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30 December 2011

तेजी की धारणा अगले साल जारी रह सकती है ग्वार में

आर. एस. राणा दिल्ली

सीड और ग्वार गम के वायदा और हाजिर बाजार में भाव की फर्राटा रफ्तार और इसे थामने के लिए मार्जिन बढ़ाने का कदम भी तेजी की धारणा को शायद कमजोर नहीं कर पाएगा। अगले साल 2012 में भी इन कमोडिटीज की तेजी का दौर जारी रह सकता है। इस वजह से निवेशकों को तेजी की धारणा मानकर निवेश के बारे में फैसला करना चाहिए। हालांकि थोड़ा करेक्शन आने के बाद लिवाली करना निवेशकों के लिए अच्छी रणनीति साबित हो सकती है।

चालू वित्त वर्ष में ग्वार गम के निर्यात में 36.4' की बढ़ोतरी का अनुमान है। 2010-11 में ग्वार गम का निर्यात 4.03 लाख टन का हुआ था जबकि चालू वित्त वर्ष में 5.50 लाख टन होने का अनुमान है। चालू फसल सीजन में ग्वार का उत्पादन पिछले साल के लगभग बराबर 1.10 से 1.20 करोड़ बोरी रहने का अनुमान है। हालांकि वायदा में ग्वार सीड और ग्वार गम के दाम काफी बढ़ गए हैं और वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) ने इन दोनों कमोडिटी के अनुबंधों के वायदा कारोबार पर मार्जिन काफी बढ़ा दिया है। साथ ही फसल का आकलन भी एफएमसी कर रहा है। ऐसे में ऊंची कीमतों पर मुनाफावसूली से गिरावट आ सकती है लेकिन भविष्य तेजी का ही है।

टिकू राम गम एंड केमिकल प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर विपिन अग्रवाल ने बताया कि ग्वार गम पाउडर में अमेरिका, चीन और खाड़ी देशों की आयात मांग लगातार बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ग्वार गम पाउडर की कीमतों में महीने भर में 29.3' की तेजी आ चुकी है। 11 नवंबर को इसका भाव 4,800 से 5,800 डॉलर प्रति टन था जबकि इस समय 7,000 से 7,500 डॉलर प्रति टन की दर से सौदे हो रहे हैं। ग्वार गम स्प्लिट के भाव इस दौरान 3,200-3,300 डॉलर से बढ़कर 4,000-4,050 डॉलर प्रति टन हो गए। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार ग्वार गम पाउडर के निर्यात में भारी मांग बनी हुई है। क्रूड तेल की ड्रिलिंग में मांग ज्यादा मांग होने से ग्वार गम पाउडर का निर्यात लगातार बढ़ रहा है। मांग बढऩे के कारण ही अप्रैल से जून के दौरान निर्यात बढ़कर 145,258 टन का हो चुका है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 73,918 टन का निर्यात हुआ था। वित्त वर्ष 2010-11 में ग्वार गम का निर्यात 84 फीसदी बढ़कर कुल निर्यात 4.03 लाख टन रहा था। जबकि चालू वित्त वर्ष 2011-12 में ग्वार गम का निर्यात बढ़कर 5.50 लाख टन से ज्यादा होने का अनुमान है। हिंदुस्तान गम एंड केमिकल लिमिटेड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू फसल सीजन में ग्वार का उत्पादन पिछले साल के लगभग बराबर ही 1.10 से 1.20 करोड़ बोरी (एक क्विंटल) होने का अनुमान है। अक्टूबर से दिसंबर तक ग्वार की आवक का पीक सीजन होता है लेकिन कीमतों में तेजी के कारण इस दौरान आवक कम रही है। ग्वार का प्लांट डिलीवरी भाव बढ़कर 7,100 से 7,200 रु. और गम का भाव 23,400 से 23,500 रु. प्रति क्विंटल हो गया। 11 नवंबर को ग्वार का प्लांट डिलीवरी भाव 5,000 से 5,100 रुपये और गम का भाव 16,000 रुपये प्रति क्विंटल था।

एनसीडीईएक्स पर दिसंबर महीने के वायदा अनुबंध में जिन निवेशकों ने जून में निवेश किया था उन्हें ग्वार में 115' और ग्वार गम में 122' का रिटर्न मिला है। एनसीडीईएक्स पर दिसंबर महीने के वायदा अनुबंध में दस जून को ग्वार का भाव 3,342 रुपये प्रति क्विंटल था जबकि 27 दिसंबर को जनवरी अनुबंध में इसका भाव 7,029 रुपये क्विंटल हो गया। ग्वार गम का भाव इस दौरान 10,650 रुपये से बढ़कर 23,330 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। इनके वायदा अनुबंधों पर मार्जिन बढऩे के कारण कारोबारी सत्र के दौरान गिरावट आई लेकिन बाद में तेजी लौट आई। कर्वी कॉमट्रेड की एनालिस्ट शिखा मित्तल का कहना है कि अगले साल अगस्त तक नई फसल नहीं आएगी, जबकि अमेरिका समेत कई देशों से लगातार मांग बनी रहने की संभावना है। इस वजह से ग्वार गम और ग्वार सीड में तेजी का रुख बने रहने की संभावना है। ग्वार गम 25000 रुपये और ग्वार सीड 7500 रुपये प्रति क्विटंल तक जाने की संभावना है।(Business Bhaskar....R S Rana)

मेंथा तेल में शॉर्ट सेलिंग से निवेशकों को मिलेगा फायदा

भास्कर दिल्ली

निवेशकों को मेंथा तेल गिरावट का संकेत दे रहा है। इस कमोडिटी के तमाम फंडामेंटल कमजोर होने के कारण आने वाले समय में इसके मूल्य में नरमी का ही रुख दिखाई दे रहा है। तेजी की कोई संभावना न होने के कारण शॉर्ट सेलिंग के जरिये मेंथा में निवेश किया जा सकता है। हालांकि गिरावट का निश्चित स्तर मिलने के बाद अस्थाई रिकवरी से इंकार नहीं किया जा सकता है।

चालू फसल सीजन में मेंथा तेल का उत्पादन 25 फीसदी बढ़ा है। जबकि चालू वित्त वर्ष के पहले सात महीनों में निर्यात चार फीसदी कम हुआ है। निर्यातकों के साथ-साथ घरेलू मांग भी कमजोर बनी हुई है। ऐसे में नए साल में मेंथा तेल की कीमतों में करीब 10 फीसदी गिरावट आने की संभावना है इसलिए निवेशक बिकवाली करके मुनाफा कमा सकते हैं।

उत्तर प्रदेश मेंथा उद्योग एसोसिएशन के अध्यक्ष फूल प्रकाश ने बताया कि चालू सीजन में मेंथा तेल की पैदावार बढ़कर 34,000 से 35,000 टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 27,000 से 28,000 हजार टन का ही उत्पादन हुआ था।

उत्पादक मंडियों में मेंथा तेल की आवक 450 से 500 ड्रम (एक ड्रम-180 किलो) की हो रही है लेकिन इसके मुकाबले मांग कमजोर है। उत्तर प्रदेश की मंडियों में मेंथा तेल का भाव 1,470-1,475 रुपये प्रति किलो है। लेकिन कमजोर मांग से मौजूदा कीमतों में 125 से 150 रुपये प्रति किलो की गिरावट आने की संभावना है। एसेंशियल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष योगेश दुबे ने बताया कि यूरोप के आयातकों की मांग पहले की तुलना में कम हो गई है तथा जनवरी मध्य तक मांग कमजोर ही रहेगी।

निर्यातक नवंबर में 30 से 32 डॉलर प्रति किलो का भाव ऑफर कर रहे थे लेकिन मांग कम होने से निर्यातकों ने 28-29 डॉलर का भाव देना शुरू कर दिया है लेकिन घटे भाव में भी निर्यात मांग कमजोर है। दिल्ली में क्रिस्टल बोल्ड का भाव 1,550-1,600 रुपये प्रति किलो है। मौजूदा कीमतों पर पड़ते नहीं होने के कारण इसके दाम 150 रुपये प्रति किलो तक घट सकते हैं। भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार चालू वित्त वर्ष के पहले सात महीनों अप्रैल से अक्टूबर के दौरान मेंथा उत्पादों के निर्यात में चार फीसदी की कमी आई है। अप्रैल से अक्टूबर के दौरान 9,150 टन मेंथा उत्पादों का निर्यात हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 9,500 टन का निर्यात हुआ था। मसाला बोर्ड ने वित्त वर्ष 2011-12 के लिए निर्यात का लक्ष्य 17,750 टन का रखा है।

मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर जनवरी महीने के वायदा अनुबंध में मेंथा तेल की कीमतों में चालू महीने में तीन फीसदी की गिरावट आई है। पहली दिसंबर को जनवरी महीने के वायदा अनुबंध में मेंथा तेल का भाव 1,347 रुपये प्रति किलो था जबकि 28 दिसंबर को इसका भाव 1,307 रुपये प्रति किलो पर बंद हुआ।

ब्रोकिंग फर्म ऐंजल कमोडिटी के एग्री विश्लेषक बद्दरुदीन ने बताया कि निवेशक मेंथा तेल की मौजूदा कीमतों पर बिकवाली करके मुनाफा कमा सकते हैं।(Business Bhaskar....R S Rana)

चावल निर्यात का ज्यादा कोटा मंजूर होने के आसार

बिजनेस भास्कर दिल्ली

बासमती चावल के निर्यात के लिए और ज्यादा कोटा तय कर सकती है। सरकार ने इससे पहले 9 सितंबर को 20 लाख टन गैर बासमती चावल के निर्यात की अनुमति दी थी। इसमें से 19 दिसंबर तक 14.1 लाख टन की शिपमेंट हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैर बासमती चावल का भाव 385 से 450 डॉलर प्रति टन चल रहा है।

खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सरकार ने 9 सितंबर को 20 लाख टन गैर बासमती चावल के निर्यात की अनुमति दी थी जिसमें से 19 दिसंबर तक 14.1 लाख टन का निर्यात हो चुका है। उधर कारोबारियों के अनुसार निर्यातक अब तक करीब 18 लाख टन से ज्यादा चावल निर्यात के सौदे कर चुके हैं। अधिकारी ने बताया कि घरेलू बाजार में चावल के बंपर स्टॉक को देखते हुए सरकार चावल के और ज्यादा निर्यात की अनुमति देने पर विचार कर रही है।

इसका फैसला खाद्य मामलों पर प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह (ईजीओएम) की आगामी बैठक में हो सकता है। खुरानिया एग्रो के डायरेक्टर रामविलास खुरानिया ने बताया कि पंजाब, हरियाणा की मंडियों में पीआर-11 स्टीम चावल 2,400 रुपये, शरबती चावल 3,200 रुपये, सुगंधा चावल 3,100 रुपये तथा परमल सेला 2,050 से 2,100 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बिक रहा है। पंजाब, हरियाणा की मंडियों से कांडला बंदरगाह का किराया 160 से 165 रुपये प्रति क्विंटल है। ऐसे में परमल सेला में तो निर्यातकों की मांग बनी हुई है लेकिन पीआर-11, शरबती और सुगंधा चावल में मांग कमजोर है।

ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय सेतिया ने बताया कि इंडोनेशिया, मलेशिया, बांग्लादेश और खाड़ी देशों की आयात मांग अच्छी बनी हुई है। बंदरगाहों के नजदीक होने के कारण उत्तर भारत के राज्यों के मुकाबले दक्षिण भारत के राज्यों से ज्यादा निर्यात हो रहा है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय गैर बासमती चावल का भाव 385 से 450 डॉलर प्रति टन है। श्रीलाल महल लिमिटेड के वाइस प्रेसिडेंट डॉ. वी. के. भसीन ने बताया कि गैर बासमती में खाड़ी देशों की आयात मांग बराबर बनी हुई है तथा निर्यातक दक्षिण भारत के राज्यों से खरीद ज्यादा कर रहे हैं। केंद्रीय पूल में एक दिसंबर को 270.63 लाख टन चावल का बंपर स्टॉक बचा हुआ है जबकि चालू विपणन सीजन 2011-12 में 174.95 लाख टन चावल की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद हो चुकी है जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 9.34 फीसदी ज्यादा है।(Business Bhaskar.....R S Rana)

मूंगफली और ग्वार के बूते बंपर कृषि निर्यात

भास्कर दिल्ली

और ग्वार गम के निर्यात में हुई भारी बढ़ोतरी से चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले छह महीनों अप्रैल से सितंबर के के दौरान एग्री उत्पादों का निर्यात मूल्य के लिहाज से 59.3 फीसदी बढ़ा है। इस दौरान 27,946.53 करोड़ का निर्यात हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 17,534.21 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ था।

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में मूंगफली दाने का निर्यात मात्रा के हिसाब से 144 फीसदी और ग्वार गम का 67.6 फीसदी बढ़ा। उन्होंने बताया कि मूंगफली दाने की इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, थाईलैंड और यूक्रेन से मांग लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा ग्वार गम में भी अमेरिका, चीन, जर्मनी, रूस, इटली, नीदरलैंड तथा फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया की मांग लगातार मजबूत है।

उन्होंने बताया कि अप्रैल से सितंबर के दौरान 2,438.27 करोड़ रुपये के 350,465 टन मूंगफली दाने का निर्यात किया गया है। जबकि इसके पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 694.17 करोड़ रुपये के 143,763 टन मूंगफली दाने का निर्यात हुआ था। इसी तरह से ग्वार गम का निर्यात चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में बढ़कर 3,710.83 करोड़ रुपये का हो चुका है। मात्रा के हिसाब से निर्यात 2.85 लाख टन का हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 1.70 लाख टन का ही निर्यात हुआ था।

इसके अलावा बासमती चावल, फल एवं सब्जियों तथा मीट और इसके उत्पादों के निर्यात में भी चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में बढ़ोतरी हुई है। बासमती चावल का निर्यात अप्रैल से सितंबर के दौरान बढ़कर 7,379.83 करोड़ रुपये का, फल एवं सब्जियों का 111.40 करोड़ रुपये का और मीट तथा इसके उत्पादों का निर्यात बढ़कर इस दौरान 5,340.49 करोड़ रुपये का हुआ है।

उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने 20-20 लाख टन गैर-बासमती चावल और गेहूं के निर्यात की अनुमति दी हुई है। इससे आगामी महीनों में निर्यात में और भी बढ़ोतरी होगी। वित्त वर्ष 2010-11 में एपीडा के तहत पंजीकृत होने वाले एग्री उत्पादों का कुल निर्यात मूल्य के लिहाज से 40,242.92 करोड़ रुपये का हुआ था। (Business Bhaskar....R S Rana)

फीकी पड़ी चांदी की दमक

बिजनेस भास्कर दिल्ली

की चांदनी अब तेजी से कम होने लगी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम घटने और औद्योगिक मांग कमजोर होने से गुरुवार को दिल्ली सराफा बाजार में चांदी की कीमतों ने पिछले दस माह का निचला स्तर छुआ। इस वजह से चांदी के भाव 3100 रुपये लुढ़क कर 49,500 रुपये प्रति किलो रह गए। इसी तरह सोना भी 540 रुपये की भारी गिरावट दर्शाकर 27,340 रुपये प्रति दस ग्राम पर आ गया।

ब्रोकिंग फर्म एंजेल कमोडिटी के एसोसिएट डायरेक्टर (कमोडिटी एंड करेंसी) नवीन माथुर ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमती धातुओं में निवेशकों की मुनाफावसूली बनी हुई है, जबकि घरेलू बाजार में औद्योगिक और गहने निर्माताओं की ओर से इसकी मांग कमजोर पड़ी है। इसलिए चांदी में गिरावट को बल मिल रहा है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में नवंबर से अभी तक चांदी की कीमतों में 23.5 फीसदी की गिरावट आ चुकी है। गत 3 नवंबर को चांदी का भाव अंतरराष्ट्रीय बाजार में 35 डॉलर प्रति औंस था, जबकि गुरुवार को एक समय चांदी का भाव 2.26 फीसदी घटकर 26.43 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करते देखा गया। यह पिछले तकरीबन तीन महीनों में चांदी का न्यूनतम स्तर है। दिल्ली बुलियन वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष वी के गोयल ने बताया कि ब्याह-शादियों का सीजन समाप्त होने के कारण चांदी में ज्वैलर्स की मांग पहले की तुलना में कम हो गई है। चांदी का भाव घटकर दिल्ली सराफा बाजार में गुरुवार को 49,500 रुपये प्रति किलो रह गया जो गत 25 फरवरी के बाद से चांदी का निचला स्तर है। चांदी के सिक्कों की कीमतें भी गुरुवार को 3,000 रुपये टूटकर 5,400 से 5,500 रुपये प्रति 100 पीस रह गईं।

दिल्ली सराफा बाजार में गुरुवार को सोने का भाव भी 540 रुपये लुढ़क कर 27,340 रुपये प्रति दस ग्राम रह गया। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस दौरान सोने की कीमतों में तकरीबन 26 डॉलर प्रति औंस की गिरावट आकर भाव 1,530.60 डॉलर प्रति औंस रह गए। यह पिछले तकरीबन छह महीनों में सोने की कीमत का न्यूनतम स्तर है। बुधवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसका भाव 1,556 डॉलर प्रति औंस पर बंद हुआ था। इटली में बांडों की नीलामी के दौरान इन पर यील्ड के उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहने के कारण डॉलर के मुकाबले यूरो के काफी नीचे आ जाने से ही सोने की बिक्री भी तेज हो गई। यूरो गुरुवार को डॉलर के मुकाबले लुढ़क कर पिछले 15 महीनों के न्यूनतम स्तर पर आ गया।

को तीसरे दिन भी तेजी नसीब नहीं

के शेयर बाजार गुरुवार को लगातार तीसरे दिन तेजी के लिए तरसते रहे। रिलायंस इंडस्ट्रीज के साथ-साथ कई बैंकों के शेयरों में खासी गिरावट के चलते ही ऐसी नौबत आई। ऐसे में बॉम्बे शेयर बाजार का सेंसेक्स भी 183.92 अंक और टूटकर 15,543.93 अंक पर बंद हुआ। इसके साथ ही चालू वर्ष की समाप्ति के समय भी बाजार को सुकून नहीं मिल पा रहा है। बाजार जानकारों ने बताया कि बढ़ते डूबत कर्जों (एनपीए) को लेकर बढ़ी निवेशक चिंता के चलते एसबीआई, आईसीआईसीआई बैंक और एचडीएफसी बैंक समेत तमाम दिग्गज कर्जदाताओं के शेयर गुरुवार को गोता खा गए। रुपये के काफी कमजोर पड़ जाने और लोन के महंगे हो जाने से अगले महीने आने वाले कंपनी नतीजों के निराशाजनक रहने की आशंका के चलते भी बाजार में बिकवाली बढ़ गई। ऐसे में खाद्य महंगाई दर के काफी नीचे आ जाने का भी अनुकूल असर बाजार पर नहीं पड़ा। (Business Bhaskar...R S Rana)

10 महीने के निचले स्तर पर आ गई चांदी

मुंबई December 29, 2011




उद्योगों की तरफ से कमजोर खरीद के चलते मुंबई के जवेरी बाजार में चांदी 10 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गई। खुदरा निवेशकों को डर है कि अगर रुपया मजबूत हुआ तो चांदी की कीमतें नीचे आ सकती हैं, लिहाजा उन्होंने ताजा खरीद से परहेज किया।
गुरुवार को स्थानीय हाजिर बाजार में शुरुआती कारोबार के दौरान चांदी 49,000 रुपये प्रति किलोग्राम तक नीचे आ गई। कीमतों का यह स्तर इस साल 18 फरवरी के बाद नहीं देखा गया था। बाद में हालांकि चांदी में सुधार हुआ और यह 49,140 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर मार्च में डिलिवरी वाली चांदी 48,903 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई, जो एक दिन पहले के मुकाबले 3.42 फीसदी कम है। सत्र के दौरान चांदी 48,562 रुपये प्रति किलोग्राम के निचले स्तर पर चली गई थी। एमसीएक्स पर चांदी के अनुबंध में पिछले चार दिनों से ओपन इंटरेस्ट बढ़ रहा है। 24 दिसंबर को ओपन इंटरेस्ट 523320 लॉट का था, जो 28 दिसंबर को बढ़कर 594740 लॉट पर पहुंच गया। केडिया कमोडिटीज के अजय केडिया ने कहा - बढ़ते ओपन इंटरेस्ट से पता चलता है कि कीमतों में और गिरावट की उम्मीद में कारोबारी चांदी में शॉर्ट पोजिशन बना रहे हैं।
देसी बाजार में चांदी वैश्विक बाजार में आई गिरावट के अनुरूप ही गिरी, जो लंदन में शुरुआती कारोबार के दौरान एक साल के निचले स्तर पर आ गई थी। कारोबार के दौरान लंदन में चांदी 13 महीने के निचले स्तर को छू गई थी और 26.46 डॉलर प्रति आउंस तक लुढ़की थी, जो 17 नवंबर 2010 के बाद का निचला स्तर है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यूरो जोन के कर्ज संकट ने क्रेडिट को धीमा कर दिया और निवेशकों को डॉलर समेत सुरक्षित संपत्ति का रुख करने के लिए उत्साहित किया।
बॉम्बे बुलियन एसोसिएशन के निदेशक सुरेश हुंडिया ने कहा - हाजिर कारोबारी रुपये के हिसाब से चांदी में और गिरावट का अनुमान जता रहे हैं, लिहाजा वे खरीदारी से फिलहाल परहेज कर रहे हैं। पिछले एक साल के दौरान रुपये में आई भारी गिरावट के चलते वैश्विक बाजार में चांदी में आई नरमी का पूरा फायदा भारतीय रुपये पर पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं हुआ है। ऐसे में खुदरा खरीदार आरबीआई के कदमों का इंतजार कर रहे हैं, जो कीमतों को और नीचे ला सकते हैं।
नाकोडा बुलियन के प्रोप्राइटर ललित जगावत ने कहा - ग्राहक चांदी की कीमतें 44,000-45,000 रुपये प्रति किलोग्राम के दायरे में आने का इंतजार कर रहे हैं, जो तभी संभव है जब रुपया अपने मौजूदा स्तर से और आगे बढऩा शुरू करे। जब तक वैश्विक विनिर्माण क्षेत्र में सुधार नहीं आता, चांदी में और गिरावट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
इस साल डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 20 फीसदी लुढ़का है, जिसकी वजह से भारत रुपये में धातु की कीमतें ऊपर रहीं। यूरो जोन के कर्ज संकट के संभावित समाधान के तौर पर यूरो मेंं मजबूती की उम्मीद धुंधली हो गई है। दुनिया के सबसे बड़े धातु उपभोक्ता चीन में विनिर्माण गतिविधियां दिसंबर में और थमने का अनुमान है, जो बताता है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था साल 2011 की समाप्ति कमजोरी के साथ करेगी।
सिल्वर एंपोरियम के प्रबंध निदेशक राहुल मेहता के मुताबिक, शेयर बाजार व मुद्रा बाजार आदि में हुए नुकसान की भरपाई के लिए कारोबारी चांदी में मुनाफावसूली कर रहे हैं, जिसकी वजह से कीमती धातुओं की कीमतें नीचे आ रही हैं। डॉलर की मजबूती के चलते धातुओं पर दबाव बने रहने की संभावना है।
मौजूदा समय में सोने-चांदी के कारोबारी आयात लागत के मुकाबले 500-600 रुपये प्रति किलोग्राम के डिस्काउंट पर चांदी की बिकवाली कर रहे हैं, ताकि ग्राहकों को आकर्षित किया जा सके। इस बीच, सोने-चांदी की कीमतों के अनुपात से संकेत मिलता है कि चांदी कमजोर हुई है और तेज गिरावट से चांदी में और कमजोरी आ सकती है। केडिया कमोडिटीज के अजय केडिया ने कहा कि 1 दिसंबर को यह अनुपात 51.70 था, जो मौजूदा समय में 57.31 पर पहुंच गया है और इससे पहले हफ्ते की शुरुआत में यह 58.15 के उच्चस्तर पर पहुंच गया था। इससे संकेत मिलता है कि सोने के मुकाबले चांदी में कमजोरी रहेगी। जल्द ही यह अनुपात 60 पर पहुंच सकता है।
हाजिर सोने ने भी चांदी की तरह कदम बढ़ाया और इसमें 3 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई और यह 26,570 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ। एक दिन पहले यह 27,415 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था। (BS Hindi)

सोने के दाम अभी और गिरेंगे, चीन ने कसा शिकंजा

नई दिल्लीः सोने के पंखों को विराम लग गया है। उसकी तेजी पर अब ब्रेक लग गया है और ऐसा लग रहा है कि आने वाले समय में इसकी कीमतें और नीचे जाएंगी। सोने के दाम बढ़ाने में चीन का बड़ा हाथ था और इसे नीचे ले जाने में भी उसका ही हाथ होगा।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार के चिन्ह आते ही सोने के दाम जो सितंबर में ऐतिहासिक ऊंचाई पर चले गए थे, नीचे आने लगे हैं। अब सोने के दाम एक ऐसे स्तर पर आ गए हैं जो उसे खरीदारी के उपयुक्त बना रहे हैं। पिछले दिनों सोने के दाम बेतहाशा बढ़ने से असली खरीदार मैदान छोड़कर चले गए थे और सिर्फ सटोरिये कारोबार कर रहे थे। सोने की कीमतों को ऐतिहासिक स्तर पर पहुंचाने का श्रेय इंटरनेशनल सटोरियों का है जो कई देशों में ऑपरेट कर रहे हैं।

लेकिन समस्या असली ग्राहकों के भाग जाने से खड़ी हो गई। सोने के खरीदार कम होते जा रहे हैं क्योंकि सोने का गहने बनाने के अलावा कोई बड़ा इस्तेमाल नहीं है। सिर्फ निवेश के लिए सोना खरीदने के पीछे कोई औचित्य नहीं है। सोने का महत्व बढ़ तो गया लेकिन कोई सही उपयोग नहीं हो पा रहा है।

अब दुनिया के सबसे बड़े खरीदार चीन ने अपने यहां सोने की खरीद-बिक्री पर रोक लगाना शुरू कर दिया है। वहां की सरकार ने वहां गोल्ड एक्सचेंज बंद करने शुरू कर दिए हैं। चीन में गोल्ड एक्सचेंज कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं और लोगों को सोने में पैसे लगाने का आग्रह कर रहे हैं। वहां के रिजर्व बैंक ने एक नोटिस जारी करके कहा है कि पूरे देश में सिर्फ दो गोल्ड एक्सचेंज ही रहेंगे। शेष सभी को बंद किया जा रहा है। चीनी जनता इन दिनों सोने में खूब पैसा लगा रही है। लोग फ्यूचर ट्रेडिंग जुए की तरह कर रहे हैं। वहां की सरकार अब नहीं चाहती कि लोग सोने में ज्यादा पैसा लगाएं।

डॉलर के मजूबत होने से सोने के प्रति निवेशकों का मोह भंग होता जा रहा है और समझा जाता है कि सोना अभी कुछ दिनों तक और गिरेगा। (BS Hindi)

कृषि मंत्रालय को दाल उत्पादन में बढ़ोतरी की उम्मीद

मुंबई December 29, 2011




कृषि मंत्रालय को उम्मीद है कि साल 2011-12 में 220-230 लाख टन दालों का उत्पादन होगा जबकि साल 2010-11 में 18.09 लाख टन दालों का उत्पादन हुआ था। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, असमय हुई बारिश के चलते खरीफ सीजन में दलहन का 6-7 लाख हेक्टेयर रकबे में फसल खराब हुई है, लेकिन सरकार ने रबी सीजन में किसानों को दलहन की बुआई के प्रति उत्साहित करने के लिए 800 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रोत्साहन के बाद दलहन का कम से कम 4-5 लाख हेक्टेयर रकबा बहाल होने की उम्मीद है। 800 करोड़ रुपये का आवंटन दलहन व तिलहन के लिए जारी सामान्य योजनाओं के अतिरिक्त है। किसानों को भी दो नकदी फसलों के बीच इंटरक्रॉप के तौर पर दलहन उत्पादन की सलाह दी गई है।
कृषि मंत्रालय का अनुमान दालों के उत्पादन पर उद्योगों के अनुमान के उलट है, जिसमें कहा गया है कि दालों का उत्पादन 5-7 फीसदी घटकर 170 लाख टन पर आ जाएगा जबकि पहले 180.5 लाख टन दालों के उत्पादन का अनुमान था। इस फसल के बेहतर विपणन के लिए कृषि मंत्रालय ने राज्यों को सलाह दी है कि वह मिड डे मील बांटने वाले स्थानीय स्कूलों व आंगनवाड़ी को दालों की खरीद के लिए स्थानीय किसानों से गठजोड़ करने को कहे। आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि भविष्य में भी खाद्य गारंटी योजना के क्रियान्वयन में अनाज की खरीद के लिए राज्यों में सीधे तौर पर किसानों से गठजोड़ किया जाएगा।
अधिकारियों ने कहा कि एक ओर जहां किसान दलहन का उत्पादन कर रहे हैं, वहीं स्थानीय जरूरतों के लिए हम इसका आयात कर रहे हैं। इसे कम किए जाने की दरकार है। इसके अलावा इस तरह के गठजोड़ के जरिए किसानों को उनके उत्पाद की लाभकारी कीमत दिलाना सुनिश्चित करने की दरकार है। इसके अतिरिक्त सभी निजी बीज एजेंसियों और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को दलहन की हाइब्रिड किस्म विकसित करने की सलाह दी गई है। नए आवंटन में कृषि मंत्रालय ने दालों की सभी श्रृंखला यानी उत्पादन से लेकर विपणन तक को विकसित करने का प्रस्ताव रखा है।
एक ओर जहां तिलहन व दलहन की सभी योजनाएं जारी रहेंगी, वहीं 12वीं योजना के दौरान ऐसी योजनाओं के आवंटन में 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी की उम्मीद है। मांग के मुकाबले भारत दालों का शुद्ध आयातक है। खबरों के मुताबिक, मौजूदा वित्त वर्ष में दालों का आयात पिछले साल के 27 लाख टन के स्तर पर रहने की संभावना है। साल 2010-11 के फसल वर्ष (जुलाई-जून) में देश में रिकॉर्ड 180.9 लाख टन दालों का उत्पादन हुआ था जबकि एक साल पहले की समान अवधि में 146.6 लाख टन दालों का उत्पादन हुआ था। भारत हालांकि दुनिया का सबसे बड़ा दलहन उत्पादक है, लेकिन वह 180-190 लाख टन की सालाना जरूरत में से 30-40 लाख टन दालों का आयात कररता है। दालों की कीमतें हालांकि साल 2008-09 के उच्च स्तर के मुकाबले 30-50 फीसदी (विभिन्न किस्में) सस्ती हुई हैं। (BS Hindi)

केस्टर सीड की लिवाली से बचना चाहिए निवेशकों को

बिजनेस भास्कर नई दिल्ली

फंडामेंटल
नए फसल सीजन में पैदावार 25 फीसदी बढऩे की संभावना
उत्पादक मंडियों में पिछले सीजन का भी बकाया स्टॉक
अमेरिका व यूरोप से केस्टर तेल की मांग फिलहाल हल्की
मौजूदा कीमतों में 12-13 फीसदी की गिरावट आने के आसार
आने वाले दिनों में निवेशकों को केस्टर सीड में निवेश से पहले सतर्क रहना चाहिए। फंडामेंटल कमजोर होने के कारण केस्टर सीड वायदा में गिरावट की संभावना बनी हुई है। इस वजह से केस्टर सीड में लिवाली से बचना ही ठीक रहेगा। अच्छा-खासा करेक्शन होने के बाद ही लिवाली से फायदा मिलेगा। वैसे बिकवाली के जरिये सौदा करना फायदेमंद हो सकता है।

नए फसल सीजन में केस्टर सीड की पैदावार लगभग 25 फीसदी बढऩे की संभावना है। जबकि इस समय अमेरिका और यूरोपीय देशों की केस्टर तेल में आयात मांग पहले की तुलना में कम हो गई है। मध्य जनवरी में गुजरात और राजस्थान की उत्पादक मंडियों में नई फसल की आवक बढ़ जाएगी जिससे मौजूदा कीमतों में 12 से 13 फीसदी की गिरावट आ सकती है।
सॉल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार चालू सीजन में केस्टर सीड की बुवाई बढ़कर 11.73 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल 7.64 लाख हैक्टेयर में ही हुई थी। उत्पादक राज्यों में मौसम भी फसल के अनुकूल बना हुआ है इसीलिए केस्टर सीड की पैदावार में पिछले साल की तुलना में करीब 25 फीसदी की बढ़ोतरी होने का अनुमान है। वर्ष 2010-11 में केस्टर सीड की पैदावार 11.90 लाख टन की हुई थी।

जयंत एग्रो ऑरनामिक लिमिटेड के कार्यकारी निदेशक वामन भाई ने बताया कि 15 जनवरी के बाद गुजरात और राजस्थान की मंडियों में नई फसल की आवक शुरू हो जाएगी। पैदावार में बढ़ोतरी को देखते हुए अमेरिका और यूरोप के आयातकों की मांग कम हो गई है। इस समय केवल चीन की खरीद ही आ रही है। चीन के आयातक 1,500 डॉलर प्रति टन (एफओबी) के आधार पर सौदे कर रहे हैं।

चालू साल के पहले 10 महीनों में 3.35 लाख टन केस्टर तेल का निर्यात हुआ है। जबकि पिछले साल की समान अवधि में 3.75 लाख टन का निर्यात हुआ था। चालू साल के जुलाई-अगस्त में केस्टर तेल का भाव बढ़कर 2,350 से 2,450 डॉलर प्रति टन (एफओबी ) हो गया था।

नेमस्त ट्रेड प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर प्रकाश भाई ने बताया कि चालू सीजन में पैदावार तो बढ़ेगी ही, साथ में उत्पादक मंडियों में केस्टर सीड का बकाया स्टॉक भी करीब एक लाख बोरी का बचा हुआ है। ऐसे में कुल उपलब्धता पिछले से ज्यादा होगी जबकि चालू साल में कुल निर्यात पिछले साल की तुलना में कम रहेगा।

इस समय आंध्र प्रदेश की मंडियों में केस्टर सीड की दैनिक आवक आठ से दस हजार बोरियों (एक बोरी-75 किलो) की हो रही है। आंध्र प्रदेश की मंडियों में केस्टर सीड का भाव 3,500 से 3,700 रुपये और गुजरात की मंडियों में 3,900 से 4,000 रुपये प्रति क्विंटल चल रहा है। जनवरी के आखिर तक इसकी कीमतों में करीब 500 से 600 रुपये क्विंटल की गिरावट आ सकती है। केस्टर तेल का भाव घटकर 900-905 रुपये प्रति दस किलो रह गया।

नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज लिमिटेड (एनसीडीईएक्स) पर निवेशकों की मुनाफावसूली से पिछले महीनेभर में केस्टर सीड की कीमतों में 2.8 फीसदी की गिरावट आई है। जनवरी महीने के वायदा अनुबंध में एक दिसंबर को केस्टर सीड का भाव 4,069 रुपये प्रति क्विंटल था जबकि गुरुवार को भाव घटकर 3,951 रुपये प्रति क्विंटल रह गया।

कासा कमोडिटी के एग्री विश्लेषक मुन्ना महतो ने बताया कि मौजूदा कीमतों में बिकवाली करके निवेशक मुनाफा कमा सकते हैं। मौजूदा कीमतों में महीनेभर में 10 से 12 फीसदी की गिरावट आने की संभावना है। (Business Bhaskar/ R S Rana)

अगले साल भी कायम रहेगी ग्वार की बादशाहत

मुंबई December 29, 2011




इस साल आर्थिक मंदी के कारण लगभग हर क्षेत्र में निवेशकों पर मार पड़ी है। लेकिन ग्वार गम और ग्वार सीड में निवेश करने वाले कारोबारी मालामाल हुए हैं। इस साल ग्वार सीड और ग्वार गम में निवेश करने वालों को क्रमश : 192 फीसदी और 265 फीसदी रिटर्न प्राप्त हुआ है। एनसीडीईएक्स के कुल कारोबार में एक-तिहाई से भी ज्यादा हिस्सा सिर्फ अकेली इस जिंस का रहा है। बाजार जानकार इस प्रवृत्ति को वायदा बाजार के लिए सही नहीं मान रहे हैं और यही वजह है कि इसके कारोबार पर सख्ती हो रही है। इसके बावजूद ग्वार की कीमतें रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। बढ़ती मांग और निवेशकों के रुझान को देखते हुए आने वाले साल में भी ग्वार मुनाफे का बादशाहत बनी रह सकती है।
ग्वार की फर्राटा भरती कीमतों को मार्जिन की लगाम भी नहीं रोक पा रही है। चालू महीने में एनसीडीईएक्स द्वारा तीन बार विशेष मार्जिन बढ़ाए जाने के बावजूद इसकी कीमतों में तेजी बनी हुई है। इस समय ग्वार सीड और ग्वार गम के सौदों पर कुल 40 फीसदी मार्जिन है, जिसमें 10 फीसदी विनिमय मार्जिन और 30 फीसदी विशेष मार्जिन है। पिछले एक महीने में ही ग्वार सीड और ग्वारगम की कीमतें क्रमश: 43 फीसदी और 50 फीसदी बढ़ चुकी हैं। सालभर के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो फायदे की रफ्तार और भी चौंकाने वाली है। साल की शुरुआत में ग्वार सीड में निवेश करने वाले ग्राहकों को 192 फीसदी और ग्वार गम के निवेशकों को 265 फीसदी का मुनाफा हुआ है। इस समय वायदा और हाजिर बाजार में ग्वार गम की कीमतें 25 हजार रुपये प्रति क्ंिवटल को पार कर गई हैं जबकि ग्वार सीड के दाम 7,600 रुपये प्रति क्ंिवटल के पार पहुंच चुके हैं।
ग्वार में निवेशकों के फिदा होने का आलम यह है कि कृषि जिंसों के प्रमुख जिंस एक्सचेंज एनसीडीईएक्स के साल भर के कुल कारोबार में एक-चौथाई हिस्सा सिर्फ ग्वार का है। एनसीडीईएक्स में इस साल 28 दिसंबर तक कुल 17,94,261.65 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ है, जिसमें 4,48,304.70 करोड़ रुपये का ग्वार वायदे का कारोबार हुआ है। इसमें ग्वार सीड का कुल कारोबार 3,48,043.37 करोड़ रुपये और ग्वार गम का 1,00,261.33 करोड़ रुपये का कारोबार था। दिसंबर महीने में ग्वार कारोबार की कुल कारोबार में हिस्सेदारी 40 फीसदी तक पहुंचने वाली है। ग्वार गम और ग्वार सीड का कुल कारोबार सालभर में करीब 155 फीसदी बढ़ा है।
ग्वार पर सख्त होती एफएमसी की नजर को देखते हुए सवाल खड़े होने लगे हैं कि वर्ष 2012 में भी ग्वार मुनाफे की डगर पर सरपट दौड़ेगा या नहीं। इस पर ऐंजल ब्रोकिंग की वेदिका नार्वेकर कहती हैं कि हालांकि वायदा ग्वार गम और ग्वार सीड की कीमतें काफी बढ़ चुकी हैं और इन दोनों के वायदा कारोबार में मार्जिन काफी ज्यादा बढ़ा दी गई है। साथ ही कारोबारियों की जांच भी की जा रही है इसके अलावा ट्रेड टू ट्रेड प्रक्रिया के तहत कारोबार कराने की बात भी की जा रही है यानी वायदा नहीं बल्कि हाजिर बाजार की तर्ज पर कारोबार हो। इन बातों की वजह से बाजार में गिरावट आ सकती है लेकिन विदेशी मांग तेज होने और ग्वार को कोई दूसरा विकल्प न होने की वजह से आने वाले साल में भी ग्वार मुनाफे वाली जिंसों में अव्वल बना रहेगा। (BS Hindi)

23 December 2011

एफसीआई की नकद ऋण सीमा 6,600 करोड़ रुपये बढ़ी

बिजनेस भास्कर नई दिल्ली

एफसीआई को धान की सरकारी खरीद करने और भुगतान करने में आसानी होगीराहत34,495 करोड़ रुपये से बढ़कर 41,095 करोड़ रुपये हुई ऋण सीमानिगम को किसानों को भुगतान करने में होगी सहूलियतसरकार ने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की नकद ऋण सीमा में 6,600 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी कर दी है। इससे एफसीआई की नकद ऋण सीमा 34,495 करोड़ रुपये से बढ़कर 41,095 करोड़ रुपये हो गई है। नकद ऋण सीमा में बढ़ोतरी से निगम को ज्यादा खाद्यान्नों की खरीद में आसानी होगी। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सरकार ने एफसीआई की नकद ऋण सीमा को 34,495 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 41,095 करोड़ रुपये कर दिया है, इससे निगम को खाद्यान्न की ज्यादा खरीद के लिए किसानों को समय पर भुगतान करने में सहूलियत होगी।
निगम को गेहूं और चावल की खरीद में हुई बढ़ोतरी तथा पिछले विपणन सीजन में गेहूं किसानों को बोनस देने के कारण ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ी थी। बजट 2011-12 में खाद्य सब्सिडी 60,570 करोड़ रुपये की रखी गई है लेकिन इसमें भारी बढ़ोतरी होने का अनुमान है। विपणन सीजन वर्ष 2011-12 में एफसीआई ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 2.5 फीसदी ज्यादा गेहूं की खरीद की थी। इस दौरान कुल खरीद 281.44 लाख टन की हुई है जबकि विपणन सीजन 2010-11 में 224.61 लाख टन गेहूं खरीदा गया था।
विपणन सीजन 2010-11 में एफसीआई ने चावल खरीद 6.46 फीसदी ज्यादा की थी। इस दौरान 341.98 लाख टन चावल खरीदा गया था जबकि विपणन सीजन 2009-10 में 321.23 लाख टन चावल खरीदा था। चालू विपणन सीजन 2011-12 में 15 दिसंबर तक चावल की सरकारी खरीद में 8.19 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल खरीद 1.33 लाख टन की हो चुकी है। उन्होंने बताया कि विपणन सीजन 2011-12 के लिए सरकार ने गेहूं का एमएसपी 1,120 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था तथा किसानों को 50 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस भी दिया था।
विपणन सीजन 2011-12 के लिए धान के एमएसपी में सरकार ने 80 रुपये की बढ़ोतरी कर कॉमन ग्रेड धान का भाव 1,080 रुपये और ग्रेड-ए धान के लिए 1,110 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। जबकि गेहूं के आगामी विपणन सीजन 2012-13 के लिए सरकार ने एमएसपी में 165 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 1,285 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। केंद्रीय पूल में एक दिसंबर को 547.19 लाख टन खाद्यान्न का स्टॉक मौजूद है इसमें 276.56 लाख टन गेहूं और 270.63 लाख टन चावल है। (Business Bhaskar.....R S Rana)

टायर निर्माताओं पर बढ़ा मार्जिन का दबाव

मुंबई December 22, 2011
प्राकृतिक रबर की कीमतों में 15 फीसदी गिरावट के बावजूद टायर निर्माताओं को ऊर्जा जैसी दूसरी लागत की ऊंची कीमतों के कारण परिचालन मार्जिन में कमी की चिंता सता रही है। अपोलो टायर्स के भारतीय कारोबार के प्रमुख सतीश शर्मा ने कहा, 'चाहे प्राकृतिक रबर की कीमतों में 15 फीसदी गिरावट आई हो, लेकिन अन्य कच्चे माल और साधन की लागत देखिए, जो लगातार बढ़ रही है। कन्वर्जन लागत में 60 फीसदी हिस्सा रखने वाली ऊर्जा लागत 50 से 60 फीसदी बढ़ चुकी है। हम शुद्ध आयातक हैं और रुपये के अवमूल्यन में भारी गिरावट से आयात लागत पर असर पड़ा है। मार्जिन 16 फीसदी से घटकर 7 फीसदी पर आ गया है। मांग बहुत कम है।'उन्होंने कहा, 'अंतरराष्ट्रीय बाजार में टायर कंपनियों ने एक बार में ही कीमतें 8 से 10 फीसदी बढ़ाई हैं, लेकिन भारत में ऐसा करना संभव नहीं है। यहां हम कीमत नहीं बढ़ा पा रहे हैं।' इस साल अप्रैल में 240 रुपये प्रति किलोग्राम की ऊंचाई छूने के बाद टायर निर्माण में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख कच्चे माल (प्राकृतिक रबर) की कीमतें घटकर हाजिर बाजार में 200 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर आ गई हैं। बेंचमार्क मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एनएमसीई) पर जनवरी 2012 में डिलिवरी वाले प्राकृतिक रबर की कीमत 0.5 फीसदी गिरकर 203.25 रुपये प्रति किलोग्रााम पर आ गई है। इसी तरह सबसे ज्यादा कारोबार होने वाले आरएसएस-4 रबर की कीमत मंगलवार को केरल के कोट्टायम बाजार में 50 पैसे बढ़कर 200.50 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई। हालांकि इस जिंस की कीमत बैंकॉक (थाईलैंड) में 4.61 रुपये गिरकर 177.18 रुपये प्रति किलोग्राम रही। विश्लेषकों का मानना है कि सर्दी के सीजन में कमजोर मांग के कारण कीमतें और गिर सकती हैं। ऑल इंडिया टायर डीलर्स फेडरेशन के संयोजक एस पी सिंह ने कहा, 'टायरों की मांग सर्दी के सीजन में घटती है और इसलिए कीमतों में गिरावट असामान्य बात नहीं है। लेकिन टायर कंपनियों को कच्चे माल की कम कीमत का फायदा ग्राहकों को देना चाहिए।'सार्वजनिक क्षेत्र के रबर बोर्ड द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार देश का रबर आयात नवंबर में 4.6 फीसदी बढ़कर 15,069 टन रहा। विदेशी बाजारों में इसकी कीमतों में तेज गिरावट से टायर निर्माताओं के लिए रबर आयात आकर्षक बना रहेगा। वहीं, संदर्भित महीने में प्राकृतिक रबर का उत्पादन 4.3 फीसदी बढ़कर 94,400 टन रहा। इस दौरान कुल खपत 82,000 टन रही जो पिछले साल के समान महीने में 78,010 टन था। सिएट के प्रबंध निदेशक पारस चौधरी ने कहा, '240 रुपये प्रति किलोग्राम के सर्वोच्च स्तर से कीमतें 15 फीसदी गिर चुकी हैं। अगर रुपये का अवमूल्यन नहीं हुआ होता तो यह गिरावट ज्यादा होती। रबर की कीमतें अब भी मजबूत बनी हुई हैं। यह देखना चाहिए कि वर्तमान कीमतें पिछले तीन साल के निम्नतम स्तर 78 रुपये प्रति किलोग्राम से अब भी 2.5 गुना अधिक हैं।' (BS Hindi)

ठंड ने रबी फसल की उम्मीद बढ़ाई

चंडीगढ़ December 22, 2011
क्षेत्र में यह चरण वर्षा रहित रहने के बावजूद कृषि अधिकारियों का कहना है कि मौसम की वर्तमान दशाएं गेहूं और अन्य रबी फसलों के लिए उपयुक्त हैं। हालांकि उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि न्यूनतम तापमान के निचले स्तर पर पहुंचने की स्थिति में सरसों और अन्य सब्जियों को नुकसान पहुंच सकता है। सीसीएस हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार में शोध निदेशक डॉ. आर पी नरवाल ने कहा कि मौसम की वर्तमान स्थितियां अच्छी हैं। हालांकि न्यूनतम तापमान गिरने की स्थिति में यह नुकसानदेह हो सकता है। मौसम विभाग के अधिकारियों ने कहा कि आने वाले दिनों में क्षेत्र का न्यूनतम तापमान तापमान गिर सकता है। हरियाणा में एक कृषि अधिकारी ने बताया कि शून्य से नीचे तापमान सरसों के निचले भाग में तने को प्रभावित करता है, जिससे फसल को नुकसान को पहुंचता है। हरियाणा में इस साल 5.26 लाख हेक्टेयर में सरसों की बुआई की गई है, जबकि पिछले साल इसका रकबा 5.04 लाख हेक्टेयर था। तापमान के शून्य से नीचे जाने पर यह सरसों के अलावा सब्जियों के लिए भी नुकसानदेह है। हालांकि राज्य के कृषि अधिकारियों ने कहा कि मौसम की वर्तमान दशाएं गेहूं की फसल के लिए अनुकूल हैं। (BS Hindi)

22 December 2011

खाद्य सुरक्षा विधेयक

December 20, 2011
मंत्रिमंडल ने खाद्य सुरक्षा विधेयक को संसद में पेश करने की मंजूरी तो दे दी है लेकिन इसमें तमाम विसंगतियां हैं और यह कहीं-कहीं अव्यावहारिक प्रतीत होता है। इसमें 75 फीसदी ग्रामीण आबादी को ज्यादा सब्सिडी वाला भोजन उपलब्ध कराने के लिए सांविधिक अधिकार चाहा गया है। इसमें से 46 फीसदी को 'वरीयता' देने की बात कही गई है जो गरीबी रेखा के नीचे बसर करते हैं। इतना ही नहीं शहरी आबादी का 50 फीसदी भी इसमें शामिल किया जाना है जिसमें से 28 फीसदी वरीयता प्राप्त होंगे। ध्यान देने योग्य बात है कि विधेयक के प्रावधानों में शामिल जनसंख्या राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की मंशा के मुताबिक नहीं है। अगर ऐसा होता तो इसमें और अधिक लोग शामिल होते और इसका क्रियान्वयन मुश्किल होता। इसके बावजूद यह प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के उन शुबहों को पूरी तरह दूर कर पाने में नाकाम रही है जो उसने इसके कारण पडऩे वाले वित्तीय बोझ के बारे में जताए हैं। इसके प्रावधानों के मुताबिक चावल 3 रुपये किलो, गेहूं 2 रुपये किलो और मोटा अनाज 1 रुपये किलो की दर से वितरित करने होंगे, जबकि इनकी खरीद की कीमत इससे कई गुना ज्यादा होगी। जाहिर है ऐसे में खाद्य सब्सिडी बिल बेहद ऊंचे स्तर तक पहुंच जाएगा। एक ओर जहां खाद्य मंत्रालय का केंद्रीय सब्सिडी बिल का अपेक्षाकृत संकुचित आकलन 60,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 95,000 करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है वहीं विश्लेषकों का अनुमान है कि यह 100,000 करोड़ रुपये तक हो सकता है। एक बार अतिरिक्त खाद्यान्न उत्पादन, बढ़ती खरीद कीमत, राज्यों के कर, मंडी शुल्क और ढुलाई तथा वितरण लागत आदि जोड़े जाने के बाद वास्तविक सब्सिडी बिल इसका दोगुना तक हो सकता है। इस बीच लागत में हिस्सेदारी और क्रियान्वयन को लेकर राज्य सरकारों की अपनी सीमाएं हैं। इसके अलावा, अनेक राज्य पहले ही कुछ तबकों को 2 रुपये और 1 रुपये प्रति किलो की दर पर अनाज मुहैया करा रहे हैं। यह कीमत विधेयक में उल्लिखित दर से भी कम है। ऐसा लग सकता है कि संप्रग-2 1970 के दशक में लौटने की कोशिश कर रहा है लेकिन इंदिरा गांधी भी खाद्य कारोबार का राष्ट्रीयकरण करने में नाकाम रही थीं। हालांकि बेहद कड़ाई से लिखे इस कानून में भी राज्यों में अनाज उत्पादन की मात्रा वांछित करके एक तरह से राष्ट्रीयकरण की कोशिश की गई है। खुले बाजार में कीमतें बढ़ेंगी क्योंकि सरकारी खरीद से कम ही अनाज बचेगा। ऐसे में विधेयक यह कैसे सुनिश्चित करेगा कि जो परिवार गरीब नहीं हैं, वे महंगे अनाज पर निर्भर न रहें? जैसा कि कई राज्यों ने इंगित किया है- सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) खराब हो चुकी है और यह कुल क्षमता का दो तिहाई ही सही ढंग से अंजाम दे पाती है। विधेयक का मौजूदा स्वरूप इसमें सुधार की कोशिशों पर बुरा असर ही डालेगा। भोजन के अधिकार को लागू करने में राज्य सरकारों की अहम भूमिका है और अगर उनके पास कोई वैकल्पिक विचार हो तो उन्हें खाद्य सुरक्षा को अपने तरीके से सुनिश्चित करने देना चाहिए। इसके अलावा अनाज की कोई कानूनी कीमत भी तय नहीं की जानी चाहिए। एन टी रामराव ने आंध्र प्रदेश में 1983 में 2 रुपये किलो अनाज देने की घोषणा की थी। उस कीमत को आखिर वर्ष 2011 में कानूनी मान्यता क्यों दी जानी चाहिए? बेहतर कानूनों को लागू करने के लिए थोड़े बहुत परिवर्तन की आवश्यकता होती है वरना वे उद्देश्य में सफल नहीं हो पाएंगे। अब चूंकि यह विधेयक समिति के जरिये सदन की राह ले चुका है, ऐसे में इस सिद्घांत को ध्यान में रखा जाना चाहिए। (BS Hindi)

ज्यादा चीनी निर्यात पर फैसला जनवरी में करेगी सरकार

चिंतन - इस्मा की 77वीं वार्षिक आम बैठक में उद्योगों के हालात में चर्चाचीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त करने पर विचार किया जाएगा : थॉमस
उद्योग का तर्ककिसानों, उपभोक्ताओं और उद्योग के हितों के लिए चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त किया जाना जरूरी है। सरकार को चीनी के कोटे को समाप्त कर देना चाहिए तथा चीनी बेचने का अधिकार मिलों को होना चाहिए। सरकार को पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण की कीमतों का फार्मूला डॉ. सुमित्रा चौधरी कमेटी की सिफारिशें के आधार पर लागू कर देना चाहिए।सरकार चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त करने पर विचार करेगी। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) की 77वीं वार्षिक आम बैठक में खाद्य राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रो. के. वी. थॉमस ने कहा कि उद्योग से जुड़े सभी पक्षों किसानों, चीनी मिलों और राज्य सरकारों से इस मुद्दे पर राय ली जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि ओजीएल में और चीनी के निर्यात का फैसला सरकार जनवरी में करेगी।
उन्होंने कहा कि चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त करने के लिए सभी संबंधित पक्षों की राय के बाद ही कोई कदम उठाया जाएगा तथा इस संबंध में संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होने के बाद वित्तमंत्री से भी विचार-विमर्श किया जाएगा। चीनी के और निर्यात पर फैसला जनवरी में किया जाएगा। उद्योग को राहत देने के लिए सरकार ने हाल ही में ओपन जरनल लाइसेंस (ओजीएल) के तहत 10 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी थी।
साथ ही चीनी पर लगी स्टॉक लिमिट को हटा लिया था। उन्होंने कहा कि चालू पेराई सीजन में कुछ राज्य सरकारों ने गन्ने के परामर्श मूल्य में बढ़ोतरी की है जबकि चीनी के दाम इसकी तुलना में नहीं बढ़े हैं इससे चीनी मिलों की उत्पादन लागत बढ़ गई है। चालू पेराई सीजन में सरकार का उत्पादन अनुमान 246 लाख टन का है।
इस अवसर पर इस्मा के अध्यक्ष नरेंद्र मुरकुम्बी ने कहा कि किसानों, उपभोक्ताओं और उद्योग के हितों के लिए चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त किया जाना जरूरी है। पेराई सीजन 2011-12 में चीनी का उत्पादन बढ़कर 260 लाख टन होने का अनुमान है। जबकि देश में चीनी की सालाना खपत 220 लाख टन की होती है।
इसलिए सरकार को और चीनी निर्यात की अनुमति दे देनी चाहिए। चीनी उद्योग सीधे किसानों से जुड़ा हुआ है लेकिन चीनी का निर्यात हो, गन्ने की खरीद हो या फिर बिक्री, लेवी चीनी की मात्रा तथा स्टॉक आदि सब पर सरकार का नियंत्रण है।
उन्होंने कहा कि सरकार को महीने के आधार पर रिलीज किए जाने वाले चीनी के कोटे को समाप्त कर देना चाहिए तथा चीनी बेचने का अधिकार मिलों को होना चाहिए। सरकार को 10 फीसदी लेवी चीनी, जिसका उपयोग सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में आवंटन के लिए किया जाता है, की अनिवार्यता को भी समाप्त कर देना चाहिए। साथ ही सरकार को पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण की कीमतों का फार्मूला डॉ. सुमित्रा चौधरी कमेटी की सिफारिशें के आधार पर लागू कर देना चाहिए। (Business Bhaskar....R S Rana)

दस साल में सात लाख टन अनाज बर्बाद

ठाणे एक ओर सरकार खाद्य सुरक्षा बिल पेश कर रही है, ताकि हर किसी को अनाज मिल सके। लेकिन अनाज की बर्बादी चौंकाने वाली है। पिछले एक दशक में 7.42 लाख टन अनाज की बर्बादी विभिन्न वजहों के चलते हुई है।
इसका मूल्य 330.71 करोड़ रुपये है। भारतीय खाद्य निगम ने स्थानीय कार्यकर्ता प्रकाश शर्मा की सूचना अधिकार कानून के तहत दायर की गई याचिका के जवाब में यह जानकारी दी है।
एफसीआई के अनुसार अनाज की यह बर्बादी अप्रैल 2000 से मार्च 2011 के दौरान हुई है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार सबसे ज्यादा 1.82 लाख टन अनाज की बर्बादी 2000-01 के दौरान हुई। इस अनाज की कीमत 67.52 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2011-11 के दौरान 3.40 करोड़ रुपये का अनाज बर्बाद हुआ। (Business Bhaskar)

पंजाब, यूपी और प. बंगाल में आलू की सरकारी खरीद जल्द

बिजनेस भास्कर नई दिल्ली

सस्ते भाव पर आलू बेचने की किसानों की विवशता को देखकर सरकार ने फैसला कियाफसल की दुर्गतिआलू पैदावार बढ़कर ४ करोड़ टन से ज्यादा का अनुमानपिछले साल आलू का उत्पादन 3.65 करोड़ टन का हुआ थाआजादपुर मंडी में आलू के थोक दाम घटकर 2.5 से 3 रुपये प्रति किलो रह गएआलू किसानों को राहत देने के लिए कृषि मंत्रालय ने पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की सरकारों को मार्केट इंटरवेंशन स्कीम (एमआईएस) के तहत आलू की खरीद करने के निर्देश दिए हैं। आलू की बंपर पैदावार के कारण कई राज्यों में लागत भी वसूल न होने के कारण किसान आलू को सड़कों पर फेंकने को मजबूर हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने एमआईएस के तहत आलू खरीद करने की योजना बनाई है।
कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि 19 दिसंबर को मंत्रालय ने पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल सरकार को एमआईएस के तहत आलू खरीद करने के निर्देश दिए हैं। उम्मीद है रि जल्दी ही इन राज्यों में आलू की खरीद नेफेड और राज्य सरकार की एजेंसियों द्वारा शुरू कर दी जाएगी, जिससे किसानों को उचित दाम मिल सकें।
उन्होंने बताया कि चालू सीजन में आलू की बंपर पैदावार हुई है जिससे किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (एन एचबी) के अनुसार वर्ष 2010-11 में देश में आलू की पैदावार बढ़कर चार करोड़ टन से ज्यादा होने का अनुमान है। जबकि पिछले साल इसका उत्पादन 3.65 करोड़ टन का हुआ था।
उन्होंने बताया कि एमआईएस के तहत केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर उन जिंसों की खरीद करती हैं, जिनका न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सरकार तय नहीं करती और बंपर पैदावार होने के एवज में किसान अपनी उपज को लागत से भी कम मूल्य पर बेचने को मजबूर हो जाते हैं। एमआईएस के तहत खरीदे जाने वाली जिंसों को बेचने में होने वाले नुकसान की भरपाई केंद्र और राज्य सरकारें पचास-पचास फीसदी के आधार पर करती हैं।
भले ही उपभोक्ताओं को आलू आठ-दस रुपये प्रति किलो के भाव पर मिल रहा हो, लेकिन किसान एक से दो रुपये प्रति किलो की दर से आलू बेचने को मजबूर हैं। एशिया की सबसे बड़ी सब्जी मंडी आजादपुर में आलू के थोक दाम घटकर 2.5 से 3 रुपये प्रति किलो रह गए हैं। आलू के थोक कारोबारी ओ. पी. शर्मा ने बताया कि पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और गुजरात में किसान कोल्ड स्टोर से पुराना आलू नहीं उठा रहे हैं जिससे कोल्ड स्टोर मालिक इसको निकाल कर फेंक रहे हैं। (Business Bhaskar.....R S Rana)

खाद्य सुरक्षा बिल संसद में पेश किया गया

गुरुवार, 22 दिसंबर, 2011
ग़रीबों को सस्ता अनाज मुहैया कराने के लिए बहुप्रतिक्षित खाद्य सुरक्षा विधेयक को सरकार ने लोकसभा में गुरुवार को पेश किया.
लोकसभा में बुधवार को वामपंथी दलों और तेलेगु देसम के सांसदों ने खाद्य सुरक्षा विधेयक के दायरे में दो तिहाई लोगों को रखे जाने के बजाए सभी को सस्ती दरों पर अनाज पर उपलब्ध कराए जाने की वकालत की थी. यूपीए सरकार की सबसे महात्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक इस विधेयक में देश के 60 फ़ीसदी से ज़्यादा लोगों को सस्ते दरों पर अनाज दिए जाने का प्रावधान है.
रविवार शाम दिल्ली में प्रधानमंत्री निवास पर यूपीए सहयोगियों तथा कुछ कांग्रेसी सदस्यों की चिंताओं को दूर करने के बाद मंत्रिमंडल की बैठक में खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंजूरी दे दी गई थी.
ग़ौरतलब है कि मौजूदा बिल के मसौदे के दायरे में देश की क़रीब 63 फ़ीसदी आबादी ही आएगी, कुछ सामाजिक संस्थाओं और वामपंथी गुटो का मानना है कि जन वितरण में धांधली रोकने के लिए इसमें बीपीएल जैसी कोई श्रेणी नही होनी चाहिए और सभी को सस्ते दरों पर खाद्य पदार्थ बांटे जाने चाहिए.
कांग्रेस ने साल 2009 के अपने चुनावी घोषणा पत्र में इस क़ानून को लाने का वादा किया था. राष्ट्रपति ने भी जून, 2009 में संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए इसकी घोषणा की थी.
इससे सरकारी खज़ाने पर 27,663 करोड़ रूपए का अतिरिक्त भार पड़ेगा.
सस्ता अनाज
खाद्य सुरक्षा विधेयक की ख़ास बात यह है कि इसके कानून बन जाने से देश की दो तिहाई आबादी को कम क़ीमतों पर अनाज मिलेगा.
विधेयक में लाभ प्राप्त करने वालों को प्राथमिकता वाले परिवार और सामान्य परिवारों में बांटा गया है.
प्राथमिकता वाले परिवारों में गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने वाले और सामान्य कोटि में गरीबी रेखा से उपर के परिवारों को रखे जाने की बात कही गई है.
ग्रामीण क्षेत्र में इस विधेयक के दायरे में 75 प्रतिशत आबादी आयेगी जबकि शहरी क्षेत्र में इस विधेयक के दायरे में 50 प्रतिशत आबादी आयेगी.
विधेयक में प्रत्येक प्राथमिकता वाले परिवारों को तीन रूपये प्रति किलोग्राम की दर से चावल और दो रूपये प्रति किलोग्राम की दर से गेहूं उपलब्ध कराने की बात कही गई है.
खाद्य सुरक्षा विधेयक के मसौदे के प्रावधानों के तहत देश की 63.5 प्रतिशत जनता को खाद्य सुरक्षा प्रदान की जाएगी. खाद्य सुरक्षा विधेयक का बजट पिछले वित्तीय वर्ष के 63,000 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 95,000 करोड़ रुपए कर दिया जाएगा.इस विधेयक के क़ानून में बदल जाने के बाद अनाज की मांग 5.5 करोड़ मैट्रिक टन से बढ़ कर 6.1 मैट्रिक टन हो जाएगी. (BBC Hindi)

खाद्य सुरक्षा विधेयक कांग्रेस का चुनावी हथकंडाः मायावती

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक को गरीबों के लिए अव्यवहारिक बताते हुए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने गुरुवार को कहा कि बिना धन और खाद्यान्न की व्यवस्था किए इस विधेयक को पारित कराना कांग्रेस पार्टी का एक चुनावी स्टंट है।मुख्यमंत्री मायावती ने गुरुवार दोपहर एक बयान जारी कर खाद्य सुरक्षा विधेयक के अंतर्गत किए गए प्रावधानों का जिक्र करते हुए कहा कि इस विधेयक में दी गई व्यवस्था के अनुसार पात्र व्यक्तियों को निर्धारित मात्रा में खाद्यान्न की आपूर्ति न होने पर उन्हें राज्य सरकार को खाद्य सुरक्षा भत्ता देना पड़ेगा, जो कि राज्य सरकार को वहन करना पड़ेगा।उन्होंने कहा कि इस विधेयक के प्रावधानों के तहत राज्यों में राज्य खाद्य सुरक्षा आयोग गठित करने की बात की गई है। इस आयोग के गठित होने पर इसके क्रियान्वयन व मूल्यांकन के लिए स्टाफ आदि की व्यवस्था करनी पड़ेगी, जिसका व्ययभार भी राज्य सरकारों को उठाना पड़ेगा।मुख्यमंत्री ने कहा कि खाद्यान्न और वित्तीय व्यवस्था किए बगैर इस विधेयक को पास कराने का प्रयास कांग्रेस पार्टी का एक चुनावी हथकंडा है।केंद्र सरकार पर गैर कांग्रेसी राज्य सरकारों के साथ सौतेला रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए मायावती ने कहा कि केंद्र सरकार संविधान के तहत मिलने वाली उचित आर्थिक सहायता नहीं दे रही है और जो दे भी रही है वह समय से आवंटित नहीं की जा रही है, जिससे गैर कांग्रेस शासित राज्य सरकारों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है।मायावती ने कहा कि केंद्र सरकार ने पहले से ही गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों (बीपीएल) की संख्या निर्धारित कर रखी है और बार-बार अनुरोध करने के बाद भी बीपीएल की संख्या बढ़ाई नहीं गई है। बीपीएल परिवारों की संख्या निर्धारित करने से बड़ी संख्या में गरीब लोग इस विधेयक के लाभों से वंचित रहेंगे। बसपा प्रमुख ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा पहले से संचालित विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ गरीबों को नहीं मिल पा रहा है। केंद्र सरकार के रवैए से ऐसा प्रतीत होता है कि उसकी अन्य योजनाओं की तरह इस विधेयक का भी वही हश्र होगा।उन्होंने कहा कि बेहतर होता कि राज्य सरकार पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का भार न डालकर केंद्र सरकार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री महामाया गरीब आर्थिक मदद योजना के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्‍ध कराती, जिससे अधिक से अधिक गरीबों को लाभान्वित किया जा सकता। (amarujala)

20 December 2011

खाद्य सुरक्षा बिल में कई मसलों पर असमंजस की स्थिति

बिजनेस भास्कर दिल्ली

खाद्य सुरक्षा बिल को मंत्रिमंडल ने पारित कर दिया है तथा अब इसे संसद की मंजूरी के लिए सदन में पेश किया जायेगा। लेकिन प्रस्तावित बिल में अभी भी कई खामियां मौजूद है। इस बिल में सामान्य और प्राथमिकता समूह के विभाजन के आधार को लेकर कुछ स्पष्ट नहीं किया गया है। इसके अलावा इस बिल में सालाना खाद्य सब्सिडी में जो बढ़ोतरी की बात कही गई है असल में बढ़ोतरी उससे कई गुना ज्यादा होने की संभावना है।

खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि प्रस्तावित बिल में सामान्य और प्राथमिक श्रेणी के परिवार के विभाजन के आधार को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं किया गया है। इस बिल में सरकार ने सामान्य और प्राथमिक श्रेणी के परिवारों को सस्ते खाद्यान्न का कानूनी हक तो देने की बात कही है लेकिन ये स्पष्ट नहीं है कि वर्तमान में लाभ लेने वाले परिवारों को ही ये हक मिलेगा या फिर नए सिरे से सामान्य और प्राथमिक परिवारों की पहचान की जाएगी।

उन्होंने बताया कि इस समय देश के 6.52 करोड़ परिवारों को सरकार गरीबी रेखा से नीचे (प्राथमिक) और 11.5 करोड़ परिवारों को (सामान्य) श्रेणी के आधार पर सस्ता खाद्यान्न उपलब्ध करवा रही है। एक परिवार पांच सदस्यों को आधार मानें तो इस समय सरकार कुल जनसंख्या की करीब 75 फीसदी जनता को सस्ता अनाज मुहैया करवा रही है। जबकि प्रस्तावित बिल में देश की 64 फीसदी जनता को सस्ता खाद्यान्न उपलब्ध कराने की बात है।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. टी हक ने बताया कि सामान्य और प्राथमिकता वाले परिवारों का आधार क्या होगा, इसको प्रस्तावित बिल में स्पष्ट नहीं किया है। मंत्रिमंडल ने खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंजूरी तो दे दी, लेकिन इसे लागू करने से पहले जो आधारभूत ढ़ांचा तैयार करना चाहिए उस पर सरकार ने कुछ नहीं किया है। राज्यों में खाद्यान्न के रख-रखाव और वितरण में आने वाले दिक्कतों को दूर करने के लिए सरकार कोई पहल नहीं कर रही है। ऐसे में लगता है कि सरकार कि मंशा सिर्फ चुनाव में इसका फायदा उठाना है।

इस विधेयक से सरकारी खजाने पर 27,663 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार बढऩे की बात कही गई है। लेकिन असल में भार इससे ज्यादा का होगा। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने आईसीडीएस कार्यक्रम के लिए 35,000 करोड़ रुपये मांग की है जोकि खाद्य सुरक्षा योजना का ही भाग है। इसके अलावा भिखारियों, बेघर और आपदा से प्रभावित लोगों को भोजन देने के लिए लगभग 8,920 करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान है जबकि प्रशासनिक खर्च करीब 1,000 करोड़ रुपये और अनाजों की परिवहन लागत 8,300 करोड़ रुपये होने का अनुमान है। ऐसे में प्रस्तावित बिल पास होने के बाद कुल खाद्य सब्सिडी बढ़कर करीब 2,00,000 रुपये होने का अनुमान है। जबकि अतिरिक्त खाद्यान्न की खरीद के लिए राशि अलग से होगी। (Business Bhaskar.....R S Rana)

चीनी के उत्पादन में 18.7 फीसदी की बढ़ोतरी

बिजनेस भास्कर नई दिल्ली

ज्यादा उत्पादन के चलते घरेलू बाजार में सुस्त दामों से परेशान चीनी मिलों को विदेशी बाजार से भी राहत नहीं मिल रही है। विदेशी बाजार में चीनी के दाम 600 डॉलर प्रति टन से नीचे चले गए हैं। इससे चीनी मिलों की परेशानी बढ़ गई है। उन्हें चीनी के निर्यात से भी कोई राहत मिलने की उम्मीद खत्म हो रही है।

चालू पेराई सीजन 2011-12 (अक्टूबर से सितंबर) में 15 दिसंबर तक चीनी के उत्पादन में 18.7 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के अनुसार चालू पेराई सीजन में अभी तक 45.84 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 38.63 लाख टन का उत्पादन हुआ था। इस्मा के अनुसार चालू पेराई सीजन में सबसे बड़े उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में 15 दिसंबर तक चीनी का उत्पादन बढ़कर 17.50 लाख टन का हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 16.25 लाख टन का उत्पादन हुआ था। उत्तर प्रदेश में चालू पेराई सीजन में अभी तक 12.85 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका है जबकि पिछले साल इस समय तक 8.55 लाख टन का उत्पादन हुआ था। उधर कर्नाटक में चालू सीजन में पिछले साल के 7.35 लाख टन से बढ़कर चालू पेराई सीजन में अभी तक 8.25 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका है।

इस्मा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी के दाम घटकर 600 डॉलर प्रति टन से भी नीचे आ गए हैं जबकि नवंबर में दाम 700 डॉलर प्रति टन से ऊपर थे। ऐसे में निर्यातकों का मार्जिन पहले की तुलना में कम हो गया है। घरेलू बाजार में पिछले आठ-दस दिनों में चीनी की कीमतों में करीब 150 से 200 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आई है। उत्तर प्रदेश में चीनी के एक्स-फैक्ट्री भाव घटकर सोमवार को 2,900 से 3,050 रुपये और दिल्ली थोक बाजार में 3,100 से 3,150 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। मुंबई में चीनी का भाव घटकर 2,950 रुपये प्रति क्विंटल रह गया।

इस समय देशभर में 452 चीनी मिलों में गन्ने की पेराई आरंभ हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 445 मिलों में पेराई चल रही थी। महाराष्ट्र में चालू सीजन में मिलों में गन्ने की पेराई में देरी हुई है। इस्मा के अनुसार चालू पेराई सीजन में देश में चीनी का उत्पादन बढ़कर 260 लाख टन होने का अनुमान है जबकि खाद्य मंत्रालय का उत्पादन अनुमान 246-250 लाख टन का है। देश में चीनी की सालना खपत 220-225 लाख टन की होती है। पिछले पेराई सीजन में देश में चीनी का उत्पादन 243 लाख टन का हुआ था। (Business Bhaskar.....R S Rana)

किसानों के लिए एमआईएस स्कीम

नैफेड व राज्य की एजेंसियों के जरिये लागू होगी स्कीम

किसानों के हित में केंद्र सरकार मार्केट इंटरवेंशन स्कीम (एमआईएस) लागू कर रही है। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने मंगलवार को कहा कि राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार से ऐसी कृषि और बागवानी उपजों को खरीद करने का आग्रह किया था जो जल्दी खराब हो जाती हैं और जिनका मूल्य समर्थन योजना के तहत सरकार खरीद नहीं करती है। शरद पवार ने लोकसभा में शीतकालीन सत्र के दौरान कहा कि एमआईएस किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए लागू की जा रही है।

यह योजना किसी उपज जैसे आलू, प्याज की बंपर पैदावार होने की सूरत में कीमत में भारी गिरावट से रोकने पर चालू की जाती है। जिससे किसान अपनी उपज लागत से कम मूल्य पर बेचने को मजबूर न हों। उन्होंने कहा कि एमआईएस के तहत खरीद नैफेड या राज्य की एजेंसियों के जरिये लागू करती है। सरकार ऐसी वस्तुओं की खरीद करके घरेलू बाजार में या निर्यात के जरिये विदेश में बेचेगी और इसमें होने वाले घाटा केंद्र व राज्य सरकारों को बराबर अनुपात में उठाना होगा। (Business Bhaskar)

बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस)

सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के माध्यम से धान सहित प्रमुख कृषि उपज के लिए लाभकारी मूल्य सुनिश्चित किया है| एमएसपी केंद्रीय, राज्य और राज्यों में सहकारी एजेंसियों द्वारा खरीद के माध्यम से सुनिश्चित किया जाता है| किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने के लिए समय समय पर पर्याप्त व्यवस्था बनाने के लिए राज्य सरकारों को सतर्क कर दिया गया है|

इसके अलावा, सरकार ने कृषि और बागवानी वस्तुओं के लिए जो मूल्य समर्थन योजना के तहत शामिल नहीं हैं बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस) लागू कर रहा है| एमआईएस राज्य / केन्द्र शासित प्रदेशों के सरकार के अनुरोध पर आदेश पर इन वस्तुओं के उत्पादकों की रक्षा के लिए कार्यान्वित किया गया है भरपूर फसल की बिक्री स्थिति में परेशानी उत्पन होती है जब कीमतें उत्पादन लागत से नीचे गिर जाती हैं| उत्तर प्रदेश में आलू के 1 लाख मीट्रिक टन की खरीद को एमआईएस के तहत मार्च - अप्रैल 2011 के दौरान स्वीकृत किया गया है|

18 December 2011

यूरोप की मांग घटने से मेंथा उत्पादों में नरमी की संभावना

एमसीएक्स में मुनाफावसूली से चालू माह में मेंथा तेल चार फीसदी गिरा
17,750 टन का रखा है मसाला बोर्ड ने वित्त वर्ष 2011-12 के लिए निर्यात का लक्ष्य9,150 टन मेंथा उत्पादों का निर्यात हुआ है अप्रैल से अक्टूबर के दौरान9,500 टन का निर्यात हुआ था पिछले साल की समान अवधि मेंयूरोप में क्रिसमस के त्यौहार के कारण जनवरी के पहले सप्ताह तक छुट्टियां रहेंगी, जिसका असर भारत से मेंथा तेल से बने उत्पादों के निर्यात पर पडऩे की संभावना है। निर्यातकों की मांग कम होने से उत्पादक मंडियों में मेंथा तेल की कीमतों में पांच से सात फीसदी की गिरावट आ सकती है। जबकि वायदा बाजार में निवेशकों की मुनाफावसूली से चालू महीने में मेंथा तेल की कीमतों में चार फीसदी की गिरावट आई है।
एसेंशियल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष जुगल किशोर ने बताया कि यूरोप में क्रिसमस के कारण जनवरी के पहले सप्ताह तक छुट्टियां रहेंगी इसीलिए यूरोप के आयातकों की मांग पहले की तुलना में कम हो गई है। इस समय खाड़ी देशों के आयातक क्रिस्टल बोल्ड का 30-32 डॉलर प्रति किलो का भाव देने को तैयार हैं। घरेलू फार्मा कंपनियों की भी मांग इस समय सीमित मात्रा में है जिससे घरेलू बाजार में मेंथा तेल की कीमतों में नरमी की संभावना है।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार चालू वित्त वर्ष के पहले सात महीनों अप्रैल से अक्टूबर के दौरान मेंथा उत्पादों के निर्यात में चार फीसदी की कमी आई है। अप्रैल से अक्टूबर के दौरान 9,150 टन मेंथा उत्पादों का निर्यात हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 9,500 टन का निर्यात हुआ था। मसाला बोर्ड ने वित्त वर्ष 2011-12 के लिए निर्यात का लक्ष्य 17,750 टन का रखा है। चंदौसी मंडी स्थित ग्लोरियस केमिकल के डायरेक्टर अनुराग रस्तोगी ने बताया कि उत्पादक मंडियों में मेंथा तेल की दैनिक आवक 500 से 650 ड्रमों (एक ड्रम-180 किलो) की हो रही है।
जबकि आवक के मुकाबले मांग कमजोर होने से मेंथा तेल की कीमतों कीमतों में गिरावट आ सकती है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर दिसंबर महीने के वायदा अनुबंध में मेंथा तेल की कीमतों में चालू महीने में चार फीसदी की गिरावट आई है। पहली तारीख को दिसंबर महीने के वायदा अनुबंध में मेंथा तेल का भाव 1,348.20 रुपये प्रति किलो था, जबकि 16 दिसंबर को इसका भाव 1,295 रुपये प्रति किलो पर बंद हुआ।
उत्तर प्रदेश मेंथा उद्योग एसोसिएशन के अध्यक्ष फूल प्रकाश ने बताया कि चालू सीजन में मेंथा तेल की पैदावार बढ़कर 34,000 से 35,000 टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 27,000 से 28,000 हजार टन का ही उत्पादन हुआ था। आवक का पीक सीजन समाप्त हो चुका है इसलिए मौजूदा कीमतों में 50 से 60 रुपये प्रति किलो की आंशिक गिरावट तो आ सकती है लेकिन भारी गिरावट की संभावना नहीं है। (Business Bhaskar....R S Rana)

सब्सिडी कटौती से सस्ती दाल बिक्री पर असर संभव

आर.एस. राणा नई दिल्ल

फरमान - सरकार ने दलहन आयात के लिए सब्सिडी बजट बढ़ाने के बजाय घटायाउपभोक्ताओं को दस रुपये प्रति किलो रियायत वाली दाल वितरण की योजनाबजट बढ़ाने की जरूरत क्योंचालू वित्त वर्ष में पीडीएस के तहत आवंटित की जाने वाली दालों के लिए सरकार ने 200 करोड़ रुपये आवंटन का प्रावधान किया था। जबकि मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में दालों की कीमतों में आई तेजी और रुपये के मुकाबले डॉलर की मजबूती के आधार पर 100 करोड़ रुपये के अतिरिक्त आवंटन की मांग की थी।सस्ती दालों का आयातसार्वजनिक कंपनियों के जरिये पांच लाख टन दालों का आयात करने का लक्ष्य तय किया गया था। लेकिन चालू वित्त वर्ष के पहले आठ महीनों के दौरान सार्वजनिक कंपनियों ने मात्र 1.75 लाख टन दलहन आयात के ही सौदे किए हैं जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 45.7 फीसदी कम है।एक तरफ जहां सरकार देश की 65 फीसदी जनता को सस्ता खाद्यान्न देने के लिए प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम को पास कराने के लिए सहयोगियों के साथ ही विपक्षी दलों को भी मनाने में जुटी हुई है। वहीं, दूसरी तरफ सरकार ने गरीबों को राशन की दुकानों के जरिये दी जाने वाली रियायती दालों के बजट आवंटन में 50 करोड़ रुपये की कटौती कर दी है। ऐसे में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत वितरित होने वाली दालों का वितरण प्रभावित होने की आशंका है।
उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू वित्त वर्ष में पीडीएस के तहत आवंटित की जाने वाली दालों के लिए सरकार ने 200 करोड़ रुपये आवंटन का प्रावधान किया था। जबकि मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में दालों की कीमतों में आई तेजी और रुपये के मुकाबले डॉलर की मजबूती के आधार पर 100 करोड़ रुपये के अतिरिक्त आवंटन की मांग की थी। लेकिन केंद्र सरकार ने संशोधित बजट अनुमान में आवंटन 50 करोड़ रुपये घटाकर 150 करोड़ रुपये कर दिया है।
इसका असर सार्वजनिक कंपनियों द्वारा किए जा रहे दलहन आयात पर भी देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि चालू वित्त वर्ष में उपभोक्ता मामले मंत्रालय ने सार्वजनिक कंपनियों के माध्यम से पांच लाख टन दालों का आयात करने का लक्ष्य तय किया था। लेकिन चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले आठ महीनों (अप्रैल से नवंबर) के दौरान सार्वजनिक कंपनियों ने मात्र 1.75 लाख टन दलहन आयात के ही सौदे किए हैं जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 45.7 फीसदी कम है।
पिछले वित्त वर्ष 2010-11 के अप्रैल से नवंबर के दौरान सार्वजनिक कंपनियों ने 3.04 लाख टन दलहन आयात के सौदे किए थे। उन्होंने बताया कि पीडीएस में आवंटन के लिए दालों का आयात सार्वजनिक कंपनियों एमएमटीसी, एसटीसी, पीईसी और नेफेड के माध्यम से किया जा रहा है। केंद्र सरकार आयातित दालों पर 10 रुपये प्रति किलो की सब्सिडी सार्वजनिक कंपनियों को प्रदान करती है।
चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से अक्टूबर तक देश में कुल 16.59 लाख टन दालों का आयात हो चुका है तथा दलहन आयात में सबसे बड़ी भागीदारी प्राइवेट आयातकों की ही है। कृषि मंत्रालय के चौथे अग्रिम अनुमान के अनुसार वर्ष 2010-11 में देश में दालों का रिकॉर्ड 180.9 लाख टन का उत्पादन होने का अनुमान है जबकि इसके पिछले साल 146.6 लाख टन का उत्पादन हुआ था। जबकि देश में दलहन की सालाना खपत 185 से 195 लाख टन की होती है।(Business Bhaskar.....R S Rana)

अब मिलेगा सस्ता अनाज

राहत की बात - कैबिनेट ने दी खाद्य सुरक्षा विधेयक के मसौदे को हरी झंडीसंसद के चालू शीतकालीन सत्र में ही खाद्य सुरक्षा विधेयक को पेश किए जाने के आसारदेश के ज्यादातर लोगों को 'सस्ते अनाज का कानूनी अधिकार' मिलने का रास्ता अंतत: साफ हो गया है। दरअसल, सरकार ने रविवार को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक के मसौदे को हरी झंडी दिखा दी। देश के गरीबों को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने की खातिर ही यह मंजूरी दी गई है। इस विधेयक के पारित हो जाने पर देश की 63.5 फीसदी आबादी को सस्ता अनाज पाने का कानूनी अधिकार मिल जाएगा।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में संक्षिप्त चर्चा के बाद खाद्य सुरक्षा विधेयक के मसौदे को बाकायदा स्वीकृति दे दी गई। इस बैठक में भाग लेने वाले एक वरिष्ठ मंत्री ने यहां पत्रकारों को यह जानकारी दी।
गौरतलब है कि पिछले सप्ताह खाद्य सुरक्षा विधेयक पर निर्णय को टाल दिया गया था। समय का अभाव होने के साथ-साथ कृत्रि मंत्री शरद पवार द्वारा जताई गई चिंता को ध्यान में रखकर ही इस पर फैसला टाला गया था। पवार ने मुख्यत: इस बात पर चिंता जताई थी कि खाद्य सुरक्षा विधेयक के अमल में आ जाने की स्थिति में सरकारी खजाने पर बोझ बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा।
कैबिनेट की मंजूरी मिल जाने के बाद संसद के चालू शीतकालीन सत्र में ही खाद्य सुरक्षा विधेयक को पेश किए जाने की प्रबल संभावना है। खाद्य सुरक्षा विधेयक के कानून में तब्दील हो जाने पर सब्सिडी बिल में 27,663 करोड़ रुपये तक की भारी बढ़ोतरी होने की संभावना जताई जा रही है। ऐसा होने पर देश का कुल सब्सिडी बिल भी बढ़कर 95,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा।
इसी तरह देश में कुल खाद्यान्न आवश्यकता भी मौजूदा 5.5 करोड़ टन से बढ़कर 6.1 करोड़ टन के स्तर पर पहुंच जाएगी। बताया जाता है कि 'मनरेगा' स्कीम के बाद यह यूपीए सरकार की दूसरी सबसे बड़ी पहल है। यह भी बताया जाता है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की पहल पर ही देश में खाद्य सुरक्षा की योजना को परवान चढ़ाया जा रहा है।क्या होगा इससे देश की 63.5% आबादी को सस्ता अनाज पाने का कानूनी अधिकार मिल जाएगाइस विधेयक के कानून में तब्दील होने पर सब्सिडी बिल में होगी 27,663 करोड़ रुपये तक की भारी बढ़ोतरीदेश में कुल खाद्यान्न आवश्यकता भी मौजूदा 5.5 करोड़ टन से बढ़कर हो जाएगी 6.1 करोड़ टनलाभ किसे देश भर में 75 फीसदी ग्रामीण आएंगे खाद्य सुरक्षा के दायरे में, 46 फीसदी लोग प्राथमिकता वाले वर्ग मेंशहरों में रहने वाले 50 फीसदी लोग भी होंगे इससे लाभान्वित, 28 फीसदी लोग प्राथमिकता वाले वर्ग में
कितना अनाज प्राथमिकता वाले वर्ग में आने वाले हर व्यक्ति को प्रत्येक माह मिलेगा 7 किलो चावल, गेहूं, मोटा अनाज, कीमत होंगी क्रमश: 3, 2 व 1 रुपया प्रति किलोसामान्य वर्ग मे आने वाले लोगों को मिलेगा कम-से-कम 3 किलो अनाज, कीमत इसके न्यूनतम समर्थन मूल्य के 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होगीलोकपाल विधेयक पर चर्चा आजनई दिल्ली रविवार की कैबिनेट बैठक में लोकपाल विधेयक को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। बैठक में विधेयक के कुछ मुद्दों को जरूर कैबिनेट के सामने रखा गया। अब इस पर सोमवार को चर्चा होने की उम्मीद है। सरकार कह चुकी है कि वह लोकपाल विधेयक को मौजूदा शीत सत्र में ही पेश करेगी। बैठक के बाद कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा, 'आप जानते हैं शीत सत्र में कितने दिन बचे हैं। इस सत्र में बिल पेश करने के लिए हम दिन-रात काम कर रहे हैं।
'वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, गृह मंत्री पी. चिदंबरम, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और कार्मिक मामलों के राज्य मंत्री वी. नारायणसामी की अनौपचारिक समिति इस बिल को अंतिम रूप देने में लगी है। सूत्रों का कहना है कि कल की कैबिनेट बैठक से पहले संबंधित मंत्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलेंगे और उन्हें विधेयक में किए गए बदलावों की जानकारी देंगे। (Business Bhaskar)

वैश्विक मंदी से निकलेगा तो ही एल्युमीनियम चमकेगा

December 16, 2011
एल्युमीनियम उत्पादकों को काफी राहत मिली है, क्योंकि सफेद धातु 2,000 डॉलर प्रति टन के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे ज्यादा दिन नहीं रही। जबकि इस समय स्मेल्टरों की 30 फीसदी क्षमता का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। हालिया सप्ताहों में ऐसी स्थिति नहीं आई जैसी उद्योग को 2008-09 की विध्वंसकारी मंदी के दौरान देखने को मिली थी। उस समय मांग में गिरावट और स्टॉक में बढ़ोतरी के कारण एल्युमीनियम 1,500 डॉलर प्रति टन से नीचे बिका था।हालांकि यह पूरे वैश्विक एल्युमीनियम उद्योग के लिए मामूली राहत है, जिसकी आमदनी दिसंबर में समाप्त होने वाली तिमाही में 2011 की पहली तीन तिमाहियों के मुकाबले कम रहने की संभावना है। पिछले महीने के तीसरे सप्ताह से एल्युमीनियम करीब 150 डॉलर सुधरकर 2,150 डॉलर प्रति टन पर आ गया, लेकिन यह इस धातु के मई के सर्वोच्च स्तर 2,800 डॉलर प्रति टन से काफी नीचे है। कुल मिलाकर जिंस मंदे बाजार की गिरफ्त में हैं। यह कोई नहीं जानता कि मांग में भारी बढ़ोतरी कब आएगी। मांग में तेजी ही केवल इसकी कीमतों को ऊपर ले जा सकती है। इस माहौल में स्टॉकिस्ट और एल्युमीनियम के वास्तविक उपयोगकर्ताओं के अपना स्टॉक कम रखने की संभावना की जा सकती है। यही हाल इस्पात का है।एल्युमीनियम की वर्तमान दरों पर केवल कुछ उत्पादक ही न फायदे और न नुकसान की स्थिति में हैं या कुछ लाभ कमा रहे हैं। वैश्विक एल्युमीनियम उद्योग को बढ़ती ऊर्जा लागत का सामना करना पड़ रहा है। यह उद्योग अपने उपयोग की एक तिहाई बिजली पैदा करने में आत्मनिर्भर है। यह सही है कि प्रति 5 इकाई वैश्विक एल्युमीनियम खपत में दो इकाइयों की खपत चीन में होती है। शोध संस्था ब्रूक हंट के मुताबिक एल्युमीनियम की स्मेल्टिंग लागत में अकेली ऊर्जा लागत का हिस्सा ही 30-40 फीसदी होता है। बाजार में इसकी कीमतें गिरने, यूरो जोन के मंदी में फंसने से कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव का विश्वास पुख्ता होने और यूनियन बैंक ऑफ स्विटजरलैंड जैसी संस्थाओं के इन अनुमानों से कि जिंस खुद को 2012 में जोखिमभरी स्थिति में पाएंगी तो लोग एल्युमीनियम शेयरों को खरीदने से दूरी बनाएंगे।इसलिए हिंडाल्को और नाल्को के शेयरों की कीमतों में गिरावट चौंकाने वाली नहीं है। इसी तरह एल्युमीनियम कॉरपोरेशन ऑफ चाइना का शेयर इस साल हांगकांग में कारोबार के दौरान करीब 40 फीसदी गिर चुका है। एंग्लो ऑस्ट्रेलियन कंपनी रियो टिंटो की कीमत लंदन मेटल एक्सचेंज में करीब 25 फीसदी घट चुकी है। इसकी वजह इसके पास विस्तृत एल्युमीनियम परिसंपत्तियां होना है। विश्व की प्रमुख एल्युमीनियम उत्पादक एल्कोआ की स्थिति भी शेयर बाजार में ज्यादा अच्छी नहीं रही। एल्युमीनियम की कीमतें मई के स्तर पर कब पहुंचेंगी या कितनी जल्द हिंडाल्को अपने 52 सप्ताह के उच्च स्तर पर लौटेगा? इसका अभी अनुमान लगाना अंधेरे में पत्थर फेंकने जैसा ही होगा। केवल एल्युमीनियम ही नहीं बल्कि अन्य बहुत सी धातुओं और खनिजों की कीमतों में भारी गिरावट आ चुकी है। रियो टिंटो के सीईओ जैकींथ कहते हैं कि भविष्य में एल्युमीनियम की कीमतों में तेजी आएगी। हालांकि उन्होंने इसका संकेत नहीं दिया कि इस धातु में चमक आनी कब शुरू होगी।इस समय रियो की एल्युमीनियम इकाई ने दूसरी छमाही की आमदनी से सब्र कर लिया है, जो पहली छमाही से काफी कम थी। हिंडाल्को के विस्तार की तरह रियो भी कनाड़ा में अपने किटीमाट स्मेलटर की क्षमता 4,20,000 टन करने के लिए इसके पुनर्निमाण और विस्तार पर 3.3 अरब डॉलर का निवेश कर रही है। यह स्मेलटर जलविद्युत से चलेगा, जिससे उत्सर्जन आधा कम हो जाएगा। इसका मकसद किटीमाट को विश्व के सबसे कम लागत वाले स्मेलटरों में से एक बनाना है, जो रियो की अपनी जूझ रही एल्युमीनियम इकाइयों के मार्जिन में सुधार की रणनीति पर बिल्कुल सटीक बैठता है। रियो अपने एल्युमीनियम कारोबार में जान डालने की कोशिश कर रही है। इसके लिए अच्छी परिसंपत्तियों पर ध्यान दिया जा रहा है, क्योंकि यह ऊंची लागत वाले परिचालन से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है। भारतीय उद्योग के अधिकारी बीएचपी बिलिटन के एल्युमीनियम पोर्टफोलियो की जारी समीक्षा के नतीजे पर नजर रख रहे हैं। बीएचपी बिलिटन के पोर्टफोलियो में कुछ पूर्ण स्वामित्व वाली परिसंपत्तियां और कुछ संयुक्त उपक्रम शामिल हैं। उनका कहना है कि बीएचपी अपनी सभी या कुछ एल्युमीनियम/एल्युमिना परिसंपत्तियों की बिक्री कर सकती है। भारतीय कारोबारी घरानों ने विदेशी अधिग्रहण के लिए काफी उत्सुकता दिखाई है। अधिकारियों के अनुसार अगर बीएचपी एल्युमीनियम कारोबार से बाहर निकलने का निर्णय लेती है तो अन्य साझेदारों के पास परिसंपत्तियों के अधिग्रहण का अच्छा मौका होगा। एल्युमीनियम की वैश्विक उत्पादन क्षमता और यूरो जोन के संकट ने यूरोप से बाहर इस धातु की मांग पर असर डाला है और उत्पादक इस पर दो तरह से प्रतिक्रिया दे रहे हैं, बंद पड़े स्मेल्टर को फिर से चालू करना और उच्च लागत वाले स्मेल्टर को बंद करना। एल्युमीनियम के अग्रणी यूरोपीय उत्पादक हाइड्रो ने कहा है कि वह नॉर्वे के स्मेल्टर को तभी चालू करेगी, जब बाजार की स्थिति बेहतर होगी। ऐसे में समय में यह भी अटकलें हैं कि चीनी उत्पादकों ने सालाना उत्पादन में 15 लाख टन की कटौती की है। बाजार ने इस अटकल से निश्चित तौर पर सबक लिया होगा कि चीन के कदम से कुछ हद तक उद्योग की अति उत्पादन क्षमता का ख्याल रखा जा सकेगा। मॉर्गन स्टैनली के एक अधिकारी ने कहा कि विश्व में उत्पादकों की तरफ से आपूर्ति व मांग के बीच संतुलन बनाए रखने का अनुशासन नजर आ रहा है। लेकिन एल्युमीनियम की कीमतों में बढ़त का मामला आपूर्ति की अनुशासित स्थिति व मांग में मजबूत बहाली से आगे की बात है। (BS Hindi)

16 December 2011

भारतीय गेहूं को अर्जेंटीना यूक्रेन से कड़ी टक्कर

- सरकार ने सितंबर में गेहूं निर्यात पर लगी रोक हटाई थी
सितंबर से अब तक सिर्फ 3.16 लाख टन गेहूं निर्यात के सौदे हुए
घरेलू बाजार
इन दिनों दिल्ली में गेहूं का दाम 1,175 रुपये प्रति क्विंटल चल रहा है। जबकि सरकार ने रबी विपणन सीजन के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर 1,285 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।

283-316 डॉलर प्रति टन (सीएंडएफ) के भाव पर बांग्लादेश और मलेशिया को भारत से गेहूं का निर्यात किया गया
214-235 डॉलर प्रति टन (एफओबी) पर गेहूं निर्यात कर रहे हैं यूक्रेन, मलेशिया और ऑस्ट्रेलिया के निर्यात

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय गेहूं को अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया और यूक्रेन से कड़ी टक्कर मिल रही है। सितंबर में गेहूं निर्यात की अनुमति दिए जाने के बाद से अब तक केवल 3.60 लाख टन गेहूं निर्यात के सौदे हो पाए हैं। इनमें दो लाख टन मलेशिया और 1.60 लाख टन बांग्लादेश को निर्यात किया गया है।

दूसरे देशों का गेहूं सस्ता होने के कारण भारत से निर्यात में तेजी नहीं आ पा रही है। खाद्य मामलों पर प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह (ईजीओएम) ने 8 सितंबर को गेहूं के निर्यात पर लगी रोक को हटाया था।

प्रवीन कॉमर्शियल कंपनी के डायरेक्टर नवीन गुप्ता ने बताया कि बांग्लादेश और मलेशिया ने ही भारत से गेहूं का आयात किया है। सितंबर से अभी तक केवल 3.16 लाख टन गेहूं निर्यात के सौदे हुए हैं। इसमें मलेशिया ने 2 लाख टन और बांग्लादेश ने 1.60 लाख टन गेहूं का आयात किया है। बांग्लादेश ने और 50 हजार टन गेहूं के आयात के लिए निविदा मांगी है जो 21 नवंबर को बंद होनी है।

ये आर्डर भारतीय निर्यातक को मिलने की संभावना है। आरती रोलर फ्लोर इंडस्ट्रीज लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर बी. सी. सिंगला ने बताया कि बांग्लादेश को 283 डॉलर प्रति टन (सीएंडएफ) और मलेशिया को 316 डॉलर प्रति टन (सीएंडएफ) की दर से निर्यात सौदे हुए हैं।

उधर यूक्रेन के गेहूं का भाव 214 डॉलर प्रति टन एफओबी है जो मलेशिया पहुंचने पर 302-303 डॉलर प्रति टन बैठेगा। इसीलिए मलेशिया की आयात मांग भारत से कम हो गई है। यूक्रेन के पास इस समय करीब 30 लाख टन अतिरिक्त गेहूं बचा है।

ईटीसी एग्रो के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अर्जेंटीना में गेहूं की नई फसल की आवक शुरू हो गई है तथा अर्जेंटीना में 160-165 लाख टन का उत्पादन होने का अनुमान है जबकि घरेलू खपत 70-80 लाख टन की ही है। अर्जेंटीना 235 डॉलर प्रति टन (एफओबी) पर बिकवाली कर रहा है। ऑस्ट्रेलिया में भी चालू सीजन में 290 लाख टन गेहूं का उत्पादन होने का अनुमान है।

वहां के निर्यातक 218 डॉलर प्रति टन (एफओबी) का भाव बता रहे हैं। भारत के मुकाबले ऑस्ट्रेलिया, यूक्रेन और अर्जेंटीना का गेहूं सस्ता होने के कारण ही भारत से गेहूं का निर्यात सीमित मात्रा में ही हो पा रहा है।
केंद्रीय पूल में एक दिसंबर को 276.56 लाख टन गेहूं का भारी-भरकम स्टॉक बचा हुआ है जबकि चालू रबी में गेहूं का उत्पादन 840 लाख टन होने का अनुमान है। (Business Bhaskar....R S Rana)

15 December 2011

खाद्य सुरक्षा विधेयक में सब्सिडी का बोझ बना अड़ंगा

नई दिल्ली December 15, 2011
सरकार पर पडऩे वाला सब्सिडी का भारी बोझ खाद्य सुरक्षा विधेयक के आसानी से पारित होने की राह में सबसे बड़ी बाधा रही है। खाद्य सुरक्षा कानून के लागू होने के साथ ही सरकार को सब्सिडी के मद में बड़ी रकम का प्रावधान करना होगा। इस सप्ताह के शुरू में कैबिनेट ने इस बहुप्रतीक्षित विधेयक को इसलिए टाल दिया क्योंकि कुछ सदस्य इसके परिणामस्वरूप सब्सिडी के मद में भारी बढ़ोतरी से चिंतित थे।इस कानून के प्रभावी होने की स्थिति में सरकार को खरीद मूल्य से काफी कम कीमतों पर गरीबों के बीच अनाज की बिक्री करनी होगी। इस वजह से सब्सिडी के मद में रकम 2011-12 के बजट के अनुसार मौजूदा 60,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 95,000 करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है। सरकार की मौजूदा माली हालत को देखते हुए इस बोझ को सहन करना आसान नहीं लग रहा है।हालांकि यह अनुमान लगाना भी सही नहीं होगा कि प्रस्तावित अधिनियम से सब्सिडी का बोझ इसी वित्त वर्ष से सरकार की वित्तीय सेहत बिगाड़ देगा क्योंकि प्रस्तावित कानून अगले वित्त वर्ष से ही प्रभावी होगा। इससे सरकार को रकम का प्रावधान करने में कुछ समय मिल सकता है। खाद्य सुरक्षा विधेयक की वजह से सब्सिडी में बढ़ोतरी 32,000 करोड़ रुपये की रकम के अतिरिक्त होगी जिसे सरकार को इस योजना को जारी रखने के लिए खर्च करना पड़ेगा।सहायक योजनाओं जैसे गर्भवती महिलाओं को छह महीनों तक प्रति माह 1,000 रुपये देना आदि पर भी सालाना अतिरिक्त खर्च आएगा।बहरहाल यह कहानी का एक पहलू है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में हर बढ़ोतरी से सब्सिडी के प्रतिशत में ज्यादा बढ़ोतरी हो जाती है। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के चेयरमैन और प्रसिद्ध कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी ने कहा, 'फसल के उत्पादन की लागत बढ़ रही है। ऐसे में एमएसपी स्थिर नहीं रखा जा सकता। हमारा अनुमान है कि इसमें अगले 2-3 साल में कम से कम 40-50 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जानी चाहिए। इसका मतलब यह भी हुआ कि सब्सिडी उच्च स्तर पर बनी रहेगी।'इस तरह से 95,000 करोड़ रुपये, 32,000 करोड़ रुपये और एमएसपी का बोझ मिलाकर 1,30,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी का बोझ सरकार पर हो जाएगा। अधिकारियों ने कहा कि कृषि मंत्रालय के बजट में भी महत्त्वपूर्ण बढ़ोतरी होगी, जो वर्तमान के 20,000 करोड़ रुपये सालाना से बढ़कर 1,00,000 करोड़ रुपये हो जाएगा, क्योंकि कार्यक्रमों को सुचारु रूप से चलाने के लिए अतिरिक्त खाद्यान्न की जरूरत होगी।इस तरह से मोटे तौर पर 1,30,000 करोड़ रुपये के साथ कृषि मंत्रालय के 1,00,000 करोड़ रुपये को मिलाकर सरकार को कुल 2,30,000 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे, जिससे प्रभावी तरीके से खाद्य सुरक्षा अधिनियम को लागू किया जा सके। यह वर्तमान में चल रहे किसी भी सामाजिक कल्याण कार्यक्रम के बजट से ज्यादा है। (BS HIndi)

स्थायी समिति पेश करेगी एफसीआरए रिपोर्ट

मुंबई December 15, 2011
खाद्य व उपभोक्ता मामलों पर गठित संसद की स्थायी समिति प्रस्तावित फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट रेग्युलेशन ऐक्ट (एफसीआरए) संशोधन विधेयक 2010 पर अपनी रिपोर्ट मौजूदा शीतकालीन सत्र में पेश करने के लिए तैयार है। समिति की बैठक में सम्मिलित होने वाले एक सूत्र ने कहा - हमने अपनी सुनवाई पूरी कर ली है और अंतिम सिफारिशों की बाबत फैसला कर लिया गया है।एक ओर जहां समिति ने सेबी की तर्ज पर वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) को पूर्ण स्वायत्तता देने पर सहमति जताई है, वहीं इसने आवश्यक जिंसों में वायदा कारोबार की अनुमति दिए जाने के पक्ष में अपनी राय दी है। सूत्रों ने कहा - आवश्यक जिंसों में वायदा कारोबार की अनुमति दिए जाने के मसले पर संसद में जोरदार बहस हो सकती है, बावजूद इसके हमने तार्किक फैसला लिया है, जो इस क्षेत्र के सभी हितधारकों और विशेषज्ञों से हुई बातचीत व तथ्यों पर आधारित है। संयोग से आवश्यक वस्तुओं में वायदा कारोबार शुरू करने की अनुमति दिए जाने के मुद्दे पर सदस्यों के बीच पहले काफी मतभेद था। उन्होंने कहा - आवश्यक जिंसों की कीमतों में उतारचढ़ाव जिंस बाजारों की गतिविधियों के समानांतर हो रहा है और इसके बीच किसी तरह का जुड़ाव नहीं है। उन्होंने कहा कि चीनी व गेहूं के मामले में यह साबित हो चुका है।रिपोर्ट के मुताबिक, एफएमसी को पूर्ण स्वायत्तता दी जाएगी। इसके जरिए एफएमसी खुद नियुक्तियां कर पाएगा। साथ ही सरकारी कैडर या बाजार में मौजूद कर्मचारियों की नियुक्ति का फैसले ले सकेगा और इन कर्मचारियों के वेतन का ढांचा बाजार आधारित होगा और यह एफएमसी ग्रेड के दायरे में भी होगा। यह जिंस बाजारों में नए उत्पादों मसलन ऑप्शन व फ्यूचर पेश कर पाएगा और शिकायत आदि का भी निपटारा कर सकेगा। इसके अलावा सरकार के साथ अनिवार्य रूप से संपर्क किए बिना बाजार के लिए दिशानिर्देश तय कर सकेगा। अपने खर्चों को पूरा करने के लिए एफएमसी के पास अपना कोष होगा और इस तरह से हर तरह के खर्च के लिए इसे सरकार पर आश्रित होने की दरकार नहीं पड़ेगी।इसके अतिरिक्त समिति ने डब्बा कारोबार समेत वायदा बाजार में गलत काम करने वालों से अर्थदंड या जुर्माने वसूलने का अधिकार भी एफएमसी को देने का प्रस्ताव किया है। एफएमसी के चेयरमैन व बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति पर फैसला करने के मामले में खाद्य व उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय नोडल एजेंसी होगा और इससे पहले वह मंत्रालयों से इस बाबत नामांकन का अनुरोध करेगा और ये चीजें कैबिनेट की सहमति से होंगी। फिलहाल यह काम कार्मिक व प्रशिक्षण विभाग के पास है और खाद्य व उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की भूमिका अपने विचार व सिफारिशें पेश करने तक सीमित है।प्रस्तावित संशोधन पर समिति को सबसे पहले अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपनी होगी और फिर संसद इसे खाद्य व उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय को भेजेगा। खाद्य व उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय इस विधेयक के संबंध में प्रशासनिक मंत्रालय है और विधेयक की जांच व सिफारिशों के लिए इस विधेयक को उसके पास भेजा जाएगा। इसके बाद सिफारिशों पर अंतिम मंजूरी के लिए कैबिनेट के सामने रिपोर्ट पेश की जाएगी और यहां से हरी झंडी मिलने के बाद संसद की मंजूरी हासिल की जाएगी।आधिकारिक सूत्र ने कहा कि इस विधेयक से किसान समेत विभिन्न हितधारकों को बेहतर कीमतें हासिल करने व कीमतों से जुड़ी जोखिम का प्रबंधन करने में मदद मिलेगी। वायदा अनुबंध विनियमन अधिनियम 1952 में निम्न संशोधन का प्रस्ताव है - 1. मौजूदा परिभाषाओं को अद्यतन करना और नई परिभाषाएं शामिल करना। 2. एफएमसी के कामकाज व संगठन से जुड़े विभिन्न प्रावधानों में बदलाव। 3. एफएमसी की शक्तियों में इजाफा करना। 4. मौजूदा जिंस एक्सचेंजों का निगमीकरण करना और अलग क्लियरिंग कॉरपोरेशन की स्थापना करना। 5. जिंसों या जिंस डेरिवेटिव में ऑप्शन कारोबार की अनुमति देना। 6. एफसीआरए के लिए अपीलीय ट्रिब्यूनल के तौर पर सिक्योरिटीज अपीलीय ट्रिब्यूनल (एसएटी) को नामित करना। (BS Hindi)

तांबे की रिफाइनिंग से बढ़ेगी कमाई

मुंबई December 15, 2011
कच्चे तांबे का शोधन शुल्क अगले साल के लिए 12.4 फीसदी ज्यादा तय किया गया है, लिहाजा भारतीय तांबा स्मेल्टर को इससे काफी लाभ मिलेगा। हिंडाल्को इंडस्ट्रीज व स्टरलाइट इंडस्ट्रीज समेत देश के तांबा उत्पादकों को रुपये में आई गिरावट का लाभ मिलने की संभावना है क्योंकि ये शुल्क डॉलर में चुकाए जाते हैं।चीन की अग्रणी स्मेल्टर जे कॉपर कॉरपोरेशन और फ्रीपोर्ट एम कॉपर गोल्ड ने साल 2012 के लिए शोधन शुल्क क्रमश: 63.5 डॉलर प्रति टन व 6.35 सेंट प्रति पाउंड देने पर सहमत हुई है। यह वैश्विक कॉपर स्मेल्टर और खनन कंपनियों के लिए बेंचमार्क तय करेगा। ट्रीटमेंट और शोधन का खर्च खनन कंपनियां स्मेल्टर को देती हैं और बदले में उन्हें कैथोड व सिल्लियों समेत शुद्ध तांबे का उत्पाद मिलता है। पीडब्ल्यूसी के वरिष्ठ कंसल्टेंट पी. सेतिया ने कहा - ट्रीटमेंट व शोधन शुल्क में बढ़ोतरी से तांबे के प्रसंस्करण करने में जुटी कंपनियों का राजस्व बढ़ेगा, लेकिन यह सिर्फ प्रसंस्करण शुल्क तक ही सीमित होगा क्योंकि भारत में मोटे तौर पर कॉपर कंसन्ट्रेट का ही आयात होता है।खनन क्षेत्र में अयस्क से धातु निकालने के लिए ट्रीटमेंट व शोधन का खर्च ही मुख्य लागत है। स्मेल्टिंग की प्रक्रिया में धातुओं को गरम कर उससे शुद्ध धातु निकालने का खर्च ही ट्रीटमेंट लागत है यानी इस प्रक्रिया में मशीन के जरिए अयस्क से धातु निकाली जाती है। ऐसे धातुओं के शोधन में इलेक्ट्रो रिफाइनिंग प्रक्रिया का इस्तेमाल होता है और फिर शुद्ध धातु का उत्पादन होता है। ट्रीटमेंट व शोधन लागत खनन कंपनियों की नकद लागत के दो महत्वपूर्ण हिस्से हैं।सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान कॉपर घरेलू खदानों से कंसन्ट्रेट निकालकर 20,000-30,000 टन कॉपर कैथोड व सिल्लियों का सालाना उत्पादन करता है। भारत में 6.80 लाख टन तांबे का उत्पादन होता है और इसमें हिंडाल्को की हिस्सेदारी करीब 3.40 टन है और स्टरलाइट इंडस्ट्रीज 3.10 लाख टन की भागीदारी करता है। इन दोनों अग्रणी कॉपर स्मेल्टर के पास भारत में तांबे की खदान नहीं हैं और ऐसे में यह पूरी तरह आयातित कंसन्ट्रेट पर आश्रित होता है। ऐसे में इन दोनों कंपनियों का वित्तीय प्रदर्शन मोटे तौर पर विदेशी खदानों में अयस्क की गुणवत्ता और डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल पर निर्भर करता है। हिंडाल्को इंडस्ट्रीज के प्रबंध निदेशक डी भट्टाचार्य ने हाल में वैश्विक स्तर पर अयस्क में आई कमी पर चिंता जताई थी।पी रिसर्च के एक विश्लेषक बिकास भलोटिया ने कहा - अगस्त से अब तक रुपये में 22 फीसदी की गिरावट आई है, ऐसे में यह निश्चित तौर पर स्मेल्टर को ज्यादा रकम हासिल करने में मदद करेगा। लेकिन कुल मांग पर देश की मौजूदा वित्तीय स्थिति का प्रभाव निश्चित तौर पर पड़ेगा और यह चिंता की बात है। इस बात की खबर है कि प्रतिकूल आर्थिक परिस्थितियों में तांबे की मांग पर दबाव बना रहेगा। कंसन्ट्रेट के आयात की मात्रा हालांकि अयस्क की गुणवत्ता और इसमें मौजूद तांबे की मात्रा पर निर्भर करता है। मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में औद्योगिक गतिविधियों में नरमी देखी गई है, जो आर्थिक गतिविधियों में गिरावट का संकेत देता है। पहले अनुमान था कि मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में उपभोग में सुधार आएगा, लेकिन मांग पर दबाव बना हुआ है।ऐंजल ब्रोकिंग की वरिष्ठ शोध विश्लेषक रीना वालिया ने कहा - अगले कैलेंडर वर्ष में दूसरी छमाही तक यह रुख जारी रहने की संभावना है क्योंकि सुधार की उम्मीद अभी भी धुंधली है। अगर औद्योगिक गतिविधियों में सुधार के लिए पर्याप्त कदम उठाए गए, तब भी जून 2012 तक उसके वास्तविक असर शायद ही देखने को मिले। भारत में करीब 6.20 लाख टन तांबे की खपत होती है, जो इसके उत्पादन के आसपास ही है। हिंडाल्को व स्टरलाइट हर साल करीब 95,000 टन रिफाइंड तांबे का निर्यात करता है। भारत करीब 1.20 लाख टन तांबे का आयात करता है। (BS Hindi)

12वीं योजना में 50,000 करोड़ रुपये होंगे आवंटित!

कपड़ा सचिव रीता मेनन कपड़ा क्षेत्र को नई ऊंचाई पर ले जाने की खातिर रोडमैप तैयार करने में व्यस्त हैं। नयनिमा बसु को दिए साक्षात्कार में मेनन ने विस्तार से बताया कि वह रोडमैप अपने उत्तराधिकारी के लिए तैयार कर रही हैं क्योंकि 31 दिसंबर को वह सेवानिवृत्त हो जाएंगी। पेश हैं मुख्य अंश : / December 15, 2011
एक अप्रैल से लागू पुनर्गठित तकनीकी उन्नयन कोष योजना उद्योग को उत्साहित करने में नाकाम रही है। इस बारे में आपकी क्या राय है?मेरे विचार से इसकी लोकप्रियता में कमी नहीं आई है। लेकिन अप्रैल के बाद से उद्योग के लिए यह साल असाधारण मुश्किलों भरा रहा है। कपास की कीमतें काफी ऊपर चली गई थीं और अब अचानक धराशायी हो गई हैं। वैश्विक मांग पूरी तरह समाप्त हो गई है। ऐसे में सितंबर तक धागे का भंडार, कपास के भंडार की उच्च लागत आदि को देखते हुए मुझे लगता है कि शुरुआती दौर में टीयूएफएस में थोड़ी सुस्ती नजर आई है। हम इसकी निगरानी कर रहे हैं और इस साल आवंटित 1972 करोड़ रुपये की सब्सिडी के लक्ष्य को देखते हुए कहा जा सकता है कि धीरे-धीरे यह रफ्तार पकड़ेगी। आपने हाल ही कपड़ा क्षेत्र द्वारा लिए गए कर्ज के पुनर्गठन को लेकर बैंकों के साथ बैठक की थी। इस दिशा में कब तक कदम उठाए जा सकते हैं?यह कार्य जारी है। पुनर्वर्गीकरण की औपचारिक स्वीकृति के लिए हम इस मुद्देे को अगले कुछ दिनों में भारतीय रिजर्व बैंक के पास ले जाएंगे, जिससे कर्ज मानक परिसंपत्तियां बने रहें न कि गैर निष्पादित परिसंपत्तियां बन जाएं। वास्तव में यह उद्योग के लिए कठिन समय है। हम चाह रहे हैं कि बैंक ऋणों को 1-2 साल स्थगित कर दें, जिसके दौरान उद्योग ब्याज चुकाता रहे और मूलधन को स्थगित कर दिया जाए। हम यह सतर्कता भी बरत रहे हैं कि सरकार का खर्च ना बढ़े। हम टीयूएफएस और अन्य योजनाओं को बंद करेंगे। इसलिए ऐसा नहीं है कि उद्योग को ज्यादा पैसा मिलेगा। राष्ट्रीय फाइबर नीति के बारे में आपका क्या कहना है? जैसा कि आपने कहा है कि यह 12वीं पंचवर्षीय योजना शुरू होने के बाद अस्तित्व में आएगी। जहां तक उद्योग की विकास दर का सवाल है, यह नीति उसी दिशा में आगे बढऩे का खाका पेश करता है। लंबी अवधि में हम फाइबर में तटस्थता हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि विभिन्न विभागों के कर, शुल्क व अप्रत्यक्ष कर से जुड़ी उम्मीदें हैं। मंत्रालय ने इसे आगे बढ़ा दिया है और वित्त विधेयक पर चर्चा के समय औपचारिक रूप से इन हस्तक्षेपों पर साल दर साल के हिसाब से हम बातचीत कर रहे हैं। अन्य सभी योजनाएं 12वीं योजना के साथ धरातल पर होंगी। नीतिगत ढांचा तैयार है और सिर्फ बजट आवंटन का कम रह गया है, ताकि हम ताजा निवेश, परियोजनाओं व कार्यक्रमों से जुड़े कुछ निश्चित लक्ष्य हासिल कर सकें। इनमें अल्पावधि व लंबी अवधि की योजनाएं हैं और इन्हें हमने 12वीं पंचवर्षीय योजना के साथ पंक्तिबद्ध किया है। आप कितनी रकम के आवंटन की मांग कर रहे हैं?हम कौशल विकास, हैंडलूम क्षेत्र को प्रोत्साहन देने पर बड़ी रकम खर्च करेंगे। साथ ही बुनकरों को सब्सिडी और ब्याज छूट के रूप में दिए जा रहे लाभों को देने की योजना बनाई है। हम टेक्सटाइल पार्क के विकास पर ध्यान दे रहे हैं, जिनकी भारी मांग है। तकनीकी कपड़ों के क्षेत्र में भी अच्छी प्रगति हो रही है। जूट और रेशम उद्योग में हस्तक्षेप की हमारी बड़ी योजना है। तिरुपुर को फिर से उबारने के लिए ध्यान दिया जा रहा है। इसलिए 12वीं पंचवर्षीय योजना में हमने 50,000 करोड़ के आवंटन का आग्रह किया है।तिरुपुर (तमिलनाडु) में संकुल के पुनरुद्धार के लिए आपकी अध्यक्षता वाली समिति क्या कदम उठा रही है? हम तकनीकी और भविष्य की योजना के बारे में तमिलनाडु सरकार का समर्थन मांग रहे हैं। हम उन्हें एक 20 सीईटीपी (कॉमन एफ्लूएंट ट्रीटमेंट प्लांट) बनाने के लिए कहेंगे, जिससे कपड़ा इकाइयों को बंद नहीं करना पड़े। हम चाहते हैं कि राज्य सरकार मद्रास उच्च न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो। सीईपीटी के निर्माण के लिए निवेश करने को केंद्र प्रतिबद्ध है, लेकिन इसके लिए राज्य सरकारों की तरफ से भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। इस साल कपास की कीमतों में अभूतपूर्व गिरावट रही है, क्या आप निर्यातकों को प्रोत्साहन देने पर विचार करेंगी?नहीं, हम निर्यातकों को किसी तरह का प्रोत्साहन नहीं दे रहे हैं। हमारा मानना है कि इसे खुले सामान्य लाइसेंस (ओजीएल) के तहत रखना ही अपने आप में प्रोत्साहन है। इस समय कपास की कीमतें ठीकठाक हैं, ये न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे नहीं आई हैं। (BS Hindi)

14 December 2011

डॉलर की मजबूती से खाद्य तेल हो सकते हैं महंगे

फसल -तिलहन की आवक घटने की संभावना से तेजी को मिलेगा बलइजाफा संभव:- अक्टूबर से अभी तक आयातित खाद्य तेलों की कीमतों में 3 से 6.9 फीसदी की तेजी आ चुकी है। मलेशिया में नवंबर महीने में क्रूड पाम तेल के उत्पादन में 15 फीसदी की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। ऐसे में आगामी दिनों में घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में पांच से सात फीसदी की तेजी आने की संभावना है।डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से खाद्य तेलों की आयात लागत बढ़ गई है। सितंबर से अभी तक रुपये के मुकाबले डॉलर 10 फीसदी मजबूत हो चुका है। जबकि अक्टूबर से अभी तक आयातित खाद्य तेलों की कीमतों में 3 से 6.9 फीसदी की तेजी आ चुकी है। मलेशिया में नवंबर महीने में क्रूड पाम तेल का उत्पादन 15 फीसदी घटा है। ऐसे में आगामी दिनों में घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में पांच से सात फीसदी की तेजी आने की संभावना है।
विजय सॉल्वैक्स लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर विजय डाटा ने बताया कि रुपये के मुकाबले डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है, जिससे आयात खाद्य तेलों की लागत बढ़ गई है। इस समय घरेलू बाजार में तिलहनों की आवक ज्यादा है लेकिन आगामी दिनों में आवक कम हो जायेगी जिससे घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में पांच से सात फीसदी की तेजी आने की संभावना है।
उन्होंने बताया कि आयातित आरबीडी पामोलीन का भाव अक्टूबर में 1,019 डॉलर प्रति टन (सीएंडएफ) मुंबई में था जबकि मंगलवार को इसका भाव बढ़कर 1,090 डॉलर प्रति टन हो गया। क्रूड पाम तेल का भाव इस दौरान 956 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 985 डॉलर प्रति टन हो गया।
के एस ऑयल लिमिटेड के चेयरमैन रमेश गर्ग ने बताया कि सितंबर से अभी तक रुपये के मुकाबले डॉलर में 10 फीसदी की मजबूती आ चुकी है। 29 नवंबर को अमेरिकी डॉलर रुपये के मुकाबले 48.32 के स्तर पर था जबकि मंगलवार को बढ़कर अभी तक के उच्चतम स्तर 53.17 पर पहुंच गया। आयातित खाद्य तेलों की कीमतों में अक्टूबर से अभी तक 3 से 6.9 फीसदी की तेजी आ चुकी है। लेकिन इस दौरान घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में केवल एक से डेढ़ रुपये प्रति किलो की ही तेजी आई है। ऐसे में आयातकों का मार्जिन घट गया है। इसका असर आयात सौदों पर पड़ रहा है।
दिल्ली वैजिटेबल ऑयल ट्रेडर्स एसोसिएशन के सचिव हेमंत गुप्ता ने बताया कि मलेशिया में नवंबर महीने में पाम तेल का उत्पादन 15 फीसदी घटकर 16.3 लाख टन का रहा है तथा एक से दस दिसंबर के दौरान मलेशिया से पाम तेल का निर्यात 4.6 फीसदी घटा है। घरेलू बाजार में सरसों तेल का भाव 700 रुपये, सोया रिफाइंड का 660 रुपये, क्रूड पाम तेल का भाव कांडला पर 510 रुपये, आरबीडी पामोलीन 545 रुपये, बिनौला तेल का 585 रुपये और मूंगफली तेल का 860 रुपये प्रति 10 किलो चल रहा है।
सॉल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार तेल वर्ष 2010-2011 (नवंबर-10 से अक्टूबर-11) के दौरान 86.7 लाख टन खाद्य तेलों का आयात हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 92.04 लाख टन खाद्य तेलों का आयात हुआ था। (Business Bhaskar....R S Rana)

खाद्य बिल पर मंत्रिमंडल की बैठक 18 को!

नई दिल्ली : खाद्य मंत्री केवी थॉमस ने शुक्रवार को कहा कि खाद्य सुरक्षा के महत्वपूर्ण विधेयक पर विस्तारपूर्वक चर्चा करने के लिए आगामी रविवार यानी 18 दिसंबर को मंत्रिमंडल की बैठक हो सकती है। मंत्रिमंडल की कल हुई बैठक में विधेयक पर चर्चा पूरी नहीं हो सकी थी, इसलिए इस पर निर्णय टाल दिया गया था।

हालांकि, कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि विधेयक के मसौदे को मंजूर करने से पहले कुछ राज्यों के प्रस्तावों पर भी विचार करने की जरूरत है। साथ ही उम्मीद जताई कि अगले आठ से 10 दिन में अंतिम चर्चा होगी। थॉमस ने सरकारी खरीद से जुड़े एक समारोह के मौके पर संवाददाताओं से कहा कि मेरी समझ से रविवार को मंत्रिमंडल की विशेष बैठक होगी। उसमें हम इस बारे में चर्चा करेंगे क्योंकि यह महत्वपूर्ण विधेयक है। इस पर बारीकी से हर मुद्दे पर विस्तृत चर्चा होगी।

समारोह में संप्रग सरकार के महत्वपूर्ण घटक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार ने जोर दिया कि राज्य सरकारों का भरोसा प्राप्त करने की जरूरत है क्योंकि ये ही प्रस्तावित अधिनियम को लागू करेंगे। उन्होंने कहा कि सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक लाने के लिए प्रतिबद्ध है। यह गंभीर मुद्दा है। राज्य सरकारों के लिए इसे लागू करना बड़ी जिम्मेदारी होगी।

हम यहां फैसला लेंगे लेकिन राज्य सरकारें ही इसे लागू करेंगी। उन्होंने कहा कि केंद्र का यह भी मानना है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक पर फैसला करते हुए राज्यों को विश्वास में लेने की जरूरत है। मुझे लगता है कि अगले आठ से 10 दिनों में इस मामले में अंतिम चर्चा होगी और मंत्रिमंडल सर्वसम्मति से अपना विचार रखेगा। (Z News)

12 December 2011

यूरोप कर्ज संकट गहराने से वैश्विक कमोडिटी में नरमी

असफलता- संकट से उबरने के प्रयासों पर निवेशकों को भरोसा नहींनरमी का लाभ:- कॉपर की कीमतों में गिरावट का फायदा चीन को मिल रहा है। चीन की ओर से नई औद्योगिक मांग निकल रही है। चीन में शनिवार को पेश किए आंकड़ों के अनुसार, कॉपर का आयात नवंबर में 17.9 फीसदी बढ़कर 4,52,022 टन हो गया।यूरोप में आर्थिक एकीकरण के लिए प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन इससे निवेशकों में भरोसा पैदा नहीं हो पा रहा है। यही वजह है कि न्यूयॉर्क कमोडिटी एक्सचेंज (नायमेक्स), लंदन मेटल एक्सचेंज (एल एमई) और शंघाई कमोडिटी एक्सचेंज में बेस मेटल्स में गिरावट दर्ज की गई।नायमैक्स में क्रूड ऑयल जनवरी की डिलीवरी १.६६ डॉलर गिरकर ९७.७५ डॉलर प्रति बैरल रह गए जबकि ब्रैंट १.६२ डॉलर गिरकर १०७ डॉलर प्रति बैरल रह गए।
एल एमई में तीन महीने की कॉपर डिलीवरी 2.24 फीसदी गिरकर 7,640 डॉलर प्रति टन रह गए। सोमवार को कारोबारी सत्र की शुरुआत में यह गिरकर 7,617.25 डॉलर प्रति टन तक गिरकर चला गया था। कॉपर में 30 नवंबर 2011 के बाद सर्वाधिक गिरावट दर्ज की गई। नायमेक्स में कॉपर तीन महीने की डिलीवरी 2.38 फीसदी गिरकर 346.60 डॉलर प्रति पाउंड रह गए।शंघाई में कॉपर तीन महीने की डिलीवरी 22.06 युआन गिरकर 444.70 युआन प्रति टन के स्तर पर पहुंच गया।
लंदन में एल्यूमीनियम तीन महीने की डिलीवरी 1.84 फीसदी गिरकर 2,027 डॉलर प्रति टन रह गए। वहीं शंघाई कमोडिटी एक्सचेंज में 17.94 युआन गिरकर एल्यूमीनियम की तीन महीने की डिलीवरी के भाव 2,470 युआन प्रति टन रह गए।
यूरोप में कर्ज का संकट गहराता जा रहा है और इसके लिए किए जा रहे उपाय पर्याप्त नहीं जो निवेशकों में भरोसा पैदा कर सकें। मेरिल लिंच के विश्लेषक माइकल विडूर का कहना है कि अमेरिका अर्थव्यवस्था की चाल लंबे समय से सुस्त पड़ गई है और यूरोप में लगातार कर्ज का संकट बना हुआ है जिससे मेटल्स में गिरावट दर्ज की गई।
कॉपर की कीमतों में गिरावट का फायदा चीन को मिल रहा है। चीन की ओर से नई औद्योगिक मांग निकल रही है। चीन में शनिवार को पेश किए आंकड़ों के अनुसार, कॉपर का आयात नवंबर में 17.9 फीसदी बढ़कर 4,52,022 टन हो गया। (Business Bhaskar)

प्याज की मंदी थामने को निर्यात मूल्य और घटाने की तैयारी

सरकार प्याज की घटती कीमतों से परेशान किसानों को राहत देने के लिए न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) में 50 डॉलर प्रति टन की और कटौती कर सकती है। नवंबर महीने में सरकार ने दो बार प्याज के एमईपी में क्रमश: 125 और 100 डॉलर प्रति टन की कटौती की थी।
सितंबर के मुकाबले अक्टूबर महीने में प्याज का निर्यात 29.5 फीसदी कम हुआ है जबकि महाराष्ट्र के बाद गुजरात में भी नई फसल की आवक शुरू हो गई है। जिससे उत्पादक मंडियों में प्याज का दाम घटकर तीन से सात रुपये प्रति किलो रह गया।
उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कृषि मंत्रालय ने प्याज के एमईपी में और कटौती की सिफारिश की है। वैसे भी खरीफ की नई फसल आने से राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात की मंडियों में प्याज के दाम लगातार घट रहे हैं। इसलिए मौजूदा एमईपी में और भी 50 डॉलर प्रति टन की कटौती करने पर विचार चल रहा है। उन्होंने बताया कि अक्टूबर महीने में केवल 93,000 टन प्याज का ही निर्यात हुआ है जबकि सितंबर महीने में 1.32 लाख टन का निर्यात हुआ था। इस समय प्याज का एमईपी 250 डॉलर प्रति टन है।
सरकार ने 18 नंवबर को प्याज के एमईपी में 125 डॉलर और फिर 28 नवंबर को 100 डॉलर की कटौती की थी। चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले सात महीनों अप्रैल से अक्टूबर के दौरान 8.56 लाख टन प्याज का निर्यात हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 10.14 लाख टन का निर्यात हुआ था। एनएचआरडीएफ के अनुसार वर्ष 2011-12 में प्याज का उत्पादन बढ़कर 151 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 145 लाख टन का उत्पादन हुआ था।
गुजरात ओनियन कंपनी के डायरेक्टर सुरेंद्र साहनी ने बताया कि महाराष्ट्र के बाद गुजरात में भी नए प्याज की आवक शुरू हो गई है। नासिक मंडी में प्याज का भाव घटकर 4,00 से 700 रुपये और राजस्थान की मंडियों में 3,00 से 5,00 रुपये प्रति क्विंटल रह गया। गुजरात की मंडियों में 90 से 120 रुपये प्रति 20 किलो प्याज बिक रहा है।
दिल्ली में प्याज का भाव घटकर 5,00 से 600 रुपये प्रति क्विंटल रह गया तथा दिल्ली में दैनिक आवक 30 से 35 हजार कट्टों (एक कट्टा-40 किलो) हो रही है इसमें 90 से 95 फीसदी आवक राजस्थान से हो रही है। चालू महीने के आखिर में महाराष्ट्र से और जनवरी के पहले सप्ताह में गुजरात में प्याज की आवक बढ़ जाएगी जिससे दाम घटने की ही संभावना है। (Business Bhaskar.....R S Rana)

'किसानों को मिलेगी सब्सिडी'

मुंबई December 12, 2011
कपास की कीमतें महाराष्ट्र सरकार के लिए गले की हड्डी बनती जा रही है। जहां किसान संगठन व विपक्षी दल कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाए जाने की मांग कर रहे हैं, वहीं सरकार चुनाव आचार संहिता लागू होने का हवाला देकर इस पर कुछ भी बोलने से बच रही है। कपास की कीमतों को लेकर जारी हो हल्ला को देखते हुए घरेलू मांग कमजोर बनी हुई है। सोमवार से शुरू हुआ राज्य विधानसभा के शीतकालीन सत्र का पहला दिन कपास की कीमतों की भेंट चढ़ गया। विपक्षी दलों ने किसानों को ज्यादा मूल्य दिये जाने के मुद्दे को लेकर सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी। किसान संगठनों और विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार कपास किसानों के साथ भेदभाव कर रही है। जब गन्ने का न्यूनतम मूल्य बढ़ाया जा सकता है तो कपास, सोयाबीन और धान का मूल्य बढ़ाने में सरकार को परेशानी क्यों हो रही है। विपक्षी नेता एकनाथ खडसे के मुताबिक जब तक किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलेगा, तब तक सदन में कामकाज नहीं हो पाएगा। बिजली का बिल, पानी, खाद और मजदूरी में बढ़ोतरी हो गई है, जिससे प्रति हेक्टेयर उपज की लागत बढ़ गई है। ऐसे में किसानों को उनकी फसल के लिए जो मूल्य तय किया गया है, वह कम है। इसीलिए किसान संगठन और विपक्षी दल लंबे समय से सरकार से मांग कर रहे हैं कि कपास सहित सोयाबीन और धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया जाए, लेकिन सरकार चुप है। इसके लिए सदन की कार्यवाही में विपक्षी दल शामिल नहीं हो रहे हैं और न ही सदन को चलने दे रहे हैं।सत्ताधारी कांग्रेस और एनसीपी विपक्ष के इस रवैये को गैरजिम्मेदाराना बताते हुए कहते हैं - सभी लोग चाहते हैं कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिले, जिसके लिए राज्य सरकार ने केंद्र से बात भी की है। लेकिन फिलहाल कीमतों को नहीं बढ़ाया जा सकता है क्योंकि राज्य के कई हिस्सों में निकाय चुनाव हो रहे हैं, जिसके चलते आचार संहिता लागू है। बकौल मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण कपास का एमएसपी बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार से बात हो चुकी है। उन्होंने कहा - हमने तय किया है कि प्रति क्ंिवटल नहीं बल्कि प्रति हेक्टेयर के हिसाब से किसानों को सब्सिडी दी जाएगी, लेकिन निकाय चुनाव के कारण चल रही आचार संहिता की वजह से राहत दिये जाने की घोषणा रोक ली गई है। जैसे ही चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, इसका ऐलान कर दिया जाएगा। इस साल केंद्र सरकार ने कपास का एमएसपी 3150 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, जबकि किसान संगठन 6000 रुपये प्रति क्विंटल की मांग कर रहे हैं। सत्ता पक्ष के सूत्रों की मानी जाए तो सरकार कपास की कीमतें बढ़ाने का खाका तैयार कर चुकी है। अगर प्रति क्विंटल कीमतें दी जाएंगी तो इसका मूल्य 4285 रुपये प्रति क्विंटल दिये जाने की योजना बनाई गई है, लेकिन चुनाव आचार संहिता लागू होने के कारण सरकार इस बात की घोषणा नहीं कर पा रही है। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया से प्राप्त कीमतों के अनुसार इस समय शंकर-6 किस्म का कपास 9870 रुपये ( 35100 रुपये प्रति कैंडी) के भाव बिक रहा है जबकि एक महीना पहले इसका भाव 10770 रुपये प्रति क्विंटल था। कपास की कीमतों में लगातार हो रही गिरावट की वजह घरेलू बाजार में कमजोर मांग को माना जा रहा है। इस समय देश भर की मंडिय़ों में हर दिन करीब 85,000 से 90,000 गांठ की आवक हो रही है, लेकिन कीमतों में अभी और कमी होने की आशंका को देखते हुए घरेलू मिले खरीदारी करने से बच रही हैं। पिछले साल की अपेक्षा इस साल देश में कपास की पैदावार भी 8 फीसदी बढ़कर 361 लाख गांठ (एक गांठ बराबर 170 किलोग्राम) होने की संभावना है, जिसकी वजह से कीमतों में गिरावट हो रही है। (BS Hindi)

हीरा कारोबारियों को पुराना केंद्र ही भाये, नया बोर्स नहीं लुभाये

मुंबई December 12, 2011
हीरा कारोबार को बढ़ावा देने के लिए अरबों रुपये की लागत से बना भारत डायमंड बोर्स (बीडीबी) अभी तक कारोबारियों की पहली पसंद नहीं बन पाया है। कई समस्याओं के बावजूद अभी भी हीरा कारोबारियों के दिलो-दिमाग में ओपेरा हाउस का इलाका ही बसा हुआ है। कारोबारियों की दिलचस्पी के कारण इस इलाके में प्रॉपर्टी की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं जबकि बांद्रा कुर्ला कॉम्लेक्स (बीकेसी) में बीडीबी की कीमतों में गिरावट दर्ज की जा रही है।हीरा कारोबार के गढ़ ओपेरा हाउस के प्रसाद चैंबर में हाल में कुछ फ्लैटों (दफ्तर) की बिक्री ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हीरा कारोबारियों की पसंद बीडीबी नहीं बल्कि ओपेरा हाउस है। रियल एस्टेट में मंदी की वजह से चारों ओर कीमतें कम हो रही हैं या फिर स्थिर हैं, लेकिन इस इलाके में कारोबारियों की भारी मांग की वजह से कीमतें पिछले साल के मुकाबले करीब 25-30 फीसदी बढ़ गई हैं। प्रसाद चैंंबर की पहली मंजिल पर 700 वर्ग फुट के एक दफ्तर का सौदा 63,500 रुपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से हुआ, जबकि तीसरी मंजिल में 300 वर्ग फुट का दफ्तर 70 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से बेचा गया है। पंचरत्ना बिल्डिंग की 17वीं मंजिल में 900 वर्ग फुट के भी एक दफ्तर का सौदा होने वाला है, जिसकी कीमत 70 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट मांगी जा रही है जबकि कारोबारियों ने इसकी कीमत 65 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट लगा रखी है। जानकारों की राय में इसका सौदा 70 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट के आसपास होना मुमकिन है क्योंकि इस इलाके में दफ्तर मिलना मुश्किल होता है। हीरा कारोबार का प्रमुख गढ़ होने की वजह से कारोबारी किसी भी कीमत पर दफ्तर खरीदने के लिए तैयार हो जाते हैं। दूसरी ओर आधुनिक सुविधाओं से लैस बीडीबी मंदी का शिकार होने लगा है। बीडीबी में चार महीने पहले दफ्तरों की कीमत 70 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट थी जो इस समय गिरकर 54 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट पर आ गई है। प्रसाद चैंबर के सचिव सतीश शाह कहते हैं कि कारोबारियों की मांग की वजह से कीमतें बढ़ रही हैं। नए दफ्तर नहीं बन रहे हैं। इसीलिए अगर कोई कंपनी पुराना दफ्तर बेचती है तो उसे खरीदने के लिए 10 लोग लाइन में खड़े हो जाते हैं। जिन लोगों ने अपने दफ्तर की बिक्री है, वे छोटे हीरा कारोबारी हैं, जो मंदी की वजह से सौदा कर रहे हैं। छोटे और मध्यम कारोबार करने वाले कारोबारी बीकेसी नहीं जाना चाहते हैं क्योंकि वह महंगा पड़ रहा है। ओपेरा हाउस इलाके के लगभग सभी बिल्डिगों में रखरखाव शुल्क कम है, जबकि बीडीबी में 30-40 रुपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से यह शुल्क देना पड़ता है। लोकल टे्रन की कनेक्टिविटी भी एक बड़ा मुद्दा है। हीरा कारोबार के जानकार हार्दिक हुंडिया कहते हैं कि हीरा कारोबारियों के बीच प्रसाद चैंंबर, पंचरत्ना व ओपेरा हाउस के दूसरे चैंंबरों में दफ्तर खरीदने की ललक कम नहीं हुई है। इसकी बड़ी वजह इस इलाके में पहले से जमा जमाया कारोबार है और दूसरी बात बीकेसी में असुरक्षा जैसी भावनाएं कारोबारियों को यहां से बाहर निकलने नहीं दे रही हैं।ओपेरा हाउस की करीब 13 बिल्डिगों में हीरा कारोबार होता है, जिन्हें देश के सबसे बड़े हीरा बाजार के रूप में जाना जाता है। जुलाई में प्रसाद चैंंबर के पास हुए बम धामके के बाद माना जा रहा था कि यह कारोबार बीकेसी के बीडीबी में शिफ्ट हो जाएगा और यहां कीमतें घटने लगेंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। नाइन डायमंड के चेयरमैन संजय शाह कहते हैं कि बीकेसी में परविहन एक बड़ी समस्या है। दूसरी बात यह इलाका शाम 6 बजे बाद एकदम सुनसान हो जाता है, जिससे बाहर से आने वाले डायमंड ब्रोकर वहां नहीं जाना चाहते हैं और कारोबारियों को भी डर सताता है कि बांद्रा से बीकेसी जाने पर उनके जान माल का खतरा रहेगा। ओपेरा हाउस चर्नी रोड स्टेशन के पास है जिससे गुजरात या मुंबई के दूसरे हिस्सों से आने वाले कारोबारी, दलाल और ग्राहक आसानी से यहां आ जाते हैं। बढ़ सकता है किरायादफ्तरों की कीमत बढऩे के साथ ही यहां के दफ्तरों का किराया भी बढऩे वाला है। रियल एस्टेट एंजेटों और कारोबारियों की मानी जाए तो जनवरी से यहां के दफ्तरों का किराया 25 से 30 फीसदी बढ़ा दिया जाएगा। इस समय यहां दफ्तरों का किराया हर महीने 300 रुपये से 500 रुपये प्रति वर्ग फुट देना होता है, जो जनवरी से बढ़कर 400 रुपये से 700 रुपये प्रति वर्ग फुट तक पहुंच सकता है। दूसरी तरफ बीडीबी में दफ्तरों की बुकिंग तो हो गई है, लेकिन अभी तक महज 27 हीरा कंपनियों ने ही यहां से कारोबार शुरू किया है। किराये पर दफ्तर लेने वालों का तो पूरी तरह अकाल है। (BS Hindi)