में बनकर तैयार हो जाएगी। इसमें से 128.43 लाख टन के लिए निविदा को भी मंजूरी दी जा चुकी है। (Business Bhaskar....R S Rana)

दुग्ध उत्पादों के निर्यात में नरमी पर विचार

पशुपालन विभाग (कृषि मंत्रालय) दुग्ध उत्पादों के निर्यात में नरमी पर विचार कर रहा है। इस साल जून में विदेश व्यापार महानिदेशक ने स्किम्ड मिल्क पाउडर (एसएमपी) के मुक्त निर्यात नीति बनाने की पहल करने का फैसला लिया था। दूध पाउडर (डब्ल्यूएमपी) और डेयरी वाइटनर के मुक्त निर्यात के बाबत प्रस्ताव अभी विचाराधीन है। पिछले साल फरवरी में सरकार ने स्किम्ड मिल्क पाउडर, डब्ल्यूएमपी, डेयरी वाइटनर, इन्फेंट मिल्क समेत सभी दुग्ध उत्पादों के निर्यात पर पाबंदी लगाने का फैसला किया था। प्रतिबंधित दुग्ध उत्पादों में दूध व क्रीम कन्संट्रेट शामिल है। देश में इस वित्त वर्ष में दूध पाउडर की मांग 88,000 टन रहने का अनुमान है जबकि मौजूदा समय में कुल उपलब्धता 1.12 लाख टन है। दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक देश भारत में साल 2011 के दौरान कुल 12.10 करोड़ टन दूध उत्पादन का अनुमान है। नैशनल काउंसिल फॉर अप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, 1995-96 में 6.62 करोड़ टन दूध का उत्पादन होता था, जो 2010-11 में बढ़कर 12.18 करोड़ टन पर पहुंच गया। 2000-01 से 2010-11 के बीच दूध उत्पादन की औसत सालाना बढ़ोतरी दर 4 फीसदी है। योजना आयोग ने कहा है कि देश में दूध की सालाना जरूरत 2021-22 में करीब 18 करोड़ टन होगी। भारत में तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल गाय के दूध के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं जबकि उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पंजाब और गुजरात भैंस के दूध के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। दूध का थोक मूल्य सूचकांक 2004-05 से 2010-11 के बीच 76 फीसदी बढ़ा है, वहीं डेयरी उïत्पादों के थोक मूल्य सूचकांक में इस अवधि में 52 फीसदी की उछाल आई है। इस दशक में दूध व दुग्ध उत्पादों की प्रति व्यक्ति मासिक खपत ग्रामीण इलाकों में दोगुनी होने से ऐसा देखने को मिला है। भारत सरकार ने हाल में 17,000 करोड़ रुपये वाले राष्ट्रीय डेयरी योजना (एनडीपी) पेश की है ताकि साल 2021-22 में 20 करोड़ टन की मांग को पूरा करने के लिए देश में दूध का पर्याप्त उत्पादन हो। यह कार्यक्रम एक ऐसे वातावरण में संचालित होगा जहां चारे आदि की पर दबाव है और ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी की लागत बढ़ी है। भैंस को रोजाना चारा देने, साफ-सफाई करने और दूध निकालने में काफी मजदूर की दरकार होती है। (BS Hindi)

सभी पक्षों से सलाह करने के बाद शुरू होगा ग्वार वायदा

फॉरवर्ड मार्केट्स कमीशन (एफएमसी) ग्वार सीड और ग्वार गम का वायदा कारोबार शुरू करने के लिए सभी संबंधित पक्षों से विचार करेगा और इसके बारे में फैसला करेगा। यह जानकारी एफएमसी के चेयरमैन रमेश अभिषेक ने यहां संवाददाताओं को दी। अभिषेक ने हाल में गठित 40 सदस्यीय सलाहकार समिति की मंगलवार को हुई बैठक में भाग लेने के बाद यह जानकारी दी। उपभोक्ता मामलात, खाद्य व सार्वजनिक वितरण प्रणाली मंत्रालय ने इस कमेटी का गठन किया था। कमेटी का उद्देश्य सरकार और एफएमसी को विभिन्न मसलों पर सलाह देना है। उन्होंने बताया कि कमेटी की बैठक में ग्वार सीड व ग्वार गम के वायदा कारोबार पर रोक हटाने के बारे में विस्तार के चर्चा की गई। ज्यादातर कमेटी सदस्यों का मानना था कि ग्वार का वायदा कारोबार दुबारा शुरू किया जाना चाहिए। लेकिन किसानों के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक प्रावधान जरूर होने चाहिए। एफएमसी प्रमुख ने कहा कि वह कमेटी सदस्यों की राय से सहमत हैं। लेकिन उन्हें इसके बारे में कोई फैसला करने से पहले संबंधित पक्षों से भी बातचीत करनी होगी। एफएमसी ने पिछले साल जनवरी में ग्वार गम और ग्वार सीड के मूल्य में किसी भी गड़बड़ी का पता लगाने के लिए जांच शुरू की थी। अंधाधुंध मूल्य वृद्धि को देखते हुए इसके वायदा कारोबार को रोक दिया गया था। जबकि पिछले सीजन में ऊंचे भाव को देखते हुए इस सीजन में बड़ी संख्या में किसानों ने ग्वार की खेती की है। इस वजह से ग्वार सीड के भाव घटकर 5,000 रुपये प्रति क्विंटल से नीचे आ गए हैं। (Business Bhaskar)

16 October 2012

खाद्य तेल में नरमी के आसार

इस खरीफ सीजन में सोयाबीन के रिकॉर्ड उत्पादन और आगामी रबी सीजन में रैपसीड-सरसों के बंपर उत्पादन की संभावना के चलते खाद्य तेल की कीमतें इस तेल वर्ष (नवंबर 2012-अक्टूबर 2013) में 5 से 10 फीसदी तक घट सकती हैं। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन (सोपा) का अनुमान है कि इस सीजन में 126.8 लाख टन सोयाबीन का उत्पादन होगा जबकि पिछले साल 116.5 लाख टन सोयाबीन का उत्पादन हुआ था। इसी तरह विशेषज्ञों का मानना है कि देर से हुई बारिश के चलते मिट्टी में नमी की पर्याप्त मात्रा व अनुकूल मौसम आगामी रबी सीजन में रैपसीड-सरसों का बंपर उत्पादन हो सकता है। ये चीजें रबी की फसल के विकास में सहायक हैं। कीमतों में कटौती से भारतीय उपभोक्ताओं को काफी राहत मिलेगी, जो हर तरफ से महंगाई से जूझ रहे हैं। रोजाना के खानपान की लागत में खाद्य तेल की हिस्सेदारी करीब 10-15 फीसदी होती है। रुचि ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज ब्रांडेड उत्पादों की कीमतें 5-10 फीसदी घटाने पर विचार कर रहा है। अन्य कंपनियां भी रुचि ग्रुप की तरह फैसला ले सकती हैं। रुचि ग्रुप सोयम व रुचि स्टार के नाम से अग्रणी सोया ब्रांड का उत्पादन करता है। इंडोनेशिया व मलेशिया जैसे प्रमुख उत्पादक देश में कच्चे पाम तेल की घटती कीमतों के चलते भारतीय खाद्य तेल उत्पादक मौजूदा समय में बाजार में कमजोर अवधारणा का सामना कर रहे हैं। स्पष्ट तौर पर कीमतों पर चोट पहुंचाने वाला अन्य कारण है इंडोनेशिया में कच्चे पाम तेल का विशाल भंडार। इंडोनेशिया पाम तेल का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। इस संकेत से एनसीडीईएक्स पर रिफाइंड सोया का निकट माह वाला अनुबंध पिछले एक महीने में 14.25 फीसदी फिसला है और यह फिलहाल 665.15 रुपये प्रति 20 किलोग्राम पर है। एनसीडीईएक्स पर सोयाबीन वायदा भी पिछले एक महीने में 17.75 फीसदी फिसलकर 3169.50 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गया है। कृषि एक्सचेंज एनसीडीईएक्स पर सीपीओ की कीमतें भी पिछले एक महीने में 22.9 फीसदी घटकर 415.5 रुपये प्रति 10 किलोग्राम पर आ गई हैं। अदाणी विल्मर लिमिटेड के मुख्य कार्याधिकारी अतुल चतुर्वेदी ने कहा, भारतीय खाद्य तेल उद्योग अलग-थलग नहीं रह सकता क्योंकि यह वैश्विक बाजार पर करीब 60 फीसदी आश्रित है। ऐसे में वैश्विक खाद्य तेल बाजार की हलचल का असर भारत पर पड़ेगा। मौजूदा समय में वैश्विक बाजार में कच्चे पाम तेल की कीमतें नरम हैं। ऐसे में भारत में भी खाद्य तेल की कीमतें घट सकती हैं।एक ओर जहां स्टॉकिस्टों की कीमतें तत्काल प्रभावित होती हैं, लेकिन खुदरा स्तर पर इसका असर बाद में दिखता है। सीपीओ का आयात तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि भारतीय उपभोक्ता इसे आसानी से स्वीकार करते हैं, ऐसे में हर महीने 6 से 7 लाख टन का आयात हो रहा है। रिफाइनर भी इस सीजन में लंबे समय तक व्यस्त रह सकते हैं क्योंकि देर से बारिश के चलते कटाई में देरी हो रही है, साथ ही सोयाबीन की बंपर पैदावार के चलते भी। मौजूदा समय में स्टॉकिस्ट सोया तेल की बिक्री 620 रुपये प्रति 10 किलोग्राम पर कर रहे हैं, जो पिछले एक महीने में करीब 22.5 फीसदी फिसला है। खाद्य तेल की खुदरा कीमतों पर इसका असर एक महीने में प्रतिबिंबित होगा, लिहाजा अगले एक महीने में खुदरा कीमतें कम होंगी। सोया तेल की कीमतें और नीचे जा सकती हैं क्योंकि मध्य प्रदेश के प्रमुख उत्पादक इलाकों की हाजिर मंडियों में आवक तेज हो गई है। इस सीजन में पेराई भी अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुंचने की संभावना है और यह पिछले साल के 13 लाख टन के मुकाबले 15 लाख टन रह सकता है। (BS Hindi)

ग्वार वायदा से पाबंदी हटाएगा एफएमसी!

सदस्यों के बीच मतभेद के बावजूद वायदा बाजार आयोग मंगलवार को होने वाली सलाहकार समिति की बैठक में ग्वार वायदा से पाबंदी हटाने का फैसला ले सकता है। एक ओर जहां जिंस बाजार नियामक और जिंस एक्सचेंज व उद्योग ग्वार वायदा फिर से शुरू करने के हक में हैं, वहीं 40 सदस्यों वाली सलाहकार समिति का एक वर्ग एफएमसी के इस कदम के खिलाफ है। समझा जाता है कि एमएमसी ने यह मामला सदस्यों पर छोड़ दिया है। यह कदम महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्वार के भाव को देखते हुए किसानों ने इस खरीफ सीजन में ग्वार की ज्यादा बुआई की है क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि पिछले साल की तरह इस साल भी उन्हें अच्छी कीमतें मिलेंगी। पिछले साल सभी मौसमी फसलों में सबसे ज्यादा भाव ग्वार का ही था। पिछले साल ग्वार और ग्वार गम की कीमतें नए रिकॉर्ड पर पहुंची थी और क्रमश: 33,500 व 1,03,000 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गई थी। एफएमसी चेयरमैन रमेश अभिषेक की अगुआई वाली समिति में एपीडा चेयरमैन असित त्रिपाठी, मसाला बोर्ड के चेयरमैन डॉ. ए जयतिलक, नेफेड के एमडी राजीव गुप्ता, एमसीएक्स के उपाध्यक्ष जिग्नेश शाह, कोटक महिंद्रा ग्रुप के सीएमडी उदय कोटक शामिल हैं। एफएमसी और जिंस एक्सचेंज समेत कुछ सदस्यों ने कुछ हफ्ते पहले एफएमसी को कुछ सिफारिशें सौंपी थी। एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, अगर एक्सचेंज इसके पक्ष में मजबूती के साथ खड़े होते हैं तो एफएमसी ग्वार वायदा बहाली की अनुमति दे सकता है। इस बीच, जिंस एक्सचेंजों ने ग्वार वायदा को फिर से शुरू करने का मजबूती के साथ समर्थन किया है और कहा है कि यह राजस्व उगाही के मामले में बड़ी जिंसों में से एक है। ग्वार वायदा के निलंबन से पहले एनसीडीईएक्स के रोजाना कारोबार में इसका योगदान करीब 8 फीसदी था जबकि एस डेरिवेटिव ऐंड कमोडिटी एक्सचेंज के कारोबार में करीब 30 फीसदी। इस साल 9 अप्रैल को एफएमसी ने अगले आदेश तक नए अनुबंधों को टाल दिया था क्योंकि वायदा एक्सचेंजोंं पर कई कारोबारी इसकी कीमतों को हवा दे रहे थे, जिसके चलते ग्वार व ग्वार कम की कीमतें काफी ज्यादा बढ़ गई थी। इस साल मार्च में हालांकि एफएमसी ने कारोबारियों को ताजा पोजीशन लेने से मना कर दिया था। लेकिन ऐसे अनुबंध की बिक्री की अनुमति थी। समिति के एक सदस्य के मुताबिक, कई तरह के विवाद के बाद ग्वार व ग्वार गम का वायदा कारोबार निलंबित किया गया था और इन विवादों में कारोबारी सदस्यों की तरफ से कीमतों को हवा देना शामिल है। साथ ही जांच में एफएमसी विशेषज्ञ समिति ने कारोबारियों की तरफ से करीब 13,000 करोड़ रुपये के मुनाफे का पता लगाया था। अपनी जांच में एफएमसी ने पाया था कि राजस्थान के कारोबारी इसकी कीमतों को हवा दे रहे हैं और इस वजह से उसकी कारोबारी सदस्यता निलंबित कर दी गई थी। इससे पहले एफएमसी ने कहा था कि वायदा एक्सचेंज में अत्यधिक सटोरिया गतिविधियों के चलते ही इसकी कीमतें नहीं बढ़ी। कम उत्पादन और अमेरिकी तेल कंपनियों की तरफ से भारी भरकम आयात ऑर्डर के चलते ऐसा हुआ था। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल ग्वार का उत्पादन 20 फीसदी घटा है और यह 12 लाख टन रह गया जबकि एक साल पहले 15 लाख टन ग्वार का उत्पादन हुआ था। मंत्रालय ने इस खरीफ सीजन में रकबे में 20 फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान जताया है। अनुमान के मुताबिक, ग्वार का कुल रकबा इस सीजन में 35 लाख हेक्टेयर रहने की संभावना है जबकि पिछले सीजन में 29.1 लाख हेक्टेयर में ग्वार की बुआई हुई थी। ऑल इंडिया ग्वारगम मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पुरुषोत्तम इसारिया का अनुमान है कि पिछले साल के मुकाबले इस साल उत्पादन करीब 25 फीसदी बढ़ेगा। एक सदस्य ने कहा, ग्वार का उत्पादन इस साल बढऩे का अनुमान है और इसके चलते विरोध करने वाले सदस्यों को अपना नजरिया बदलना पड़ सकता है। लेकिन पिछले साल के विवाद को देखते हुए, जब एसोचैम ने कीमतों में कृत्रिम ïउछाल पर चिंता जताई थी, एफएमसी जोखिम उठाना नहीं चाहेगा। इस बीच, ग्वार व ग्वार गम की कीमतें मौजूदा समय में क्रमश: 7000 व 34,000 रुपये प्रति क्विंटल है। साथ ही मांग भी कम है। एपीडा के मुताबिक, ग्वार गम का निर्यात साल 2011-12 में बढ़कर 7.06 लाख टन पर पहुंच गया। इस साल निर्यात 5 लाख टन पर आ सकता है। सलाहकार समिति जिंसों में मार्केट मेकिंग को अनुमति देने, इलिक्विड जिंस आदि पर भी अंतिम फैसला ले सकता है। (BS Hindi)

लाल मिर्च की कीमतों में तेजी के संकेत

मध्य प्रदेश की उत्पादक मंडियों में लाल मिर्च की आवक शुरू होने के बावजूद इसकी कीमतों में फिलहाल तेजी जारी रहने की संभावना है। आंध्र प्रदेश में चालू सीजन में लाल मिर्च का रकबे 40 फीसदी तक कम रहने के संकेतों से कीमतों में तेजी जारी रह सकती है। कारोबारियों का कहना है कि त्योहारी सीजन में अन्य मसालों के साथ लाल मिर्च की मांग भी तेज रहने के संकेत हैं जिससे कीमतों पर अभी मध्य प्रदेश की मंडियों में लाल मिर्च की आवक का असर कम ही देखने को मिलेगा। कारोबारियों के मुताबिक मई-जून के दौरान लाल मिर्च के भाव 3,500- 4,000 रुपये के निचले स्तर पर आ गए थे। लेकिन पिछले दो माह से उत्पादन कम रहने की संभावना से कीमतों में सुधार दर्ज किया जा रहा है। हालांकि, मध्य प्रदेश की आवक शुरू होने के कारण पिछले दस-पंद्रह दिन में गुंटूर में लाल मिर्च की कीमतें कम 100-200 रुपये प्रति क्विंटल कम हुई हैं। कारोबारियों का कहना है कि त्योहारी सीजन में लाल मिर्च की बिक्री बढऩे से भी कीमतों में तेजी बरकरार रह सकती है। कीमतें फिर से 5,500 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर पहुंच सकती हैं। गुंटूर स्थित लाल मिर्च के थोक कारोबारी कमलेश जैन ने बताया कि अक्टूबर के अंत तक उत्पादन की सही स्थिति का पता चलेगा। हालांकि, रकबे में कमी को देखते हुए बाजार में तेजी का रुख जारी रहने के संकेत हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक चालू सीजन में आंध्र प्रदेश में अब तक लाल मिर्च की बुवाई 40 फीसदी कम क्षेत्र में की गई है। निर्यात मांग में तेजी के कारण भी कीमतों में उछाल दर्ज किया जा रहा है। भारतीय मसाला बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष 2012-13 के पहले महीने अप्रैल में ही लाल मिर्च के निर्यात में 131 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस दौरान 30,000 टन लाल मिर्च का निर्यात किया गया। जबकि अप्रैल 2011 में 12,963 टन लाल मिर्च का निर्यात किया गया था। दिल्ली के कारोबारी राजीव अग्रवाल ने बताया कि मांग में सुधार होने पर लाल मिर्च के भावों में तेजी जारी रहने की संभावना है। मध्य प्रदेश की आवक के कारण कीमतों पर दबाव देखने को मिल रहा था। लेकिन त्योहारी सीजन की बिक्री बढऩे आंध्र प्रदेश में उत्पादन घटने की संभावना से कीमतें फिर से सुधर सकती हैं। (Business Bhaskar)

नेचुरल रबर के आयात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी होने की संभावना

चालू वित्त वर्ष 2012-13 के दौरान नेचुरल रबर का आयात रिकॉर्ड स्तर पर 22.5 फीसदी बढऩे की संभावना है। घरेलू और विदेशी बाजारों में रबर के मूल्य में भारी अंतर होने के कारण टायर निर्माता कंपनियां जमकर आयात कर रही हैं। देश में नेचुरल रबर उत्पादन का पीक सीजन होने के बावजूद कंपनियां खूब आयात कर रही हैं। आमतौर पर दुनिया के चौथे सबसे बड़े उत्पादक देश भारत में अक्टूबर से मार्च के दौरान रबर का आयात कम हो जाता है। इस अवधि में मौसम अनुकूल होने के कारण रबर की टेपिंग अच्छी हो जाती है और उत्पादन सुधर जाता है। उद्योग के जानकारों के मुताबिक इस साल पहली छमाही में 23.5 फीसदी ज्यादा रबर का आयात होने के बावजूद टायर निर्माता आयात के नए सौदे कर रहे हैं क्योंकि घरेलू बाजार में रबर का भाव विदेश के मुकाबले ज्यादा है। टायर निर्माताओं का अनुमान है कि जल्दी ही रबर के दाम बढ़ सकते हैं। इंडियन रबर डीलर्स फेडरेशन के प्रेसीडेंट जॉर्ज वेली ने बताया कि टायर निर्माता ने पिछले सितंबर के दौरान आयात के लिए कई सौदे किए। सितंबर में रबर के दाम विदेश में करीब 45 रुपये प्रति किलो कम चल रहे थे। सोमवार को भारत के कोट्टायम ने सबसे ज्यादा बिकने वाली आरएसएस-4 रबर के दाम 18,500 रुपये (350 डॉलर) प्रति क्विंटल रहे। जबकि मलेशिया की एसएमआर-20 रबर के दाम 15,649 रुपये प्रति क्विंटल थे। भारतीय टायर निर्माता ज्यादातर इसी किस्म की रबर की खरीद करते हैं। भारत में मलेशिया, थाईलैंड और इंडोनेशिया से रबर की खरीद की जाती है। कोचीन रबर मर्चेंट्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष व कारोबारी एन. राधाकृष्णन ने कहा कि मूल्यों में अंतर काफी ज्यादा है। इस वजह से आयात शुल्क लगने के बाद भी विदेशी रबर सस्ती पड़ रही है। ऐसे में आगामी महीनों में भी टायर निर्माताओं की ओर से रबर का आयात जारी रहेगा। विदेश से खरीद करके वे अच्छी बचत कर रहे हैं। रबर के आयात पर 20 रुपये प्रति किलो या 20 फीसदी (जो भी कम हो) शुल्क लगता है। (Business Bhaskar)

15 October 2012

सरकार मुक्त चीनी निर्यात नीति जारी रखेगी : थॉमस

खाद्य मंत्री के वी थामस ने कहा है कि सरकार इस महीने से शुरू होने वाले चालू विपणन वर्ष 2012-13 में मुक्त चीनी निर्यात नीति जारी रखेगी। इस वक्त चीनी उत्पादन, घरेलू मांग से अधिक होने की उम्मीद दिख रही है। इन्हीं कयासों के बीच थॉमस ने यह बात कही। इस साल मई में केवल सितंबर तक चीनी निर्यात को ओपन जनरल लाइसेंस (ओजीएल) के तहत रखा गया था। कृषि मंत्री शरद पवार के साथ चीनी क्षेत्र को नियंत्रण मुक्त बनाने के संदर्भ में रंगराजन समिति की रिपोर्ट सहित चीनी क्षेत्र के विभिन्न मुद्दों पर विचार विमर्श करने के बाद थॉमस ने बताया, 'हमने ओपन जनरल लाइसेंस (ओजीएल) के तहत चीनी निर्यात की सीमा एक और वर्ष बढ़ाने का फैसला किया है।' उन्होंने कहा कि उनकी और कृषि मंत्री में सहमति बनी है कि सरकार 'कभी निर्यात करने और कभी नहीं करने' की व्यापार नीति को नहीं अपनाएगी। चीनी उत्पादन अनुमान के बारे में उन्होंने कहा कि कृषि मंत्रालय के अनुसार 2012-13 (अक्टूबर से नवंबर) के विपणन वर्ष में उत्पादन 2.3 से 2.35 करोड़ टन रहेगा जो इसके पिछले वर्ष में करीब 2.6 करोड़ टन था। देश में चीनी की वार्षिक घरेलू मांग 2.2 करोड़ टन है। भारत दुनिया में चीनी का विशालतम उत्पादक और सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। भारत ने पिछले विपणन वर्ष में करीब 35 लाख टन चीनी का निर्यात किया। (BS Hindi)